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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 625 of 1063

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Page 625

हे अर्बुदि नाम के सर्प! तुम्हारे द्वारा काटे जाने पर हमारे शत्रु पुरुष के मर जाने पर उस
की पत्नी छाती पीटती हुई, आंसू बहाती हुई, गहनों से शून्य कानों वाली, बाल बिखराए हुए
रोए. (७)
संकर्षन्ती करूकरं मनसा पुत्रमिच्छन्ती.
पतिं भ्रातरमात् स्वान् रदिते अर्बुदे तव.. (८)
हे अर्बुदि नाम के सर्प! काटने के कारण शरीर में विष फैल जाने पर शत्रु की पत्नी हाथ
मलती हुई विष के नाश के लिए अपने पुत्र की इच्छा करती हुई, इस के बाद पति की भी
इच्छा करती हुई तथा विष दूर करने के लिए अपने संबंधियों की इच्छा करें. (८)
अलिक्लवा जाष्कमदा गृध्राः श्येनाः पतत्रिणः.
ध्वाङ्क्षाः शकुनयस्तृप्यन्त्वमित्रेषु समीक्षयन् रदिते अर्बुदे तव.. (९)
हे अर्बुदि नाम के सर्प! तुम्हारे द्वारा हमारे शत्रुओं को काटे जाने पर धृष्ट पक्षी, शरीर को
कष्ट देने वाले पक्षी, गिद्ध, बाज तथा अन्य मांस खाने वाले पक्षी और कौवे, जो हमारे शत्रुओं
का मांस खाने की प्रतीक्षा कर रहे हैं, वे तृप्त हों. (९)
अथो सर्वं श्वापदं मक्षिका तृप्यतु क्रिमिः.
पौरुषेये ऽ धि कुणपे रदिते अर्बुदे तव.. (१०)
हे अर्बुदि! तुम्हारे द्वारा काटे जाने पर हमारे शत्रुओं के शरीर में जो घाव हो जाते हैं, उन
के शरीर को खा कर मांसभक्षी पशु, मक्खियां और कीड़े तृप्त हों. (१०)
आ गृह्लीतं सं बृहतं प्राणापानान् न्यर्बुदे.
निवाशा घोषाः सं यन्त्वमित्रेषु समीक्षयन् रदिते अर्बुदे तव.. (११)
हे न्यर्बुदि तथा अर्बुदि नाम के सर्पो! तुम हमारे शत्रुओं के प्राण और अपान को ग्रहण
करो. तुम्हारे द्वारा हमारे शत्रुओं को काटे जाने पर उन्हें देखने वालों के द्वारा दुःख भरे स्वर
उच्चारण किए जाएं. (११)
उद् वेपय सं विजन्तां भियामित्रान्सं सृज.
उरुग्राहैर्बाहुड्कैर्विध्यमित्रान् न्यर्बुदे.. (१२)
हे न्यर्बुदि नाम के सर्प! तुम हमारे शत्रुओं को कंपित करो. तुम्हारे भय के कारण वे
अपने स्थान से भाग जाएं. इस के बाद तुम हमारे शत्रुओं के पैरों और हाथों को बांध कर
मारो. (१२)
मुह्यन्त्वेषां बाहवश्चित्ताकूतं च यद्धृदि.
मैषामुच्छेषि किं चन रदिते अर्बुदे तव.. (१३)
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