अनुरागसागर वाणी
Anuragsagar Vani
स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
ब्रह्मा को लेकर आद्य शक्ति व्याकुल हुई
ब्रह्मा को लेकर आद्य-शक्ति व्याकुल हुई
धर्मदास ने पूछा
कहे धरमनि यह संशय बीती । साहब कहहु ब्रह्मा की रीती ॥
पिता सीस तिन परसन कीन्हा । कि होय निरास पीछे पग दीन्हा ॥
धर्मदास जी ने साहिब से पूछा कि ब्रह्मा के साथ क्या हुआ ! क्या उसने पिता के शीश का स्पर्श किया या फिर निराश होकर लौट गया !
साहिब ने कहा
धर्मदास मुहि अति प्रिय अहहु । कहो सँदेस परखि दूढ़ गहहु ॥
चलत ब्रह्मा तब वार न लावा । पिता दरस कहँ अति मन भावा ॥
तेहि स्थान पहुँचिगै जाई । नहिं तहँ रबि ससि शून्य रहाई ॥
बहु विधि अस्तुत करे बनायी । ज्योति प्रभाव ध्यान तहँ लाई ॥
ऐसे बहु दिन गये बितायी । नहिं पायो ब्रह्मा दर्श पितायी ॥
शून्य ध्यान युग चार गमाना । पिता दरस अजहूँ नहिं पावा ॥
साहिब ने कहा—हे धरमदास ! तुम मुझे बहुत प्रिय हो, अब आगे की बात कहता हूँ, उसे जानो । कहा—ब्रह्मा के दिल में पिता के दर्शन की चाह थी, उसने जाते हुए समय नहीं लगाया । एक स्थान पर पहुँचा तो वहाँ सूर्य, चाँद आदि नहीं थे, शून्य स्थान था । वहाँ ब्रह्मा ध्यान लगाकर बैठ गया और पिता की बहुत भांति से स्तुति करने लगा । ऐसे मैं बहुत समय
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साहिब बन्दगी
व्यतीत हो गया, पर ब्रह्मा को पिता के दर्शन नहीं हुए। चार युग उसने ध्यान में गँवा दिये, पर दर्शन नहीं पा सका।
ब्रह्मा तात दरश नहीं पाया। शून्य ध्यान महँ बहु जाया ॥
माता चिन्ता करत मन माहाँ। जेठ पुत्र ब्रह्मा रहु काहाँ ॥
किहि विधि रचना रचहु बनाई। ब्रह्मा आवे कौन उपाई ॥
इधर शून्य में ध्यान मग्न ब्रह्मा को युग बीत गये, पर पिता का दर्शन न हुआ और उधर शक्ति को चिंता हुई कि उसका बड़ा बेटा कहाँ रह गया, क्योंकि सृष्टि की रचना जो करनी थी, सो उसने सोचा कि ब्रह्मा को कैसे बुलाया जाए!
सार शब्द सर्व से न्यारा, भेद न पावे कोई।
चार वेद में ब्रह्मा भूलें, आदि नाम न पाई॥