अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextहे घाव भरने वाली लाख! तू घोड़े के रंग वाली है एवं वृक्षों को सींचती हैं. तू सरकने
वाली है, इसलिए चिड़िया बन कर हमारे समीप आ. (९)
सूक्त-६ देवता—ब्रह्म
ब्रह्म जज्ञानं प्रथमं पुरस्ताद् वि सीमतः सुरुचो वेन आवः.
स बुध्न्या उपमा अस्य विष्ठाः सतश्च योनिमसतश्च वि वः.. (१)
संपूर्ण सृष्टि का कारण ब्रह्म सृष्टि के आरंभ में सूर्य के रूप में प्रकट हुआ. उस का तेज
सीमा रहित है, जो सभी दिशाओं और लोकों में व्याप्त होता है. वह अनुपम है. सत् इसी से
उत्पन्न हुआ है और असत् इसी में समा जाता है. (१)
अनाप्ता ये वः प्रथमा यानि कर्माणि चक्रिरे.
वीरान् नो अत्र मा दभन् तद् व एतत् पुरो दधे.. (२)
हे मनुष्यो! तुम्हारे विरोधी शत्रुओं ने जो उत्तम कर्म किए हैं, उन कर्मों से वे हमारी
संतानों तथा वीरों का विनाश न करें, इसलिए मैं वह अभिचार कर्म तुम्हारे सामने प्रस्तुत कर
रहा हूं. (२)
सहस्रधार एव ते समस्वरन् दिवो नाके मधुजिह्वा असश्चतः.
तस्य स्पशो न नि मिषन्ति भूर्णयः पदेपदे पाशिनः सन्ति सेतवे.. (३)
आकाश में स्थित एवं हजारों मार्गों वाले स्वर्ग में विनाश करने वाले यह घोषित कर चुके
हैं. जो लोग युद्ध में जाने के लिए आनाकानी करते हैं, उन्हें बांधने के लिए यमदूत पाश लिए
हुए सदा तत्पर रहते हैं एवं अपनी आंखें कभी बंद नहीं करते. (३)
पर्यु षु प्र धन्वा वाजसातये परि वृत्राणि सक्षणिः.
द्विषस्तदध्यर्णविनेयसे सनिस्रसो नामासि त्रयोदशो मास इन्द्रस्य गृहः.. (४)
हे सूर्य! तुम अन्न उत्पादन के निमित्त मेघों के समीप जाते हो और उन्हें ताड़ित कर के
सागर के पास पहुंचाते हो. इसी कारण तुम्हारा नाम सनिस्रत है. वर्ष का तेरहवां महीना जो
इंद्र का घर है, तुम उस में भी वर्षा करने को तत्पर हो. (४)
न्वे ३ तेनारात्सीरसौ स्वाहा.
तिग्मायुधौ तिग्महेती सुशेवौ सोमारुद्राविह सु मृडतं नः.. (५)
इसी अभिचार कर्म द्वारा इस पुरुष ने सिद्धि प्राप्त की थी. यह अभिचार कर्म सुंदर
आहुति वाला हो. हे सोम और रुद्र! तुम तीखे अस्त्रों वाले हो. तुम हमें इस युद्ध में विजयी
बना कर सुख प्रदान करो. (५)
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