आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक
Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)
Page 59 of 235
Read in contextवायोविद् का रसवाद और त्रिधातु सिद्धान्त
३७
( सचेतन ) रूप-धारिणी वह ( आर्तविक जलरूपा ) पहिली संस्कृति है जिसमें ( घटक के रूप में ) सोम, प्रधान होकर मित्र, वरुण और अग्नि भी हैं। सारांश सचेतन स्मृति को पैदा करनेवाला आर्तविक जल जिन घटकों का मिश्रण है उनमें सोम ही प्रधान होकर सचेतन स्मृति को पैदा करने के पूर्व आर्तविक जलों को पैदा करना उसका पहिला संस्कार है। इस सोम को ही ‘ अदभ्यः संश्रुतः प्रथिव्यैरसाच्छ विश्वकर्मणः समवर्तताम्रे ’ ( यजु० अ० ३१ मं० १७ ) इस मंत्र में ‘ रस ’ शब्द से संबोधित किया है। ( आगे प्रजापतिवाद के विवेचन के समय सोम तथा जलों पर हम अधिक विचार करेंगे )
त्रिधातु-सिद्धान्तवादी वायोविद् की दृष्टि से भी आर्तविक जल, वायु ( मित्र वरुण ) अग्नि और सोम इनका अर्थात् त्रिधातुओं का ही मिश्रण है। और जलगत सोम को ही वे ‘ रस ’ शब्द से संबोधित करते हैं। यद्यपि सिद्धान्त पक्ष में वे वायु-अग्नि-सोम इस त्रयी को पुरुषरोगोत्पादक कहते हैं तथापि यहां रसवाद का समर्थन करके उन्होंने यह व्यक्त किया है कि अचेतन द्रव्यों को सचेतन द्रव्यों में संगठित करनेवाला धर्म मुख्यतः जलगत रस अर्थात् सोम ही है।
उक्त रस विषयक मत अग्नीपोमलोक-पक्षियों का है। पंचात्मक लोक पक्षियों में भी कुछ उक्त मत को स्वीकार करते