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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

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Page 629

शत्रु के आसपास मंडराते हैं, वे वज्र से मारे जाएं. (३)
अन्तर्धेहि जातवेद आदित्य कुणपं बहु.
त्रिषन्धेरियं रोना सुहितास्तु मे वशे.. (४)
हे जातवेद अग्नि! आदित्य देव अर्थात् सूर्य को आकाश में गिरते हुए शवों के शरीरों के
द्वारा ढक दो. त्रिषंधि नामक देव से संबंध रखने वाली यह सेना भलीभांति मेरे वश में हो,
जिस से मैं शत्रुओं को मार सकूं. (४)
उत्तिष्ठ त्वं देवजनार्बुदे सेनया सह.
अयं बलिर्व आहुतस्त्रिषन्धेराहुतिः प्रिया.. (५)
हे देव जाति के अर्बुदि नाम के सर्प! तुम अपनी सेना के साथ उठो. हमारा यह बलि
कार्य तुम्हारी तृप्ति करने वाला हो. त्रिषंधि देव की जो सेना है, वह भी बलि प्राप्त होने के
कारण शत्रुओं का विनाश करे. (५)
शितिपदी सं द्यतु शरव्ये ३ यं चतुष्पदी.
कृत्ये ऽ मित्रेभ्यो भव त्रिषन्धेः सह सेनया.. (६)
श्वेत चरणों वाली गाय, चार चरणों वाली हो कर तथा बाणों का समूह बना कर हमारे
शत्रुओं को प्राप्त हो. हे कृत्यारूपिणी गौ! तू त्रिषंधि देव के समान हमारे शत्रुओं का संहार
करने वाली बन. (६)
धूमाक्षी सं पततु कृधुकर्णी च क्रोशतु.
त्रिषन्धेः सेनया जिते अरुणाः सन्तु केतवः.. (७)
हमारे शत्रुओं की सेना माया से उत्पन्न धुएं से ढके हुए नयनों वाली हो जाए. हमारे रण
के बाजों के कारण उन के कान बहरे हो जाएं. इस प्रकार त्रिषंधि नामक देव के द्वारा शत्रु की
सेना को जीत लिए जाने पर देव सेना के झंडे लाल रंग को हो जाएं. (७)
अवायन्तां पक्षिणो ये वयांस्यन्तरिक्षे दिवि ये चरन्ति.
श्वापदो मक्षिकाः सं रभन्तामामादो गृध्राः कुणपे रदन्ताम्.. (८)
जो पक्षी मरी हुई शत्रु सेना का मांस खाने के लिए नीचे की ओर मुंह कर के आकाश में
उड़ते हैं तथा द्युलोक अर्थात् स्वर्ग में जो पक्षी उड़ते हैं, वे तथा मांसभक्षी सिंह, गीदड़ आदि
पशु और मांस भक्षिणी नीले रंग की मक्खियां शवों का मांस खाने के लिए शत्रु सेनाओं में
विचरण करें. मांस भक्षक गिद्ध शत्रु सेना के शरीरों को अपनी चोंच से नोचें. (८)
यामिन्द्रेण संधां समधत्था ब्रह्मणा च बृहस्पते.
तया ऽ हमिन्द्रसंधया सर्वान् देवानिह हुव इतो जयत मामुतः.. (९)
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