अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
About this granth
The Atharvaveda (अथर्ववेद) is one of the four Vedas. Besides ritual hymns it contains many verses concerned with everyday life: protection from disease, healing plants, the welfare of house and family, defence against enemies, marriage, kingship and praise of the earth, including the well-known Prithvi Sukta.
The introduction to this edition notes that Patanjali, author of the Mahabhashya, knew nine branches of the Atharvaveda, of which only a few, such as the Paippalada and Shaunaka, survive. The translation follows the Shaunaka recension, which the introduction describes as having 20 kandas, 731 suktas and 5,987 mantras. Each sukta is headed by its deity, for example the waters, Brihaspati, the rivers, plants, Brahmanaspati, the jangida amulet, Indra, the apamarga herb, and the house and its guardian, so the subject of each hymn is clear at a glance.
The Sanskrit mantras are accompanied by a simple Hindi rendering by Dr. Ganga Sahay Sharma. This is the 2015 edition of Sanskrit Sahitya Prakashan, New Delhi, part of its set of the four Vedas, and runs to 1063 pages.
सूक्त-३६ देवता—सत्य ओज वाले अग्नि
अव बाधे द्विषन्तं देवपीयुं सपत्ना ये मे ऽ प ते भवन्तु.
ब्रह्मोदनं विश्वजितं पचामि शृण्वन्तु मे श्रद्दधानस्य देवाः.. (७)
मैं हिंसा करने वाले शत्रु का वध करता हूं तथा देवों के हिंसकों की हत्या करता हूं. जो
मेरे शत्रु हैं, वे भाग जाएं. इस के निमित्त मैं सब को जीतने वाले ब्रह्मोदन को पकाता हूं. मुझ
श्रद्धालु के वचनों को देव सुनें और मेरी सहायता करें. (७)
सूक्त-३६ देवता—सत्य ओज वाले अग्नि
तान्तसत्यौजाः प्र दहत्वग्निर्वैश्वानरो वृषा.
यो नो दुरस्याद् दिप्साच्चाथो यो नो अरातियात्.. (१)
सच्चे बल वाले, वैश्वानर एवं गर्भाधान में समर्थ अग्नि उन शत्रुओं को जलाएं, जो हमारे
प्रति दुष्टों के समान आचरण करें, जो हमारी हिंसा करना चाहें तथा जो हमारे प्रति शत्रु के
समान आचरण करें. (१)
यो नो दिप्साददिप्सतो दिप्सतो यश्च दिप्सति.
वैश्वानरस्य दंष्ट्रयोरग्नेरपि दधामि तम्.. (२)
जो शत्रु हिंसा की इच्छा न करने वाले मुझ को मारना चाहता है तथा जिस हिंसा की
इच्छा करने वाले को मैं मारना चाहता हूं, उस को मैं वैश्वानर अग्नि की दाढ़ों में रखता हूं. (२)
य आगरे मृगयन्ते प्रतिक्रोशे ऽ मावास्ये.
क्रव्यादो अन्यान् दिप्सतः सर्वांस्तान्सहसा सहे.. (३)
युद्ध भूमि में जो पिशाच हमें खाने के लिए खोजते हैं तथा शत्रुओं द्वारा किए गए
आक्रोश के कारण अमावस्या की आधी रात में हमें मारना चाहते हैं, हम मंत्रों के प्रभाव से
उन्हें पराजित करते हैं. (३)
सहे पिशाचान्त्सहसैषां द्रविणं ददे.
सर्वान् दुरस्यतो हन्मि सं म आकूतिर्ऋध्यताम्.. (४)
मैं बल के द्वारा राक्षसों को पराजित करता हूं तथा उन राक्षसों के धन को अपने
अधिकार में करता हूं. मैं द्वेष करने वाले सभी शत्रुओं को मारता हूं. मेरा इष्ट फल विषयक
संकल्प और सुख समृद्ध हो. (४)
ये देवास्तेन हासन्ते सूर्येण मिमते जवम्.
नदीषु पर्वतेषु ये सं तैः पशुभिर्विदे.. (५)
हे अग्नि आदि देवो! जो पशु, राक्षस, पिशाच आदि से बचना चाहते हैं तथा उन्हें छोड़
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कर सूर्य के समान वेग से भागते हैं तथा जो पशु नदियों और तीर्थों में घूमते हैं, तुम्हारे प्रभाव
से मैं उन राक्षस आदि को मार कर उन पशुओं के साथ संयुक्त होता हूं. (५)
तपनो अस्मि पिशाचानां व्याघ्रो गोमतामिव.
श्वानः सिंहमिव दृष्ट्वा ते न विन्दन्ते न्यञ्चनम्.. (६)
मैं मंत्रों के सामर्थ्य से पिशाचों को उसी प्रकार संताप देता हूं, जिस प्रकार बाघ गायों के
स्वामियों को दुःखी करता है. सिंह को देख कर जिस प्रकार कुत्ता भय से छिप जाता है, उसी
प्रकार मेरे मंत्रों के प्रभाव से वे अधोगति पाते हैं. (६)
न पिशाचैः सं शक्नोमि न स्तेनैर्न वनर्गूभिः.
पिशाचास्तस्मान्नश्यन्ति यमहं ग्राममाविशे.. (७)
मैं पिशाचों, चोरों और वन में रहने वाले लुटेरों से न मिलूं. मैं जिस ग्राम में प्रवेश कर के
निवास करूं, उस से पिशाच भाग जाएं. (७)
यं ग्राममाविशत इदमुग्रं सहो मम.
पिशाचास्तस्मान्नश्यन्ति न पापमुप जानते.. (८)
मंत्र के प्रभाव से उत्पन्न मेरा यह बल जिस ग्राम में प्रवेश कर के निवास करता है,
पिशाच उस ग्राम से भाग जाता है. वहां रहने वाले लोग पिशाचों के हिंसा रूपी पाप को नहीं
जानते. (८)
ये मा क्रोधयन्ति लपिता हस्तिनं मशका इव.
तानहं मन्ये दुर्हितान् जने अल्पशयूनिव.. (९)
जो पिशाच मिल कर मुझे इस प्रकार क्रोधित करते हैं, जिस प्रकार मच्छर हाथी को
क्रोध बढ़ा देते हैं; मैं उन्हें उसी प्रकार हनन के योग्य दुष्ट जानता हूं, जिस प्रकार जनसंचार के
स्थान पर छोटे शरीर वाले कीड़े होते हैं. (९)
अभि तं निर्ऋतिर्धत्तामश्वमिवाश्वाभिधान्या.
मल्वो यो मह्यं क्रुध्यति स उ पाशान्न मुच्यते.. (१०)
पाप देवता मेरे शत्रु को उसी प्रकार बांध लें, जिस प्रकार रस्सी घोड़े को बांधती हैं. जो
शत्रु मेरे लिए क्रोध करता है, वह शत्रु पाप देवता निर्ऋति के पाश से न छूटे. (१०)
सूक्त-३७ देवता—जड़ीबूटी आदि
त्वया पूर्वमथर्वाणो जघ्नु रक्षांस्योषधे.
त्वया जघान कश्यपस्त्वया कण्वो अगस्त्यः.. (१)
हे जड़ीबूटियो! प्राचीन काल में तुम्हें साधन बना कर अथर्ववेद संबंधी महर्षियों ने
राक्षसों को मारा था. तुम्हारे द्वारा कश्यप, कण्व और अगस्त्य ऋषियों ने राक्षसों का वध
किया. (१)
त्वया वयमप्सरसो गन्धर्वाञ्चातयामहे.
अजशृङ्गयज रक्षः सर्वान् गन्धेन नाशय.. (२)
हे अजशृंगी नाम की जड़ी! तुझे साधन बना कर हम उपद्रव करने वाली अप्सराओं और
गंधर्वों का नाश करते हैं. तू राक्षसों को यहां से दूर भगा तथा अपनी गंध से सभी राक्षसों का
विनाश कर. (२)
नदीं यन्त्वप्सरसो ऽ पां तारमवश्वसम्.
गुल्गुलूः पीला नलद्यौ ३ क्षगन्धिः प्रमन्दनी.
तत् परेताप्सरसः प्रतिबुद्धा अभूतन.. (३)
गंधर्वों की पत्नियां अप्सराएं अपने वास स्थान पर उसी प्रकार चली जाएं, जिस प्रकार
नदी पार करने वाले मल्लाह के समीप पहुंचते हैं. हे अप्सराओ! गुग्गुलु, पीला, नलवी,
ओक्षगंधि एवं प्रमंदिनी के हवन से भयभीत हो कर अपने निवास स्थान को चली जाओ तथा
वहीं रहो. (३)
यत्राश्वत्था न्यग्रोधा महावृक्षाः शिखण्डिनः.
तत् परेताप्सरसः प्रतिबुद्धा अभूतन.. (४)
जहां अश्वत्थ, न्यग्रोध आदि महावृक्ष एवं मोर होते हैं, हे अप्सराओ! वहां से अपने
निवास स्थान को चली जाओ तथा वहीं रुकी रहो. (४)
यत्र वः प्रेङ्खा हरिता अर्जुना उत यत्राघाटाः कर्कर्यः संवदन्ति.
तत् परेताप्सरसः प्रतिबुद्धा अभूतनः.. (५)
हे अप्सराओ! तुम्हारे खेलने के लिए जहां झूले पड़े हैं, उन झूलों का रंग हरा और सफेद
है. जहां कर्करी नाम के बाजे बजाए जाते हैं, वहां से भाग कर अपने निवास स्थान को चली
जाओ तथा वहीं रहो. (५)
एयमगन्नोषधीनां वीरुधां वीर्यावती.
अजशृङ्गयराट्की तीक्ष्णशृङ्गी वृषतु.. (६)
जड़ीबूटियों एवं वृक्षों में सब से अधिक शक्ति वाली अजशृंगी, अराटकी तथा तीक्ष्ण
शृंगी नाम की जड़ीबूटियां आ गई हैं. इस स्थान से राक्षस भाग जाएं. (६)
आनृत्यतः शिखण्डिनो गन्धर्वस्याप्सरापतेः. भिनद्मि मुष्कावपि यामि
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शेषः.. (७)
मैं मोर के समान नाचते हुए अप्सरा के पति गंधर्व के अंडकोषों को फोड़ता हूं तथा उस
के पुरुष जननांग को निष्क्रिय बनाता हूं. (७)
भीमा इन्द्रस्य हेतयः शतमृष्टीरयस्मयीः.
ताभिर्हविरदान् गन्धर्वानवकादान् व्यृषतु.. (८)
इंद्र का आयुध भयंकर, सौ धारों वाला एवं लोहे का बना हुआ है. उसी से वह हवि न
देने वाले एवं शैवाल खाने वाले गंधर्वों को मारें. (८)
भीमा इन्द्रस्य हेतयः शतमृष्टीर्हिरण्ययीः.
ताभिर्हविरदान् गन्धर्वानवकादान् व्यृषतु.. (९)
इंद्र के आयुध भयंकर, सौ धारों वाले एवं सोने के बने हैं. इंद्र उन्हीं से हवि न देने वाले
तथा शैवाल भक्षण करने वाले गंधर्वों का वध करें. (९)
अवकादानभिशोचानप्सु ज्योतय मामकान्.
पिशाचान्त् सर्वानोषधे प्र मृणीहि सहस्व च.. (१०)
हे अजशृंगी जड़ी! शैवाल खाने वाले, सभी को शोक पहुंचाने वाले उन गंधर्वों को जलों
में प्रकाशित करो, जो युद्ध से संबंधित हैं. तुम सभी पिशाचों को मारो तथा पराजित करो.
(१०)
श्वैवैकः कपिरिवैकः कुमारः सर्वकेशकः.
प्रियो दृश इव भूत्वा गन्धर्वः सचते स्त्रियस्तमितो नाशयामसि ब्रह्मणा
वीर्यवता.. (११)
मायावी होने के कारण एक गंधर्व कुत्ते के समान, दूसरा बंदर के समान है. गंधर्व सारे
शरीर पर बाल उगे होने पर भी बालक ही होता है. गंधर्व देखने में प्रिय रूप बना कर स्त्रियों
से मिलते हैं. मैं अत्यधिक शक्तिशाली मंत्रों की सहायता से उन्हें यहां से भगाता हूं. (११)
जाया इद् वो अप्सरसो गन्धर्वाः पतयो यूयम्.
अप धावतामर्त्या मर्त्यान् मा सचध्वम्.. (१२)
हे गंधर्वों! ये अप्सराएं तुम्हारी पत्नियां हैं और तुम इन के पति हो. तुम गंधर्व जाति के
हो, इसलिए मनुष्यों से दूर भाग जाओ, इन से मत मिलो. (१२)
सूक्त-३८ देवता—अप्सराएं, अक्ष
शलाका
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उद्भिन्दतीं सञ्जयन्तीमप्सरां साधुदेविनीम्.
ग्लहे कृतानि कृण्वानामप्सरां तामिह हुवे.. (१)
बाजी लगा कर धन का भेदन करती हुई एवं भलीभांति जुए में जीतने वाली एवं अक्ष
शलाका आदि से अच्छी तरह जुआ खेलने वाली अप्सरा की मैं स्तुति करता हूं. सदैव दांव पर
लगाए गए धन पर जुआ जीतने के चिह्न बनाने वाली उस अप्सरा को मैं यहां बुलाता हूं. (१)
विचिन्वतीमाकिरन्तीमप्सरां साधुदेविनीम्.
ग्लहे कृतानि गृह्णानामप्सरां तामिह हुवे.. (२)
एक निश्चित काठ पर तीनचार अक्षों अर्थात् पासों को एक करती हुई, पुनः उन्हें ही जुए
में जीतने के लिए बहुत से काठों पर बिखेरती हुई एवं जय के उपाय जानने के कारण
भलीभांति जुआ खेलती हुई अप्सरा को मैं अपने समीप बुलाता हूं. वह जुए में लगाए गए धन
को चिह्न बना कर जीत लेती है. (२)
यायैः परिनृत्यत्याददाना कृतं ग्लहात्.
सा नः कृतानि सीषती प्रहामाप्नोतु मायया.
सा नः पयस्वत्यैतु मा नो जैषुरिदं धनम्.. (३)
जो अप्सरा जुए में जीते गए धन को 'यह मेरा है' कह कर अधिकार में कर लेती हैं तथा
पासों की संख्याओं के द्वारा जुए में जीत कर प्रसन्नतापूर्वक नृत्य करती हैं, वे हमारे कृतों में
अर्थात् चार संख्या के दांवों को सोखती हुई पासों को अपनी माया से प्राप्त कर के गाय आदि
धन वाली अप्सराएं हमारे समीप आएं. जुए के दांव पर लगा हमारा धन दूसरे न जीत सकें.
(३)
या अक्षेषु प्रमोदन्ते शुचं क्रोधं च बिभ्रती.
आनन्दिनीं प्रमोदिनीमप्सरां तामिह हुवे.. (४)
जो अप्सरा जुए में जीतने के कारण प्रसन्नता एवं हार के कारण शोक और क्रोध को
धारण करती है, जुए के कारण हर्षित होने वाली तथा ज्वारियों को प्रसन्नता देने वाली उस
अप्सरा को मैं बुलाता हूं. (४)
सूर्यस्य रश्मीननु याः सञ्चरन्ति मरीचीर्वा या अनुसञ्चरन्ति.
यासामृषभो दूरतो वाजिनीवान्त्सद्यः सर्वान् लोकान् पर्येति रक्षन्.
स न ऐतु होममिमं जुषाणो ३ न्तरिक्षेण सह वाजिनीवान्.. (५)
जो अप्सराएं सूर्य की किरणों के पीछे घूमती हैं अथवा सूर्य की किरणें उन के पीछे
चलती हैं, उन अप्सराओं के गर्भाधान में समर्थ पति सदा उषाओं से संबंधित रहते हैं. वे सभी
लोकों की रक्षा करने के लिए प्रतिदिन आते हैं. उषा के पति सूर्य अप्सराओं के साथ हमारे
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होम के हवि को स्वीकार करते हुए आएं. (५)
अन्तरिक्षेण सह वाजिनीवन् कर्कीं वत्सामिह रक्ष वाजिन्.
इमे ते स्तोका बहुला एह्यर्वाङिडयं ते मनो ऽ स्तु.. (६)
हे बलवान सूर्य! इस स्थान पर धौरे (सफेद) रंग के बछड़ों का पालन करो. तुम्हारी ये
दूध की बूंदें हमारे लिए समृद्ध हों. तुम यहां शीघ्र आओ. यह धौरे रंग की गौ तुम्हारी है. तुम्हारे
लिए नमस्कार है. (६)
अन्तरिक्षेण सह वाजिनीवन् कर्कीं वत्सामिह रक्ष वाजिन्.
अयं घासो अयं व्रज इह वत्सां नि बध्नीमः
यथानाम व ईश्महे स्वाहा.. (७)
हे बलवान सूर्य! इस स्थान पर धौरे रंग के बछड़ों का पालन करो. यह घास और
गोशाला पुष्टिकर हो. इस गोशाला में मैं बछड़ों को बांधता हूं. मैं तुम्हें उसी प्रकार बांधता हूं,
जिस से तुम्हारा स्वामी बन सकूं. यह हवि उत्तम आहुति वाला हो. (७)
सूक्त-३९ देवता—पृथ्वी, अग्नि
पृथिव्यामग्नये समनमन्तस् आध्र्नोत्.
यथा पृथिव्यामग्नये समनमन्नेवा मह्यं संनमः सं नमन्तु.. (१)
पृथ्वी पर देवता रूप में स्थित अग्नि के लिए सभी प्राणी नमन करते हैं. वे अग्नि इस से
समृद्ध होते हैं. पृथ्वी पर प्राणी जिस प्रकार अग्नि के लिए नमन करते हैं, उसी प्रकार का
नमन मेरे लिए भी हो. (१)
पृथिवी धेनुस्तस्या अग्निवत्सः.
सा मे ऽ ग्निना वत्सेनेषमूर्जं कामं दुहाम्.
आयुः प्रथमं प्रजां पोषं रयिं स्वाहा.. (२)
पृथ्वी गाय है और अग्नि उस का बछड़ा है. अग्नि रूपी बछड़े के कारण पृथ्वी मेरे लिए
मनचाही मात्रा में बल कारक अन्न दे. पृथ्वी मुझे सौ वर्ष की आयु, प्रजा, पुष्टि एवं धन दे. यह
हवि उत्तम आहुति वाला हो. (२)
अन्तरिक्षे वायवे समनमन्तस् आध्र्नोत्.
यथान्तरिक्षे वायवे समनमन्नेवा मह्यं संनमः सं नमन्तु.. (३)
अंतरिक्ष में अधिपति के रूप में स्थित वायु के लिए यक्ष, गंधर्व आदि ने भलीभांति
नमस्कार किया. वायु उन के नमस्कार से प्रसन्न हुए. जिस प्रकार गंधर्व आदि ने अंतरिक्ष में
वायु के लिए नमस्कार किया, उसी प्रकार वह मेरे लिए नमस्कार करें. (३)
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अन्तरिक्षं धेनुस्तस्या वायुर्वत्सः.
सा मे वायुना वत्सेनेषमूर्जं कामं दुहाम्.
आयुः प्रथमं प्रजां पोषं रयिं स्वाहा.. (४)
अंतरिक्ष गाय है और वायु उस का बछड़ा है. वह गाय वायु रूपी बछड़े के कारण मुझे
बलकारक अन्न पर्याप्त मात्रा में प्रदान करे. वायु मुझे सौ वर्ष की आयु, प्रजा, पुष्टि एवं धन दे.
यह हवि उत्तम आहुति वाला हो. (४)
दिव्यादित्याय समनमन्त्या आध्र्नोत्.
यथा दिव्यादित्याय समनमन्नेवा मह्यं संनमः सं नमन्तु.. (५)
द्युलोक में स्थित सूर्य के लिए वहां के सभी प्राणियों ने नमस्कार किया. उस नमस्कार से
सूर्य प्रसन्न हुए. प्राणियों ने जिस प्रकार द्युलोक के सूर्य के लिए नमस्कार किया, उसी प्रकार
मेरे लिए भी नमस्कार करें. (५)
द्यौर्धेनुस्तस्या आदित्यो वत्सः.
सा म आदित्येन वत्सेनेषमूर्जं कामं दुहाम्.
आयुः प्रथमं प्रजां पोषं रयिं स्वाहा.. (६)
द्यौ गाय है और सूर्य उस का बछड़ा है. वह द्यौ रूपी गाय सूर्य रूपी बछड़े के कारण मेरे
लिए मनचाहा बलकारक अन्न प्रदान करे. वह मुझे सौ वर्ष की आयु, प्रजा, पुष्टि और धन
प्रदान करे. यह हवि उत्तम आहुति वाला हो. (६)
दिक्षु चन्द्राय समनमन्तस आध्र्नोत्.
यथा दिक्षु चन्द्राय समनमन्नेवा मह्यं संनमः सं नमन्तु.. (७)
दिशाओं में वर्तमान चंद्रमा के लिए वहां के जीवों ने नमस्कार किया. इस से चंद्रमा बहुत
प्रसन्न हुए. जीवों ने जिस प्रकार चंद्रमा के लिए नमस्कार किया, उसी प्रकार मेरे लिए भी
करेंगे. (७)
दिशो धेनवस्तासां चन्द्रो वत्सः.
ता मे चन्द्रेण वत्सेनेषमूर्जं कामं दुहाम्.
आयुः प्रथमं प्रजां पोषं रयिं स्वाहा.. (८)
दिशाएं गाय हैं और चंद्रमा उन का बछड़ा है. वे दिशाएं चंद्रमा रूपी बछड़े के कारण
मुझे मनचाहा बलकारक अन्न प्रदान करें. वे मुझे सौ वर्ष की आयु, प्रजा, पुष्टि एवं धन दें. (८)
अग्नावग्निश्चरति प्रविष्ट ऋषीणां पुत्रो अभिशस्तिपा उ.
नमस्कारेण नमसा ते जुहोमि मा देवानां मिथुया कर्म भागम्.. (९)
अंगार रूप लौकिक अग्नि में प्रवेश कर के देवता रूप अग्नि संचरण करते हैं. अथवा,
अंगिरा आदि ऋषियों के पुत्र हमें आरोप के रूप में प्राप्त पाप से बचाएं. मैं नमस्कार के साथ
अन्न से तुम्हारे निमित्त हवन करता हूं. हम देवों के भाग हवि को मिथ्या न करें. (९)
हृदा पूतं मनसा जातवेदो विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्.
सप्तास्यानि तव जातवेदस्तेभ्यो जुहोमि स जुषस्व हव्यत्.. (१०)
हे जातवेद अग्नि! मैं तुम्हारे लिए हृदय और मन से पवित्र हवि का हवन करता हूं. हे
देव! तुम सभी ज्ञानों को जानते हो. हे जातवेद अग्नि! तुम्हारे सात मुख हैं. उन मुखों के लिए
मैं घी का हवन करता हूं. तुम मेरे हव्य को स्वीकार करो. (१०)
सूक्त-४० देवता—जातवेद
ये पुरस्ताज्जुह्वति जातवेदः प्राच्या दिशोऽभिदासन्त्यस्मान्.
अग्निमृत्वा ते पराञ्चो व्यथन्तां प्रत्यगेनान् प्रतिसरेण हन्मि.. (१)
हे जातवेद अग्नि! जो शत्रु पूर्व दिशा में हवन करते हुए हम पर जादूटोने तथा पूर्व दिशा
से हमारी हिंसा करना चाहते हैं, अग्नि में गिर कर हमारे वे विरोधी दुःखी हों. हम उन के द्वारा
किए गए जादूटोने को वापस लौटा कर उन्हें मारते हैं. (१)
ये दक्षिणतो जुह्वति जातवेदो दक्षिणाया दिशो ऽ भिदासन्त्यस्मान्.
यममृत्वा ते पराञ्चो व्यथन्तां प्रत्यगेनान् प्रतिसरेण हन्मि.. (२)
हे जातवेद अग्नि! जो शत्रु हमारे निवास स्थान की दक्षिण दिशा में हवन कर के
जादूटोना कर रहे हैं, वे दक्षिण दिशा से हमारी हिंसा करते हैं. वे शत्रु हमारी ओर से मुंह फेर
कर जल जाएं. इन जादूटोना करने वालों को हम उन के जादूटोने को उन्हीं की ओर लौटा
कर मारते हैं. (२)
ये पश्चाज्जुह्वति जातवेदः प्रतीच्या दिशो ऽ भिदासन्त्यस्मान्.
वरुणमृत्वा ते पराञ्चो व्यथन्तां प्रत्यगेनान् प्रतिसरेण हन्मि.. (३)
हे जातवेद अग्नि! जो शत्रु हमारे निवास स्थान की पश्चिम दिशा में हवन कर के
जादूटोना कर रहे हैं, वे पश्चिम दिशा से हमारी हिंसा करते हैं. वे शत्रु हमारी ओर से मुंह फेर
कर जल जाएं. उन जादूटोना करने वालों को हम उन के जादूटोने को उन्हीं की ओर लौटा
कर मारते हैं. (३)
य उत्तरतो जुह्वति जातवेद उदीच्या दिशो ऽ भिदासन्त्यस्मान्.
सोममृत्वा ते पराञ्चो व्यथन्तां प्रत्यगेनान् प्रतिसरेण हन्मि.. (४)
हे जातवेद अग्नि! जो शत्रु हमारे निवास स्थान की उत्तर दिशा में हवन कर के जादूटोना
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कर रहे हैं, वे उत्तर दिशा से हमारी हिंसा करते हैं. वे शत्रु हमारी ओर से मुंह फेर कर जल
जाएं. उन जादूटोना करने वालों को हम उन के जादूटोने उन्हीं की ओर लौटा कर मारते हैं.
(४)
ये ३ ऽ धस्ताज्जुह्वति जातवेदो ध्रुवाया दिशो ऽ भिदासन्त्यस्मान्.
भूमिमृत्वा ते पराञ्चो व्यथन्तां प्रत्यगेनान् प्रतिसरेण हन्मि.. (५)
हे जातवेद अग्नि! जो शत्रु हमारे निवास से नीचे की दिशा में हवन कर के जादूटोना कर
रहे हैं, वे नीचे की दिशा से हमारी हिंसा करते हैं. वे शत्रु हमारी ओर से मुंह फेर कर जल
जाएं. उन जादूटोना करने वालों को हम उन के जादूटोने उन्हीं की ओर वापस कर के मारते
हैं. (५)
ये ३ ऽ न्तरिक्षाज्जुह्वति जातवेदो व्यध्वाया दिशो ऽ भिदासन्त्यस्मान्.
वायुमृत्वा ते पराञ्चो व्यथन्तां प्रत्यगेनान् प्रतिसरेण हन्मि.. (६)
हे जातवेद अग्नि! जो शत्रु हमारे निवास स्थान से अंतरिक्ष की दिशा में हवन कर के
जादूटोना कर रहे हैं, वे अंतरिक्ष की दिशा से हमारी हिंसा करते हैं, वे शत्रु हमारी ओर से मुंह
फेर कर जल जाएं. उन जादूटोना करने वालों को हम उन के जादूटोने उन्हीं की ओर वापस
कर के मारते हैं. (६)
य उपरिष्टाज्जुह्वति जातवेदः ऊर्ध्वाया दिशो ऽ भिदासन्त्यस्मान्.
सूर्यमृत्वा ते पराञ्चो व्यथन्तां प्रत्यगेनान् प्रतिसरेण हन्मि.. (७)
हे जातवेद अग्नि! जो शत्रु हमारे निवास स्थान से ऊपर की दिशा में हवन कर के
जादूटोना कर रहे हैं, वे ऊपर की दिशा से हमारी हिंसा करते हैं. वे शत्रु हमारी ओर से मुंह फेर
कर जल जाएं. उन जादूटोना करने वालों को हम उन के जादूटोने उन्हीं की ओर वापस कर
के मारते हैं. (७)
ये दिशामन्तर्देशेभ्यो जुह्वति जातवेदः सर्वाभ्यो दिग्भ्यो ऽ
भिदासन्त्यस्मान्.
ब्रह्मर्त्वा ते पराञ्चो व्यथन्तां प्रत्यगेनान् प्रतिसरेण हन्मि.. (८)
हे जातवेद अग्नि! जो शत्रु अन्तर्दिशाओं में आहुति डालकर जादूटोने द्वारा दिशाओं के
कोणों से हमें नष्ट करना चाहता, वह शत्रु पराजित होते हुए कष्ट भोगे. अपने शत्रुओं को हम
प्रतिसर कर्म से नष्ट करते हैं. (८)
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सूक्त-१ देवता—वरुण
पांचवां कांड
सूक्त-१ देवता—वरुण
ऋधङ्मन्त्रो योनिं य आबभूवामृतासुर्वर्धमानः सुजन्मा.
अदब्धासुभ्राजमानो ऽ हेव त्रितो धर्ता दाधार त्रीणि (१)
जिस के प्राण मरण रहित हैं, जो जन्म ले कर बढ़ता है, कोई भी जिस की हिंसा नहीं
कर सकता, जो दिन के समान प्रकाश वाला है, जो तीनों लोकों का धारणकर्ता और पालक
है, वह योनि से उत्पन्न हुआ है. (१)
आ यो धर्माणि प्रथमः ससाद ततो वपूंषि कृणुषे पुरूणि.
धास्युर्योनिं प्रथम आ विवेशा यो वाचमनुदितां चिकेत.. (२)
जो जीवात्मा सब से पहले धर्म का पालन करता है तथा इसी हेतु अनेक शरीरों को
धारण करता है, जो संज्ञाओं के द्वारा आकृष्ट वाणी का निर्माण करता है, वह अन्न की इच्छा
से योनि में सब से पहले प्रवेश करता है. (२)
यस्ते शोकाय तन्वं रिरेच क्षरद्धिरण्यं शुचयो ऽ नु स्वाः.
अत्रा दधेते अमृतानि नामास्मे वस्त्राणि विश एरयन्ताम्.. (३)
हे वरुण! जो जीवात्मा तुम्हारे निमित्त धर्म पालन हेतु कष्ट सहता हुआ सुवर्ण के समान
अपनी कीर्ति फैलाने के लिए शरीर में आया है, उसे द्यावा पृथ्वी अमरत्व प्रदान करते हैं तथा
प्रजाएं वस्त्र देती हैं. (३)
प्र यदेते प्रतरं पूर्व्यं गुः सदःसद अतिष्ठन्तो अजूर्यम्.
कविः शुषस्य मातरा रिहाणे जाम्यै धुर्यं पतिमेरयेथाम्.. (४)
जो उत्तम स्थान पर बैठ कर उस परमात्मा का चिंतन करते हैं, जो ब्राह्मण के हितैषी हैं
तथा उसे प्राप्त कर चुके हैं, वे लोक परमात्मा की उपासना करके उस स्त्री को भी ईश्वर के
दर्शन कराएं, जो प्रजा को अपनी बहन समझ कर उस का भार वहन करती है. (४)
तदू षु ते महत् पृथुज्मन् नमः कविः काव्येना कृणोमि.
यत् सम्यञ्चावभियन्तावभि क्षामत्रा मही रोधचक्रे वावृधेते.. (५)
पृथ्वी को स्थिर रखने वाले दो राजा पहिए के समान तेज चाल से आगे बढ़ रहे हैं. हे
पृथ्वी! मैं अथर्ववेद का ज्ञाता ब्राह्मण हूं और तुम्हारे लिए अन्न भेंट करता हूं. (५)
सप्त मर्यादाः कवयस्ततक्षुस्तासामिदेकामभ्यं हुरो गात्.
आयोर्ह स्कम्भ उपमस्य नीडे पथां विसर्गे धरुणेषु तस्थौ.. (६)
मनु आदि ऋषियों ने चोरी, गुरुपत्नीगमन, ब्रह्महत्या, भ्रूणहत्या, मद्यपान, मिथ्याभाषण
एवं पापकर्म — इन सात कर्मों के रूप में धार्मिक, मर्यादा निश्चित की है. जो इस मर्यादा को
नहीं मानता, वह पापी है. इन सात मर्यादाओं का पालन करने वाला पुरुष मृत्यु के पश्चात सूर्य
मंडल में स्थित आदित्य को प्राप्त करता है और प्रलय काल तक वहीं स्थित रहता है. (६)
उतामृतासुर्व्रत एमि कृण्वन्नसुरात्मा तन्व १ स्तत् समुद्गुः.
उत वा शक्रो रत्नं दधात्यूर्जया वा यत् सचते हविर्दाः.. (७)
शरीर से संबंधित जो स्वयं प्रकाश उभरता है, मैं उसी का व्रती हूं. मैं अपने बल के सहारे
आ रहा हूं. जो व्यक्ति इंद्र को शक्ति वाला हवि देता है, इंद्र उसे रत्न आदि धन प्रदान करते हैं.
(७)
उत पुत्रः पितरं क्षत्रमीडे ज्येष्ठं मर्यादमह्वयन्त्स्वस्तये.
दर्शन् नु ता वरुण यास्ते विष्ठा आवर्व्रततः कुणवो वपूंषि.. (८)
क्षत्रिय जाति का पुत्र अपने पिता की पूजा करे तथा उत्तम कल्याण पाने के लिए धर्म
पालन में प्रवृत्त हो. हे वरुण! अनेक स्थानों को दिखाते हुए तुम सांसारिक जीवों की रचना
करते हो. (८)
अर्धमर्धेन पयसा पृणक्ष्यर्धेन शुष्म वर्धसे अमुर.
अविं वृधाम शग्मियं सखायं वरुणं पुत्रमदित्या इषिरम्.
कविशस्तान्यस्मै वपूंष्यवोचाम रोदसी सत्यवाचा.. (९)
मित्र और वरुण अदिति के पुत्र हैं. हम इन दोनों की वृद्धि करते हैं. हे वरुण! तुम आधे
दूध, घृत आदि से इस सेना का बल बढ़ाते हो और आधे से अपनी वृद्धि करते हो. हे आकाश
और पृथ्वी के देवो! विद्वान् ऋषियों ने जिन शरीरों का वर्णन किया है, हम अपनी सत्य वाणी
से उन्हीं का वर्णन करते हैं. (९)
सूक्त-२ देवता—वरुण
तदिदास भुवनेषु ज्येष्ठं यतो जज्ञ उग्रस्त्वेष्णृम्णः.
सद्यो जज्ञानो नि रिणाति शत्रूननु यदेनं मदन्ति विश्व ऊमाः.. (१)
इंद्र संसार में धनवान एवं बली होने के कारण श्रेष्ठ माने जाते हैं. इंद्र ने जन्म लेते ही
शत्रु का संहार करना आरंभ कर दिया था, इसीलिए इन के सैनिक इन की रक्षा करते हैं एवं
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प्रसन्न रहते हैं. (१)
वावृधानः शवसा भूर्योजाः शत्रुर्मासाय भियसं दधाति.
अव्यनच्च व्यनच्च सस्नि सं ते नवन्त प्रभृता मदेषु.. (२)
बढ़ता, शक्तिशाली एवं ओजस्वी शत्रु अपने दासों को भयभीत करता है. चर और अचर
सारा विश्व हम में लीन हो जाता है. वेतन पाने वाले सच्चे वीर युद्ध में परमात्मा की प्रार्थना
करते हैं. (२)
त्वे क्रतुमपि पृञ्चन्ति भूरि द्विर्यद्ते त्रिर्भवन्त्यूमाः.
स्वादोः स्वादीयः स्वादुना सृजा समदः सु मधु मधुनाभि योधीः.. (३)
हे इंद्र! जन्म, संस्कार और युद्ध की दीक्षा से तीन बातें मनुष्य के जन्म के साथ ही
निश्चित हो जाती हैं एवं विशाल यज्ञ को तुम तक पहुंचाती हैं. तुम सभी पदार्थों को उत्तम
स्वाद वाला बनाने वाले हो तुम हमारे पदार्थों को भी स्वादिष्ट बनाओ एवं सुंदर रीति से युक्त
करो. (३)
यदि चिन्नु त्वा धना जयन्तं रणेरणे अनुमदन्ति विप्राः.
ओजीयः शुष्मिन्त्स्थिरमा तनुष्व मा त्वा दभन् दुरेवासः कशोकाः.. (४)
हे बलशाली इंद्र! तुम सभी युद्धों में विजय प्राप्त करते हो. यदि ब्राह्मण तुम्हारी स्तुति
करें तो तुम उन्हें स्थिर रहने वाला बल प्रदान करो. जो मुख्य सुखमय वातावरण को दुःखमय
बना देते हैं अथवा जिन की गति बुरी है, वे तुम तक न आ सकें. (४)
त्वया वयं शाशदमहे रणेषु प्रपश्यन्तो यधेन्यानि भूरि.
चोदयामि त आयुधा वचोभिः सं ते शिशामि ब्रह्मणा वयांसि.. (५)
हे इंद्र! तुम्हारी सहायता से हम युद्ध में अपने सभी विरोधियों को समाप्त कर देते हैं. मैं
तपस्या द्वारा सिद्ध अपनी वाणी से तुम्हारे शस्त्रों को प्रेरणा प्रदान करता हूं तथा तुम्हारी
गतिशील वाणी को तीखा बनाता हूं. (५)
नि तद् दधिषेऽवरे परे च यस्मिन्नाविथावसा दुरोणे.
आ स्थापयत मातरं जिगत्नुमत इन्वत कर्वराणि भूरि.. (६)
जिस घर में उत्तम एवं साधारण प्राणियों का पालन हुआ तथा जिस घर में अन्न द्वारा
उन की रक्षा की गई, उस घर में कालिका माता की गतिशील शक्ति की स्थापना करो. इस
प्रकार वह घर अद्भुत पदार्थों से पूर्ण हो जाएगा. (६)
स्तुष्व वर्मन् पुरुवर्त्मानं समृभ्वाणमिनतममाप्तमाप्त्यानाम्.
आ दर्शति शवसा भूर्योजाः प्र सक्षति प्रतिमानं पृथिव्याः.. (७)
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हे शरीरधारी पुरुष! तू उस राजा की स्तुति कर जो विचरण करने वाला, तेजस्वी, स्वामी
एवं उन गुणों से युक्त है, जो आप्त जनों में होते हैं. राजा पृथ्वी का प्रतिरूप है एवं युद्ध में
जुटा हुआ है. (७)
इमा ब्रह्म बृहद्दिवः कृणवदिन्द्राय शूषमग्रियः स्वर्षाः.
महो गोत्रस्य क्षयति स्वराजा तुरश्चिद् विश्वमर्णवत् तपस्वान्.. (८)
यह राजा स्वर्ग प्राप्ति की अभिलाषा से महान स्तोत्रों द्वारा इंद्र को प्रसन्न कर रहा है.
स्वर्ग के स्वामी इंद्र मेघों के द्वारा जल वर्षा कर के विश्व को जल से पूर्ण करते हैं. (८)
एवा महान् बृहद्दिवो अथर्वावोचत् स्वां तन्व १ मिन्द्रमेव.
स्वसारौ मातरिश्वरी अरिप्रे हिन्वन्ति चैने शवसा वर्धयन्ति च.. (९)
अपने शरीर को इंद्र मान कर महर्षि अथर्वा ने कहा था कि पाप रहित भगिनियां इसे
बल के द्वारा बढ़ाती हुई प्रसन्न करती हैं. (९)
सूक्त-३ देवता—अग्नि
ममाग्ने वर्चो विहवेष्वस्तु वयं त्वेन्धानास्तन्वं पुषेम.
मह्यं नमन्तां प्रदिशश्चतस्रस्त्वयाध्यक्षेण पृतना जयेम.. (१)
हे अग्नि देव! युद्धों में हम वर्चस्वी बनें. हम तुम्हें प्रकट करते हुए अपने शरीर को
शक्तिशाली बनाएं. चारों दिशाएं और प्रदिशाएं हमारे सामने तथा आप के संरक्षण में शत्रुओं
की इस सेना पर विजय प्राप्त करें. (१)
अग्ने मन्युं प्रतिनुदन् परेषां त्वं नो गोपाः परि पाहि विश्वतः.
अपाञ्चो यन्तु निवता दुरस्यवो ऽ मैषां चित्तं प्रबुधां वि नेशत्.. (२)
हे अग्नि देव! तुम हजारों शत्रुओं का क्रोध समाप्त करते हुए सभी ओर से हमारी रक्षा
करो. हमें दुःख देने के इच्छुक लोग हमारे सामने नम्र बनें तथा हमारे सामने से चले जाएं. (२)
मम देवा विहवे सन्तु सर्व इन्द्रवन्तो मरुतो विष्णुरग्निः.
ममान्तरिक्षमुरुलोकमस्तु मह्यं वातः पवतां कामायास्मै.. (३)
इंद्र के साथ मरुत्, विष्णु और अग्नि आदि सभी देव युद्ध भूमि में मेरे अनुकूल बनें.
अंतरिक्ष में मेरा यशोगान गूंजे तथा वायु की गति मेरे अनुकूल हो. (३)
मह्यं यजन्तां मम यानीष्टाकूतिः सत्या मनसो मे अस्तु.
एनो मा नि गां कतमच्चनाहं विश्वे देवा अभि रक्षन्तु मेह.. (४)
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मैं जो इच्छा और संकल्प करता हूं, वह सत्य हो. मैं सभी प्रकार के पापों से दूर रहूं तथा
विश्वे देव मेरी रक्षा करें. (४)
मयि देवा द्रविणमा यजन्तां मय्याशीरस्तु मयि देवहूतिः.
दैवा होतारः सनिषन् न एतदरिष्टाः स्याम तन्वा सुवीराः.. (५)
मैं जिन देवों को बुलाता हूं, वे मुझे अन्न से संपन्न बनाएं. यज्ञ में देवों के होता हमारे
समीप बैठें, जिस से हम रोगरहित और शक्तिशाली बन सकें. (५)
दैवीः षडुर्वीरुरु नः कृणोत विश्वे देवास इह मादयध्वम्.
मा नो विददभिभा मो अशस्तिर्मा नो विदद् वृजिना द्वेष्या या.. (६)
हे विश्वे देव! आप सब हमारे लिए पृथ्वी, आकाश, जल, ओषधि, दिन और रात—इन
छह दिव्य शक्तियों को बढ़ाइए. आप प्रसन्न हों, जिस से कोई न हमारा तिरस्कार करे और न
हमारी निंदा करे. हमें पाप न लगे. (६)
तिस्रो देवीर्महि नः शर्म यच्छत प्रजायै नस्तन्वे ३ यच्च पुष्टम्.
मा हास्महि प्रजया मा तनूभिर्मा रधाम द्विषते सोम राजन्.. (७)
भारती, सरस्वती और पृथ्वी—ये तीन देवियां हमारा कल्याण करें. हमारी प्रजाएं पोषक
पदार्थ पा कर पुण्य शरीर वाली हों. हे तेजस्वी सोम! हम संतान एवं पशुओं से हीन न हों तथा
शत्रु हमें दुःख न दें. (७)
उरुव्यचा नो महिषः शर्म यच्छत्वस्मिन् हवे पुरुहूतः पुरुक्षु.
स नः प्रजायै हर्यश्व मृडेन्द्र मा नो रीरिषो मा परा दाः.. (८)
हे इंद्र! तुम नदी के समान गतिशील, गुणसंपन्न एवं अन्न के स्वामी हो. तुम हमें इस यज्ञ
के कारण सुख प्रदान करो. तुम हमारी संतान का नाश मत करो तथा हमारा त्याग मत करो.
(८)
धाता विधाता भुवनस्य यस्पतिर्देवः सविताभिमातिषाहः.
आदित्या रुद्रा अश्विनोभा देवाः पान्तु यजमानं निर्ऋथात्.. (९)
धाता, विधाता, संसार के स्वामी एवं शत्रुहंता सविता देव, आदित्य, रुद्र तथा दोनों
अश्विनीकुमार यजमान को पाप से बचाएं और उग्र शत्रुओं से रक्षा करें. (९)
ये नः सपत्ना अप ते भवन्त्विन्द्राग्निभ्यामव बाधामह एनान्.
आदित्या रुद्रा उपरिस्पृशो न उग्रं चेत्तारमधिराजमक्रत.. (१०)
जो हमारे शत्रु हैं, वे हम से दूर भाग जाएं. हम इंद्र और अग्नि के द्वारा अपने शत्रुओं को
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सूक्त-४ देवता—कुष्ठ, तक्मा-नाशन
बांधते हैं. आदित्य और रुद्र ने हमें जो राजा बना दिया है, वह सावधान करने वाला है. (१०)
अर्वाञ्चमिन्द्रममुतो हवामहे यो गोजिद् धनजिदश्वजिद् यः.
इमं नो यज्ञं विहवे शृणोत्वस्माकमभूर्हर्यश्व मेदी.. (११)
हम ऐसे इंद्र को यज्ञ में बुलाते हैं जो भूमि के विजेता, धन के विजेता और घोड़ों को
जीतने वाले हैं, वह इंद्र हमारी स्तुति सुनें. हे इंद्र! तुम हम से स्नेह करने वाले बनो. (११)
सूक्त-४ देवता—कुष्ठ, तक्मा-नाशन
यो गिरिष्वजायथा वीरुधां बलवत्तमः.
कुष्ठेहि तक्मनाशन तक्मानं नाशयन्न्नितः.. (१)
हे पर्वतों में उत्पन्न होने वाली तथा शक्तिशाली ओषधि कुष्ठ! तू कोढ़ नामक कठिन रोग
का नाश करने वाली है. तू हमें कष्ट देने वाले रोग को नष्ट करती हुई यहां आ. (१)
सुपर्णसुवने गिरौ जातं हिमवतस्परि.
धनैरभि श्रुत्वा यन्ति विदुर्हि तक्मनाशनम्.. (२)
गरुड़ को उत्पन्न करने वाले हिमवंत पर्वत के ऊपर उत्पन्न होने वाली इस ओषधि के
विषय में हम ने लोगों से सुना और अन्न ले कर वहां गए. इस प्रकार हम ने इस ओषधि को
प्राप्त किया. (२)
अश्वत्थो देवसदनस्तृतीयास्यामितो दिवि.
तत्रामृतस्य चक्षणं देवाः कुष्ठमवन्वत.. (३)
यहां तीसरे देव स्थान में अश्वत्थ अर्थात् पीपल विराजमान है. यहां देवों ने अमृत के
समान गुण वाले कूठ को जाना. (३)
हिरण्ययी नौरचरद्धिरण्यबन्धना दिवि.
तत्रामृतस्य पुष्पं देवाः कुष्ठमवन्वत.. (४)
देवों ने सोने के रस्से से बंधी हुई स्वर्ग की नौका के द्वारा अमृत के पुष्प के समान कूठ
को प्राप्त किया. (४)
हिरण्ययाः पन्थान आसन्नरित्राणि हिरण्यया.
नावो हिरण्ययीरासन् याभिः कुष्ठं निरावहन्.. (५)
सोने के बने हुए मार्ग से स्वर्ण की नाव के द्वारा कूठ को लाया गया. उन नावों की
पतवारें भी सोने की थीं. (५)
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इमं मे कुष्ठ पूरुषं तमा वह तं निष्कुरु. तमु मे अगदं कृधि.. (६)
हे कूठ! मेरे इस पुरुष को अपने समीप ले कर और इस रोग से छुटकारा दिला कर
स्वस्थ बनाओ. (६)
देवेभ्यो अधि जातो ऽ सि सोमस्यासि सखा हित:.
स प्राणाय व्यानाय चक्षुषे मे अस्मै मृड.. (७)
हे कूठ! तुम देवों के समीप उत्पन्न हुए हो तथा सोम के हितकारक मित्र हो. तुम मेरे इस
पुरुष के प्राण, व्यान एवं नेत्रों को सुख देने वाले बनो. (७)
उदङ् जातो हिमवत: स प्राच्यां नीयसे जनम्.
तत्र कुष्ठस्य नामान्युत्तमानि वि भेजिरे.. (८)
कूठ हिमालय पर्वत के उत्तरभाग में उत्पन्न हुआ है एवं मनुष्यों के द्वारा पूर्व दिशा में
लाया गया है. वहां उस के उत्तम नामों का विभाजन हुआ. (८)
उत्तमो नाम कुष्ठास्युत्तमो नाम ते पिता.
यक्ष्मं च सर्वं नाशय तक्मानं चारसं कृधि.. (९)
हे कूठ! तुम्हारी प्रसिद्धि उत्तम है तथा तुम्हारे पिता भी उत्तम थे. तुम सभी प्रकार के
राजयक्ष्मा रोगों का नाश करो तथा कुष्ठ रोग को हम से दूर भगाओ. (९)
शीर्षामयमुपहत्यामक्ष्योस्तन्वो ३ रेप:.
कुष्ठस्तत् सर्वं निष्करद् दैवं समह वृष्ण्यम्.. (१०)
सिर संबंधी रोग, नेत्र संबंधी व्याधियां एवं रोग उत्पन्न करने वाले पाप को कूठ ने दैवी
बल पा कर इन सब को नष्ट कर दिया. (१०)
सूक्त-५ देवता—लाक्षा
रात्री माता नभ: पितार्यमा ते पितामह:.
सिलाची नाम वा असि सा देवानामसि स्वसा.. (१)
हे लाख नामक ओषधि! तू चंद्रमा की किरणों से पुष्ट होती है. इसलिए रात्रि तेरी माता
है. तू वर्षा काल में उत्पन्न होती है, इसलिए आकाश तेरा पिता है. आकाश में मेघों को उत्पन्न
करने के कारण सूर्य तेरा पितामह है. तेरा नाम सिलाची है और तू देवों की बहन है. (१)
यस्त्वा पिबति जीवति त्रायसे पुरुषं त्वम्.
भर्त्री हि शश्वतामसि जनानां च न्यञ्चनी.. (२)
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जो तुझे पीता है, वह जीवित रहता है. तू पुरुष की रक्षा करती है, तू मनुष्यों का
भरणपोषण करने वाली एवं उन्नत बनाने वाली है. (२)
वृक्षंवृक्षमा रोहसि वृषण्यन्तीव कन्यला.
जयन्ती प्रत्यातिष्ठन्तीस्परणी नाम वा असि.. (३)
तू बैल की इच्छा करने वाली गाय के समान प्रत्येक वृक्ष पर चढ़ती है. तू विजय प्राप्त
करती है एवं स्थित रहती है, इसलिए तेरा नाम स्मरणी है. (३)
यद् दण्डेन यदिष्वा यद् वारुर्हरसा कृतम्.
तस्य त्वमसि निष्कृतिः सेमं निष्कृधि पूरुषम्.. (४)
हे लाख! जो डंडे से चोट खाया है और जो धारदार शस्त्र से घायल है, तू उन के घावों
को ठीक करने का उपाय है, इसलिए तू इस पुरुष को घावविहीन बना. (४)
भद्रात् प्लक्षान्निस्तिष्ठस्यश्वत्थात् खदिराद् धवात्.
भद्रान्न्यग्रोधात् पर्णात् सा न एह्यरुन्धति.. (५)
हे लाख! तू कदंब, पाकड़, पीपल, खैर, धौ, भद्र, न्यग्रोध एवं पर्ण नामक वृक्षों से उत्पन्न
होती है. हे घाव को शुद्ध करने वाली एवं भरने वाली ओषधि लाख! तू हमें प्राप्त हो. (५)
हिरण्यवर्णे सुभगे सूर्यवर्णे वपुष्टमे.
रुतं गच्छासि निष्कृते निष्कृतिर्नाम वा असि.. (६)
हे स्वर्ण के समान वर्ण वाली सुभगा एवं सूर्य के समान चमक वाली ओषधि लाख! तू
शरीर को स्वस्थ बनाती है. तू घाव को ठीक करती है, इसलिए तेरा नाम निष्कृति है. (६)
हिरण्यवर्णे सुभगे शुष्मे लोमशवक्षणे.
अपामसि स्वसा लाक्षे वातो हात्मा बभूव ते.. (७)
हे सोने के समान वर्ण वाली, सुभगा, सूर्य के समान वर्ण वाली एवं लोगों का विनाश
करने वाली लाख! तू जलों की बहन है और वायु तेरी आत्मा है. (७)
सिलाची नाम कानीनो ऽ जबभ्रु पिता तव.
अश्वो यमस्य यः श्यावस्तस्य हास्नास्युक्षिता.. (८)
हे लाख! तेरे नाम सिलाची और कानीन हैं. बकरियों का पालक तेरा पिता है. यमराज
का जो पीले रंग का घोड़ा है, उस के रक्त से तुझे सींचा गया है. (८)
अश्वस्यास्नः सम्पतिता सा वृक्षां अभि सिष्यदे.
सरा पतत्रिणी भूत्वा सा न एह्यरुन्धति.. (९)
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सूक्त-६ देवता—ब्रह्म
हे घाव भरने वाली लाख! तू घोड़े के रंग वाली है एवं वृक्षों को सींचती हैं. तू सरकने
वाली है, इसलिए चिड़िया बन कर हमारे समीप आ. (९)
सूक्त-६ देवता—ब्रह्म
ब्रह्म जज्ञानं प्रथमं पुरस्ताद् वि सीमतः सुरुचो वेन आवः.
स बुध्न्या उपमा अस्य विष्ठाः सतश्च योनिमसतश्च वि वः.. (१)
संपूर्ण सृष्टि का कारण ब्रह्म सृष्टि के आरंभ में सूर्य के रूप में प्रकट हुआ. उस का तेज
सीमा रहित है, जो सभी दिशाओं और लोकों में व्याप्त होता है. वह अनुपम है. सत् इसी से
उत्पन्न हुआ है और असत् इसी में समा जाता है. (१)
अनाप्ता ये वः प्रथमा यानि कर्माणि चक्रिरे.
वीरान् नो अत्र मा दभन् तद् व एतत् पुरो दधे.. (२)
हे मनुष्यो! तुम्हारे विरोधी शत्रुओं ने जो उत्तम कर्म किए हैं, उन कर्मों से वे हमारी
संतानों तथा वीरों का विनाश न करें, इसलिए मैं वह अभिचार कर्म तुम्हारे सामने प्रस्तुत कर
रहा हूं. (२)
सहस्रधार एव ते समस्वरन् दिवो नाके मधुजिह्वा असश्चतः.
तस्य स्पशो न नि मिषन्ति भूर्णयः पदेपदे पाशिनः सन्ति सेतवे.. (३)
आकाश में स्थित एवं हजारों मार्गों वाले स्वर्ग में विनाश करने वाले यह घोषित कर चुके
हैं. जो लोग युद्ध में जाने के लिए आनाकानी करते हैं, उन्हें बांधने के लिए यमदूत पाश लिए
हुए सदा तत्पर रहते हैं एवं अपनी आंखें कभी बंद नहीं करते. (३)
पर्यु षु प्र धन्वा वाजसातये परि वृत्राणि सक्षणिः.
द्विषस्तदध्यर्णविनेयसे सनिस्रसो नामासि त्रयोदशो मास इन्द्रस्य गृहः.. (४)
हे सूर्य! तुम अन्न उत्पादन के निमित्त मेघों के समीप जाते हो और उन्हें ताड़ित कर के
सागर के पास पहुंचाते हो. इसी कारण तुम्हारा नाम सनिस्रत है. वर्ष का तेरहवां महीना जो
इंद्र का घर है, तुम उस में भी वर्षा करने को तत्पर हो. (४)
न्वे ३ तेनारात्सीरसौ स्वाहा.
तिग्मायुधौ तिग्महेती सुशेवौ सोमारुद्राविह सु मृडतं नः.. (५)
इसी अभिचार कर्म द्वारा इस पुरुष ने सिद्धि प्राप्त की थी. यह अभिचार कर्म सुंदर
आहुति वाला हो. हे सोम और रुद्र! तुम तीखे अस्त्रों वाले हो. तुम हमें इस युद्ध में विजयी
बना कर सुख प्रदान करो. (५)
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अवैतेनारातत्सीरसौ स्वाहा.
तिग्मायुधौ तिग्महेती सुशेवौ सोमारुद्राविह सु मृडतं नः.. (६)
इस अभिचार कर्म के द्वारा ही इस राजा ने सिद्धि प्राप्त की है एवं शत्रुओं का विनाश
किया है. इस की छवि सुंदर आहुति वाली हो. हे सोम एवं रुद्र! तुम तीक्ष्ण शस्त्रों वाले हो. तुम
इस युद्ध में विजय प्रदान करा के हमें सुख दो. (६)
अपैतेनारातत्सीरसौ स्वाहा.
तिग्मायुधौ तिग्महेती सुशेवौ सोमारुद्राविह सु मृडतं नः.. (७)
इस अभिचार कर्म द्वारा ही इस राजा ने अपने शत्रुओं का विरोध करते हुए उन का
दमन किया तथा सिद्धि प्राप्त की. इस की यह हवि सुंदर आहुति वाली हो. हे सोम और रुद्र!
तुम अत्यधिक तीक्ष्ण आयुधों वाले तथा सुख प्राप्त करने वाले हो. तुम हमें इस युद्ध में
विजयी बना कर सुख प्रदान करो. (७)
मुमुक्तमस्मान्दुरितादवद्याज्जुषेथां यज्ञममृतमस्मासु धत्तम्.. (८)
हे सोम एवं रुद्र देव! हमें ऐसे पाप से बचाओ, जिस का नाम लेने में भी लज्जा आती
है. तुम इस यज्ञ को प्राप्त करो और इस में अमृत धारण करो. (८)
चक्षुषो हेते मनसो हेते ब्रह्मणो हेते तपसश्च हेते.
मेन्या मेनिरस्यमेनयस्ते सन्तु ये३स्मां अभ्यघायन्ति.. (९)
हे नेत्र की, मन की, ब्रह्म की एवं तप की संहारक शक्ति! तुम सभी आयुधों की अपेक्षा
श्रेष्ठ आयुध हो. जो आयुधधारी हमें नष्ट करना चाहते हैं, वे आयुधहीन हो जाएं. (९)
यो ३ स्मांश्चक्षुषा मनसा चित्त्याकूत्या च यो अघायुरभिदासात्.
त्वं तानग्ने मेन्यामेनीन् कृणु स्वाहा.. (१०)
हे अग्नि! हमारी हत्या रूपी पाप करने का इच्छुक जो व्यक्ति हम को चक्षु से, मन से
और चित्तवृत्ति से क्षीण करना चाहता है, उसे अपने आयुध के द्वारा आयुधहीन बनाओ.
हमारी यह आहुति उत्तम हो. (१०)
इन्द्रस्य गृहो ऽ सि.
तं त्वा प्र पद्ये तं त्वा प्र विशामि सर्वगुः सर्वपूरुषः
सर्वात्मा सर्वतनूः सह यन्मेऽस्ति तेन.. (११)
हे अग्नि! तुम इंद्र के गृह हो. तुम सर्वत्र गमन करने वाले, सब के पुरुष, सब की आत्मा
एवं सब के शरीर हो. मैं अपने सभी सहयोगियों सहित आप की शरण में आया हूं. (११)
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