अनुरागसागर वाणी
Anuragsagar Vani
स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
त्रेतायुग में साहिब का आगमन
त्रेतायुग में साहिब का आगमन
सतयुग गयो त्रेता आवा । नाम मुनींद्र जीव समुझावा ॥
जब आयेउ जीवन उपदेशा । धर्मराय हित भयेउ अँदेशा ॥
इन भवसागर मोर उजारा । जिव लै जाहि पुरुष दरबारा ॥
परबस होय मौन सो गहिया । सोच विचार मनहिं मन रहिया ॥
सतयुग बीतने पर त्रेतायुग में साहिब मुनींद्र जी के नाम से भवसागर में विख्यात हुए, जब जीवों को उपदेश देने लगे तो निरंजन को संदेह हुआ कि यह मेरी दुनिया उजाड़ देंगे, हंसों को परम पुरुष के पास ले जायेंगे।
त्रेतायुग जबही पगु धारा । मृत्यु लोक कीन्हों पैसारा ॥
जीव अनेकन पूछा जाई । यम से को तुहि लेहि छुड़ाई ॥
कहें भरम वश जीव अयाना । हमरा करता पुरुष पुराना ॥
कोई विष्णु महेश की आस लगावें । कोई चण्डी देवी कहैं गावें ॥
जो ग्रासे जिव सेवैं ताही । अनचीन्है यम मुख में जाहीं ॥
जैसे ही त्रेतायुग आया तो साहिब पुनः मृत्यु लोक आए, आकर बहुतों से पूछा कि तुम्हें काल से कौन बचायेगा! तब कोई कहता कि विष्णु जी हमें काल से छुड़ायेंगे, कोई कहता कि शिवजी छुड़ायेंगे, कोई कहता कि चण्डी देवी जी छुड़ायेंगी। भ्रमवश जीव उसी की भक्ति कर रहे थे, जो भक्षण करने वाला था और बिना सत्य की पहचान किये सब काल के मुख में जा रहे थे।
चहुँ दिशि फिरि आयेउँ गढ़ लंका । भाट विचित्र मिल्यो निःसंका ॥
तिनि पुनि पूछेउ मुक्ति संदेशा । तासों कह्यो ज्ञान उपदेशा ॥
सुना विचित्र तबहि भ्रम भागा । अति अधीन है चरणन लागा ॥
कीजै मोहि कृतारथ आजू । मोरे जिवकर कीजे काजू ॥
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अनुरागसागर वाणी
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कह्यो ताहि आरति को लेखा । खेमसरिहि जस भाषेउ रेखा ॥
तृण तोर बीरा तिहि दीन्हा । ताकैं गृह में काहु न चीन्हा ॥
सुमिरन ध्यान ताहि सो भाखा । पुरुष डोर गाय नहिं राखा ॥
साहिब चारों दिशाओं में फिरकर लंका में आए तो विचित्र नाम का
भाट मिला, उसने साहिब की बात को समझा और अधीन होकर चरणों
पर गिर पड़ा, कहा कि मेरे जीव का आज कल्याण करो। तब साहिब ने
उसे नाम दिया और खेमसरी की भाँति आरती करना बताया, ध्यान
सुमिरन करना बताया।
तब विचित्र की स्त्री रानी मंदोदरी के पास गयी और कहा कि कोई
साधु आया है, बहुत सुंदर है, श्वेत वस्त्र धारण किए हैं। ऐसा साधु कभी
नहीं देखा। तब मंदोदरी आयी और देखकर चकित हुई, विनती की—
कहे मँदोदरी शुभ दिन मोरा । विनती करों दोई कर जोरा ॥
ऐसा तपसी कबहुँ न देखा । श्वेत अंग सब श्वेतहि भेखा ॥
हे समरथ मोहिं करहु सनाथा । भव बूढ़त गहि राखो हाथा ॥
तब मंदोदरी ने विनती की, कहा कि ऐसा तपस्वी तो कभी नहीं
देखा। वो प्रभावित हुई, कहा कि मुझे सनाथ करो, भवसागर में डुबने से
बचा लो।
सुनहु वधू प्रिय रावण केरी । नाम प्रताप कटे यम बेरी ॥
ज्ञान दृष्टि सो परखहु आई । खरा खोट तोहि देउँ चिन्हाई ॥
पुरुष अमान अंजर मनि सारा । सो तो तीन लोक ते न्यारा ॥
तेहि साहिब कहँ सुमिरे कोई । आवागमन रहित सो होई ॥
साहिब ने मंदोदरी से कहा कि नाम की ताकत से ही यम का बंधन
कट सकता है। ज्ञान दृष्टि से परखो, तुम्हें अच्छे बुरे की पहचान बताता
हूँ, जो सत्य पुरुष है, वो तीन लोक से न्यारा है, जो उस साहिब का
सुमिरन करता है, उसका आवागमन मिट जाता है।
सुनतहि शब्द तासु भ्रम भागा । गह्यो शब्द शुचि मन अनुरागा ॥
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साहिब बन्दगी
हे साहिब मोहि लीजे शरणा। मेटहु मोर जन्म अरु मरणा॥
दीन्हों ताहि पान परवाना। पुरुष डोर सौँप्यो सहिदाना॥
मंदोदरी ने जब साहिब के शब्द सुने तो उसका भ्रम दूर हो गया, उसका हृदय स्वच्छ हो गया और प्रेम उमड़ आया, उसने कहा—हे साहिब! मुझे अपनी शरण में लेकर जन्म मरण से दूर कर दो। तब साहिब ने उसे नाम दिया।
तब मैं रावण पहुँ चलि आओ। द्वारपाल सों वचन सुनायो॥
तोसों एक बात समुझाई। राजा कहँ तुम आव लिवाई॥
साहिब तब रावण के महल में पहुँचे और द्वारपाल से कहा कि रावण को संदेश दो कि कोई साधु आया है, आकर उसे महल में ले आओ।
द्वारपाल ने कहा
द्वारपाल तब विनती लाई। महा प्रचण्ड है रावण राई॥
महागर्व अरु क्रोध अपारा। कहों जाय मोहि पल में मारा॥
द्वारपाल ने कहा कि रावण बड़ा प्रचण्ड है, शक्तिशाली है, उसमें बड़ा क्रोध और अभिमान भी है, यदि उससे ऐसी बात कहूँगा तो मुझे वहीं मार देगा।
साहिब ने कहा
मानहु वचन जाव यहि बारा। रोम बंक नहिं होय तुम्हारा॥
सत्य वचन तुम हमरा मानो। रावण जाय तुरत तुम आनो॥
साहिब ने कहा कि तुम्हारा बाल भी बाँका नहीं होगा, मेरा वचन सत्य मानो और तुरंत रावण को यह संदेश देकर आओ।
ततक्षण गा प्रतिहार जनायी। द्वै कर जोरे ठाढ रहाई॥
सिद्ध एक तो हम पहुँ आई। तेकह राजहि लाव बुलाई॥
तभी द्वारपाल अन्दर गया और दोनों हाथ जोड़ रावण से कहा कि एक सिद्ध आया है, कहता है कि राजा रावण को बुलाओ।
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सुन नृप क्रोध कीन्ह तेहि बारा । मैं मति हीन आहि प्रतिहारा ॥
यहि मति ज्ञान हरोँ किन तोरा । जो तैं मोहि बुलावन दौरा ॥
दर्श मोर शिवसुत नहिं पावत । मैं कह भिक्षुक कहा बुलावत ॥
रावण ने क्रोधित हो कहा—हे द्वारपाल ! तेरी बुद्धि का किसने हरण कर लिया, जो तू मुझे बुलाने आया है, मेरा दर्शन शिवजी के पुत्र भी नहीं पा सकते, फिर तू मुझे कहने आया है कि भिक्षु बुला रहा है ।
रावण चला शस्त्र लै हाथा । तुरत जाय तिहि काटों माथा ॥
मारों ताहि सीस खसि परयी । देखों भुक्षुक मोर का करयी ॥
जहँ मुनीन्द्र तहँ रावण राई । सत्तर बार अस्त्र कर लाई ॥
लीन्ह मुनीन्द्र तृण कर ओटा । अति बल रावण मारै चोटा ॥
रावण ने क्रोध में आकर हाथ में तलवार ली, सोचा, अभी उसका शीश काट देता हूँ, देखता हूँ कि वो मेरा क्या करता है । रावण ने आकर 70 बार तलवार चलायी, पर साहिब एक तिनके पर उसका वार रोक देते थे । रावण ने बड़े बल का प्रयोग किया, पर कुछ न बना ।
तृण ओट यहि कारणे है , गर्व धारी राय हो ॥
तेही कारणे यह युक्ति कीन्ही, लाज रावण आय हो ॥
साहिब ने तिनके का सहारा इसलिए लिया, क्योंकि रावण बड़ा घमण्डी था, उसे शर्म आ सके , उसका घमण्ड चूर हो सके ।
रावण को अमान करि, तब अवध नगरहि आय ।
दशा संत की जान के , मधुकर पकरै पाय ॥
रावण का घमण्ड तोड़ फिर साहिब अवध में आए, वहाँ मधुकर ब्राह्मण मिला, वो साहिब के चरण पकड़ उन के अधीन हुआ ।
देख्यो ताहि बहु त लवलीना । तासों कह्यो ज्ञान को चीन्हा ॥
पुरुष संदेश कहेउ तिहिं पास । सुनत बचन जिय भयउ हुलासा ॥
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साहिब बन्दगी
साहिब ने उसका प्रेम देखा ते उसे परम पुरुष का ज्ञान दिया, जिसे सुन वो बहुत प्रसन्न हुआ।
अंबु मिलत अंकर सुख माना । तैसहिं मधुकर सब्दहिं जाना ॥
पुरुष भाव सुन तेहि हरषंता । मोकहैं लोक दिखावहु संता ॥
जैसे जल मिलने से अंकुर फूटकर मानो अपनी खुशी प्रकट कर देते हैं, ऐसे ही मधुकर साहिब के शब्द सुन प्रसन्न हो गया और कहने लगा कि मुझे वो लोक दिखाओ
राख्यो देह हंस लै धाये । अमर लोक लैं तिहिं पहुँचाये ॥
सोभा लोक देख हरषाना । तब मधुकर को मन पतियाना ॥
तब साहिब उसकी आत्मा को शरीर से निकाल अमर लोक गये। अमर लोक की सोभा को देख वो बड़ा प्रसन्न हुआ और उसे विश्वास हो गया।
इसके अतिरिक्त शृंगी ऋषि, वशिष्ठ मुनि, आदि सहित सात जीवों को साहिब ने त्रेता में तारा।
मधुकर जेते जीव, लोकहिं कीन्ह पयान ॥
तातैं नाम मुनीन्द्र कहि, जीव सत्त दान ॥