Skip to content
SarvaKosh
Back to the archive

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

Report a copyright issue

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

About this granth

The Atharvaveda (अथर्ववेद) is one of the four Vedas. Besides ritual hymns it contains many verses concerned with everyday life: protection from disease, healing plants, the welfare of house and family, defence against enemies, marriage, kingship and praise of the earth, including the well-known Prithvi Sukta.

The introduction to this edition notes that Patanjali, author of the Mahabhashya, knew nine branches of the Atharvaveda, of which only a few, such as the Paippalada and Shaunaka, survive. The translation follows the Shaunaka recension, which the introduction describes as having 20 kandas, 731 suktas and 5,987 mantras. Each sukta is headed by its deity, for example the waters, Brihaspati, the rivers, plants, Brahmanaspati, the jangida amulet, Indra, the apamarga herb, and the house and its guardian, so the subject of each hymn is clear at a glance.

The Sanskrit mantras are accompanied by a simple Hindi rendering by Dr. Ganga Sahay Sharma. This is the 2015 edition of Sanskrit Sahitya Prakashan, New Delhi, part of its set of the four Vedas, and runs to 1063 pages.

Page 624Permalink

उत्तिष्ठत सं नह्यध्वं मित्रा देवजना यूयम्.
संदृष्टा गुप्ता वः सन्तु या नो मित्राण्यर्बुदे.. (२)
हे मित्रो अर्थात् हमारी विजय के प्रदानशील देवगणो! तुम सेना की इस छावनी से
विजय प्राप्ति के लिए प्रार्थना करो. आप के द्वारा दिए हुए हमारे योद्धा आप के द्वारा रक्षित
हैं. हे अर्बुद सर्प! हमारे जो मित्र हैं जो हमारे शत्रुओं के साथ युद्ध करने के लिए आए हैं, उन
के तुम अंग बनो. (२)
उत्तिष्ठतमा रभेथामादानसंदाननाभ्याम्. अमित्राणां सेना अभि धत्तमर्बुदे..
(३)
हे अर्बुदि सर्प! तुम और निर्बुद इस स्थान से चले जाओ. तुम यहां से दूर जाओ. तथा
युद्ध करो. तुम आदान और संदान नाम की रस्सियों से शत्रुओं की सेना को बांधो. (३)
अर्बुदिर्नाम यो देव ईशानश्च न्यर्बुदिः.
याभ्यामन्तरिक्षमावृतमियं च पृथिवी मही.
ताभ्यामिन्द्रमेदिभ्यामहं जितमन्वेमि सेनया.. (४)
अर्बुदि, ईशान और न्यर्बुदि नाम के जो देव है, उन के द्वारा आकाश और विशाल पृथ्‍वी
को ढक लिया है. स्वर्ग और धरती को व्याप्त कर के स्थित एवं इंद्र के मित्र अर्बुदि और
न्यर्बुदि के द्वारा जीती हुई सेना का मैं अनुगमन करूं. (४)
उत्तिष्ठ त्वं देवजनार्बुदे सेनया सह.
भञ्जन्नमित्राणां सेनां भोगेभिः परि वारय.. (५)
हे देव जाति से संबंधित अर्बुदि नाम के सर्प! तुम अपनी सेना के साथ उठो. इस के बाद
तुम शत्रुओं की सेनाओं का वध करते हुए अपने सर्प शरीरों के द्वारा उन की आंखें बंद कर
लो. (५)
सप्त जातान् न्यर्बुद उदाराणां समीक्ष्यन्.
तेभिष्ट्वमाज्ये हुते सर्वैरुत्तिष्ठ सेनया.. (६)
हे न्यर्बुदि नाम के सर्प! पहले बताए हुए आंखों को बंद करने वाले सब शरीरों के शत्रुओं
को दिखाते हुए तुम घृत एवं आज्य के होने पर उन सब के द्वारा जाते हुए शत्रुओं को उन सब
को दिखाओ जो उन की आंखों को बंद कर देते हैं. तुम उन सब के साथ हमारी सेना के संग
उठो. (६)
प्रतिघ्नानाश्रुमुखी क्रुधकर्णी च क्रोशतु.
विकेशी पुरुषे हते रदिते अर्बुदे तव.. (७)
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 625Permalink

हे अर्बुदि नाम के सर्प! तुम्हारे द्वारा काटे जाने पर हमारे शत्रु पुरुष के मर जाने पर उस
की पत्नी छाती पीटती हुई, आंसू बहाती हुई, गहनों से शून्य कानों वाली, बाल बिखराए हुए
रोए. (७)
संकर्षन्ती करूकरं मनसा पुत्रमिच्छन्ती.
पतिं भ्रातरमात् स्वान् रदिते अर्बुदे तव.. (८)
हे अर्बुदि नाम के सर्प! काटने के कारण शरीर में विष फैल जाने पर शत्रु की पत्नी हाथ
मलती हुई विष के नाश के लिए अपने पुत्र की इच्छा करती हुई, इस के बाद पति की भी
इच्छा करती हुई तथा विष दूर करने के लिए अपने संबंधियों की इच्छा करें. (८)
अलिक्लवा जाष्कमदा गृध्राः श्येनाः पतत्रिणः.
ध्वाङ्क्षाः शकुनयस्तृप्यन्त्वमित्रेषु समीक्षयन् रदिते अर्बुदे तव.. (९)
हे अर्बुदि नाम के सर्प! तुम्हारे द्वारा हमारे शत्रुओं को काटे जाने पर धृष्ट पक्षी, शरीर को
कष्ट देने वाले पक्षी, गिद्ध, बाज तथा अन्य मांस खाने वाले पक्षी और कौवे, जो हमारे शत्रुओं
का मांस खाने की प्रतीक्षा कर रहे हैं, वे तृप्त हों. (९)
अथो सर्वं श्वापदं मक्षिका तृप्यतु क्रिमिः.
पौरुषेये ऽ धि कुणपे रदिते अर्बुदे तव.. (१०)
हे अर्बुदि! तुम्हारे द्वारा काटे जाने पर हमारे शत्रुओं के शरीर में जो घाव हो जाते हैं, उन
के शरीर को खा कर मांसभक्षी पशु, मक्खियां और कीड़े तृप्त हों. (१०)
आ गृह्लीतं सं बृहतं प्राणापानान् न्यर्बुदे.
निवाशा घोषाः सं यन्त्वमित्रेषु समीक्षयन् रदिते अर्बुदे तव.. (११)
हे न्यर्बुदि तथा अर्बुदि नाम के सर्पो! तुम हमारे शत्रुओं के प्राण और अपान को ग्रहण
करो. तुम्हारे द्वारा हमारे शत्रुओं को काटे जाने पर उन्हें देखने वालों के द्वारा दुःख भरे स्वर
उच्चारण किए जाएं. (११)
उद् वेपय सं विजन्तां भियामित्रान्सं सृज.
उरुग्राहैर्बाहुड्कैर्विध्यमित्रान् न्यर्बुदे.. (१२)
हे न्यर्बुदि नाम के सर्प! तुम हमारे शत्रुओं को कंपित करो. तुम्हारे भय के कारण वे
अपने स्थान से भाग जाएं. इस के बाद तुम हमारे शत्रुओं के पैरों और हाथों को बांध कर
मारो. (१२)
मुह्यन्त्वेषां बाहवश्चित्ताकूतं च यद्धृदि.
मैषामुच्छेषि किं चन रदिते अर्बुदे तव.. (१३)
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 626Permalink

हे अर्बुदि नाम के सर्प! तुम्हारे खाए जाने पर उन शत्रुओं की भुजाएं निष्क्रिय हो जाएं.
उन के मन में जो भी भावनाएं हैं, वे भी मोहित हो जाएं. हमारे शत्रुओं की जो रथ, घोड़ा
हाथी आदि सेना है, वह भी शेष न बचे. (१३)
प्रतिघ्नाना: सं धावन्तूर: पटूरावाघनाना:.
अघारिणीर्विकेश्यो रुदत्य १: पुरुषे हते रदिते अर्बुदे तव.. (१४)
हे अर्बुदि! तुम्हारे द्वारा जिन के पतियों को काटा गया है. हमारे उन शत्रुओं की पत्नियां
अपने हाथों से अपने मुख और सीने को पीटती हुई, केश बिखेरे हुए उन मृत पुरुषों के समीप
शीघ्र जाएं. (१४)
श्वन्वतीरप्सरसो रूपका उताबुँदे.
अन्तःपात्रे रेरिहतीं रिशां दुर्णिहितैषिणीम्.
सर्वास्ता अर्बुदे त्वममित्रेभ्यो दृशे कुरूदारांश्च प्र दर्शय.. (१५)
हे अर्बुदि! तुम हमारे शत्रुओं की माया के द्वारा निर्मित ऐसी अप्सराओं को दिखाओ,
जिन के साथ शिकारी कुत्ते हों. तुम उन्हें ऐसी गायों को दिखाओ जो पात्र को बारबार चाट
रही हों. तुम उन्हें उल्कापात आदि अद्भुत अपशकुन दिखाओ. (१५)
खडूरे ऽ धिचङ्क्रमां खर्विकां खर्ववासिनीम्.
य उदारा अन्तर्हिता गन्धर्वाप्सरसश्च ये.
सर्पा इतरजना रक्षांसि.. (१६)
हे अर्बुदि नाम के सर्प! तुम हमारे शत्रुओं को माया के द्वारा निर्मित ऐसे छोटे प्राणियों
को दिखाओ. जो आकाश में चलफिर रहे हों और धीमी आवाज कर रहे हों. (१६)
चतुर्दंष्ट्रांश्छायावदतः कुम्भमुष्काँ असृङ्मुखान्. स्वभ्यसा ये चोद्भ्यसा:..
(१७)
जो यक्ष, राक्षस आदि अपनी माया से छिपे रहते हैं, उन काले रंग वालों और चार दांतों
वालों को हमारे शत्रुओं को दिखाओ. जो राक्षस अनेक रूपों के कारण भयानक हैं, उन्हें भी
तुम हमारे शत्रुओं को दिखाओ. (१७)
उद् वेपय त्वमर्बुदे ऽ मित्राणाममूः सिचः.
जयांश्च जिष्णुश्चामित्राँजायतामिन्द्रमेदिनौ.. (१८)
हे अर्बुदि नाम के सर्प! विष की अधिकता के कारण हमारे शत्रुओं की जो सेनाएं दुखी
हैं, उन्हें कंपित करो. हे विजय प्राप्त करने वाले अर्बुदि और न्यर्बुदि नाम के सर्पो! तुम हमारे
शत्रुओं को पराजित करते हुए विजयी बनो एवं इंद्र के साथ मिल कर हमें विजयी बनाओ.
(१८)
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 627Permalink

प्रब्लीनो मृदितः शयां हतो ३ मित्रो न्यर्बुदे.
अग्निजिह्वा धूमशिखा जयन्तीयर्न्तु सेनया.. (१९)
हे न्यर्बुदि नाम के सर्प! हमारे शत्रु तुम्हारे द्वारा काटे जाने पर प्राण हीन हो कर सोएं.
तुम्हारे द्वारा माया के बल से उत्पन्न की गई अग्नि की ज्वालाएं और धुएं की शिखाएं हमारे
शत्रुओं की सेना को पराजित करती हुई हमारे साथ चलें. (१९)
तयार्बुदे प्रणुत्तानामिन्द्रो हन्तु वरंवरम्.
अमित्राणां शचीपतिर्मामीषां मोचि कश्चन.. (२०)
हे अर्बुदि नाम के सर्प! तुम्हारे द्वारा युद्ध भूमि से भगाए गए हमारे जो शत्रु हैं, उन में जो
श्रेष्ठ हैं, उन्हें शची के पति इंद्र मारें. वे हमारे किसी शत्रु को न छोड़ें. (२०)
उत्कसन्तु हृदयान्यूर्ध्वः प्राण उदीषतु.
शौष्कास्यमनु वर्तताममित्रान् मोत मित्रिणः.. (२१)
हमारे शत्रुओं के हृदय उन के शरीर से निकल जाएं. उन की प्राण वायु भी उन के शरीर
से निकल जाए. मुख सूख जाने से हमारे शत्रु मर जाएं. हमारे मित्रों का मुख न सूखे. (२१)
ये च धीरा ये चाधीराः पराञ्चो बधिराश्च ये.
तमसा ये च तूपरा अथो बस्ताभिवासिनः.
सर्वांस्तां अर्बुदे त्वममित्रेभ्यो दृक्षे कुरूदारांश्च प्र दर्शय.. (२२)
हे अर्बुदि नाम के सर्प! हमारे शत्रुओं में जो वीर कायर, युद्ध से भागने वाले, भय के
कारण कुछ न सुनने वाले, बिना सींग के पशुओं के समान हानि न पहुंचाने वाले और भेड़ों के
समान शब्द करने वाले हैं, उन सब को अपनी माया से पराजित होने वाला बनाओ. हे सर्प!
तुम हमारे शत्रुओं को अपनी माया के द्वारा उल्कापात आदि अपशकुन दिखाओ. (२२)
अर्बुदिश्च त्रिषन्धिश्चामित्रान् नो वि विध्यताम्.
यथैषामिन्द्र वृत्रहन् हनाम शचीपते ऽ मित्राणां सहस्रशः.. (२३)
त्रिषंधि अर्थात् सेना को मोहित करने वाला देव और अर्बुदि नाम का सर्प हमारे शत्रुओं
को अनेक प्रकार से चोट पहुंचाए. हे शचीपति इंद्र! हम जिस प्रकार उन शत्रुओं से संबंधित
लोगों को हजारों की संख्याओं में मारे, हमें ऐसी शक्ति दो. (२३)
वनस्पतीन् वानस्पत्यानोषधीरुत वीरुधः.
गन्धर्वाप्सरसः सर्पान् देवान् पुण्य-जनान् पितॄन्.
सर्वांस्तां अर्बुदे त्वममित्रेभ्यो दृशे कुरूदारांश्च प्र दर्शय.. (२४)
हे अर्बुदि नाम के सर्प! तुम हमारे शत्रुओं को अपनी माया से वृक्षों, वृक्षों के विकारों,
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 628Permalink

गेहूं, जौ आदि फसलों, वन के वृक्षों गंधर्वों और अप्सराओं को दिखाओ. तुम उन्हें उल्कापात
आदि अद्भुत अपशकुन दिखाओ. (२४)
ईशां वो मरुतो देव आदित्यो ब्रह्मणस्पतिः.
ईशां व इन्द्रश्चाग्निश्च धाता मित्रः प्रजापतिः.
ईशां व ऋषयश्चक्रुरमित्रेषु समीक्षयन् रदिते अर्बुदे तव.. (२५)
हे शत्रुओ! मरुत देव और ब्रह्मणस्पति तुम्हारे शिक्षक हों. इंद्र, अग्नि, धाता, मित्र और
प्रजापति तुम्हारा नियंत्रण करने वाले हों. हे अर्बुदि नाम के सर्प! तुम्हारे द्वारा हमारे शत्रुओं
को काटे जाने पर ऋषिगण उन्हें देखते हुए उन के शिक्षक बनें. (२५)
तेषां सर्वेषामीशाना उत्तिष्ठ सं नह्यध्वं मित्रा देवजना यूयम्.
इमं संग्रामं संजित्य यथालोकं वि तिष्ठध्वम्.. (२६)
हमारे मित्र देवगण उन सभी शत्रुओं के शिक्षक होते हुए उठें. ये सभी उन की शिक्षा के
लिए तैयार हो जाएं. हे शत्रुओ! देवगण इस संग्राम को जीत कर शत्रुओं का विनाश कर के
अपने स्थान को जाएं. (२६)
सूक्त-१२ देवता—त्रिषंधि
उत्तिष्ठत सं नह्यध्वमुदाराः केतुभिः सह.
सर्पा इतरजना रक्षांस्यमित्राननु धावत.. (१)
हे उदार गुणों वाले सेनानायको! अपने झंडों के साथ उठो और युद्ध के लिए चलो. तुम
कवच आदि पहन कर युद्ध के लिए तैयार हो जाओ. हे सर्पों की आकृति वाले देवो! हे
राक्षसो! तुम भी हमारे शत्रुओं के पीछे दौड़ो. (१)
ईशां वो वेद राज्यं त्रिषन्धे अरुणैः केतुभिः सह.
ये अन्तरिक्षे ये दिवि पृथिव्यां ये च मानवाः.
त्रिषन्धेस्ते चेतसि दुर्णीमान उपासताम्.. (२)
हे शत्रुओ! वज्र के अभिमानी देव त्रिषंधि तुम्हारा राज्य छीन कर अपने अधिकार में
करें. हे वज्रात्मक देव! तुम्हारे जो लाल झंडे आकाश में उत्पात के रूप में उत्पन्न होते हैं तथा
भूलोक में मनुष्य संबंधी हैं, तुम उन के साथ आओ. (२)
अयोमुखाः सूचीमुखा अथो विकङ्कतीमुखाः.
क्रव्यादो वातरंहस आ सजन्त्वमित्रान् वज्रेण त्रिषन्धिना.. (३)
लोहे के समान मुख वाले, सूई के आकार के मुंह वाले, बहुत से कांटों जैसे पंखों वाले
पक्षी, गिद्ध आदि मांस भक्षी पक्षी और हवा के समान तेजी से उड़ने वाले पक्षी, हमारे जिस
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 629Permalink

शत्रु के आसपास मंडराते हैं, वे वज्र से मारे जाएं. (३)
अन्तर्धेहि जातवेद आदित्य कुणपं बहु.
त्रिषन्धेरियं रोना सुहितास्तु मे वशे.. (४)
हे जातवेद अग्नि! आदित्य देव अर्थात् सूर्य को आकाश में गिरते हुए शवों के शरीरों के
द्वारा ढक दो. त्रिषंधि नामक देव से संबंध रखने वाली यह सेना भलीभांति मेरे वश में हो,
जिस से मैं शत्रुओं को मार सकूं. (४)
उत्तिष्ठ त्वं देवजनार्बुदे सेनया सह.
अयं बलिर्व आहुतस्त्रिषन्धेराहुतिः प्रिया.. (५)
हे देव जाति के अर्बुदि नाम के सर्प! तुम अपनी सेना के साथ उठो. हमारा यह बलि
कार्य तुम्हारी तृप्ति करने वाला हो. त्रिषंधि देव की जो सेना है, वह भी बलि प्राप्त होने के
कारण शत्रुओं का विनाश करे. (५)
शितिपदी सं द्यतु शरव्ये ३ यं चतुष्पदी.
कृत्ये ऽ मित्रेभ्यो भव त्रिषन्धेः सह सेनया.. (६)
श्वेत चरणों वाली गाय, चार चरणों वाली हो कर तथा बाणों का समूह बना कर हमारे
शत्रुओं को प्राप्त हो. हे कृत्यारूपिणी गौ! तू त्रिषंधि देव के समान हमारे शत्रुओं का संहार
करने वाली बन. (६)
धूमाक्षी सं पततु कृधुकर्णी च क्रोशतु.
त्रिषन्धेः सेनया जिते अरुणाः सन्तु केतवः.. (७)
हमारे शत्रुओं की सेना माया से उत्पन्न धुएं से ढके हुए नयनों वाली हो जाए. हमारे रण
के बाजों के कारण उन के कान बहरे हो जाएं. इस प्रकार त्रिषंधि नामक देव के द्वारा शत्रु की
सेना को जीत लिए जाने पर देव सेना के झंडे लाल रंग को हो जाएं. (७)
अवायन्तां पक्षिणो ये वयांस्यन्तरिक्षे दिवि ये चरन्ति.
श्वापदो मक्षिकाः सं रभन्तामामादो गृध्राः कुणपे रदन्ताम्.. (८)
जो पक्षी मरी हुई शत्रु सेना का मांस खाने के लिए नीचे की ओर मुंह कर के आकाश में
उड़ते हैं तथा द्युलोक अर्थात् स्वर्ग में जो पक्षी उड़ते हैं, वे तथा मांसभक्षी सिंह, गीदड़ आदि
पशु और मांस भक्षिणी नीले रंग की मक्खियां शवों का मांस खाने के लिए शत्रु सेनाओं में
विचरण करें. मांस भक्षक गिद्ध शत्रु सेना के शरीरों को अपनी चोंच से नोचें. (८)
यामिन्द्रेण संधां समधत्था ब्रह्मणा च बृहस्पते.
तया ऽ हमिन्द्रसंधया सर्वान् देवानिह हुव इतो जयत मामुतः.. (९)
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 630Permalink

हे बृहस्पति देव! इंद्र और प्रजापति देव के साथ जो आपने प्रतिज्ञा की है. मैं उस देव
सेना को उस संग्राम में बुलाता हूं. हे बुलाए गए देव! हमारी सेना को विजय प्रदान करो.
हमारे शत्रु सैनिकों को विजय मत प्रदान करो. (९)
बृहस्पतिराङ्गिरस ऋषयो ब्रह्मसंशिताः.
असुरक्षयणं वधं त्रिषन्धिं दिव्याश्रयन्.. (१०)
अंगिरा ऋषि के पुत्र बृहस्पति जो देवों के मंत्री हैं, वेद मंत्रों के अभ्यास से शक्तिशाली
बनें अन्य ऋषियों ने असुरों का नाश करने वाले आयुध वज्र को द्युलोक अर्थात् स्वर्ग में स्थित
किया है. (१०)
येनासौ गुप्त आदित्य उभाविन्द्रश्च तिष्ठतः.
त्रिषन्धिं देवा अभजन्त्तौजसे च बलाय च.. (११)
जिस वज्र के द्वारा दिखाई देने वाले आदित्य अर्थात् सूर्य को स्वर्ग में पाला गया है,
जिस वज्र की शक्ति के कारण आदित्य और इंद्र दोनों अपनेअपने स्थान पर स्थित हैं, उस
त्रिषंधि नाम के देव अर्थात् वज्र की सभी देवों ने तेज और बल की प्राप्ति के लिए सेवा की है.
(११)
सर्वॉल्लोकान्तसमजयन् देवा आहुत्यानया.
बृहस्पतिराङ्गिरसो वज्रं यमसिञ्चतासुरक्षयणं वधम्.. (१२)
अंगिरा ऋषि के पुत्र एवं देवों के मंत्री बृहस्पति ने तथा इंद्र आदि देवों ने इस आहुति के
द्वारा असुरों को मार कर सभी लोकों को प्राप्त किया है. बृहस्पति ने असुरों का विनाश करने
के साधन उस वज्र को इस आहुति के द्वारा ही बनाया है. (१२)
बृहस्पतिराङ्गिरसो वज्रं यमसिञ्चतासुरक्षयणं वधम्.
तेनाहममूं सेनां नि लिम्पामि बृहस्पते ऽ मित्रान हन्म्योजसा.. (१३)
अंगिरा ऋषि के पुत्र एवं देवों के मंत्री बृहस्पति ने तथा इंद्र आदि देवों ने असुरों का वध
करने वाले जिस वज्र की रचना घृत की आहुति से की है, हे देवो! उस वज्र के द्वारा मैं अपनी
शत्रु सेना का विनाश करता हूं. सेना के विनाश के कारण मैं अपने शत्रुओं का विनाश अपने
बल से करूं. (१३)
सर्वे देवा अत्यायन्ति ये अश्नन्ति वषट् कृतम्.
इमां जुषध्वमाहुतिमितो जयत मामुतः.. (१४)
इंद्र आदि सभी देव हमारे शत्रुओं को छोड़ कर हमारे सामने आएं. वे देव वषट् शब्द के
साथ दिए गए हवि का भोग करते हैं. वे सब हमारी उस आहुति का सेवन करें. उस आहुति से
प्रसन्न सभी देव हमारी सेनाओं को विजयी बनाएं. हमारे शत्रुओं की सेनाओं को विजयी न
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 631Permalink

बनाएं. (१४)
सर्वे देवा अत्यायन्तु त्रिषन्धेराहुतिः प्रिया.
संधां महतीं रक्षत ययाग्रे असुरा जिताः. (१५)
इंद्र आदि सभी देव हमारे शत्रुओं की सेना को छोड़ कर हमारे पास आएं. सेना को
मोहित करने वाले देव को हमारी यह आहुति प्रसन्न करने वाली हो. हे देवो! अपनी असुर
विजय की महती प्रतिज्ञा की रक्षा करो. इस त्रिषंधि की आहुति ने पहले असुरों को जीत
लिया था. (१५)
वायुरमित्राणामिष्वग्राण्याञ्चतु.
इन्द्र एषां बाहून् प्रति भनक्तु मा शकन् प्रतिधामिषुम्.
आदित्य एषामस्त्रं वि नाशयतु चन्द्रमा युतामगतस्य पन्थाम्. (१६)
वायु देव शत्रुओं के बाणों के आगे जाएं. तात्पर्य यह है कि प्रतिकूल हवा के कारण उन
के बाण अपना लक्ष्य प्राप्त न कर सकें. इंद्र देव उन की घायल भुजाओं को आयुध पकड़ने
के अयोग्य बनाएं. सूर्य उन शत्रुओं के आयुधों का विनाश करें. चंद्रमा हमारे शत्रुओं को उस
मार्ग से अलग करें जो हमारे समीप तक आता है. (१६)
यदि प्रेयुर्देवपुरा ब्रह्म वर्माणि चक्रिरे तनूपानं
परिपाणं कृण्वाना यदुपोचिरे सर्वं तदरसं कृधि.. (१७)
हे देव! हमारे शत्रुओं ने तनूपान एवं परिमाण नामक कर्म के समय अपने मंत्रमय कवचों
को सिद्ध कर लिया है. तुम इन कर्मों से संबंधित मंत्रों को असफल बनाओ. (१७)
क्रव्यादांनुवर्तयन् मृत्युना च पुरोहितम्.
त्रिषन्धे प्रेहि सेनया जयामित्रान् प्र पद्यस्व.. (१८)
हे त्रिषंधि देव! हमारे सामने स्थित शत्रु के पीछे मांसभक्षी पशु चलें. तुम हमारी सेना के
साथ जाओ और हमारे शत्रुओं का विनाश करने के लिए उन में घुसो. (१८)
त्रिषन्धे तमसा त्वममित्रान् परि वारय.
पृषदाज्यप्रणुत्तानां मामीषां मोचि कश्चन.. (१९)
हे त्रिषंधि! तुम हमारे शत्रुओं को अंधकार के द्वारा घेर लो. हमारे यज्ञ कार्य में तुम दही
से मिले भात को खाने के लिए बुलाए गए हो. तुम हमारे शत्रुओं में से एक को भी जीवित मत
छोड़ो. (१९)
शितिपदी सं पतत्वमित्राणाममूः सिचः.
मुह्यन्त्वद्यामूः सेना अमित्राणां न्यर्बुदे.. (२०)
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 632Permalink

श्वेत चरणों वाली गौ हमारे शत्रुओं की उस सेना को शोक प्रदान करने के लिए जाए
और हमारे बाणों से पीड़ित उस सेना पर टूट पड़े. हे न्यर्बुदि! सामने दिखाई देने वाली यह
सेना आज युद्ध के समय मोह को प्राप्त हो जाए. (२०)
मूढा अमित्र न्यर्बुदे जह्योषां वरंवरम्. अनया जहि सेनया.. (२१)
हे न्यर्बुदि! तुम हमारे शत्रुओं को अपनी माया के कर्तव्य और अकर्तव्य जानने के लिए
मूर्ख बना दो. तुम इस सेना के श्रेष्ठों को नष्ट कर दो. तुम्हारी कृपा से हमारी सेना विजय प्राप्त
करे. (२१)
यश्च कवची यश्चाकवचो ३ मित्रो यश्चाज्मनि.
ज्यापाशैः कवचपाशैरज्मनाभिहतः शयाम्.. (२२)
हमारा जो शत्रु कवच धारण किए है अथवा जो कवच रहित है, हमारे जो शत्रु रथ में
बैठे हैं, वे अपनेअपने पाशों से बंधे हुए सो जाएं. (२२)
ये वर्मिणो ये ऽ वर्माणो अमित्र‍ा ये च वर्मिणः.
सर्वांस्ताँ अर्बु दे हतांछ्वानो ऽ दन्तु भूम्याम्.. (२३)
हमारे जो शत्रु कवच धारण करने वाले, कवचहीन और कवच के अतिरिक्त अन्य शस्त्र
से रक्षा करने वाले साधन से युक्त हैं, हे न्यर्बुदि! तुम्हारे द्वारा मारे गए उन शत्रुओं को कुत्ते
आदि मांसभक्षी पशु खाएं. (२३)
ये रथिनो ये अरथा असादा ये च सादिनः.
सर्वानदन्तु तान् हतान् गृध्राः श्येनाः पतत्रिणः (२४)
हमारे जो शत्रु रथ में बैठे हैं, जो रथहीन हैं, जो घोड़े पर सवार हैं और जो बिना घोड़े
वाले हैं, उन सब को गिद्ध, बाज तथा अन्य मांसभक्षी पक्षी खाएं. (२४)
सहस्रकुणपा शेतामामित्री सेना समरे वधानाम्. विविद्धा ककजाकृता..
(२५)
हमारे शत्रुओं की सेना हमारी सेना को प्राप्त कर के आयुध साधनों की युद्ध में भिड़ंत
होने पर मरी हुई एवं अनगिनती लाशों वाली हो. (२५)
मर्माविधं रोरुवतं सुपर्णैरदन्तु दुश्चितं मृदितं शयानम्.
य इमां प्रतीचीमाहुतिममित्रो नो युयुत्सति.. (२६)
शोभन पतन वाले बाणों के द्वारा मर्मस्थलों में विद्ध एवं अत्यधिक रोते हुए दुःखों से
पूर्ण, चूर्ण किए हुए और धरती पर पड़े हुए शत्रु सैनिकों को गीदड़ आदि मांसभक्षी पशु खाएं.
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 633Permalink

हमारा जो शत्रु हमारी इस आहुति को पा कर इस की गति प्रतिनिवृत्त कर के हमारे साथ युद्ध
करना चाहता है, इस प्रकार के शत्रु को भी मांसभक्षी पशु खाएं. (२६)
यां देवा अनुतिष्ठन्ति यस्या नास्ति विराधनम्.
तयेन्द्रो हन्तु वृत्रहा वज्रेण त्रिषन्धिना.. (२७)
जिस दधि मिश्रित भात की आहुति को देवगण वज्र बनाने का साधन बनाते हैं, जिस
आयुध की असमानता नहीं है. उस आहुति द्वारा उत्पन्न वज्र से वृत्र असुर का वध करने वाले
इंद्र इस शत्रु सेना का वध करें. (२७)
ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त-१ देवता—भूमि

Page 634Permalink

बारहवां कांड
सूक्त-१ देवता—भूमि
सत्यं बृहदृतमुग्रं दीक्षा तपो ब्रह्म यज्ञः पृथिवीं धारयन्ति.
सा नो भूतस्य भव्यस्य पत्न्युरुं लोकं पृथिवी नः कृणोतु.. (१)
पृथ्वी को धारण करने वाले ब्रह्म, तप, यज्ञदीक्षा तथा विशाल रूप में फैले हुए जल हैं.
इस पृथ्वी ने भूत काल के जीवों का पालन किया था और भविष्य काल के जीवों का भी
पालन करेगी. इस प्रकार की पृथ्वी हमें निवास के हेतु विस्तृत स्थान प्रदान करे. (१)
असंबाधं मध्यतो मानवानां यस्या उद्वतः प्रवतः समं बहु.
नानावीर्या ओषधीर्या बिभर्ति पृथिवी नः प्रथतां राध्यतां नः.. (२)
जिस भूमि पर ऊंचे, नीचे तथा समतल स्थान हैं तथा जो अनेक प्रकार की सामर्थ्य
वाली जड़ीबूटियों को धारण करती है, वह भूमि हमें सभी प्रकार तथा पूर्ण रूप से प्राप्त हो
और हमारी सभी कामनाओं को पूर्ण करे. (२)
यस्यां समुद्र उत सिन्धुरापो यस्यामन्नं कृष्टयः संबभूवुः.
यस्यामिदं जिन्वति प्राणदेजत् सा नो भूमिः पूर्वपेये दधातु.. (३)
यह पृथ्वी सागरों, नदियों, झरनों और सरोवरों के जल से सुशोभित है. इस पृथ्वी पर
कृषि की जाती है, जिस से अन्न उत्पन्न होता है. उस अन्न से संसार के प्राणवान मनुष्य, पशु
आदि तृप्ति पाते हैं. इस प्रकार की पृथ्वी हमें उस प्रदेश में प्रतिष्ठित करे, जहां पर रसदार
फल उत्पन्न होते हैं. (३)
यस्याश्चतस्रः प्रदिशः पृथिव्या यस्यामन्नं कृष्टयः संबभूवुः.
या बिभर्ति बहुधा प्राणदेजत् सा नो भूमिर्गोष्वप्यन्ने दधातु.. (४)
जिस पृथ्वी पर चार दिशाएं हैं, जिस पर अन्न उत्पन्न होता है और जिस पर किसान
खेती करते हैं तथा जो सांस लेने वाले एवं गतिशील प्राणियों को धारण करती है, वह पृथ्वी
हमारे लिए दुधारू गाएं और अन्न धारण करे. (४)
यस्यां पूर्वे पूर्वजना विचक्रिरे यस्यां देवा असुरानभ्यवर्तयन्.
गवामश्वानां वयसश्च विष्ठा भगं वर्चः पृथिवी नो दधातु.. (५)

Page 635Permalink

हमारे पूर्व पुरुषों अर्थात् पूर्वजों ने जिस पृथ्वी पर अनेक प्रशंसनीय कार्य किए, जिस
पृथ्वी पर देवों ने अत्याचारी दैत्यों के साथ संग्राम किया तथा जो पृथ्वी गायों, घोड़ों तथा
पक्षियों को आश्रय प्रदान करने वाली है, वह पृथ्वी हमें तेज और ऐश्वर्य प्रदान करे. (५)
विश्वंभरा वसुधानी प्रतिष्ठा हिरण्यवक्षा जगतो् निवेशनी.
वैश्वानरं बिभ्रती भूमिरग्निमिन्द्रऋषभा द्रविणे नो दधातु.. (६)
जो पृथ्वी वनों को धारण करने वाली तथा संसार के प्राणियों का भरणपोषण करने
वाली है, जो पृथ्वी अपने सीने अर्थात् खदानों में स्वर्ण को धारण करती है तथा वैश्वानर अग्नि
को आश्रय प्रदान करती है, वह पृथ्वी हमारे लिए धन प्रदान करे. (६)
यां रक्षन्त्यस्वप्ना विश्वदानीं देवा भूमिं पृथिवीमप्रमादम्.
सा नो मधु प्रियं दुहामथो उक्षतु वर्चसा.. (७)
देवगण जाग्रत रहते हुए अथवा सावधान रहते हुए जिस पृथ्वी की रक्षा करते हैं, वह
पृथ्वी हमें मधु, धन एवं बल से युक्त करे. (७)
यार्णवे ऽ धि सलिलमग्र आसीद् यां मायाभिरन्वचरन् मनीषिणः.
यस्या हृदयं परमे व्योमन्सत्येनावृतममृतं पृथिव्याः.
सा नो भूमिस्त्विषिं बलं राष्ट्रे दधातूत्तमे.. (८)
जो पृथ्वी पहले सागर के जल में डूबी हुई थी, मनीषीजनों ने अनेक प्रकार के कार्य
करते हुए, जिस पृथ्वी पर विचरण किया था, जिस का हृदय विशाल आकाश में स्थित है, वह
मरण रहित पृथ्वी हमें श्रेष्ठ राष्ट्र, बल और दीप्ति प्रदान करे. (८)
यस्यामापः परिचराः समानीरहोरात्रे अप्रमादं क्षरन्ति.
सा नो भूमिर्भूरिधारा पयो दुहामथो उक्षतु वर्चसा.. (९)
जिस पृथ्वी पर बहता हुआ जल रात में और दिन में समान रूप से गमन करता है, ऐसी
अधिक जल वाली पृथ्वी हमें दूध के समान सार रूप फलों तथा तेज से युक्त करे. (९)
यामश्विनावमिमातां विष्णुर्यस्यां विचक्रमे.
इन्द्रो यां चक्र आत्मने ऽ नमित्रां शचीपतिः.
सा नो भूमिर्वि सृजतां माता पुत्राय मे पयः.. (१०)
अश्विनीकुमारों ने जिस पृथ्वी का निर्माण किया, विष्णु ने जिस पर पराक्रम का प्रदर्शन
किया तथा इंद्र ने जिस पृथ्वी को अपने अधीन कर के शत्रुओं से हीन कर दिया, वह पृथ्वी
अपना सार रूप जल मुझे उसी प्रकार पिलाए, जिस प्रकार माता पुत्र को दूध पिलाती है.
(१०)
ebook converter DEMO Watermarks*

गिरयस्ते पर्वता हिमवन्तो ऽ रण्यं ते पृथिवि स्योनमस्तु.

Page 636Permalink

गिरयस्ते पर्वता हिमवन्तो ऽ रण्यं ते पृथिवि स्योनमस्तु.
बभ्रुं कृष्णां रोहिणीं विश्वरूपां ध्रुवां भूमिं पृथिवीमिन्द्रगुप्ताम्.
अजीतो ऽ हतो अक्षतो ऽ ध्यष्ठां पृथिवीमहम्.. (११)
हे पृथ्‍वी! तेरे बर्फ से ढके हुए पर्वत एवं घने वन हमें सुख प्रदान करें. मैं इंद्र देव के द्वारा
सुरक्षित पृथ्‍वी पर इस प्रकार प्रतिष्ठित रहूं कि न मेरा विनाश हो तथा न मैं किसी से परिचित
होऊं. (११)
यत् ते मध्यं पृथिवि यच्च नभ्यं यास्त ऊर्जास्तन्वःसंबभूवुः.
तासु नो धेह्यभि नः पवस्य माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः.
पर्जन्यः पिता स उ नः पिपर्तु.. (१२)
हे पृथ्‍वी! तेरी नाभि अर्थात् मध्य भाग से सभी के शरीरों को पुष्ट करने वाले जो पदार्थ
उत्पन्न होते हैं, मुझे उन्हीं के मध्य स्थित करो. भूमि मेरी माता है और मेघ मेरे पिता हैं. ये
दोनों यज्ञ कर्म को पूर्ण करते हैं. (१२)
यस्यां वेदिं परिगृह्णन्ति भूम्यां यस्यां यज्ञं तन्वते विश्वकर्माणः.
यस्यां मीयन्ते स्वरवः पृथिव्यामूर्ध्वाः शुक्रा आहुत्याः पुरस्तात्.
सा नो भूमिर्वर्धयद् वर्धमाना.. (१३)
यज्ञ में आहुति देने से पूर्व ही जिस पृथ्वी पर लकड़ी के स्तंभ गाढ़े जाते हैं, वह पृथ्वी
स्वयं वृद्धि को प्राप्त कर के हमें समृद्धिशाली बनाए. (१३)
यो नो द्वेषत् पृथिवि यः पृतन्याद् यो ऽ भिदासान्मनसा यो वधेन.
तं नो भूमे रन्धय पूर्वकृत्वरि.. (१४)
हे पृथ्‍वी! हम से द्वेष करता हुआ जो सेना ले कर हमें क्षीण करना अथवा मारना चाहे,
तुम हमारी रक्षा के लिए उस का विनाश कर दो. (१४)
त्वज्जातास्त्वयि चरन्ति मर्त्यास्त्वं बिभर्षि द्विपदस्त्वं चतुष्पदः.
तवेमे पृथिवि पञ्च मानवा येभ्यो ज्योतिरमृतं मर्त्येभ्य उद्यन्सूर्यो
रश्मिभिरातनोति.. (१५)
हे पृथ्‍वी! जो प्राणी तुम्हारे ऊपर जन्म लेते हैं, वे तुम्हारे ही ऊपर भ्रमण करते है. तुम
जिन चार पैरों वाले पशुओं तथा दो पैरों वाले मनुष्यों का पोषण करती हो, उन के लिए सूर्य
अपनी किरणों के द्वारा जीवन पर्यंत अमृतमयी ज्योति फैलाता है. (१५)
ता नः प्रजाः सं दुहतां समग्रा वाचो मधु पृथिवि धेहि मह्यम्.. (१६)
हे पृथ्‍वी! सूर्य की किरणें हमारे हेतु प्रजा अर्थात् संतान और सेवक वर्ग के अतिरिक्त
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 637Permalink

सभी प्रकार की वाणी प्रदान करें. हे पृथ्वी! तुम मुझे मधुर पदार्थ प्रदान करो. (१६)
विश्वस्वं मातरमोषधीनां ध्रुवां भूमिं धर्मणा धृताम्.
शिवां स्योनामनु चरेम विश्वहा.. (१७)
हम ऐसी पृथ्वी पर सदा विचरण करते रहें जो ओषधियों को उत्पन्न करने वाली, संसार
की ऐश्वर्य रूप, धर्म के द्वारा आश्रित कल्याणमयी एवं सुख देने वाली है. (१७)
महत् सधस्थं महती बभूविथ महान् वेग एजथुर्वेपथुष्टे.
महांस्तेवेन्द्रो रक्षत्यप्रमादम्.
सा नो भूमे प्र रोचय हिरण्यस्येव संदृशि मा नो द्विक्षत कश्चन.. (१८)
हे पृथ्वी! तू महती निवास भूमि है. तेरा वेग और कंपन भी भाव पूर्ण है. वे इंद्र तेरे रक्षक
हैं. तू हमें सब का प्रिय बनाए. जिस प्रकार स्वर्ग सब को प्रिय होता है, उसी प्रकार हमारा
द्वेषी कोई न हो अर्थात् हम सब के प्रिय बनें. (१८)
अग्निर्भूम्यामोषधीष्वग्निमापो बिभ्रत्यग्निरश्मसु.
अग्निरन्तः पुरुषेषु गोष्वश्वेष्वग्नयः.. (१९)
जल अग्नि को धारण करता है. पृथ्वी में अग्नि है. जल में, पुरुष में, मेरे अश्वादि पशुओं
में भी अग्नि है. (१९)
अग्निर्दिव आ तपत्यग्नेर्देवस्योर्व १ न्तरिक्षम्.
अग्निं मर्तास इन्धते हव्यवाहं घृतप्रियम्.. (२०)
अग्नि देव स्वर्ग में तपते हैं, अंतरिक्ष में भी हैं और मरण धर्म वाले मनुष्य हमारी अग्नि
को प्रदीप्त करते हैं. (२०)
अग्निवासाः पृथिव्य सितज्ञूस्त्विषीमन्तं संशितं मा कृणोतु.. (२१)
जिस धूम में अग्नि का वास है, उस धूम को जानने वाली पृथ्वी मुझे तेजस्वी बनाए.
(२१)
भूम्यां देवेभ्यो ददति यज्ञं हव्यमरंकृतम्.
भूम्यां मनुष्या जीवन्ति स्वधयान्नेन मर्त्याः.
सा नो भूमिः प्राणमायुर्दधातु जरदष्टिं मा पृथिवी कृणोतु.. (२२)
पृथ्वी पर जो यज्ञ सुशोभित हैं, उन में देवों के हेतु हवि प्रदान की जाती है. इसी पृथ्वी
पर मरणधर्मा जीव अन्न जल से अपना जीवन व्यतीत करते हैं. यह पृथ्वी हम को प्राण और
आयु प्रदान करती हुई वृद्धावस्था तक जीवित रहने वाला बनाए. (२२)
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 638Permalink

यस्ते गन्धः पृथिवि संबभूव यं बिभ्रत्योषधयो यमापः.
यं गन्धर्वा अप्सरसश्च भेजिरे तेन मा सुरभिं कृणु मा नो द्विक्षत कश्चन..
(२३)
हे पृथ्वी! तेरी जिस गंध को ओषधियां और जल धारण करते हैं, जिस का सेवन गंधर्व
और अप्सराएं करती हैं, तू मुझे उसी गंध से सुशोभित बना. कोई मेरा वैरी न रहे. (२३)
यस्ते गन्धः पुष्करमाविवेश यं संजभुः सूर्याया विवाहे. अमर्त्याः पृथिवि
गन्धमग्रे तेन मा सुरभिं कृणु मा नो द्विक्षत कश्चन.. (२४)
हे पृथ्वी! तुम्हारी जो गंध कमल में है, जिस गंध को सूर्य के विवाहोत्सव में मरणधर्मा
जीवों को धारण किया था, उस गंध से मुझे सुगंधित बना. मुझ से द्वेष करने वाले कोई न रहे.
(२४)
यस्ते गन्धः पुरुषेषु स्त्रीषु पुंसु भगो रुचिः. यो अश्वेषु वीरेषु यो मृगेषूत
हस्तिषु.
कन्यायां वर्चो यद् भूमे तेनास्माँ अपि सं सृज मा नो द्विक्षत कश्चन.. (२५)
हे पृथ्वी! तुम्हारी जो गंध स्त्रीपुरुषों में, घोड़ों में, वीरों में, मृग में, हाथी में तथा कन्या में
है, मुझे उन सब की गंध से संपन्न बना. मुझ से द्वेष करने वाला कोई न रहे. (२५)
शिला भूमिरश्मा पांसुः मा भूमिः संधृता धृता.
तस्यै हिरण्यवक्षसे पृथिव्या अकरं नमः.. (२६)
जो पृथ्वी शिला, भूमि, पत्थर और धूल के रूपों को धारण करती है, ऐसी पृथ्वी
हिरण्यवक्षा अर्थात् सोने के सीने वाली है. मैं उस पृथ्वी को नमस्कार करता हूं. (२६)
यस्यां वृक्षा वानस्पत्या ध्रुवास्तिष्ठन्ति विश्वहा.
पृथिवीं विश्वधायसं धृतामच्छावदामसि.. (२७)
वनस्पतियां उत्पन्न करने वाले वृक्ष जिस भूमि पर अडिग रूप में खड़े रहते हैं, वे वृक्ष
औषधालय के रूप में सब की सेवा करते हैं. ऐसी धर्म आश्रिता पृथ्वी की हम स्तुति करते हैं.
(२७)
उदीराणा उतासीनास्तिष्ठन्तः प्रक्रामन्तः.
पद्भ्यां दक्षिणसव्याभ्यां मा व्यथिष्महि भूम्याम्.. (२८)
हम अपने दाएं अथवा बाएं पैर से चलते हुए, बैठते अथवा खड़े होते हुए कभी व्यथित
न हों. (२८)
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 639Permalink

विमृग्वरीं पृथिवीमा वदामि क्षमां भूमिं ब्रह्मणा वावृधानाम्.
ऊर्जं पुष्टं बिभ्रतीमन्नभागं घृतं त्वाभि नि षीदेम भूमे.. (२९)
धर्मरूपिणी, परम पवित्रा तथा मंत्रों के द्वारा बढ़ने वाली पृथ्वी की मैं स्तुति करता हूं. हे
पृथ्वी! तू पोषक अन्न और बल को धारण करने वाली है. मैं तुझ पर घृत की आहुति देता हूं.
(२९)
शुद्धा न आपस्तन्वे क्षरन्तु यो नः सेदुरप्रिये तं नि दध्मः.
पवित्रेण पृथिवि मोत् पुनामि.. (३०)
पवित्र जल हमारी देह को सींचे. हमारे शरीर पर हो कर जाने वाले जल शत्रु को प्राप्त
हों. हे पृथ्वी! मैं अपनी देह को पवित्र जल के द्वारा पवित्र करता हूं. (३०)
यास्ते प्राचीः प्रदिशो या उदीचीर्यास्ते भूमे अधराद् याश्च पश्चात्.
स्योनास्ता मह्यं चरते भवन्तु मा नि पप्तं भुवने शिश्रियाणः.. (३१)
हे पृथ्वी! तुम्हारी पूर्व, उत्तर, दक्षिण और पश्चिम रूप चारों दिशाएं मुझे विचरण की
शक्ति प्रदान करें. इस लोक में रहता हुआ मैं गिरने न पाऊं. (३१)
मा नः पश्चान्मा पुरस्तान्नुदिष्ठा मोत्तरादधरादुत.
स्वस्ति भूमे नो भव मा विदन् परिपन्थिनो वरीयो यावया वधम्.. (३२)
हे पृथ्वी! तू मेरे पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण चारों ओर खड़ी रहे. मुझे दस्यु प्राप्त न करे.
तू विशाल हिंसा से मुझे बचाती हुई मंगल करने वाली हो. (३२)
यावत् ते ऽ भि विपश्यामि भूमे सूर्येण मेदिना.
तावन्मे चक्षुर्मा मेष्टोत्तरामुत्तरां समाम्.. (३३)
मैं जब तक तुझे सूर्य के सामने देखता रहूं, तब तक मेरे देखने की शक्ति नष्ट न हो.
(३३)
यच्छयानः पर्यावर्ते दक्षिणं सव्यमभि भूमे पार्श्वम्.
उत्तानास्त्वा प्रतीचीं यत् पृष्टीभिरधिशेमहे.
मा हिंसीस्तत्र नो भूमे सर्वस्य प्रतिशीवरि.. (३४)
हे पृथ्वी! सोता हुआ मैं करवट लूं अथवा सीधा हो कर सोऊं, उस समय कोई मेरी हिंसा
न करे. (३४)
यत् ते भूमे विखनामि क्षिप्रं तदपि रोहतु.
मा ते मर्म विमृग्वरि मा ते हृदयमर्पिपम्.. (३५)
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 640Permalink

हे पृथ्वि! मैं तेरे जिस स्थल को खोदूं वह शीघ्र ही पहले जैसा हो जाए. मैं तेरे मर्म को
पूर्ण करने में समर्थ नहीं हूं. (३५)
ग्रीष्मस्ते भूमे वर्षाणि शरद्धेमन्तः शिशिरो वसन्तः.
ऋतवस्ते विहिता हायनीरहोरात्रे पृथिवि नो दुहाताम्.. (३६)
हे पृथ्वि! ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत, शिशिर और वसंत—ये छह ऋतुएं तथा दिन, रात
और वर्ष—ये सब हम को फल देने वाले हों. (३६)
याप सर्पं विजमाना विमृग्वरी यस्यामासन्नग्नयो ये अप्स्व१न्तरः.
परा दस्यून् ददती देवपीयूनिन्द्रं वृणाना पृथिवी न वृत्रम्.
शक्राय दध्रे वृषभाय वृष्णे.. (३७)
जो पृथ्वी सूर्य के हिलने पर कांपती है, विद्युत के रूप में जल में रहने वाली अग्नि जिस
पृथ्वी में भी निवास करती है, जिस ने वृत्रासुर को त्याग कर इंद्र का वरण किया था, जो देव
हिंसकों के लिए फल देने वाली नहीं होती तथा जो पुष्ट और शक्तिशाली पुरुष के अधीन
रहती है. (३७)
यस्यां सदोहविर्धाने यूपो यस्यां निमीयते.
ब्रह्माणो यस्यामर्चन्त्यृग्भिः साम्ना यजुर्विदः.
युज्यन्ते यस्यामृत्विजः सोममिन्द्राय पातवे.. (३८)
जिस पृथ्वी पर यज्ञ मंडप की रचना होती है, जिस पर यूप खड़े किए जाते हैं. जिस
पृथ्वी पर ऋग्वेद, सामवेद तथा यजुर्वेद के मंत्रों द्वारा देव पूजन और इंद्र को सोमपान कराने
का कार्य होता है. (३८)
यस्यां पूर्वे भूतकृत ऋषयो गा उदानृचुः.
सप्त सत्रेण वेधसो यज्ञेन तपसा सह.. (३९)
जिस पृथ्वी पर प्राणियों की रचना करने वाले ऋषियों ने सप्त सूत्रों वाले ब्रह्मयोग और
स्तुति रूपी वाणियों से देव पूजन किया था. (३९)
सा नो भूमिरा दिशतु यद्धनं कामयामहे.
भगोः अनुप्रयुङ्क्तामिन्द्र एतु पुरोगवः.. (४०)
वह भूमि हमारा चाहा हुआ धन प्रदान करे. भग हम को प्रेरणा देने वाले हों तथा इंद्र
हमारे आगे चलने वाले हों. (४०)
यस्यां गायन्ति नृत्यन्ति भूम्यां मर्त्या व्यैलबाः.
युध्यन्ते यस्यामाक्रन्दो यस्यां वदति दुन्दुभिः.
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 641Permalink

सा नो भूमिः प्र णुदतां सपत्नानसपत्नं मा पृथिवी कृणोतु.. (४१)
जिस पृथ्‍वी पर मनुष्य नाचते और गाते हैं, जिस पर रुदन होता है और दुंदुभि बजती है,
वह पृथ्‍वी मुझे शत्रुहीन बनाए. (४१)
यस्यामन्नं व्रीहियवौ यस्या इमाः पञ्च कृष्टयः.
भूम्यै पर्जन्यपत्न्यै नमोऽस्तु वर्षमेदसे.. (४२)
जिस पृथ्‍वी पर गेहूं और जौ जैसे अन्न पैदा होते हैं, जिस पर पांच प्रकार की खेतियां
होती हैं, वर्षा द्वारा पुष्ट की जाने वाली पृथ्‍वी को नमस्कार है. (४२)
यस्याः पुरो देवकृताः क्षेत्रे यस्या विकुर्वते.
प्रजापतिः पृथिवीं विश्वगर्भामाशामाशां रण्यां नः कृणोतु.. (४३)
देवताओं द्वारा बनाए गए हिंसक पशु जिस पृथ्‍वी पर अनेक प्रकार की क्रीड़ाएं करते हैं,
जो पूरे संसार को अपने में धारण करती है, उस पृथ्‍वी की दिशाओं को प्रजापति हमारे लिए
मंगलमय करें. (४३)
निधिं बिभ्रती बहुधा गुहा वसु मणिं हिरण्यं पृथिवी ददातु मे.
वसूनि नो वसुदा रासमाना देवी दधातु सुमनस्यमाना.. (४४)
निधियों को धारण करने वाली पृथ्‍वी मुझे गुफा, स्वर्ण, मणि आदि धन प्रदान करे. धन
प्रदान करने वाली पृथ्‍वी हम पर प्रसन्न होती हुई वरदायिनी बने. (४४)
जनं बिभ्रती बहुधा विवाचसं नानाधर्माणं पृथिवी यथौकसम.
सहस्रं धारा द्रविणस्य मे दुहां ध्रुवेव धेनुरनपस्फुरन्ती.. (४५)
अनेक धर्मों और अनेक भाषाओं वाले मनुष्यों को धारण करने वाली पृथ्‍वी अडिग धेनु
के समान मेरे लिए धन की हजारों धाराओं को दुहाए. (४५)
यस्ते सर्पो वृश्चिकस्तृष्टदंश्मा हेमन्तजब्धो भृमलो गुहा शये. क्रिमिर्जिन्र्वत्
पृथिवि यद्यदेजति प्रावृषि तन्नः सर्पन्मोप सृपद् यच्छिवं तेन नो मृड..
(४६)
हे पृथ्‍वी! तुम में जो सर्प निवास करते हैं, उन का दंश प्यास लगाने वाला है. तुम में जो
बिच्छू हैं, वे हेमंत ऋतु में डंक नीचे किए हुए गुफा में शयन करते हैं. वर्षा ऋतु में प्रसन्नता
पूर्वक विचरण करने वाले ये प्राणी अर्थात् सांप और बिच्छू मेरे समीप न आएं. (४६)
ये ते पन्थानो बहवो जनायना रथस्य वर्त्मानसच्व यातवे.
यैः संचरन्त्युभये भद्रपापास्तं पन्थानं जयेमानमित्रमतस्करं यच्छिवं तेन
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 642Permalink

नो मृड.. (४७)
हे पृथ्वी! मनुष्यों के चलने के और रथ आदि के चलने के जो मार्ग हैं, उन मार्गों पर
धर्मात्मा और पापात्मा दोनों प्रकार के मनुष्य चलते हैं. जो मार्ग चोरों और शत्रुओं से हीन है,
उसी कल्याणमय मार्ग के द्वारा तुम हमें सुखी बनाओ. (४७)
मत्वं बिभ्रती गुरुभृद् भद्रपापस्य निधनं तितिक्षुः.
वराहेण पृथिवी संविदाना सूकराय वि जिहीते मृगाय.. (४८)
पुण्य एवं पाप कर्म करने वालों के शवों को तथा शत्रु को भी धारण करने वाली जिस
पृथ्वी को वाराह खोज रहे थे, वह पृथ्वी उन वाराह को ही प्राप्त हुई थी. (४८)
ये त आरण्याः पशवो मृगा वने हिताः सिंहा व्याघ्राः पुरुषादश्चरन्ति.
उलं वृकं पृथिवि दुच्छुनामित ऋक्षीकां रक्षो अप बाधयास्मत्.. (४९)
जो व्याघ्र आदि हिंसक पशु घूमते हैं, उन को और व्रक अर्थात् भेड़ियों, भालुओं और
राक्षसों को हम से दूर कर के बाधा पहुंचाओ. (४९)
ये गन्धर्वा अप्सरसो ये चारायः किमीदिनः.
पिशाचान्त्सर्वा रक्षांसि तानस्मद् भूमे यावय.. (५०)
हे पृथ्वी! गंधर्व, अप्सरा, राक्षस, मांसभक्षी, पिशाच आदि को हम से दूर करो. (५०)
यां द्विपादः पक्षिणः संपतन्ति हंसाः सुपर्णाः शकुना वयांसि.
यस्यां वातो मातरिश्वैयते रजांसि कृण्वंश्च्यावयंश्च वृक्षान्.
वातस्य प्रवामुपवामनु वात्यर्चिः.. (५१)
जिस पृथ्वी पर दो पांवों वाले पक्षी हंस, कौवे, गिद्ध आदि घूमते हैं, जिस पृथ्वी पर वायु
धूल उड़ाती और वृक्षों को गिराती है तथा वायु के तीक्ष्ण होने पर अग्नि भी उस के साथ
चलती है. (५१)
यस्यां कृष्णमरुणं च संहिते अहोरात्रे विहिते भूम्यामधि.
वर्षेण भूमिः पृथिवी वृतावृता सा नो दधातु भद्रया प्रिये धामनिधामनि..
(५२)
जिस पृथ्वी पर काले और लाल दिनरात मिले रहते हैं, जो पृथ्वी वर्षा से ढकी रहती है,
वह पृथ्वी सुंदर चित्त वृत्ति से हमें प्रिय स्थान प्राप्त कराए. (५२)
द्यौश्च म इदं पृथिवी चान्तरिक्षं च मे व्यचः.
अग्निः सूर्य आपो मेधां विश्वे देवाश्च सं ददुः.. (५३)
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 643Permalink

आकाश, पृथ्वी, अंतरिक्ष, अग्नि, सूर्य, जल, मेघ तथा सब देवताओं ने मुझे चलने की
शक्ति प्रदान की है. (५३)
अहमस्मि सहमान उत्तरो नाम भूम्याम्.
अभीषाडस्मि विश्वाषाडाशामाशां विषासहि:.. (५४)
मैं पृथ्वी पर शत्रु का तिरस्कार करने वाले के रूप में प्रसिद्ध हूं. मैं अपने शत्रुओं के
सामने जा कर उन्हें दबाऊं. मैं हर दिशा में रहने वाले शत्रु को भलीभांति वश में कर लूं. (५४)
अदो यद् देवि प्रथमाना पुरस्ताद् देवैरुक्ता व्यसर्पो महित्वम्.
आ त्वा सुभूतमविशत् तदानीमकल्पयथाः प्रदिशश्चतस्रः.. (५५)
हे पृथ्वी! तुम्हारे विस्तृत होने से पहले देवताओं ने तुम से विस्तार वाली होने को कहा
था. उस समय तुम में भूतों ने प्रवेश किया. तभी चार दिशाएं बनाई गईं. (५५)
ये ग्रामा यदरण्यं याः सभा अधि भूम्याम्.
ये संग्रामाः समितयस्तेषु चारु वदेम ते.. (५६)
पृथ्वी पर जो गांव, जंगल और सभाएं हैं, जो युद्ध की मंत्रणाएं हैं तथा जो युद्ध होते हैं,
हे भूमि! हम उन सब में तेरी वंदना करते हैं. (५६)
अश्व इव रजो दुधुवे वि तान् जनान् य आक्षियन् पृथिवीं यादजायत.
मन्द्राग्रेत्वरी भुवनस्य गोपा वनस्पतीनां गृभिरोषधीनाम्.. (५७)
पृथ्वी में उत्पन्न हुए पदार्थ पृथ्वी पर ही रहते हैं तथा अश्व के समान उस पर धूल उड़ाते
हैं. यह भूमि भद्रा और उर्वरा हैं. यह वनस्पतियों तथा ओषधियों के प्रभाव से लोक का पालन
करने वाली है. (५७)
यद् वदामि मधुमत् तद् वदामि यदीक्षे तद् वनन्ति मा.
त्विषीमानस्मि जुतिमानवान्यान् हन्मि दोधतः.. (५८)
मैं जो कुछ कहूं, वह मधुर हो, मैं जिसे देखूं, वही मेरा प्रिय हो जाए. मैं यशस्वी और वेग
वाला बनूं. मैं दूसरों का रक्षक होता हुआ उन का संहार करूं जो मुझे कंपित करें. (५८)
शन्तिवा सुरभिः स्योना कीलालोध्‍नी पयस्वती.
भूमिरधि ब्रवीतु मे पृथिवी पयसा सह.. (५९)
सुख और शांति प्रदान करने वाली, अन्न और दूध देने वाली, दूध के समान सार पदार्थों
वाली होती हुई पृथ्वी मेरे पक्ष में रहे. (५९)
यामन्वैच्छद्धविषा विश्वकर्मान्तर्णवे रजसि प्रविष्टाम्.
ebook converter DEMO Watermarks*