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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

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Page 635

हमारे पूर्व पुरुषों अर्थात् पूर्वजों ने जिस पृथ्वी पर अनेक प्रशंसनीय कार्य किए, जिस
पृथ्वी पर देवों ने अत्याचारी दैत्यों के साथ संग्राम किया तथा जो पृथ्वी गायों, घोड़ों तथा
पक्षियों को आश्रय प्रदान करने वाली है, वह पृथ्वी हमें तेज और ऐश्वर्य प्रदान करे. (५)
विश्वंभरा वसुधानी प्रतिष्ठा हिरण्यवक्षा जगतो् निवेशनी.
वैश्वानरं बिभ्रती भूमिरग्निमिन्द्रऋषभा द्रविणे नो दधातु.. (६)
जो पृथ्वी वनों को धारण करने वाली तथा संसार के प्राणियों का भरणपोषण करने
वाली है, जो पृथ्वी अपने सीने अर्थात् खदानों में स्वर्ण को धारण करती है तथा वैश्वानर अग्नि
को आश्रय प्रदान करती है, वह पृथ्वी हमारे लिए धन प्रदान करे. (६)
यां रक्षन्त्यस्वप्ना विश्वदानीं देवा भूमिं पृथिवीमप्रमादम्.
सा नो मधु प्रियं दुहामथो उक्षतु वर्चसा.. (७)
देवगण जाग्रत रहते हुए अथवा सावधान रहते हुए जिस पृथ्वी की रक्षा करते हैं, वह
पृथ्वी हमें मधु, धन एवं बल से युक्त करे. (७)
यार्णवे ऽ धि सलिलमग्र आसीद् यां मायाभिरन्वचरन् मनीषिणः.
यस्या हृदयं परमे व्योमन्सत्येनावृतममृतं पृथिव्याः.
सा नो भूमिस्त्विषिं बलं राष्ट्रे दधातूत्तमे.. (८)
जो पृथ्वी पहले सागर के जल में डूबी हुई थी, मनीषीजनों ने अनेक प्रकार के कार्य
करते हुए, जिस पृथ्वी पर विचरण किया था, जिस का हृदय विशाल आकाश में स्थित है, वह
मरण रहित पृथ्वी हमें श्रेष्ठ राष्ट्र, बल और दीप्ति प्रदान करे. (८)
यस्यामापः परिचराः समानीरहोरात्रे अप्रमादं क्षरन्ति.
सा नो भूमिर्भूरिधारा पयो दुहामथो उक्षतु वर्चसा.. (९)
जिस पृथ्वी पर बहता हुआ जल रात में और दिन में समान रूप से गमन करता है, ऐसी
अधिक जल वाली पृथ्वी हमें दूध के समान सार रूप फलों तथा तेज से युक्त करे. (९)
यामश्विनावमिमातां विष्णुर्यस्यां विचक्रमे.
इन्द्रो यां चक्र आत्मने ऽ नमित्रां शचीपतिः.
सा नो भूमिर्वि सृजतां माता पुत्राय मे पयः.. (१०)
अश्विनीकुमारों ने जिस पृथ्वी का निर्माण किया, विष्णु ने जिस पर पराक्रम का प्रदर्शन
किया तथा इंद्र ने जिस पृथ्वी को अपने अधीन कर के शत्रुओं से हीन कर दिया, वह पृथ्वी
अपना सार रूप जल मुझे उसी प्रकार पिलाए, जिस प्रकार माता पुत्र को दूध पिलाती है.
(१०)
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