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अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

by महर्षि अष्टावक्र

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished405 pages
Page 115Permalink

१०८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
समदुःखसुखः=तुल्य है दुःख और सुख जिसकोसमजीवितः= मृत्युःतुल्य है जीना और मरना जिसको
पूर्णः=जो पूर्ण हैएवम् एव=ऐसा
आशानैराश्ययोः=आशा और निराशा मेंसन्=होता हुआ
लयम्=ब्रह्म-दृष्टि को
समः=जो बराबर हैव्रज=(तू) प्राप्त हो ॥

भावार्थ ।

अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! तू आत्मानंद करके पूर्ण है । दैवयोग से शरीर में उत्पन्न हुए जो सुख दुःख हैं, उनमें भी तू पूर्ण है, आशा और निराशा में भी तू सम है, जीने और मरने में भी तू सम है, तू निर्विकार है, सुख दुःखादि सब अनात्मा के धर्म हैं, और मिथ्या हैं । क्योंकि इनके धर्मी जो देहादिक हैं, वे भी सव मिथ्या हैं । उत्पत्ति से पूर्व जो देहादिक नहीं थे, और नाश से उत्तर भो नहीं रहते हैं, वे बीच में भी प्रतीतिमात्र हैं । जो वस्तु उत्पत्ति से पूर्व और नाश से उत्तर न हो, वह बीच में भो वास्तविक नहीं होती है, केवल प्रतीतमात्र ही होती है । जैसे स्वप्न के पदार्थ और रज्जु विषे सर्पादिक मिथ्या हैं, वैसे यह जगत् भी मिथ्या है । वास्तव में, तीनों कालों में नहीं है, केवल ब्रह्म ही ब्रह्म है ॥

सर्वं खल्विदं ब्रह्म ॥

यह संपूर्ण जगत् निश्चय करके ब्रह्म-रूप ही है, ऐसे चिंतन का नाम ही लयचिंतन है ॥ ४ ॥

इति श्रीअष्टावक्रगीतायां पंचमं प्रकरणं समाप्तम् ॥

छठा प्रकरण (लय-माहात्म्य)

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छठा प्रकरण ।

---:o:---

मूलम् ।

आकाशवदनन्तोऽहं घटवत्प्राकृतं जगत् ।
इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः ॥ १ ॥

पदच्छेदः ।

आकाशवत्, अनन्तः, अहम्, घटवत्, प्राकृतम्, जगत्,
इति, ज्ञानम्, तथा एतस्य, न, त्यागः, न, ग्रहः, लयः ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
आकाशवत्=आकाशवत्एतस्य=इसका
अहम्=मैंन त्याग=न त्याग है
अनन्तः=अनन्य हूँच=और
जगत्=संसारन ग्रहः=न ग्रहण है
घटवत्=घटवत्च=और
प्राकृतम्=प्रकृतिजन्य हैन लयः=न लय है
तथा=इस कारणइति ज्ञानम्=ऐसा ज्ञान है ॥

भावार्थ ।

शिष्य की परीक्षा के वास्ते पाँचवें प्रकरण द्वारा गुरु ने लययोग-रूप चिंतन का उपदेश किया । अब इस छठे प्रकरण में गुरु अपने अनुभव को दिखाता हुआ लयादिकों के असंभव को दिखाता है—

लय चिंतन-रूप योग भी मेरे में नहीं बनता है । लय उसका होता है, जो उत्पतिवाला पदार्थ है । जिसकी उत्पत्ति

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११० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

ही तीनों कालों में नहीं है, उसका लय भी नहीं है। जैसे बंध्या का पुत्र और शशे के सींग की उत्पत्ति नहीं है और न उसका लय है, वैसे ही जगत् भी तीनों कालों में न उत्पन्न हुआ है, न होगा, और न वर्तमान काल में है। तब उसका लयचिंतन कैसे हो सकता है, किन्तु कदापि नहीं हो सकता है।

प्रश्न—यदि जगत् उत्पन्न ही नहीं हुआ है, तब प्रतीत क्यों होता है ?

उत्तर—मांडूक्य-कारिका में कहा है—

आदावन्ते च यन्नास्ति वर्तमानेऽपि तत्तथा ।
वितथैः सदृशाः सन्तोऽवितथा इव लक्षिताः ॥ १ ॥
स्वप्नमाये यथा दृष्टे गंधर्वनगरं तथा ।
तथा विश्वमिदं दृष्टं वेदान्तेषु विचक्षणैः ॥ २ ॥

अर्थात् जो वस्तु उत्पत्ति से पहले नहीं है, और नाश से उत्तर भी नहीं है, वह वर्तमान काल में भी नहीं है, परन्तु मिथ्या होकर सत्य की तरह वर्तमान काल में प्रतीत होती है ॥ १ ॥

जैसे स्वप्न के हाथी-घोड़े, और इन्द्रजाली करके रचे हुए पदार्थ, और गन्धर्वनगर; ये सब बिना हुए ही प्रतीत होते हैं, वैसे यह जगत् भी बिना हुए ही प्रतीत होता है। ज्ञानियों ने ऐसा अनुभव करके वेदान्त-शास्त्र द्वारा देखा है कि केवल अद्वैत अनंत-स्वरूप आत्मा ही सत्य है, और सारा प्रपंच प्रतीतिमात्र ही है, वास्तव में नहीं है।

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छठा प्रकरण । १११

प्रश्न-अनंत-स्वरूप आत्माका देहादिकों में निवास कैसे हो सकता है ? बड़ी वस्तु छोटी वस्तु के भीतर नहीं आ सकती है ?
उत्तर-जैसे घटमठादिक आकाश के निवास के स्थान हैं, और भेदक भी हैं, वैसे ही देहादिक भी अनंत-स्वरूप आत्मा के निवास का स्थान है, और भेदक भी है । वास्तव में तो यह जगत् मिथ्या माया का कार्य होने से मिथ्या है । इस प्रकार वेदान्त करके सिद्ध जो ज्ञान है, वही अनुभवरूप होकर जगत् के मिथ्यात्व में प्रमाण है, इस वास्ते लयचिंतनादिक भी जगत् के नहीं बन सकते हैं ॥ १ ॥

मूलम् ।
महोदधिरिवाहं स प्रपञ्चो वीचिसन्निभः ।
इति ज्ञानं तथैतस्य त्यागो न ग्रहो लयः ॥ २ ॥

पदच्छेदः ।
महोदधिः, इव, अहम्, सः, प्रपञ्चः, वीचिसन्निभः, इति, ज्ञानम्, तथा, एतस्य, न, त्यागः, न, ग्रहः, लयः ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
अहम्=मैंएतस्यत्यागः=इसका त्याग है
महोदधिः इव=समुद्र सदृश हूँच=और
सः=यहन=न
प्रपञ्चः=संसारग्रहः लयः=ग्रहण और लय है
वीचिसन्निभः=तरंगों के तुल्य है
तथा=इस कारणइति ज्ञानम्=यह ज्ञान है अर्थात् इस प्रकार के विचार को ज्ञान कहते हैं ॥
न=न
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११२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

भावार्थ ।

**प्रश्न--**घटाकाश के दृष्टांत से तो देह और आत्मा के भेद की शंका उत्पन्न होती है । जैसे आकाश से घट भिन्न है, और घट से आकाश भिन्न है, वैसे आत्मा से देह भिन्न है, और देह से आत्मा भिन्न है, दोनों के भिन्न-भिन्न होने से ही द्वैत साबित हुआ, अद्वैत आत्मा तो साबित न हुआ ?

**उत्तर--**जनकजी कहते हैं कि आत्मा महान् समुद्र की तरह है, उसमें प्रपंच लहरों की तरह है । इस प्रकार का अनुभव-रूप ज्ञान ही अद्वैत में प्रमाण है ॥ २ ॥

मूलम् ।

अहं सः शुक्तिसङ्काशो रूप्यवद्विश्वकल्पना ।
इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः ॥ ३ ॥

पदच्छेदः ।

अहम्, सः, शुक्तिसंकाशः, रूप्यवत्, विश्वकल्पना, इति, ज्ञानम्, तथा, एतस्य, न, त्यागः, न, ग्रहः, लयः ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
सः=वहतथा=इसका कारण
अहम्=मैंएतस्य=इसका
शुक्तिसंकाशः=शुक्ति के तुल्य हूँन त्यागः=न त्याग है
विश्वकल्पना=विश्व की कल्पनान लयः=न लय है
रूप्यवत्=रजत के समान हैइति ज्ञानम्=यही ज्ञान है ॥
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५५२

भावार्थ ।

**प्रश्न—**जैसे सब बीचियाँ समुद के विकार हैं और समुद्र विकार है, वैसे आपके दृष्टान्त से देह आत्मा का विकार है, और आत्मा विकारी सिद्ध होता है ?

**उत्तर—**अष्टावक्रजी कहते हैं कि विकार-विकारीभाव सावयव पदार्थों में होते हैं, निरवयव पदार्थ में नहीं होते हैं, इसलिये तुम्हारा दृष्टान्त सार्थक नहीं है, अतएव मेरे दृष्टान्त को सुनो—

जैसे शुक्ति सत्य-रूप है और उसमें रजत मिथ्या है, वैसे ही देहादिक समग्र प्रपंच का अधिष्ठान-रूप मैं ही सत्य हूँ और सारा प्रपंच मेरे में कल्पित रजत की तरह मिथ्या है। इसी कारण द्वैत तीनों कालों में सिद्ध नहीं हो सकता है ॥ ३ ॥

मूलम् ।

अहं वा सर्वभूतेषु सर्वभूतान्यथो मयि ।
इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः ॥ ४ ॥

पदच्छेदः ।

अहम्, वा, सर्वभूतेषु, सर्वभूतानि, अथो, मयि, इति, ज्ञानम्, तथा, एतस्य, न, त्यागः, न, ग्रहः, लयः ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
अहम्=मैंसर्वभूतानि=सब भूत
वा=निश्चय करकेमयि=मुझमें
सर्वभूतेषु=सब भूतों में हूँ+सन्ति=हैं
अथो=औरतथा=इस कारण से
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११४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

एतस्य=इसका<br>न त्यागः=न त्याग है<br>न ग्रहः=न ग्रहण है<br>च=औरन लयः=न लय है<br>इति ज्ञानम्= $\Big{$ इस प्रकार का ज्ञान है ॥

भावार्थ ।

**प्रश्न—**शुक्ति में रजत के दृष्टांत करके भी आत्मा को परिच्छिन्नता की शंका होती है, क्योंकि जैसे शुक्ति परिच्छिन्न और एकदेशवर्ती है, वैसे ही आत्मा भी परिच्छिन्न और एकदेशवर्ती सिद्ध होगा ?

**उत्तर—**जनकजी कहते हैं, कि मैं ही सम्पूर्ण भूतों में व्यापक-रूप करके मणियों में सूत की तरह वर्तता हूँ, मैं ही सबका अधिष्ठान-रूप होकर सत्ता और स्फूर्ति का देनेवाला हूँ, मेरे में ही सारा जगत् आकाश में नीलता की तरह अध्यस्त है । इस प्रकार का दान्त वाक्यों करके सिद्ध ज्ञान अर्थात् अनुभव आत्मा के अद्वैत होने में प्रमाण है । और जब मैं हूँ, तो मेरे में ग्रहण, त्याग और लय चिंतनादिक भी नहीं बनते हैं ॥ ४ ॥

इति श्रीअष्टावक्रगीतायां षष्ठं प्रकरणं समाप्तम् ॥ ६ ॥

—:०:—

सातवाँ प्रकरण (शान्त-स्थिति / आत्मविश्रांति)

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सातवाँ प्रकरण ।

—:०:—

मूलम् ।

मय्यनन्तमहाम्भोधौ विश्वपोत इतस्ततः ।
भ्रमति स्वान्तवातेन न ममास्त्यसहिष्णुता ॥ १ ॥

पदच्छेदः ।

मयि, अनन्तमहाम्भोधौ, विश्वपोतः, इतः, भ्रमति, स्वान्तवातेन, न, मम, अस्ति, असहिष्णुता ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
मयि अनन्त-महाम्भोधौ =मुझ अनन्त महासमुद्र मेंभ्रमति =भ्रमती है
+ परन्तु =परन्तु
विश्वपोतः =विश्व-रूपी नौकामम =मुझको
स्वान्तवातेन =मन-रूपी पवन करकेअसहिष्णुता =असहनशीलता
इतः ततः =इधर-उधर सेन अस्ति =नहीं है ॥

भावार्थ ।

**प्रश्न—**यदि लय चिंतन नहीं होगा, तो सांसारिक विक्षेप भी बने रहेंगे और वे कदापि दूर नहीं होंगे ?

**उत्तर—**वे बने रहें, मेरी क्या हानि है । अनन्त महान् समुद्र-रूपी मुझ आत्मा में यह विश्व-रूपी नौका मन-रूपी पवन करके इधर-उधर भ्रमती है, उसका भ्रमण करना मेरे को असहन नहीं है । जैसे समुद्र में पवन करके इधर-उधर

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११६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

भ्रमती हुई नौका समुद्र को क्षुब्ध नहीं कर सकती है, वैसे
मन-रूपी पवन करके इधर-उधर भ्रमती हुई विश्व-रूपी
नौका भी समुद्र-रूपी आत्मा को क्षुब्ध नहीं कर सकती
है ॥ १ ॥

मूलम् ।
मय्यनन्तमहाम्भोधौ जगद्वीचिः स्वभावतः ।
उदेतु वास्तमायातु न मे वृद्धिर्न च क्षतिः ॥ २ ॥

पदच्छेदः ।
मयि, अनन्तमहाम्भोधौ, जगद्वीचिः, स्वभावतः, उदेतु,
वा, अस्तम्, आयातु, न, मे, वृद्धिः, न, च, क्षतिः ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
$\left.\begin{aligned} &मयि अनन्त- \ &महाम्भोधौ = \end{aligned}\right}$$\left{\begin{aligned} &मुझ अनन्त \ &महासमुद्र में \end{aligned}\right.$आयातु = प्राप्त हो
जगद्वीचिः = जगत्-रूपी कल्लोलमे = मेरी
स्वभावतः = स्वभाव सेन = न
उदेतु = उदय होंवृद्धिः = वृद्धि है
वा = और चाहेच = और
अस्तम् = लय कोन = न
क्षति = हानि है ॥

भावार्थ ।
पूर्ववाले वाक्य करके जगत् के व्यवहार को अनिष्टता
का अभाव कहा । अब इस वाक्य करके जगत् की उत्पत्ति
आदिकों को भी अनिष्टता का अभाव कथन करते हैं ।

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सातवाँ प्रकरण ११७

जनकजी कहते हैं कि विनाश से रहित व्यापक आत्मा-
रूप समुद्र में जगत्-रूपी अनेक लहरें उदय होती हैं, और
फिर अस्त हो जाती हैं। उनके उदय होने से आत्मा की वृद्धि
नहीं होती है और उनके अस्त होने से आत्मा की कोई हानि
नहीं होती है। जैसे समुद्र की लहरों के उदय और अस्त होने
से समुद्र की कुछ भी हानि नहीं है ॥ २ ॥

मूलम् ।

मय्यनन्तमहाम्भोधौ विश्वं नाम विकल्पना ।
अतिशान्तो निराकार एतदेवाहमास्थितः ॥ ३ ॥

पदच्छेदः ।

मयि, अनन्तमहाम्भोधौ, विश्वम्, नाम, विकल्पना,
अतिशान्तः, निराकारः, एतत्, एव, अहम्, आस्थितः ।

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
मयि=मुझअहम्=मैं
अनन्त- महाम्भोधौ=अनन्त महा- समुद्र मेंअतिशान्तः=अत्यन्त शान्त हूँ
निराकारः=निराकार हूँ
नाम=निश्चय करकेच=और
विश्वम्=संसारएतत् एव=इसी आत्मा के
विकल्पना=कल्पना मात्र हैंआस्थितः=आश्रय हूँ ॥

समुद्र और लहर के दृष्टान्त से किसी को ऐसा भ्रम न
हो जावे कि आत्मा का विकार जगत् है, इस भ्रम के दूर
करने के लिये जनकजी दूसरी रीति से कहते हैं।

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११८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

भावार्थ ।

मुझ महान् समुद्र-रूपी आत्मा में जो जगत् की कल्पना है, सो भ्रम-मात्र ही है । वास्तव में नहीं है, क्योंकि मेरा अनन्तस्वरूप निराकार है । निराकार से साकार की उत्पत्ति नहीं बनती है । जब कि आत्मा में जगत् की वास्तव में उत्पत्ति नहीं बनती है, तो मैं प्रपंच से रहित शान्त-रूप होकर स्थित हूँ । एवं लय योगादिक भी मेरे को करना उचित नहीं हैं ॥ ३ ॥

मूलम् ।

नात्मा भावेषु नो भावस्तत्रानन्ते निरञ्जने ।
इत्यसक्तोऽस्पृहः शान्त एतदेवाहमास्थितः ॥ ४ ॥

पदच्छेदः ।

न, आत्मा, भावेषु, नो, भावः, तत्र, अनन्ते, निरञ्जने, इति, असक्तः, अस्पृहः, शान्त, एतत्, एव, अहम्, आस्थितः ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
आत्मा = आत्मानो = नहीं है
भावेषु = देह आदि मेंइति = इस प्रकार
न = नहींअसक्तः = संग-रहित
+ च = औरशान्तः = शान्त हुआ
भवः = देहादिअहम् = मैं
तत्र = उसएतत् एव = इसी आत्मा के
अनन्ते = अनन्तआस्थितः = आश्रित हूँ ॥
निरञ्जने = निर्द्वन्द्व आत्मा में

भावार्थ ।

आत्मा देहादिभावों में आधेय अर्थात् आश्रित-रूप करके

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सातवाँ प्रकरण । ११९

नहीं है, क्योंकि आत्मा व्यापक है, देहादिक सब परिच्छिन्न हैं। व्यापक, परिच्छिन्न के आश्रित नहीं होता। और आत्मा निराकार होने से देहादिकों की उपाधि भी नहीं हो सकता है, क्योंकि आत्मा सत्य है, देहादिक सब मिथ्या है। सत्य वस्तु मिथ्या वस्तु की उपाधि नहीं हो सकती है। और देह इन्द्रियादिक आत्मा की उपाधि भी नहीं हो सकते हैं, क्योंकि आत्मा अनन्त और निरञ्जन है और देहादिक अन्तवान् और नाशवान् हैं, इसी कारण आत्मा सम्बन्ध से रहित है और इच्छा आदिकों से भी रहित है एवं आत्मा शान्त स्वरूप है ॥ ४ ॥

मूलम् ।
अहो चिन्मात्रमेवाहमिन्द्रजालोपमं जगत् ।
अतो मम कथं कुत्र हेयोपादेयकल्पना ॥ ५ ॥

पदच्छेदः ।
अहो, चिन्मात्रम्, एव, अहम्, इन्द्रजालोपमम्, जगत्, अतः, मम, कथम्, कुत्र, हेयोपादेयकल्पना ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
अहो= आश्चर्य है किमम= मेरी
अहम्= मैंहेयोपादेय-कल्पना= हेय और उपादेय की कल्पना
चिन्मात्रम्= चैतन्य-मात्र हूँ
जगत्= संसारकथम्= क्योंकर
इन्द्रजालोपमम्= इन्द्रजाल की तरह हैच= और
अतः= इसलियेकुत्र= किसमें हो ॥
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१२० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

भावार्थ ।

विद्वान् में इच्छा आदिक भी स्वतः नहीं होते हैं, इसमें जो कारण है उसको कहते हैं—
जनकजी कहते हैं कि मैं चैतन्य-स्वरूप हूँ और संपूर्ण जगत् इन्द्रजाल के तुल्य मेरी सत्ता के बल और अपनी सत्ता से रहित प्रतीत होता है। चूँकि जगत् की अपनी सत्ता कुछ भी नहीं है इस वास्ते मेरे को किसी पदार्थ में भी किसी प्रकार करके त्याग और ग्रहण की बुद्धि नहीं होती है। जो पुरुष जगत् के पदार्थों को सत्य मानता है, उसी की उनमें ग्रहण और त्यागबुद्धि होती है ॥ ५ ॥

इति श्रीअष्टावक्रगीतायां सप्तमं प्रकरणं समाप्तम् ॥ ७ ॥

—:०:—

आठवाँ प्रकरण (मोक्ष-लक्षण / बन्ध-मुक्ति)

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आठवाँ प्रकरण ।

——:०:——

मूलम् ।

तदा बन्धो यदा चित्तं किञ्चिद्वाञ्छति शोचति ।
किञ्चिन्मुञ्चति गृह्णाति किञ्चिद्धृष्यति कुप्यति ॥ १ ॥

पदच्छेदः ।

तदा, बन्धः, यदा, चित्तम्, किञ्चित्, वाञ्छति, शोचति, किञ्चित्, मुञ्चति, गृह्णाति, किञ्चित्, हृष्यति, कुप्यति ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
यदाजबकिञ्चित्कुछ
चित्तम्मनगृह्णातिग्रहण करता है
वाञ्छतिचाहता हैहृष्यतिप्रसन्न होता है
किञ्चित्कुछकुप्यतिदुःखित होता है
शोचतिसोचता हैतदातब
किञ्चित्कुछबन्धःबन्ध है ॥
मुञ्चतित्यागता है

भावार्थ ।

पहले के सात प्रकरणों द्वारा अष्टावक्रजी ने सब प्रकार से जनकजी के अनुभव की परीक्षा कर ली । अब इस आठवें प्रकरण में चार श्लोकों द्वारा अपने शिष्य के अनुभव की श्लाघा को करते हैं—

हे जनक ! जो तूने पूर्व कहा है कि मुझ अनन्त-स्वरूप आत्मा में त्याग और ग्रहण करने की कल्पना नहीं है, सो तूने ठीक कहा है । क्योंकि जब चित्त विषयों की इच्छावाला होकर किसी पदार्थ की प्राप्ति की इच्छा करता है और

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१२२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

उसके अप्राप्त होने से फिर शोच करता है और कष्ट होता
है, तब उसके त्याग की इच्छा करता है। और जब चित्त में
लोभ उत्पन्न होता है, तब ग्रहण की इच्छा करता है तथा
पदार्थ की प्राप्ति होने पर हर्ष को प्राप्त होता है, अप्राप्ति
होने पर क्रोधित होता है। इस प्रकार जब कि अनेक वास-
नाओं करके चित्त युक्त होता है, तब जीव को बन्ध होता
है। योगवाशिष्ठ में भी कहा है—

स्नेहेन धनलोभेन लाभेन मणियोषिताम् ।
आपातरमणीयेन चेतो गच्छति पीनताम् ॥ १ ॥

अर्थात् स्त्री-पुत्रादिकों में स्नेह करके, धन के लोभ करके,
मणियों और स्त्री आदिकों के लाभ करके चित्त दीनता को
प्राप्त होता है ॥ १ ॥

बन्धो हि वासनाबन्धो मोक्षः स्याद्वासनाक्षयः ।
वासनास्त्वं परित्यज्य मोक्षार्थित्वमपि त्यज ॥ २ ॥

चित्त में अनेक प्रकार के भोगों की वासना ही पुरुष
के बंधन का कारण है। समग्र-रूप से वासना के क्षय हो
जाने का नाम ही मोक्ष है। हे राम ! जब तुम वासना का
त्याग करोगे और मोक्ष की इच्छा न करोगे, तब सुखी हो
जाओगे ॥ २ ॥

प्रश्न—आपने कहा है कि जब तक चित्त में वासनाएं
भरी हुई हैं, तब तक इसकी मुक्ति कदापि नहीं होती है, सो
संसार में निर्वासनिक पुरुष तो कोई भी नहीं दिखाई देता
है, क्योंकि जितने गृहस्थाश्रमी हैं, उनके चित्त में स्त्री, पुत्र,

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आठवाँ प्रकरण । १२३

धनादिकों की प्राप्ति की वासनाएँ भरी रहती हैं । यदि कोई
पुरुष ईश्वर का स्मरण और दानादिकों को करता है, तो
उसके चित्त में यही कामना रहती है कि मेरे धनादिक सर्वदा
बने रहें, निर्वासनिक होकर कोई भी नहीं करता है । और
जितने त्यागी, साधु और महात्मा कहलाते हैं, उनके चित्त
में भी अनेक प्रकार की कामनाएँ भरी हुई हैं । कोई मठों
को बनाता है, कोई सेवको को बढ़ाता है, निर्वासनिक तो
उनमें भी कोई नहीं दिखाई देता है । यदि निर्वासनिक होवें,
तो वेषों को, चेलों को और मठों को क्यों बढ़ावें, और क्यों
प्रपंच को फैलावें, अतएव सब कोई प्रपंच को फेलाते हैं—क्या
गृहस्थ, क्या संन्यासी । इस हालत में कोई भी ज्ञानी नहीं
सिद्ध होता है । ज्ञानी के अभाव होने से मुक्ति का भी
अभाव ही सिद्ध होता है ?

उत्तर—जैसे एक वन में एक ही सिंह रहता है और
स्यार मृगादिक लाखों रहते हैं वैसे ही संसार-रूपी, गृहस्था-
श्रम-रूपी, अथवा संन्यासाश्रम-रूपी वन में वासना से रहित
ज्ञानवान् कोई एक विरला ही होता है और वासना से भरे
हुए अनेक होते हैं । जैसे सिंह के मारे हुए शिकार को स्यार
आदिक खाते हैं, वैसे निर्वासनिक पुरुषों के चिह्नों को धारण
करके अर्थात् ज्ञान की बातें सुना करके और वैराग्यादिकों
को दिखलाकर, बहुत से मूर्खों को वञ्चक संन्यासी या गृहस्थ
आचार्यादिक ठगते हैं, वे ही संसार के स्यार हैं । इसमें एक
दृष्टान्त को कहते हैं—

एक ग्राम में जुलाहे बसते थे । उन्होंने आपस में एक
दिन सलाह किया कि चलो, रात्रि को क्षत्रियों के ग्राम को

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१२४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

लूट लावें। तदनुसार सब जुलाहे मिलकर रात्रि को क्षत्रियों के ग्राम को लूटने गये। जब क्षत्रिय लोग हथियार लेकर जुलाहों के मारने को दौड़े, तब जुलाहे सब भागे। उनमें से एक जुलाहे ने कहा कि भाइयो ! भागे तो जाते ही हो, भला मारो-मारो तो कहते चलो। वे सब जुलाहे भागते जाते और मारो-मारो भी कहते जाते थे।

दाष्टान्त में यह है कि बहुत से बनावट के ज्ञानी ज्ञान के साधनों से भागे तो जाते हैं, पर औरों से ऐसा कहते जाते हैं कि वासना को त्यागो, ज्ञान को धारण करो, सब संसार मिथ्या है, ऐसे दम्भी ज्ञानी नहीं हो सकते हैं। जो समग्र वासनाओं से रहित हैं, वे ही ज्ञानी हैं। वासनावाला ही बन्ध को प्राप्त होता है ॥ १ ॥

मूलम् ।

तदामुक्तिर्यदा चित्तं न वाञ्छति न शोचति ।
न मुञ्चति न गृह्णाति न हृष्यति न कुप्यति ॥ २ ॥

पदच्छेदः ।

तदा, मुक्तिः, यदा, चित्तम्, न, वाञ्छति, न, शोचति, न, मुञ्चति, न, गृह्णाति, न, हृष्यति, न, कुप्यति ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
यदा=जबन हृष्यति=न प्रसन्न होता है
चित्तम्=मन+ च=और
न वाञ्छति=न चाहता हैन=न
न शोचति=न शोचता हैकुप्यति=दुःखित होता है
न मुञ्चति=न त्यागता हैतदा=तब भी
न गृह्णाति=न ग्रहण करता हैमुक्तिः=मुक्ति है ॥
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भावार्थ ।

जिस काल में चित्त न भोगों की प्राप्ति की इच्छा करता है, और न शोकों के त्याग की इच्छा करता है, अर्थात् पदार्थ के पाने पर न उसको हर्ष होता है, और न प्यारे सम्बन्धियों के नष्ट या वियोग हो जाने पर शोक होता है, किन्तु एक-रस सदा ज्यों का त्यों बना रहता है, उसी काल में वह पुरुष मोक्ष को प्राप्त हो जाता है ॥ २ ॥

मूलम् ।

तदा बन्धो यदा चित्तं सक्तं कास्वपि दृष्टिषु ।
तदा मोक्षो यदा चित्तमसक्तं सर्वदृष्टिषु ॥ ३ ॥

पदच्छेदः ।

तदा, बन्धः, यदा, चित्तम्, सक्तम्, कासु, अपि, दृष्टिषु,
तदा, मोक्षः, यदा, चित्तम्, असक्तम्, सर्वदृष्टिषु ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
यदा= जबयदा= जब
चित्तम्= मनचित्तम्= मन
कासु= किसीसर्वदृष्टिषु= सब दृष्टियों में अ- र्थात् सब विषयों में से किसी भी विषय में
दृष्टिषु= दृष्टि में अर्थात् विषय मेंअसक्तम्= नहीं
सक्तम्= लगा हुआ हैतदा= तब
तदा= तबमोक्षः= मुक्त है ॥
बन्धः= बन्ध है
अपि= और
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१२६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

भावार्थ ।

पहले एक वाक्य करके बन्ध के लक्षण को कहा और दूसरे वाक्य करके मुक्ति के लक्षण को कहा । अब एक ही वाक्य करके बन्ध और मोक्ष दोनों का कथन करते हैं—

जब चित्त अनात्मपदार्थों में अनात्माकारवृत्तिवाला होता है, तब भी इसको बन्ध होता है । जब चित्त विषयाकार नहीं होता है अर्थात् आसक्ति से रहित होकर सर्वत्र आत्मदृष्टिवाला होता है, तभी जीव मुक्त कहा जाता है ।

प्रश्न—आपने कहा है कि जिस काल में चित्त विषयों में आसक्त होता है, तब बन्ध होता है और जब अनासक्त होता है, तब मुक्त होता है । यदि एक ही चित्त में काल-भेद करके बन्ध और मोक्ष माना जावेगा, तब मुक्ति भी अनित्य हो जावेगी ?

उत्तर—उस वाक्य का यह तात्पर्य नहीं है, जो आपने समझा है, किन्तु उसका यह तात्पर्य है कि आत्म-ज्ञान की प्राप्ति के पूर्व जितने काल तक पुरुष का चित्त विचार से शून्य होकर विषयों में आसक्त रहता है, उतने काल तक जीव बन्ध में ही पड़ा रहता है । पश्चात् जब विचार करके युक्त हुआ, रचित दोष-दृष्टि करके विषयों में आसक्ति से रहित हो जाता है, और फिर विषय-वासना का बीज भी चित्त में नहीं रहता है, तब फिर वह मुक्त होकर कदापि बन्ध को नहीं प्राप्त होता है । जैसे भुंजे हुए बीज में फिर अंकुर उत्पन्न करने की शक्ति नहीं रहती है, वैसे ही निर्वासनिक चित्तवाला पुरुष कभी भी जन्म को नहीं प्राप्त होता है ॥ ३ ॥

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आठवाँ प्रकरण । १२७

मूलम् ।

यदा नाहं तदा मोक्षो यदाहं बन्धनं तदा ।
मत्वेति हेलया किञ्चिन्मा गृहाण विमुञ्च मा ॥ ४ ॥

पदच्छेदः ।

यदा, न, अहम्, तदा, मोक्षः, यदा, अहम्, बन्धनम्, तदा,
मत्वा, इति, हेलया, किञ्चित्, मा, गृहाण, विमुञ्च, मा ॥

अन्वयः । शब्दार्थ । अन्वयः । शब्दार्थ ।
यदा=जब इति=इस प्रकार
अहम्=मैं हूँ मत्वा=मान करके
तदा=तब हेलया=इच्छा करके
बन्धनम्=बन्ध है मा=मत
यदा=जब गृहाण=ग्रहण कर
अहम् न=मैं नहीं हूँ मा=मत
तदा=तब विमुञ्च=त्याग कर ॥
मोक्षः=मोक्ष है

भावार्थ ।

जब तक पुरुष में अहंकार बैठा है—'मैं ब्राह्मण हूँ', 'मैं ज्ञानी हूँ,' 'मैं त्यागी हूँ,' तब तक वह मुक्त कदापि नहीं हो सकता है । ऐसा भी कहा है—

यावत्स्यात्स्वस्य सम्बन्धोऽहंकारेण दुरात्मना ।
तावन्न लेशमात्रापि मुक्तिवार्ता विलक्षणा ॥ १ ॥

अर्थात् तब तक इस जीव का सम्बन्ध दुरात्मा अहंकारी