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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 627 of 1063

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Page 627

प्रब्लीनो मृदितः शयां हतो ३ मित्रो न्यर्बुदे.
अग्निजिह्वा धूमशिखा जयन्तीयर्न्तु सेनया.. (१९)
हे न्यर्बुदि नाम के सर्प! हमारे शत्रु तुम्हारे द्वारा काटे जाने पर प्राण हीन हो कर सोएं.
तुम्हारे द्वारा माया के बल से उत्पन्न की गई अग्नि की ज्वालाएं और धुएं की शिखाएं हमारे
शत्रुओं की सेना को पराजित करती हुई हमारे साथ चलें. (१९)
तयार्बुदे प्रणुत्तानामिन्द्रो हन्तु वरंवरम्.
अमित्राणां शचीपतिर्मामीषां मोचि कश्चन.. (२०)
हे अर्बुदि नाम के सर्प! तुम्हारे द्वारा युद्ध भूमि से भगाए गए हमारे जो शत्रु हैं, उन में जो
श्रेष्ठ हैं, उन्हें शची के पति इंद्र मारें. वे हमारे किसी शत्रु को न छोड़ें. (२०)
उत्कसन्तु हृदयान्यूर्ध्वः प्राण उदीषतु.
शौष्कास्यमनु वर्तताममित्रान् मोत मित्रिणः.. (२१)
हमारे शत्रुओं के हृदय उन के शरीर से निकल जाएं. उन की प्राण वायु भी उन के शरीर
से निकल जाए. मुख सूख जाने से हमारे शत्रु मर जाएं. हमारे मित्रों का मुख न सूखे. (२१)
ये च धीरा ये चाधीराः पराञ्चो बधिराश्च ये.
तमसा ये च तूपरा अथो बस्ताभिवासिनः.
सर्वांस्तां अर्बुदे त्वममित्रेभ्यो दृक्षे कुरूदारांश्च प्र दर्शय.. (२२)
हे अर्बुदि नाम के सर्प! हमारे शत्रुओं में जो वीर कायर, युद्ध से भागने वाले, भय के
कारण कुछ न सुनने वाले, बिना सींग के पशुओं के समान हानि न पहुंचाने वाले और भेड़ों के
समान शब्द करने वाले हैं, उन सब को अपनी माया से पराजित होने वाला बनाओ. हे सर्प!
तुम हमारे शत्रुओं को अपनी माया के द्वारा उल्कापात आदि अपशकुन दिखाओ. (२२)
अर्बुदिश्च त्रिषन्धिश्चामित्रान् नो वि विध्यताम्.
यथैषामिन्द्र वृत्रहन् हनाम शचीपते ऽ मित्राणां सहस्रशः.. (२३)
त्रिषंधि अर्थात् सेना को मोहित करने वाला देव और अर्बुदि नाम का सर्प हमारे शत्रुओं
को अनेक प्रकार से चोट पहुंचाए. हे शचीपति इंद्र! हम जिस प्रकार उन शत्रुओं से संबंधित
लोगों को हजारों की संख्याओं में मारे, हमें ऐसी शक्ति दो. (२३)
वनस्पतीन् वानस्पत्यानोषधीरुत वीरुधः.
गन्धर्वाप्सरसः सर्पान् देवान् पुण्य-जनान् पितॄन्.
सर्वांस्तां अर्बुदे त्वममित्रेभ्यो दृशे कुरूदारांश्च प्र दर्शय.. (२४)
हे अर्बुदि नाम के सर्प! तुम हमारे शत्रुओं को अपनी माया से वृक्षों, वृक्षों के विकारों,
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