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अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

by महर्षि अष्टावक्र

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished405 pages
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बारहवाँ प्रकरण । १९१

मूलम् ।

एवमेव कृतं येन सकृतार्थो भवेदसौ ।
एवमेव स्वभावो यः स कृतार्थो भवेदसौ ॥ ८ ॥

पदच्छेदः ।

एवम्, एव, कृतम्, येन, सः, कृतार्थः, भवेत्, असौ,
एवम्, एव, स्वभावः, यः, सः, कृतार्थः, भवेत्, असौ ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
येन= जिस पुरुष करकेयः= जो
एवम् एव= क्रिया-रहितएवम् एव= ऐसा ही अर्थात् स्वतः ही
स्वरूपम्= स्वरूपस्वभावः= स्वभाववाला है
साधनवशात्= साधनों के वश सेसः असौ= सो वह
कृतम्= किया गया हैकृतार्थः= कृतकृत्य
सः असौ= वह पुरुष भीभवेत्= होता है
कृतार्थः= कृतकृत्यकिंवक्तव्यम्= इसमें कहना ही क्या है
भवेत्= होता है

भावार्थ ।

जिस पुरुष ने इस प्रकार संपूर्ण क्रियाओं से रहित अपने स्वरूप को जान लिया है, वही कृतार्थ अर्थात् जीवन्मुक्त होता है ।

प्रश्न—जीवन्मुक्त का लक्षण क्या है ?
उत्तर—ब्रह्मैवाहमस्मीत्यपरोक्षज्ञानेन निखिलकर्मबन्धवि-
निर्मुक्तो जीवन्मुक्तः ।

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१९२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

अर्थात् 'मैं ब्रह्म हूँ' इस प्रकार के अपरोक्ष-ज्ञान करके जो संपूर्ण कर्मों के बंधनों से छूट गया है, वही जीवन्मुक्त है।
देहपातानन्तरं मुक्तिः विदेहमुक्तिः।
शरीर के पात होने के अनन्तर जो मुक्ति है, उसका नाम विदेह-मुक्ति है। तात्पर्य यह है कि साधनों करके क्रम से जिसने संपूर्ण शरीर और इन्द्रियादिकों की क्रिया का त्याग किया है और आत्मानंद का अनुभव किया है, वही जीवन्मुक्त है ॥ ८ ॥

इति श्रीअष्टावक्रगीतायां द्वादशं प्रकरणं समाप्तम् ॥ १२ ॥

—:०:—

तेरहवाँ प्रकरण (कैवल्य-सुख)

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तेरहवाँ प्रकरण

—:०:—

मूलम् ।

अकिञ्चनभवं स्वास्थ्यं कौपीनत्वेऽपि दुर्लभम् ।
त्यागादानेविहायास्मादहमासेयथासुखम् ॥ १ ॥

पदच्छेदः ।

अकिञ्चनभवम्, स्वास्थ्यम्, कौपीनत्वे, अपि, दुर्लभम्,
त्यागादाने, विहाय, अस्मात्, अहम्, आसे, यथासुखम् ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
अकिञ्चनभवम्= नहीं है कुछ, ऐसे विचार से पैदा हुईअस्मात्=इस कारण से
स्वास्थ्यम्= जो चित्त की स्थिरता, सोत्यागादाने= त्याग और ग्रहण को
कौपीनत्वे= कौपीन के धारण करने परविहाय=छोड़ करके
अपि=भीअहम्=मैं
दुर्लभम्=दुर्लभ हैयथासुखम्=सुख-पूर्वक
आसे=स्थित हूँ ॥

भावार्थ ।

इस त्रयोदश प्रकरण में जीवन्मुक्त के फल का निरूपण करते हैं—

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१९४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

संपूर्ण विषयों में जा आसक्ति है, उस आसक्ति के त्याग
करने से जो चित्त की स्थिरता हुई है, वह स्थिरता कौपीन-
मात्र में आसक्ति करने मे नहीं होती है, ऐसी स्थिरता अति
दुर्लभ है । इसी कारण मे शिष्य कहता है कि पदार्थों के
त्याग करने में और ग्रहण करने में जो आसक्ति है, उसको
भी त्याग करके आत्मानंद में स्थित हूँ ॥ १ ॥

मूलम् ।
कुत्रापि खेदः कायस्य जिह्वा कुत्रापि खिद्यते ।
मनः कुत्रापि तत्त्यक्त्वा पुरुषार्थे स्थितः सुखम् ॥ २ ॥

पदच्छेदः ।
कुत्र, अपि, खेदः, कायस्य, जिह्वा, कुत्र, अपि, खिद्यते,
मनः, कुत्र, अपि, तत्, त्यक्त्वा, पुरुषार्थे, स्थितः, सुखम् ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
कुत्र अपि =कहीं तोमनः =मन
कायस्य =शरीर काखिद्यते =खेद करता है
खेदः =दुःख हैअतः =इससे
कुत्र अपि =कहींतत् =तीनों को
जिह्वा =वाणीत्यक्त्वा =त्याग करके
खिद्यते =दुःखी हैसुखम् =सुख-पूर्वक
कुत्र अपि =कहींस्थितः =स्थित हूँ ॥

भावार्थ ।
शारीरिक कर्मों में शरीर को खेद होता है, अर्थात्
शरीर के जो कर्म चलना-फिरना, सोना-जागना, लेना-देना,

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तेरहवाँ प्रकरण । १९५

ग्रहण-त्यागादिक हैं, उनके करने में शरीर को ही खेद होता
है, और वाणी के कर्म जो सत्य मिथ्या भाषणादिक हैं, उनके
करने में जिह्वा को खेद होता है, और मन के कर्म जो
संकल्प-विकल्पनादिक का ध्यान-धारणादिक हैं उनके करने
में मन को खेद होता है, इसलिये शिष्य कहता है कि उन
तीनों के कर्मों का त्याग करके मैं अपने आत्मानन्द में स्थित
हूँ ॥ २ ॥

मूलम् ।

कृतं किमपि नैव स्यादिति संचिन्त्य तत्त्वतः ।
यदा यत्कर्तुमायाति तत्कृत्वाऽऽसे यथासुखम् ॥ ३ ॥

पदच्छेदः ।

कृतम्, किम्, अपि, न, एव, स्यात्, इति, संचिन्त्य, तत्त्वतः,
यदा, यत्, कर्तुम्, आयाति, तत्, कृत्वा, आसे, यथासुखम् ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
कृतम् =$\Big{$ शरीर आदि करके किया हुआ कर्मसंचिन्त्य =विचार करके
किमपि =कुछ भीयदा =जब
एव =वास्तव मेंयत् =जो कुछ कर्म
न आत्मकृतम् =$\Big{$ आत्मा करके नहीं किया हुआकर्तुम् =करने को
स्यात् =होय हैआयाति =आ पड़ता है
इति =ऐसातत् =उसको
तत्त्वतः =यथार्थकृत्वा =करके
यथासुखम् =सुख-पूर्वक
आसे =मैं स्थित हूँ ॥
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१९६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

भावार्थ ।

**प्रश्न—**कायिक, वाचिक और मानसिक कर्मों में त्याग होने से शरीर का भी त्याग हो जावेगा; क्योंकि बिना कर्मों के भोजनादिक क्रिया का त्याग होगा और बिना भोजन के शरीर रहेगा नहीं ?

**उत्तर—**शरीर और इन्द्रियादिकों करके किया हुआ जो कर्म है, वह वास्तव में आत्मा करके किया हुआ नहीं होता है। ऐसे चिंतवन करके विद्वान् को जब शरीरादिकों के खान-पानादिक कर्म करने पड़ते हैं, तब वह अहंकार से रहित होकर उन कर्मों को करता हुआ भी अपने सुख-स्वरूप में ही रहता है ॥ ३ ॥

मूलम् ।

कर्मनैष्कर्म्यनिर्वंधभावा देहस्थयोगिनः ।
संयोगायोगविरहादहमासे यथासुखम् ॥ ४ ॥

पदच्छेदः ।

कर्मनैष्कर्म्यनिबन्धभावाः, देहस्थयोगिनः, संयोगायोग-विरहात्, अहम्, आसे, यथासुखम् ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
कर्मनैष्कर्म्यनिबन्धभावा =कर्म और निष्कर्म के बंधन से संयुक्त स्वभाववालेसंयोगायोगविरहात् =देह के संयोग और वियोग के पृथक् होने के कारण
देहस्थयोगिनः =देह विषे आसक्त योगी हैंयथासुखम् =सुख-पूर्वक
अहम् =मैंआसे =स्थित हूँ ॥
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तेरहवाँ प्रकरण । १९७

भावार्थ ।

प्रश्न—कर्मों के करने में अथवा कर्मों के न करने में अर्थात् दोनों में से एक ही निष्ठा हो सकती है, दोनों में निष्ठा कैसे हो सकती है ?

उत्तर—कर्म और निष्कर्म का हठरूप स्वभाव उसी को होता है, जिसकी देह में आसक्ति है, जिसकी देहादिकों में आसक्ति नहीं है, उसको हठ नहीं होता है, हे प्रभो ! मेरा तो देह के संयोग और वियोग में भी हठ नहीं है । देह का संयोग बना रहे वा इसका वियोग हो जावे, मैं अहंकार और हठ से रहित अपने आत्मा विषे स्थित हूँ ॥ ४ ॥

मूलम् ।
अर्थानर्थौ न मे स्थित्या गत्या वा शयनेन वा ।
तिष्ठन् गच्छन् स्वपंस्तस्मादहमासे यथासुखम् ॥ ५ ॥

पदच्छेदः ।
अथानर्थौ, न, मे, स्थित्या, गत्या, वा, शयनेन, वा, तिष्ठन्, गच्छन्, स्वपन्, तस्मात्, अहम्, आसे, यथासुखम् ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
मेमुझकोतस्मात्इस कारण
स्थित्यास्थिति सेअहम्मैं
गत्याचलने सेतिष्ठन्स्थित होता हुआ
वायागच्छन्जाता हुआ
शयनेनशयन सेस्वपन्सोता हुआ
अर्थानर्थौअर्थ और अनर्थयथासुखम्सुख-पूर्वक
नकुछ नहीं हैआसेस्थित हूँ ॥
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१९८ अष्टावक्र-गीता भा० टो० स०

भावार्थ ।

शिष्य कहता है कि हे गुरो ! लौकिकव्यवहार जो चलना, फिरना, बैठना, उठना आदिक है, इसमें भी मेरी हानि तथा लाभ कुछ भी नहीं है, क्योंकि लौकिक व्यवहार में भी अभिमान से रहित हूँ, चाहे मैं सोता रहूँ, बैठा रहूँ अथवा चलता फिरता रहूँ, इन सब क्रियाओं में भी मैं अपने आत्मानन्द में एकरस ज्यों का त्यों स्थित रहता हूँ ॥ ५ ॥

मूलम् ।

स्वपतो नास्ति मे हानिः सिद्धिर्यत्नवतो न वा ।
नाशोल्लासौ विहायास्मादहमासे यथासुखम् ॥ ६ ॥

पदच्छेदः ।

स्वपतः, न, अस्ति, मे, हानिः, सिद्धिः, यत्नवतः, न, वा, नाशोल्लासौ, विहाय, अस्मात्, अहम्, आसे, यथासुखम् ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
मे=मुझसिद्धिः=सिद्धि है
स्वपतः=सोते हुए कीअस्मात्=इस कारण
हानिः=हानिअहम्=मैं
न अस्ति=नहीं हैनाशोल्लासौ= { हानि और लाभ को
वा=औरविहाय=छोड़ करके
न=नयथासुखम्=सुख-पूर्वक
मे=मुझआसे=स्थित हूँ ॥
यत्नवतः=यत्न करते हुए की
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तेरहवाँ प्रकरण । १९९

भावार्थ ।
जनकजी कहते हैं कि यत्न से रहित होकर यदि मैं सोता ही रहूँ, तब भी मेरी कोई हानि नहीं है और यत्न-विशेष करने से मेरे को किसी फल-विशेष की सिद्धि भी नहीं होती है, इस वास्ते मैं यत्न और अयत्न में भी हर्ष और शोक को त्याग करके सुख-पूर्वक स्थित हूँ । क्योंकि यत्न अयत्नादिक सब देह, इन्द्रियों के धर्म हैं, मुक्त आत्मा के नहीं हैं ॥ ६ ॥

मूलम् ।
सुखादिरूपानियमं भावेष्वालोक्य भूरिशः ।
शुभाशुभे विहायास्मादहमासे यथासुखम् ॥ ७ ॥

पदच्छेदः ।
सुखादिरूपानियमम्, भावेषु, आलोक्य, भूरिशः, शुभाशुभे, विहाय, अस्मात्, अहम्, आसे, यथासुखम् ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
अस्मात् =इसलियेच =और
भावेषु =बहुत जन्मों मेंशुभाशुभे =शुभ और अशुभ को
$\left.\begin{matrix} \textbf{सुखादिरूपा-} \ \textbf{नियमम्} \end{matrix}\right}=$सुखादिरूप की अनित्यता कोविहाय =छोड़ करके
भूरिशः =वारंवारयथासुखम् =सुख-पूर्वक
आलोक्य =देख करकेआसे =स्थित हूँ ॥

भावार्थ ।
जनकजी कहते हैं कि अनेक जन्मों में मनुष्य और पशु

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२०० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

आदिकों के जितने भाव अर्थात् जन्म होते हैं, उनको जो सुख-
दुःखादिक प्राप्त होते हैं, वे सब अनित्य हैं, ऐसा बहुत स्थलों
में देखा जाता है, क्योंकि संसार में सब देहधारियों को दुःख-
सुख बराबर बने रहते हैं। कोई भी ऐसा देहधारी संसार में
नहीं है, जो सदैव सुखी रहे, किन्तु यत्किञ्चित् काल सुख
और बहुत काल दुःख रहता है। प्रथम तो जन्मकाल का
दुःख फिर बाल्यावस्था में अनेक प्रकार के रोगादिकों करके
जन्य दुःख होता है। युवावस्था में भोगों से जन्य रोगादिकों
करके दुःख होता है। फिर स्त्री-पुत्रादिकों में मोह से दुःखों
के समूह उत्पन्न होते हैं। फिर वृद्धावस्था तो दुःखों की
खानि ही है। अनेक प्रकार के विषय-जन्य सुख-दुःखादिकों
को अनित्य जानकर और उनके हेतु जो शुभाशुभ कर्म हैं,
उनका त्याग करके अपने आत्मानन्द में स्थित हूँ ॥ ७ ॥

इति श्रीअष्टावक्रगीतायां त्रयोदश प्रकरणं समाप्तम् ॥ १३ ॥


चौदहवाँ प्रकरण (चित्त-शान्ति)

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चौदहवाँ प्रकरण ।

—:०:—

मूलम् ।

प्रकृत्या शून्यचित्तो यः प्रमादाभावभावनः ।
निद्रितो बोधित इव क्षीणसंसरणो हि सः ॥ १ ॥

पदच्छेदः ।

प्रकृत्या, शून्यचित्तः, यः, प्रमादात्, भावभावनः, निद्रितः, बोधितः, इव, क्षीणसंसरण, हि, सः ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
यः =जो पुरुषच =और
प्रकृत्या =स्वभाव सेनिद्रितः =सोता हुआ
शून्यचित्तः =शून्य चित्त वाला हैबोधितः इव =जागते हुए के तुल्य है ऐसा
च =परस =वह पुरुष
प्रमादात् =प्रमाद सेक्षीणसंसरणः =संसार से रहित है ॥
भावभावनः =विषयों का सेवन करनेवाला है

भावार्थ ।

इस प्रकरण में जनकजी अपने शान्तिचतुष्टय को कहते हैं ।
जो पुरुष स्वभाव से विषयों में शून्य चित्तवाला है अर्थात् अपने स्वभाव से चित्त के धर्म जो विषयों में राग-

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२०२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

द्वेष हैं, उनसे जो रहित है और प्रारब्धकर्म्मों के वशीभूत
होकर विषयों का चिन्तन भी करता है, और भोगता भी
है, उसको हानि-लाभ कुछ नहीं है । इसी में दृष्टान्त को
कहते हैं—
जैसे निद्रा के वश जो पुरुष शून्यचित्त होकर सो रहा
है उसको किसी पुरुष ने जगाकर उससे कहा कि तू इसकाम
को कर । वह जागकर उस काम को तो करता है, परन्तु
अपनी इच्छा के अनुसार नहीं करता है, किन्तु दूसरे पुरुष
की प्रेरणा करके वह काम को करता है ।

दाष्टान्त ।

इसी प्रकार जो पुरुष शान्तचित्त है, वह भी प्रारब्धवश
से विषयों को भोगता है, अपनी इच्छा से नहीं भोगता है
और जैसे कोई पुरुष अपने आनन्द में बैठा है, किसी सिपाही
ने आकर उसको बिगारी पकड़कर उसके शिर पर गठरी
रखवाया और वह पुरुष गठरी को उठाकर ले जाता है ।
यदि न उठावे या कहीं धर देवे, तो सिपाही उसके कमची
मारे । वह अपनी खुशी से उठाकर नहीं ले जाता है, किन्तु
दूसरे की प्रेरणा से वह उठाकर लिये जाता है, वैसे ही
ज्ञानवान् भी अपनी खुशी से तो विषय-भोगों को नहीं भोगता
है, परन्तु प्रारब्धरूपी सिपाही की प्रेरणा करके भोगता है,
इसलिये उसको हानि-लाभ कुछ भी नहीं है ॥ १ ॥

मूलम् ।

क्व धनानि क्व मित्राणि क्व मे विषयदस्यवः ।
क्व शास्त्रं क्व च विज्ञानं यदा मे गलिता स्पृहा ॥ २ ॥

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चौदहवाँ प्रकरण । २०३

पदच्छेदः ।

क्व, धनानि, क्व, मित्राणि, क्व, मे, विषयदस्यवः, क्व,
शास्त्रम्, क्व, च, विज्ञानम्, यदा, मे, गलिता, स्पृहा ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
यदा= जबमित्राणि= मित्र है
मे= मेरीक्व= कहाँ
स्पृहा= इच्छाविषयदस्यवः= विषय-रूपी चोर है
गलिता= गलिता हो गई हैक्व= कहाँ
तदा= तबशास्त्रम्= शास्त्र है
मे= मेरे कोच= और
क्व= कहाँक्व= कहाँ
धनानि= धन हैविज्ञानम्= ज्ञान है
क्व= कहाँ

भावार्थ ।

जनकजी कहते हैं कि विषयों की भावना से शून्य चित्तवाला मैं हूँ, मुझ पूर्णात्मदर्शी को जब विषय-भोगों की इच्छा नष्ट हो गई है, तब मेरा धन कहाँ है ? मेरे मित्र कहाँ हैं ? शास्त्र का अभ्यास कहाँ है ? और निदिध्यासनादिक कहाँ है ? मेरी तो किसी में भी आस्थाबुद्धि नहीं रही ॥ २ ॥

मूलम् ।

विज्ञाते साक्षिपुरुषे परमात्मनि चेश्वरे ।
नैराश्ये बन्धमोक्षे च न चिन्तामुक्तये मम ॥ ३ ॥

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२०४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

पदच्छेदः ।

विज्ञाते, साक्षिपुरुषे, परमात्मनि, च, ईश्वरे, नैराश्ये, बन्धमोक्ष, च, न, चिन्ता, मुक्तये, मम ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
साक्षिपुरुषे='त्वं' पद का अर्थ साक्षी पुरुष अर्थात् जीव हैनैराश्ये=आशा-रहित
च=औरबन्धमोक्षे=बन्ध के मोक्ष होने पर
परमात्मनि=तत्पद का अर्थ परमात्मा हैमम=मुझको
ईश्वरे=ईश्वर केमुक्तये=मुक्ति के लिये
विज्ञाते=जानने परचिन्ता=चिन्ता
न=नहीं है ॥

भावार्थ ।

देह और इन्द्रियों का साक्षी पुरुष जो 'त्वं' पद का अर्थ है, और तत्पद का अर्थ जो परमात्मा ईश्वर है, इन दोनों के लक्ष्यार्थ चेतन का 'तत्त्वमसि' महावाक्य और भागत्याग-लक्षणा करके साक्षात्कार करने से और बंध और मोक्ष में भी इच्छा के अभाव होने से मुक्ति के निमित्त भी विद्वान् को कोई चिन्ता बाकी नहीं रहती है ।

प्रश्न— महावाक्य का लक्षण क्या है ? और लक्षणा का अर्थ क्या है ?

उत्तर— वेद में दो प्रकार के वाक्य हैं—एक अवान्तर्वाक्य हैं, दूसरे महावाक्य हैं । दोनों के लक्षण को दिखाते हैं—

स्वरूपबोधकं वाक्यमवान्तर्वाक्यम् ।

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चौदहवाँ प्रकरण । २०५

आत्मा के स्वरूप का बोधक जो वाक्य है, उसका नाम
अवान्तरवाक्य है । जैसे—
“सत्यं ज्ञानमनंतं ब्रह्म”
आत्मा ब्रह्मसद्रूप है, ज्ञान-स्वरूप है, अनन्त-स्वरूप है ।
यह वाक्य तो केवल आत्मा के स्वरूप को ही बोधन
करता है, इसी वास्ते इसका नाम अवान्तरवाक्य है ।
अभेदबोधकं वाक्यं महावाक्यम् ।
अभेद का बोधक जो वाक्य है, उसी का नाम महा-
वाक्य है । जैसे—
ब्रह्माहमस्मि ।
मैं ही ब्रह्म हूँ ।
अयमात्माब्रह्म ।
यह अपना आत्मा ही ब्रह्म है ।
तत्त्वमसि ।
तत् = वही अर्थात् ईश्वर । त्वं = तू अर्थात् जीव ।
असि = है, ये सब वाक्य जीव और ईश्वर की अभेदता को
ही बोधन करते हैं, इसी से इनका नाम महावाक्य है ।
अब लक्षणा को दिखाते हैं—
पद के अर्थ का ज्ञान दो तरह से होता है । एक तो
शक्तिवृत्ति करके होता है, जैसे किसी ने किसी से कहा

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२०६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

"घटमानय" अर्थात् घट को लाओ । अब यहाँ पर 'घट'-पद
की शक्ति कम्बुग्रीवादिवाली व्यक्ति में है, अर्थात् घड़े में है
और लानेवाले को भी उसका ज्ञान है कि घड़े के लाने को
दूसरा पुरुष कहता है । वह 'घटमानय' शब्द को सुनकर
तुरन्त घड़े को उठा लाता है यहाँ पर तो शक्ति-वृत्ति करके
पद के अर्थ का बोध होता है । और जहां पर शक्ति-वृत्ति
करके बोध नहीं होता है, वहाँ पर लक्षणावृत्ति करके पद के
अर्थ का बोध होता है, सो दिखाते हैं ।

शक्यसम्बन्धो हि लक्षणा ।

शक्ति के आश्रय का नाम शक्य है, अर्थात् पद जिस
अर्थ को बोधन करे, उस अर्थ का नाम शक्य है ।

दृष्टान्त ।

किसी ने एक गुवाल से पूछा, तेरा मकान कहाँ है ।
उसने कहा—गंगायां घोषः । अर्थात् मेरा मकान गंगा में है ।

अब यहाँ पर शक्तिवृत्ति करके तो अर्थ नहीं बनता है,
क्योंकि 'गंगा' पद की शक्ति प्रवाह में है, अर्थात् 'गंगा' पद
का अर्थ जल का प्रवाह है । उस प्रवाह में मकान का होना
असंभव है, इस वास्ते यहाँ पर जो लक्षणा करके अर्थ का
बोध होता है, उसको दिखाते हैं—'गंगा' पद का शक्य प्रवाह
है, उसका सम्बन्ध तीर के साथ है, इस वास्ते गंगा के तीर
पर इसका ग्राम है—'गंगायां घोषः' इस पद से ऐसा बोध
होता है । और तात्पर्यानुपपत्ति लक्षणा में बीज है । जिस

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चौदहवाँ प्रकरण । २०७

अर्थ में वक्ता के तात्पर्य की असिद्धि हो, वहाँ पर ही लक्षणा होती है । 'गंगायां घोषः' यहाँ पर गंगा के प्रवाह में मेरा ग्राम है, ऐसा वक्ता का तात्पर्य नहीं है, क्योंकि ऐसा हो नहीं सकता है, इसी वास्ते—'गंगायां घोषः' में लक्षणा होती है ।

अब लक्षणा के भेद को दिखलाते हैं—

वाच्यार्थमशेषतया परित्यज्य तत्सम्बन्धिन्यर्थान्तरे वृत्तिर्जहल्लक्षणा ।

जहाँ पर वाच्यार्थ का समग्ररूप से त्याग करके तत्सम्बन्धी अर्थान्तर में वृत्ति हो, वहाँ पर जहल्लक्षणा होती है । जैसे—गंगायां घोषः । यहाँ पर गंगा पद का वाच्यार्थ जो प्रवाह है, उसका समग्ररूप से त्याग करके उसके साथ सम्बन्धवाला जो तीर है, उस तीर में गंगा पद की लक्षणा होती है, अर्थात् गंगा के तोर पर इसका ग्राम है । घोष नाम अहीरों के ग्राम का है ।

वाच्यार्थापरित्यागेन तत्सम्बन्धिन्यर्थान्तरे वृत्तिरजहल्लक्षणा ।

जहाँ पर वाच्यार्थ का त्याग न करके उसके सम्बन्धवाले का भी ग्रहण हो, वहाँ पर अजहल्लक्षणा होती है ।

किसी के गृह में दण्डी संन्यासियों का निमन्त्रण था । वहाँ पर जाकर दण्डी लोग बाहर बैठे । जब भोजन तैयार हुआ, तब मालिक ने अपने नौकर से कहा कि—यष्टी प्रवेशय । अर्थात् लाठी का भीतर प्रवेश कराओ ।

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२०८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

अब यहाँ पर लाठी का भीतर प्रवेश तो बन सकता है, परन्तु उस में वक्ता का तात्पर्य नहीं है, किन्तु यष्टिधर के प्रवेश कराने में वक्ता का तात्पर्य है, इस वास्ते 'यष्टी'-पद का वाच्यार्थ यष्टि है, उसका त्याग न करके उसके साथ सम्बन्धवाला जो पुरुष है, उस पुरुष में जो लक्षणा करनी है, इसी का नाम अजहल्लक्षणा है ।

वाच्यार्थैकदेशपरित्यागे नैकदेशवृत्तिर्जहदजहल्लक्षणा ।

अर्थात् वाच्यार्थ के एकदेश को त्याग करके एकदेश का ग्रहण करना जो है, इसी का नाम जहत् अजहत् लक्षणा है जैसे—'तत्त्वमसि' ।

यहाँ पर 'तत्' पद का वाच्यार्थ सर्वज्ञत्वादिक गुणों करके युक्त ईश्वर चेतन है, और 'त्वं' पद का वाच्यार्थ अल्पज्ञत्वादिक गुणों करके युक्त जीव चेतन है । 'तत्' वह सर्वज्ञत्वादि गुणवाला ईश्वर 'त्वं' तू अल्पज्ञत्वादि गुणवाला जीव, ये जो दोनों के वाक्यार्थ हैं इनका अभेद नहीं हो सकता है, पर दोनों का लक्ष्यार्थ जो गुणों से रहित केवल चेतन है, उसी का अभेद हो सकता है, सो अभेद जहद् अजहद् अर्थात् भागत्यागलक्षणा करके ही होता है । तत्पद के वाच्यार्थ का जो एकदेश सर्वज्ञत्वादिक गुण हैं, उनके त्याग करने से, और त्वं पद के वाच्यार्थ का जो एकदेश अल्पज्ञत्वादिक गुण हैं उनके भी त्याग करने से, दोनों पदों विषे एक जो लक्ष्यार्थ चेतन स्थित है, उसके ग्रहण करने से दोनों का अर्थात् ईश्वर और जीव का अभेद केवल चेतन में

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चौदहवाँ प्रकरण । २०९

होता है, सो जिस विद्वान् ने महाकाव्यों करके और भाग-
त्यागलक्षणा करके जीव ईश्वर की अभेदता को जान लिया
है, वही मुक्त है, उसको मुक्ति की कोई चिन्ता नहीं
है ॥ ३ ॥

मूलम् ।

अन्तर्विकल्पशून्यस्य बहिः स्वच्छन्दचारिणः ।
भ्रान्तस्येव दशास्तास्तास्तादृशा एव जानते ॥ ४ ॥

पदच्छेदः ।

अन्तर्विकल्पशून्यस्य, बहिः, स्वच्छन्दचारिणः, भ्रान्तस्य, इव, दशाः, ताः, ताः, तादृशा, एव, जानते ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
$अन्तर्विकल्प-\ शून्यस्य = जो अन्तःकरण में विकल्प से शून्य है$\begin{aligned}स्वच्छन्द-\ चारिणः\end{aligned} = स्वतंत्र चलनेवाले की
च=और (जो)ताः ताः=उन उन
बहिः=बाहरदशाः=दशाओं को
$भ्रान्तस्य इव = भ्रान्त हुए पुरुष की नाईं है ऐसे$तादृशाः एव = वैसे ही दशावाले पुरुष
जानते=जानते हैं ॥

भावार्थ ।

जिस पुरुष का अन्तःकरण विकल्प अर्थात् संकल्प से रहित है, अर्थात् जिसको कोई भी विषय-वासना भीतर से

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२१० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

नहीं फुरती है, और बाहर से जो उन्मत्त की तरह स्वेच्छा-
पूर्वक विहार करता है, वही ज्ञानी है । उसको ज्ञानी पुरुष
ही जानता है, दूसरा अज्ञानी पुरुष नहीं जान सकता
है ॥ ४ ॥

इति श्रीअष्टावक्रगीतायां चतुर्दशप्रकरणं समाप्तम् ॥

—:०:—