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आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक

Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)

DevanagariHindipublished235 pages

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शरलोमा का सत्त्ववाद

शरलोमाः—पारीक्षिमौद्रल्य के बाद शरलोमा ने कहा किः—

शरलोमातुनेत्याह न ज्ञात्मात्मानमात्मना ।

योजयेद्वयाधिभिर्दुःखैर्दुःखद्वेषी कदाचन ॥

रजस्तमोभ्यांतुमनः परीतं सत्त्वसंज्ञकम् ।

शरीरस्य समुत्पत्तौ विकाराणांच कारणम् ॥

अर्थात् आत्मा को शरीर का तथा रोगों का उत्पादक कहना उचित नहीं है; क्योंकि दुःखद्वेषी आत्मा अपने आपको कदापि दुःख में नहीं डाल सकता। वास्तव में सत्त्व—संज्ञक मन ही जब रजोगुण तमोगुणों से व्याप्त होता है तब वह शरीर तथा रोगों की उत्पत्ति में कारण बन जाता है।

इस पर से ज्ञात होता है कि सत्त्ववादी आत्मा का अस्तित्व स्वीकार करते हुए भी उसको कर्ता नहीं मानते बल्कि उदासीन मानते हैं। इस तरह एक को उदासीन व दूसरे को कर्ता मानना यह भी व्यक्त करता है कि सत्त्ववादी, आत्मा व सत्त्व दोनों को अनादि मानते हैं।

उक्त श्लोकद्वय पर से सत्त्ववाद के विषय में इससे अधिक अनुमान नहीं होसकता और यह भी निश्चय पूर्वक