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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 214 of 1063

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Page 214

पांचवां कांड
सूक्त-१ देवता—वरुण
ऋधङ्मन्त्रो योनिं य आबभूवामृतासुर्वर्धमानः सुजन्मा.
अदब्धासुभ्राजमानो ऽ हेव त्रितो धर्ता दाधार त्रीणि (१)
जिस के प्राण मरण रहित हैं, जो जन्म ले कर बढ़ता है, कोई भी जिस की हिंसा नहीं
कर सकता, जो दिन के समान प्रकाश वाला है, जो तीनों लोकों का धारणकर्ता और पालक
है, वह योनि से उत्पन्न हुआ है. (१)
आ यो धर्माणि प्रथमः ससाद ततो वपूंषि कृणुषे पुरूणि.
धास्युर्योनिं प्रथम आ विवेशा यो वाचमनुदितां चिकेत.. (२)
जो जीवात्मा सब से पहले धर्म का पालन करता है तथा इसी हेतु अनेक शरीरों को
धारण करता है, जो संज्ञाओं के द्वारा आकृष्ट वाणी का निर्माण करता है, वह अन्न की इच्छा
से योनि में सब से पहले प्रवेश करता है. (२)
यस्ते शोकाय तन्वं रिरेच क्षरद्धिरण्‍यं शुचयो ऽ नु स्वाः.
अत्रा दधेते अमृतानि नामास्मे वस्त्राणि विश एरयन्ताम्.. (३)
हे वरुण! जो जीवात्मा तुम्हारे निमित्त धर्म पालन हेतु कष्ट सहता हुआ सुवर्ण के समान
अपनी कीर्ति फैलाने के लिए शरीर में आया है, उसे द्यावा पृथ्वी अमरत्व प्रदान करते हैं तथा
प्रजाएं वस्त्र देती हैं. (३)
प्र यदेते प्रतरं पूर्व्यं गुः सदःसद अतिष्ठन्तो अजूर्यम्.
कविः शुषस्य मातरा रिहाणे जाम्यै धुर्यं पतिमेरयेथाम्.. (४)
जो उत्तम स्थान पर बैठ कर उस परमात्मा का चिंतन करते हैं, जो ब्राह्मण के हितैषी हैं
तथा उसे प्राप्त कर चुके हैं, वे लोक परमात्मा की उपासना करके उस स्त्री को भी ईश्वर के
दर्शन कराएं, जो प्रजा को अपनी बहन समझ कर उस का भार वहन करती है. (४)
तदू षु ते महत् पृथुज्मन् नमः कविः काव्येना कृणोमि.
यत् सम्यञ्चावभियन्तावभि क्षामत्रा मही रोधचक्रे वावृधेते.. (५)
पृथ्‍वी को स्थिर रखने वाले दो राजा पहिए के समान तेज चाल से आगे बढ़ रहे हैं. हे