अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextइमं मे कुष्ठ पूरुषं तमा वह तं निष्कुरु. तमु मे अगदं कृधि.. (६)
हे कूठ! मेरे इस पुरुष को अपने समीप ले कर और इस रोग से छुटकारा दिला कर
स्वस्थ बनाओ. (६)
देवेभ्यो अधि जातो ऽ सि सोमस्यासि सखा हित:.
स प्राणाय व्यानाय चक्षुषे मे अस्मै मृड.. (७)
हे कूठ! तुम देवों के समीप उत्पन्न हुए हो तथा सोम के हितकारक मित्र हो. तुम मेरे इस
पुरुष के प्राण, व्यान एवं नेत्रों को सुख देने वाले बनो. (७)
उदङ् जातो हिमवत: स प्राच्यां नीयसे जनम्.
तत्र कुष्ठस्य नामान्युत्तमानि वि भेजिरे.. (८)
कूठ हिमालय पर्वत के उत्तरभाग में उत्पन्न हुआ है एवं मनुष्यों के द्वारा पूर्व दिशा में
लाया गया है. वहां उस के उत्तम नामों का विभाजन हुआ. (८)
उत्तमो नाम कुष्ठास्युत्तमो नाम ते पिता.
यक्ष्मं च सर्वं नाशय तक्मानं चारसं कृधि.. (९)
हे कूठ! तुम्हारी प्रसिद्धि उत्तम है तथा तुम्हारे पिता भी उत्तम थे. तुम सभी प्रकार के
राजयक्ष्मा रोगों का नाश करो तथा कुष्ठ रोग को हम से दूर भगाओ. (९)
शीर्षामयमुपहत्यामक्ष्योस्तन्वो ३ रेप:.
कुष्ठस्तत् सर्वं निष्करद् दैवं समह वृष्ण्यम्.. (१०)
सिर संबंधी रोग, नेत्र संबंधी व्याधियां एवं रोग उत्पन्न करने वाले पाप को कूठ ने दैवी
बल पा कर इन सब को नष्ट कर दिया. (१०)
सूक्त-५ देवता—लाक्षा
रात्री माता नभ: पितार्यमा ते पितामह:.
सिलाची नाम वा असि सा देवानामसि स्वसा.. (१)
हे लाख नामक ओषधि! तू चंद्रमा की किरणों से पुष्ट होती है. इसलिए रात्रि तेरी माता
है. तू वर्षा काल में उत्पन्न होती है, इसलिए आकाश तेरा पिता है. आकाश में मेघों को उत्पन्न
करने के कारण सूर्य तेरा पितामह है. तेरा नाम सिलाची है और तू देवों की बहन है. (१)
यस्त्वा पिबति जीवति त्रायसे पुरुषं त्वम्.
भर्त्री हि शश्वतामसि जनानां च न्यञ्चनी.. (२)
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