यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पूर्वार्ध सत्रहवां अध्याय
हम आज अपनी रक्षा के लिए वाचस्पति व विश्वकर्मा को आमंत्रित करते हैं.
हम आज अपनी रक्षा के लिए मन जैसे वेगवान को आमंत्रित करते हैं. आप सत्कर्म
करने वाले हैं. आप हमारे यज्ञ में हमारे द्वारा भेंट की गई हवि का प्रेम से भोग
लगाइए. ( २३ )
विश्वकर्मन् हविषा वर्धनेन त्रातारमिन्द्रमकृणोरवध्यम्.
तस्मै विशः समनमन्त पूर्वीरयमग्रो विहव्यो यथासत्.. ( २४ )
आप विश्व के रचयिता हैं. आप ने हवियों से इंद्र देव की बढ़ोत्तरी की. आप
ने इंद्र देव को संसार का रक्षक बनाया. आप ने इंद्र देव को अवध्य बनाया. इंद्र देव
को मन से नमस्कार करते हैं. हम उन्हें नम कर ( झुक कर ) नमस्कार करते हैं. इंद्र
देव अपूर्व, उग्र और सर्वसमर्थ हैं. ( २४ )
चक्षुषः पिता मनसा हि धीरो घृतमेने अजनन्नम्नमाने.
यदेदन्ता ऽ अददृहन्त पूर्व ऽ आदिद् द्यावापृथिवी अप्रथेताम्.. ( २५ )
हमारे पिता ( पूर्वजों ) ने सृष्टि के आरंभ में स्वर्गलोक तथा पृथ्वीलोक को सुदृढ़
बनाया. सृष्टि के आरंभ में उन का विस्तार किया. पिता ने चक्षु ( आंख ) आदि सभी
इंद्रियों का पालन किया. पिता ने धीर हो कर पृथ्वी को घी से सींचा. ( २५ )
विश्वकर्मा विमना ऽ आद्विहाया धाता विधाता परमोत सन्दृक्.
तेषामिष्टानि समिषा मदन्ति यत्रा सप्तऋषीन् पर ऽ एकमाहुः.. ( २६ )
जग की रचना में सृष्टि रचयिता के साथ सात ऋषियों ने अद्वितीय सहयोग
किया. वह परम शक्ति एक है. धाता है. विधाता है. पोषक है. सर्वश्रेष्ठ है. उन की
कृपा से सभी इष्ट कार्य पूर्ण होते हैं. वे हवि से प्रसन्न होते हैं. ( २६ )
यो नः पिता जनिता यो विधाता धामानि वेद भुवनानि विश्वा.
यो देवानां नामधा ऽ एक ऽ एव त १७ सम्प्रश्नं भुवना यन्त्यन्या.. ( २७ )
जो परमेश्वर हमारे पिता हैं, जो सब के जनक हैं, जो विधाता हैं, सब वेदों के
धाम हैं, सब विश्व के भुवनों के ज्ञाता हैं, जो देवताओं के नाम धारण करते हैं,
भले ही वे एक ही हैं, समस्त भुवन ( लोकों ) के प्राणी अंततः उन्हीं के लोक में
प्राप्त होते हैं. ( २७ )
त ऽ आयजन्त द्रविण १७ समस्मा ऽ ऋषयः पूर्वे जरितारो न भूना.
असूत्ते सूर्त्ते रजसि निषत्ते ये भूतानि समकृण्वन्निमानि.. ( २८ )
उस परमेश्वर ने सब को जना, सभी धनों को उपजाया. समस्त ऋषिगण जिस
की उपासना करते हैं. यज्ञ में संपूर्ण वैभव जिसे समर्पित करते हैं, वह परमेश्वर
अप्रत्यक्ष रूप से सब में निवास करता है. ( २८ )
यजुर्वेद - २११
पूर्वार्ध सत्रहवां अध्याय
परो दिवा पर ऽ एना पृथिव्या परो देवेभिरसुरैर्यदस्ति.
क १७ स्विद् गर्भं प्रथमं दध्र ऽ आपो यत्र देवाः समपश्यन्त पूर्वे.. (२९)
वह परम तत्त्व स्वर्गलोक से परे है. वह परम तत्त्व पृथ्वीलोक व देवताओं से
परे है. वह परम तत्त्व असुरों से परे है. जलों ने पहले गर्भ में किसे धारण किया ?
जहां देवगण पहले उन्हें देखते हैं. ( २९ )
तमिद्गर्भं प्रथमं दध्र ऽ आपो यत्र देवाः समगच्छन्त विश्वे.
अजस्य नाभावध्येकमर्पितं यस्मिन् विश्वानि भुवनानि तस्थुः.. (३०)
वह परम तत्त्व सभी देवताओं का आश्रय है. सभी उस परम तत्त्व को प्राप्त होते
हैं. उस परम तत्त्व ने सर्वप्रथम जल को अपने गर्भ में धारण किया. परमतत्त्व के
नाभि में एक ही परम तत्त्व अधिष्ठित है, जिस में सारे भुवन स्थिर होते हैं. ( ३० )
न तं विदाथ य ऽ इमा जजानान्यद्युष्माकमन्तरं बभूव.
नीहारेण प्रावृता जल्प्या चासुतृप ऽ उक्थशासश्चरन्ति.. (३१)
उस परम तत्त्व ने सर्वप्रथम ब्रह्मांड को रचा. उसे आप और हम लोग नहीं
जानते. वह सब में है भी तथा सब से अलग भी है. कोहरे से ढके बादल की तरह
लोग उस परम तत्त्व के बारे में विविध व्यर्थ धारणाओं ( भ्रांतियों ) से ग्रसित रहते
हैं. उस की स्तुति नहीं कर पाते. ( ३१ )
विश्वकर्मा ह्याजनिष्ट देव ऽ आदिद्गन्धर्वो अभवद् द्वितीयः.
तृतीयः पिता जनितौषधीनामपां गर्भं व्यदधात् पुरुत्रा.. (३२)
सर्वप्रथम विश्व का निर्माण करने वाले देवता पृथ्वी पर आए. तत्पश्चात पृथ्वी
पर आदि गंधर्व हुए. पृथ्वी पालक ओषधियों में जल उपजाने वाले तीसरे क्रम में
हुए. प्रथम रक्षक सभी जलों के गर्भ को विविध रूपों में धारता है. ( ३२ )
आशुः शिशानो वृषभो न भीमो घनाघनः क्षोभणश्चर्षणीनाम्.
संक्रन्दनो ऽ निमिषएकवीरः शत १७ सेना ऽ अजयत् साकमिन्द्रः.. (३३)
इंद्र देव शीघ्रता से शत्रुओं पर हमला करने वाले हैं. बैल जैसे बलवान हैं.
घनघोर गर्जना करने वाले हैं. शत्रुओं के लिए क्षोभकारी हैं. पल भर में शत्रुओं को
हराने वाले हैं. इंद्र देव अकेले ही ऐसे वीर हैं, जो सैकड़ों शत्रुओं की सेना को एक
साथ जीत लेते हैं. ( ३३ )
संक्रन्दनेनानिमिषेण जिष्णुना युत्कारेण दुश्च्यवनेन धृष्णुना.
तदिन्द्रेण जयत तत्सहध्वं युधो नर ऽ इषुहस्तेन वृष्णा.. (३४)
गर्जना से पल भर में शत्रुओं को जीतने वाले हैं. आक्रमण के विविध तरीकों
से शीघ्र ही युद्ध में तैयार होने वाले हैं. संगठित शत्रुओं को भी जीतने वाले हैं. इंद्र
२१२ - यजुर्वेद
पूर्वार्ध सत्रहवां अध्याय
पूर्वार्ध सत्रहवां अध्याय
देव से जुड़ कर हम उन के साथ साहसपूर्वक, बलपूर्वक हाथ में बाण ले कर
शत्रुओं को जीत जाएं. सुखपूर्वक जीवन गुजारें. ( ३४ )
स ऽ इषुहस्तैः स निष्षङ्गिभिर्वशी स १९ स्रष्टा स युध ऽ इन्द्रो गणेन.
स १९ सृष्टजित्सोमपा बाहुशर्ध्युग्रधन्वा प्रतिहिताभिरस्ता.. (३५)
इंद्र देव हाथ में बाणधारी हैं. वे वीरों को संगठित करने वाले, संगठित शत्रुओं
को भी जीतने वाले व सोमपायी हैं. शत्रु पर बाण प्रहरी, उग्र व धनुषधारी हैं. वे
हमारी रक्षा करने की कृपा करें. ( ३५ )
बृहस्पते परि दीया रथेन रक्षोहामित्राँ २ अपबाधमानः.
प्रभञ्जन्सेनाः प्रमृणो युधा जयन्नस्माकमेध्यविता रथानाम्.. (३६)
हे बृहस्पति देव! आप चारों ओर रथ से भ्रमण करते हैं. आप राक्षसों का
विनाश करने वाले और मित्रों की बाधाओं को दूर करने वाले हैं. युद्धों में
विनाश करने वालों को युद्ध में जीतते हुए हमारे रथों की रक्षा करने की कृपा
करें. ( ३६ )
बलविज्ञाय स्थविरः प्रवीरः सहस्वान् वाजी सहमान ऽ उग्रः.
अभिवीरो अभिसत्त्वा सहोजा जैत्रमिन्द्र रथमा तिष्ठ गोवित्.. (३७)
इंद्र देव बल के ज्ञाता, युद्ध में स्थिर, प्रकृष्ट ( अत्यंत ) वीर हैं. वे सामर्थ्यवान,
बलशाली, साहसी व वीर हैं. वे प्रसिद्ध बलशाली और शत्रुओं की भूमि जीतने वाले
हैं. आप सदैव जीतने वाले रथ पर सवार रहते हैं. ( ३७ )
गोत्रभिदं गोविदं वज्रबाहुं जयन्तमज्म प्रमृणन्तमोजसा.
इम १९ सजाता ऽ अनु वीरयध्वमिन्द्र १९ सखायो अनु स १९ रभध्वम्.. (३८)
हे देवगण! आप गो नाशकों का भेदन करने वाले, गौओं को जानने वाले,
वज्र जैसी भुजाओं वाले और जीतने वाले हैं. ओज से शत्रुओं के नाशक हैं. आप
इंद्र को वीरों के योग्य कार्यों के लिए उत्साह दिलाएं. आप स्वयं भी उन का
अनुकरण करें. हम इंद्र देव के सखा हैं. ( ३८ )
अभि गोत्राणि सहसा गाहमानोदयो वीरः शतमन्युरिन्द्रः.
दुश्च्यवनः पृतनाषाड्युध्योस्माक १९ सेना अवतु प्र युत्सु.. (३९)
इंद्र देव शत्रुओं को पूरी तरह नष्ट करने वाले, क्रोधी व शत्रुओं को पूरी तरह
हराने वाले हैं. वे हमारी सेना की रक्षा करें. वे हमारी सेना को पूरा संरक्षण प्रदान
करें. ( ३९ )
इन्द्र ऽ आसां नेता बृहस्पतिर्दक्षिणा यज्ञः पुर ऽ एतु सोमः.
देवसेनानामभिभञ्जतीनां जयन्तीनां मरुतो यन्त्वग्रम्.. (४०)
यजुर्वेद - २१३
पूर्वार्ध सत्रहवां अध्याय
इंद्र देव इन सब के नेता हैं. बृहस्पति और इंद्र दोनों देव सेना का नियंत्रण करते
हैं. सोम यज्ञ के सम्मुख रहते हैं. मरुद्गण सेना के आगेआगे रहते हैं. विष्णु दाहिनी
ओर रहते हैं. ( ४० )
इन्द्रस्य वृष्णो वरुणस्य राज ऽ आदित्यानां मरुता १४ शर्ध ऽ उग्रम्.
महामनसां भुवनच्यवानां घोषो देवानां जयतामुदस्थात्.. (४१)
इंद्र वरुण व राजा आदित्य देव की इच्छा के अनुसार वर्षा करते हैं. वे मरुद्गण
की इच्छा के अनुसार वर्षा करते हैं. महान् मन वाले लोकों में देवताओं का जयघोष
गूंजता है. ( ४१ )
उद्धर्षय मघवन्नायुधान्युत्सत्त्वनां मामकानां मना १४ सि.
उद्द्वृत्रहन् वाजिनां वाजिनान्युद्रथानां जयतां यन्तु घोषा:... (४२)
हे इंद्र देव! आप धनवान हैं. आप अपने आयुधों को तीखा कीजिए. वीरों को
व घोड़ों को शीघ्र जाने के लिए उत्साहित कीजिए. आप शत्रुनाशक व बलशाली
हैं. रथों के जयघोष सब ओर गूंजें. ( ४२ )
अस्माकमिन्द्रः समृतेषु ध्वजेष्वस्माकं या ऽ इषवस्ता जयन्तु.
अस्माकं वीरा ऽ उत्तरे भवन्त्वस्माँ २ उ देवा ऽ अवता हवेषु.. (४३)
हमारे इंद्र देव ध्वजों को अच्छी तरह फहराते हैं. हमारे शत्रुओं को जीतें. हमारे
बाण शत्रुओं को जीतें. हमारे वीर उत्तरोत्तर विजयी हों. देवगण यज्ञों में हमारी रक्षा
करें. ( ४३ )
अमीषां चित्तं प्रतिलोभयन्ती गृहाणाङ्गान्वप्वे परेहि.
अभि प्रेहि निर्दह हृत्सु शोकैरन्धेनामित्रास्तमसा सचन्ताम्.. (४४)
व्याधियां हमारे शत्रुओं के चित्त को लुभाएं. उन के अंगों को ग्रहण करें.
निर्दयता से शत्रुओं के चित्र को चबाएं. उन के हृदय में शोक व्यापे. शोक से शत्रु
गहन अंधकार में डूब जाएं. ( ४४ )
अवसृष्टा परा पत शरव्ये ब्रह्मसं १४ शिते.
गच्छामित्रान् प्र पद्यस्व मामीषां कं चनोच्छिषः... (४५)
ब्रह्मज्ञानमय वचनों से बाण तीखे हो कर अमित्रों पर गिरें. शत्रुओं पर प्रहार
करें. उन का उच्छेदन ( विनाश ) करें. ( ४५ )
प्रेता जयता नर ऽ इन्द्रो वः शर्म यच्छतु.
उग्रा वः सन्तु बाहवो ऽ नाधृष्या यथासथ.. (४६)
हे नरो! इंद्र देव विजयी हों और हमें सुख प्रदान करें. उन की बाहुएं उग्र हों,
जिस से वह शत्रुओं पर आक्रमण कर सकें. ( ४६ )
२१४ - यजुर्वेद
पूर्वाध सत्रहवां अध्याय
पूर्वाध सत्रहवां अध्याय
असौ या सेना मरुतः परेषामभ्यैति न ऽ ओजसा स्पर्धमाना.
तां गूह्त तमसापव्रतेन यथामी अन्यो अन्यं न जानन्.. (४७)
मरुतों की सेना हमारे वेग के साथ स्पर्द्धा करने वाले शत्रुओं तक पहुंचे, ताकि
भ्रम हो जाने के कारण एक दूसरे को जानने में ही असमर्थ हो जाएं तथा अपने ही
लोगों का नाश कर दें. ( ४७ )
यत्र बाणाः सम्पतन्ति कुमारा विशिखा ऽ इव.
तन्न ऽ इन्द्रो बृहस्पतिरदितिः शर्म यच्छतु विश्वाहा शर्म यच्छतु.. (४८)
जहां बाण ऐसे गिरे जैसे बिना चोटी वाले बालक गिरते हैं, वहां इंद्र देव हमें
सुख प्रदान करें. बृहस्पति देव हमें सुख प्रदान करें. अदिति देव हमें सुख प्रदान करें.
स्वामी देव हमें सुख प्रदान करें. ( ४८ )
मर्माणि ते वर्मणा छादयामि सोमस्त्वा राजामृतेनानुवस्ताम्.
उरोर्वरीयो वरुणस्ते कृणोतु जयन्तं त्वानु देवा मदन्तु.. (४९)
हम वीर अपने अंगों को कवच से ढकते हैं. वरुण देव इसे दृढ़ बनाए रखें.
सोम राजा हैं. वह सब को अमृत से अमर बनाएं. वरुण देव वरीय हैं. वह हमें विजयी
करें. देवगण उन्हें आनंदित करें. ( ४९ )
उदेनमुत्तरां नयाग्ने घृतेनाहुत. रायस्पोषेण स ᳪ सृज प्रजया च बहुं कृधि.. (५०)
हे अग्नि! हम यजमान आप के लिए घी से आहुति भेंट करते हैं. आप उस से
तृप्त होइए. आप हमें धन से पुष्ट कीजिए. हमारे लिए सुख प्रदान कीजिए. आप हमें
बहुत प्रजा ( पुत्रपौत्र ) से समृद्ध कीजिए. ( ५० )
इन्द्रेमं प्रतरां नय सजातानामसद्वशी.
समेनं वर्चसा सृज देवानां भागदा ऽ असत्.. (५१)
हे इंद्र देव! आप हमें उत्कृष्टता की ओर ले जाइए. आप हमारे सजातियों को
हमारे वश में कीजिए. आप हमें समान वर्चस्वी और देवताओं को उन का भाग देने
में समर्थ बनाइए. ( ५१ )
यस्य कुर्मो गृहे हविस्तमग्ने वर्धया त्वम्.
तस्मै देवा ऽ अधि ब्रुवन्नयं च ब्रह्मणस्पतिः.. (५२)
हे अग्नि! हम जिस के घर पर यज्ञ कर्म करते हैं, उन को हवि प्रदान करते हैं,
आप उस की बढ़ोतरी करने की कृपा कीजिए. सभी देवता उस का वर्चस्व स्वीकारें.
सभी ब्रह्मज्ञान के स्वामी हो जाएं. ( ५२ )
उदु त्वा विश्वे देवा ऽ अग्ने भरन्तु चित्तिभिः.
स नो भव शिवस्त्व ᳪ सुप्रतीको विभावसुः.. (५३)
यजुर्वेद - २१५
पूर्वार्ध सत्रहवां अध्याय
हे अग्नि! सभी देवगण मन से आप का भरपूर विस्तार करने की कृपा करें.
आप हमारा कल्याण करें. आप हमें वैभववान बनाइए. ( ५३ )
पञ्च दिशो दैवीर्यज्ञमवन्तु देवीरपामतिं दुर्मतिं बाधमाना:.
रायस्पोषे यज्ञपतिमाभजन्ती रायस्पोषे अधि यज्ञो अस्थात्.. (५४)
पांचों दिशाएं इस दैवीय यज्ञ की रक्षा करें व यजमान की मंदबुद्धि दूर करें.
पांचों दिशाएं यजमान की दुर्मति दूर करें. यज्ञपति को धन से पोसें. यज्ञपति को
यशस्वी धन से पोसें. यज्ञ में अधिष्ठित होने की कृपा करें. ( ५४ )
समिद्धे अग्नावधि मामहान ऽ उक्थपत्र ऽ ईड्यो गृभीतः.
तप्तं घर्मं परिगृह्यायजन्तोजां यद्यज्ञमयजन्त देवाः.. (५५)
यजमान समिधा से अग्नि को प्रदीप्त करते हैं. घी से भरी आहुति अग्नि को
प्रदान करते हैं. महान उक्थों ( स्तोत्रों ) से यज्ञ को सिद्ध किया जाता है. ( ५५ )
दैव्याय धर्त्रे जोष्ट्रे देवश्रीः श्रीमनाः शतपयाः.
परिगृह्य देवा यज्ञमायन् देवा देवेभ्यो अध्वर्यन्तो अस्थुः.. (५६)
सैकड़ों लोग देवताओं की दिव्यता तथा शोभा पाने के लिए यज्ञ करते हैं. देवों
को यज्ञ में बुला कर अध्वर्यु यज्ञ करते हैं. उन के धाम को प्राप्त होते हैं. ( ५६ )
वीत १४ हविः शमित १४ शमिता यजद्ध्ये तुरीयो यज्ञो यत्र हव्यमेति.
ततो वाका ऽ आशिषो नो जुषन्ताम्.. (५७)
यजमान शांत मन से शांत हवियों वाला यज्ञ करते हैं. यह यज्ञ तुरीय ( चौथा
एवं उत्तम ) कहा जाता है. यज्ञ के वाणीमय आशीष तन हमारी इच्छा के अनुकूल
फलीभूत होते हैं. ( ५७ )
सूर्यरश्मिर्हरिकेशः पुरस्तात्सविता ज्योतिरुदयाँ २ अजस्रम्.
तस्य पूषा प्रसवे याति विद्वान्सम्पश्यन्विश्वा भुवनानि गोपाः.. (५८)
हरे केशों वाली और सम्मुख स्थित सविता देव की रश्मियां उन के उदय होने
से पूर्व ही प्रकट हो जाती हैं. अजस्र ( लगातार ) ज्योति प्रवाहित होने लगती है.
सूर्य का प्रसव ( उदय ) होते ही विद्वान् समस्त भुवनों को देखने में समर्थ हो जाते
हैं. ( ५८ )
विमान ऽ एष दिवो मध्य ऽ आस्त ऽ आपप्रिवान् रोदसी अन्तरिक्षम्.
स विश्वाचीरभि चष्टे घृताचीरन्तरा पूर्वमपरं च केतुम्.. (५९)
सूर्य जगत् को रचने में समर्थ हैं. यह सूर्य मध्यलोक, पृथ्वीलोक तथा
अंतरिक्षलोक—तीनों लोकों को अपनी दीप्ति से पूरी तरह भर देते हैं ( प्रकाशित
२१६ - यजुर्वेद
पूर्वार्ध सत्रहवां अध्याय
कर देते हैं )। सारे विश्व को अपने आश्रय में रखते हैं. सभी जलों को धारते हैं.
सर्वद्रष्टा हैं. पूर्व और पश्चात के सभी मनोभावों को जानते हैं. ( ५९ )
उक्षा समुद्रो अरुणः सुपर्णः पूर्वस्य योनिं पितुराविवेश.
मध्ये दिवो निहितः पृश्निरश्मा विचक्रमे रजसस्पत्यन्तौ.. (६०)
सूर्य वर्षा द्वारा समुद्र को सींचते हैं. वे समुद्र को धारते हैं. उन का मूल स्थान
पूर्व दिशा है. वे अंतरिक्ष में निरंतर भ्रमणशील व स्वर्गलोक के बीच निहित रहते हैं.
वे रज की रक्षा करते हैं. वे अद्भुत रश्मियों वाले और सर्वत्र भ्रमणशील हैं. ( ६० )
इन्द्रं विश्वा ऽ अवीवृधन्त्समुद्रव्यचसं गिरः.
रथीतम १४ रथीनां वाजाना १४ सत्पतिं पतिम्.. (६१)
सभी प्रार्थनाएं इंद्र देव को बढ़ोतरी प्रदान करती हैं. आप समुद्र की तरह
विस्तृत, उत्तम रथी, अन्न के स्वामी व पालकों में श्रेष्ठ पालक हैं. ( ६१ )
देवहूर्यज्ञ ऽ आ च वक्षत्सुम्नहूर्यज्ञ ऽ आ च वक्षत्.
यक्षदग्निर्देवो देवाँ २ आ च वक्षत्.. (६२)
यह यज्ञ देवताओं का आह्वान करने वाला है. यह यज्ञ देवताओं के लिए अच्छे
मन से हवि वहन करें, देवताओं को सभी सुख प्रदान करे और देवताओं को
अधिष्ठित करे. ( ६२ )
वाजस्य मा प्रसव ऽ उद्ग्राभेणोदग्रभीत्.
अधा सपत्नानिन्र्दो मे निग्राभेणाधराँ २ अकः.. (६३)
हे इंद्र देव! आप हमारे लिए अन्न उत्पादक हैं. आप हमारा उच्च मार्ग प्रशस्त
कीजिए. आप हमारे शत्रुओं को नीचे मार्ग पर पहुंचाइए. उन्हें अधोगति प्रदान
कीजिए. ( ६३ )
उद्ग्राभं च निग्राभं च ब्रह्म देवा ऽ अवीवृधन्.
अधा सपत्नानिन्द्राग्नी मे विषूचीनानव्यस्यताम्.. (६४)
हे इंद्र देव! हे अग्नि! आप ब्रह्मज्ञान की बढ़ोतरी कीजिए. आप श्रेष्ठ कर्म
करने वालों का उच्च मार्ग प्रशस्त कीजिए. आप हमारे शत्रुओं का सर्वनाश
कीजिए. ( ६४ )
क्रमध्वमग्निना नाकमुख्य १४ हस्तेषु बिभ्रतः.
दिवस्पृष्ठ १४ स्वर्गात्वा मिश्रा देवेभिराध्वम्.. (६५)
यजमान अग्नि से श्रेष्ठ व स्वर्गिक सुख पाएं. हाथ में उखा शोभित हों.
देवताओं के साथ दिव्यलोक में जाकर स्वर्गिक सुख अनुभव करें. ( ६५ )
यजुर्वेद - २१७
पूर्वार्ध सत्रहवां अध्याय
प्राचीमनु प्रदिशं प्रेहि विद्वानग्नेरग्ने पुरो अग्निर्भवेह.
विश्वा ऽ आशा दीद्यानो वि भाह्यूर्जं नो धेहि द्विपदे चतुष्पदे.. (६६)
हे अग्नि! आप पूर्व दिशा का अनुकरण कीजिए. आप अग्रगामी होइए. आप
सब का नेतृत्व कीजिए. आप विद्वान् और सब की आस हैं. आप अपनी चमकीली
लपटों से सभी दिशाओं को चमकाइए. आप दोपायों तथा चौपायों सभी के लिए
बल धारिए. ( ६६ )
पृथिव्या ऽ अहमुदन्तरिक्षमारुहमन्तरिक्षाद्दिवमारुहम्.
दिवो नाकस्य पृष्ठात् स्वर्ज्योतिरगामहम्.. (६७)
हम पृथ्वि से उच्च अंतरिक्षलोक में चढ़ते हैं. हम उच्च अंतरिक्षलोक से
स्वर्गलोक में चढ़ते हैं. स्वर्गलोक से सूर्यलोक की ज्योति को प्राप्त होते हैं. ( ६७ )
स्वर्यन्तो नापेक्षन्त ऽ आ द्या ᳪ रोहन्ति रोदसी.
यज्ञं ये विश्वतोधार ᳪ सुविद्वा ᳪ सो वितेनिरे.. (६८)
जो सुखदायी स्वर्ग के सुख भोगते हैं, वे सांसारिक भोगों की अपेक्षा नहीं
करते. वे यज्ञ के धारक वे श्रेष्ठ विद्वान् हैं. वे अपना उज्ज्वल यश फैलाते हैं. वे
स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक से ऊपर आरोहण करते हैं. ( ६८ )
अग्ने प्रेहि प्रथमो देवयतां चक्षुर्देवानामुत मर्त्यानाम्.
इयक्षमाणा भृगुभिः सजोषोः स्वर्यन्तु यजमानाः स्वस्ति.. (६९)
हे अग्नि! आप प्रथम प्रार्थित हैं. आप मनुष्यों और देवताओं के चक्षु स्वरूप
और सब के पथ प्रदर्शक हैं. यज्ञ के इच्छुकों के पापनाशक हैं. आप ऐसे यजमानों
को अपनी ज्योति से प्रकाशित करते हैं. उन का कल्याण करते हैं. ( ६९ )
नक्तोषासा समनसा विरूपे धापयेते शिशुमेक ᳪ समीची.
द्यावाक्षामा रुक्मो अन्तर्विभाति देवा ऽ अग्निं धारयन् द्रविणोदाः.. (७०)
हे अग्नि! आप रात्रिकाल तथा उषस काल में समान रूप से सुशोभित होते
हैं. आप विभिन्न रूप धारते हैं. आप उपयुक्त शिशु के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त हैं.
आप पृथ्वीलोक और स्वर्गलोक के बीच में शोभते हैं. आप धनदाता व वैभवधारी
हैं. ( ७० )
अग्ने सहस्राक्ष शतमूर्धञ्छतं ते प्राणाः सहस्रं व्यानाः.
त्व ᳪ साहस्रस्य राय ऽ ईशिषे तस्मै ते विधेम वाजाय स्वाहा.. (७१)
हे अग्नि! आप हजार आंखों, सौ मूर्धा, सौ प्राण वाले हैं. आप हजार प्राण वाले
व हजार धन वाले हैं. आप हमारे स्वामी हैं. हम आप के लिए अन्नमय आहुति भेंट
करते हैं. आप के लिए स्वाहा. ( ७१ )
२१८ - यजुर्वेद
पूर्वार्ध सत्रहवां अध्याय
सुपर्णो ऽ सि गरुत्मान् पृष्ठे पृथिव्याः सीद.
भासा ऽ न्तरिक्षमापृण ज्योतिषा दिवमुत्तभान तेजसा दिश ऽ उद्दृ ष्य ह.. (७२)
हे अग्नि! आप सुंदर पंख वाले गरुड़ स्वरूप हैं. आप पृथ्वी तल पर अधिष्ठित
होने की कृपा कीजिए. आप अंतरिक्ष को अपनी कांति से पूर्ण करते हैं. आप अपनी
ज्योति से स्वर्गलोक को उत्कृष्टता प्रदान करें. आप अपने तेज से दिशाओं को
सुदृढ़ता व उत्कृष्टता प्रदान करें. ( ७२ )
आजुह्वानः सुप्रतीकः पुरस्तादग्ने स्वं योनिमा सीद साधुया.
अस्मिन्त्सधस्थे अध्युत्तरस्मिन्विश्वे देवा यजमानश्च सीदत.. (७३)
हे अग्नि! हम बहुत नम्रतापूर्वक आप का आह्वान करते हैं. आप हमारे सम्मुख
पधारने व मूल स्थान पर सज्जनता से विराजने की कृपा कीजिए. आप इस यज्ञ में
अधिष्ठित होने की कृपा कीजिए. आप सभी यजमानों के साथ इस यज्ञ में होने व
विराजने की कृपा कीजिए. ( ७३ )
ता ष्य सवितुर्वरेण्यस्य चित्रामाहं वृणे सुमतिं विश्वजन्याम्.
यामस्य कण्वो अदुहत्प्रपीना ष्य सहस्रधारां पयसा महीं गाम्.. (७४)
सविता देव! आप वरेण्य व अद्भुत हैं. हम आप का वरण करते हैं. आप विश्व
के जन्मदाता हैं. कण्व ऋषि ने सविता देव की किरणें धारण करने वाली हजारों
धाराओं से गाय को दुहा. हम आप की सुमति को स्वीकार करते हैं. ( ७४ )
विधेम ते परमे जन्मन्नग्ने विधेम स्तोमैरवरे सधस्थे.
यस्माद्योनेरुदारिथा यजे तं प्र त्वे हवी ष्य षि जुहुरे समिद्धे.. (७५)
हे अग्नि! आप ने परम स्थान पर जन्म लिया है. हम आप के लिए स्तुतियों का
विधान करते हैं. आप श्रेष्ठ स्थान पर विराजमान हैं. आप जिस मूल स्थान से प्रकट
होते हैं. उसे यज्ञ के अनुकूल बनाते हैं. हम समिधाओं से आप के लिए आहुतियां
समर्पित करते हैं. ( ७५ )
प्रेद्धो अग्ने दीदिहि पुरो नो ऽ जस्रया सूर्म्या यविष्ठ.
त्वा ष्य शश्वन्त उपयन्ति वाजाः.. (७६)
हे अग्नि! आप प्रदीप्त व हमारे सम्मुख दीप्तिमान होने की कृपा कीजिए. आप यज्ञ
में अधिष्ठित व लगातार यज्ञ में अधिष्ठित होने की कृपा कीजिए. आप हमें लगातार अपना
प्रकाश प्रदान कीजिए. हम आप को शाश्वत अन्नमय आहुति प्रदान करते हैं. ( ७६ )
अग्ने तमद्याश्वं न स्तोमैः क्रतुं न भद्र ष्य हृदिस्पृशम्. ऋध्यामात ऽ ओहैः.. (७७)
हे अग्नि! हम हृदयस्पर्शी स्तोत्रों से आप के घोड़ों को कल्याणकारी यज्ञ के
लिए संवर्धित करते हैं. ( ७७ )
यजुर्वेद - २१९
पूर्वार्ध सत्रहवां अध्याय
पूर्वार्ध सत्रहवां अध्याय
चित्तिं जुहोमि मनसा घृतेन यथा देवा ऽ इहागमन्वीतिहोत्रा ऽ ऋतावृधः.
पत्ये विश्वस्य भूमनो जुहोमि विश्वकर्मणे विश्वाहादाभ्यं ४५ हविः.. (७८)
हम चित्त से यज्ञ करते हैं. हम मन से घी की आहुति भेंट करते हैं. देवगण इस
यज्ञ में आने व सत्य की बढ़ोतरी करने की कृपा करें. देवगण विश्वपति, विश्व के
रचयिता, विश्वकर्मा व विश्व के संतापहर्ता हैं. हम उन के लिए हवि प्रदान करते
हैं. ( ७८ )
सप्त ते अग्ने समिधः सप्त जिह्वाः सप्त ऋषयः सप्त धाम प्रियाणि.
सप्त होत्राः सप्तधा त्वा यजन्ति सप्त योनीरापृणस्व घृतेन स्वाहा.. (७९)
हे अग्नि! आप की सात समिधाएं, सात जिह्वाएं व आप के सात ऋषि हैं. आप
के सात प्रिय धाम व सात होता हैं. वे आप का सात प्रकार से यजन करते हैं. आप
के सात मूल उत्पत्ति स्थान हैं. हम घी से आप के प्रति आहुति अर्पित करते हैं. ( ७९ )
शुक्रज्योतिश्च चित्रज्योतिश्च सत्यज्योतिश्च ज्योतिष्माँश्च.
शुक्रश्च ऋतपाश्चात्य ४५ हा:... (८०)
आप चमकीले, अद्भुत ज्योति वाले हैं. आप सत्य रूप ज्योति वाले और
ज्योतिष्मान हैं. चमकीले सत्य स्वरूप पश्चिम दिशा वाले मरुत् देव हेतु यह आहुति
अर्पित है. ( ८० )
ईदृङ् चान्यादृङ् च सदृङ् च प्रतिसदृङ् च. मितश्च सम्मितश्च सभरा:... (८१)
यज्ञ में अर्पित हवि को इस तरह देखने वाले, अन्य दृष्टि से देखने वाले, समान
दृष्टि से देखने वाले व सम्मिलित दृष्टि से देखने वाले मरुद्गण हेतु यह आहुति
अर्पित है. ( ८१ )
ऋतश्च सत्यश्च ध्रुवश्च धरुणश्च. धर्त्ता च विधर्त्ता च विधारय:... (८२)
मरुद्गण सत्य, सत्यवान, ध्रुव, धारक, धर्ता व विधर्ता हैं. वे देव हमारे यज्ञ
को विशेष रूप से धारने की कृपा करें. ( ८२ )
ऋतजिच्च सत्यजिच्च सेनजिच्च सुषेणश्च. अन्तिमित्रश्च दूरे अमित्रश्च गण:... (८३)
शुद्धस्वरूप, सत्यरूप, शत्रु सेनाओं के विजेता, श्रेष्ठ सेनाओं वाले, मित्रों के
समीप रहने वाले, शत्रुओं को दूर हटाने वाले तथा संघबद्ध रहने वाले ये मरुद्गण
हमारे इस यज्ञ में पधारें. उन के लिए यह आहुति अर्पित है. ( ८३ )
ईदृक्षास ऽ एतादृक्षास ऽ ऊ षु णः सदृक्षासः प्रतिसदृक्षास ऽ एतन.
मितासश्च सम्मितासो नो अद्य सभरसो मरुतो यज्ञे अस्मिन्.. (८४)
हे मरुद्गण! आप विविध कोणों से देखने वाले, समान कोण से देखने वाले,
२२० - यजुर्वेद
पूर्वार्ध सत्रहवां अध्याय
प्रत्येक समान कोण से देखने वाले मिश्रित कोण से देखने वाले, समान प्रकार के
मिश्रित कोण से देखने वाले तथा समान अलंकारों के धारक हैं. आप आज हमारे
इस यज्ञ में पधारें. आप के निर्मित यह आहुति अर्पित है. (८४)
स्वतवाँश्च प्रघासी च सान्तपनश्च गृहमेधी च. क्रीडी च शाकी चोज्जेषी.. (८५)
आप स्वयं अर्जित तप बल पूर्ण पुरोडाश का सेवन करते हैं. आप शत्रुओं
को संताप देने वाले, गृहस्थ धर्म के पालक, क्रीड़ाशाली, बलवान व विजयशील
हैं. (८५)
इन्द्रं दैवींर्विशो मरुतोन्वर्तमानो ऽभवन्यथेन्द्रं दैवींर्विशो मरुतोन्वर्तमानो ऽभवन्.
एवमिमं यजमानं दैवीश्च विशो मानुषीश्चानुवर्त्मानो भवन्तु.. (८६)
मरुद्गण की सेना इंद्र देव का अनुकरण करती है. वह इंद्र देव की प्रजा जैसी
है व इंद्र देव के पथ का अनुकरण करती है. वैसे ही सभी दैवीय गुण मनुष्यों का
अनुकरण करें. वैसे ही सभी प्रजा मनुष्यों का अनुकरण करें. (८६)
इम २४ स्तनमूर्जस्वन्तं धयापां प्रपीनमग्ने सरिरस्य मध्ये.
उत्सं जुषस्व मधुमन्तमर्वन्त्समुद्रिय २४ सदनमा विशस्व.. (८७)
हे अग्नि! आप ऊर्जस्वी स्तन व घी से भरे स्रुक का प्रेम से पान करें. आप उस
से तृप्त होने की कृपा करें. वह मधुर हैं. आप इस समुद्र सदन में प्रवेश करने की
कृपा करें. (८७)
घृतं मिमिक्षे घृतमस्य योनिर्घृते श्रितो घृतम्वस्य धाम.
अनुष्वधमावह मादयस्व स्वाहाकृतं वृषभ वक्षि हव्यम्.. (८८)
हम घी को अग्नि के मुख में समर्पित करना चाहते हैं. यह अग्नि का मूल स्थान
है. अग्नि घृत पर अश्रित हैं. वह अग्नि का धाम हैं. हे अध्वर्यु! आप अग्नि के लिए
हवि प्रदान कीजिए. उन्हें हवि से मदमस्त बनाइए. उन्हें हवि से बलवान बनाइए. अग्नि
से अनुरोध है कि वह हवि को निर्धारित देव तक पहुंचाने की कृपा करें. (८८)
समुद्रादूर्मिर्मधुमाँ २ उदारदुपा २४ शुना सममृतत्वमानट्.
घृतस्य नाम गुह्यं यदस्ति जिह्वा देवानाममृतस्य नाभिः.. (८९)
घी जैसा समुद्र है. उस में मधुर लहरें उमड़ रही हैं. ये लहरें अग्नि से एकमेक
हो जाती हैं. घी का जो गुप्त नाम है, वह देवों की जिह्वा है. गुप्त नाम अमृत की
नाभि है. (८९)
वयं नाम प्र ब्रवामा घृतस्यास्मिन् यज्ञे धारयामा नमोभिः.
उप ब्रह्मा शृणवच्छस्यमानं चतुः शृङ्गो ऽ वमीद्गौर ऽ एतत्.. (९०)
यजुर्वेद - २२१
पूर्वार्ध सत्रहवां अध्याय
हम इस यज्ञ में घी के नाम को धारण करते हैं. बारबार बोलते हैं. हम यज्ञ में
घी के नाम को नमस्कारपूर्वक धारण करते हैं. बारबार बोलते हैं. ब्रह्मा इस यज्ञ में
इस नाम को पास से सुनने की कृपा करें. चार सींगों ( होता रूपी ) वाला घी इस
यज्ञ के फल को प्रदान करने की कृपा करे. ( ९० )
चत्वारि शृङ्गा त्रयो अस्य पादा द्वे शीर्षे सप्त हस्तासो अस्य.
त्रिधा बद्धो वृषभो रोरवीति महो देवो मर्त्याँ २ आविवेश.. (९१)
इस यज्ञ के चार सींग ( पुरोहित रूपी ), तीन पैर ( तीन वेद रूपी ), दो सिर
( हवि प्रवर्ग्य ) व सात हाथ ( सात छंद रूपी ) हैं. यह यज्ञ तीन प्रकार की संध्याओं
में बंधा हुआ, महान् शब्द करने वाला व मनुष्यों का महान् देव है. इस यज्ञ के
मनुष्यलोक में अधिष्ठित हैं. ( ९१ )
त्रिधा हितं पणिभिर्गुह्यमानं गवि देवासो घृतमन्वविन्दन्.
इन्द्र ऽ एक १४ सूर्य ऽ एकं जजान वेनादेक १४ स्वधया निष्टतक्षुः.. (९२)
असुरों से छिपा कर रखे हुए घी को देवताओं ने तीन प्रकार से गायों से प्राप्त कर
लिया. एक प्रकार से ( एक भाग ) इंद्र देव के लिए जना. दूसरे प्रकार से ( दूसरा भाग )
सूर्य के लिए जना. तीसरे प्रकार से ( तीसरा भाग ) ब्राह्मणों के लिए जना. ( ९२ )
एता ऽ अर्षन्ति हृद्यात्समुद्राच्छतव्रजा रिपुणा नावचक्षे.
घृतस्य धारा ऽ अभि चाकशीमि हिरण्ययो वेतसो मध्य ऽ आसाम्.. (९३)
जैसे हृदय रूपी समुद्र से भावों की धाराएं फूटती हैं, दुश्मन इन धाराओं को
देख नहीं सकता, वैसे ही इस यज्ञ में घी की धाराएं फूटती हैं. इन धाराओं के बीच
विद्यमान अग्नि को हम सब ओर से देखते हैं. ( ९३ )
सम्यक् स्रवन्ति सरितो न धेना ऽ अन्तर्हृदा मनसा पूयमानाः.
एते अर्षन्त्युर्मयो घृतस्य मृगा ऽ इव क्षिपणोरीषमाणाः.. (९४)
जैसे सम्यक् रूप से नदी बहती है, वैसे ही हमारे अंतःहृदय से पवित्र की जाती
हुई वाणी स्रवित होती है. ये वाणियां घी की तरंगों की तरह हैं. यज्ञ की ओर शिकारी
से डरे हुए हिरण की तरह भागती हैं. ( ९४ )
सिन्धोरिव प्राध्वने शूघनासो वातप्रमियः पतयन्ति यह्वाः.
घृतस्य धारा ऽ अरुषो न वाजी काष्ठा भिन्दन्नूर्मिभिः पिन्वमानः.. (९५)
जैसे समुद्र में वायु के वेग से नदियों की धाराएं मिलती हैं, वैसे ही घी की
धाराएं तीव्र वेग से यज्ञ की अग्नि में गिरती हैं. जैसे बलवान घोड़ा शत्रुओं की सेना
को बेध देता है और पसीने से पृथ्वी को सींचता हुआ प्रस्थान करता है, वैसे ही घी
की धाराएं पृथ्वी को सींचती हैं. ( ९५ )
२२२ - यजुर्वेद
पूर्वार्ध सत्रहवां अध्याय
अभि प्रवन्त समनेव योषाः कल्याण्यः स्मयमानासो अग्निम्.
घृतस्य धाराः समिधो नसन्त ता जुषाणो हर्यति जातवेदाः.. (९६)
जैसे समान मन वाली सुंदर स्त्रियां खुश होती हुई अपने पति के पास जाती हैं,
वैसे ही घी की धाराएं प्रदीप्त करती हुई अग्नि को प्राप्त होती हैं. अग्नि को व्यापक
बनाती हैं. घी की धाराएं सर्वज्ञ अग्नि को प्राप्त होती हैं. अग्नि निरंतर उन धाराओं
की कामना करते हैं. ( ९६ )
कन्या ऽ इव वहतुमेतवा ऽ उ अञ्ज्यञ्जाना ऽ अभि चाकशीमि.
यत्र सोमः सूयते यत्र यज्ञो घृतस्य धारा ऽ अभि तत्पवन्ते.. (९७)
जैसे सुंदर कन्या रूप वहन करती हुई स्वयंवर में वर के पास पहुंचती है,
वैसे ही जहां सोमरस निचोड़ा जाता है, यज्ञ किया जाता है, वहां घी की धाराएं
जाती हैं. ( ९७ )
अभ्यर्षत सुष्टुतिं गव्यमाजिमस्मासु भद्रा द्रविणानि धत्त.
इमं यज्ञं नयत देवता नो घृतस्य धारा मधुमत्पवन्ते.. (९८)
हे देवताओ! यह यज्ञ घी से सिंचित है. श्रेष्ठ स्तुतियुक्त है. जिस यज्ञ में मधुर
स्वाद वाली घी की कल्याणमयी धाराएं गिरती हैं, आप ऐसी घृतमयी मधुर
आहुतियों को यज्ञ से देवलोक तक पहुंचाने की कृपा कीजिए. ( ९८ )
धामं ते विश्वं भुवनमधि श्रितमन्तः समुद्रे हृद्यन्तरायुषि.
अपामनीके समिथे य ऽ आभृतस्तमश्याम मधुमन्तं त ऽ ऊर्मिम्.. (९९)
हे अग्नि! सभी लोक आप के धाम हैं. आप सब लोकों के आश्रय हैं. समुद्र
के हृदय में आप का श्रेष्ठ रूप उपस्थित है. हम आप के मधुर लहरदार रूप को
पा सकें. ( ९९ )
यजुर्वेद - २२३
अठारहवां अध्याय
अठारहवां अध्याय
वाजश्च मे प्रसवश्च मे प्रयतिश्च मे प्रसितिश्च मे धीतिश्च मे क्रतुश्च मे स्वरश्च मे
श्लोकश्च मे श्रवश्च मे श्रुतिश्च मे ज्योतिश्च मे स्वश्च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्.. (१)
यह यज्ञ हमारे लिए अन्नदाता हो. यह यज्ञ हमारे लिए ऐश्वर्यदाता हो. यह यज्ञ
हमारे लिए पौरुष हो. यह यज्ञ हमारे लिए प्रबंधकौशल हो. यह यज्ञ हमारे लिए बुद्धि
हो. यह यज्ञ हमारे लिए निर्णय क्षमता हो. यह यज्ञ हमारे लिए करने की शक्ति हो.
यह यज्ञ हमारे लिए श्लोक हो. यह यज्ञ हमारे लिए श्रवणक्षमता हो. यह यज्ञ हमारे
लिए तेजदाता हो. सर्वविधि फलीभूत हो. (१)
प्राणश्च मेपानश्च मे व्यानश्च मेसुश्च मे चित्तं च म ऽ आधीतं च मे वाक् च मे
मनश्च मे चक्षुश्च मे श्रोत्रं च मे दक्षश्च मे बलं च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्.. (२)
यह यज्ञ हमें प्राण दे. यह यज्ञ हमें अपान दे. यह यज्ञ हमें व्यान दे. यह यज्ञ हमें
मुख्य प्राण दे. यह यज्ञ हमें चिंतन दे. यह यज्ञ हमें वाणी दे. यह यज्ञ हमें नेत्र दे. यह
यज्ञ हमें कान दे. यह यज्ञ हमें दक्षता दे. यह यज्ञ हमें बल दे. यह यज्ञ सर्वविधि
फलीभूत हो. (२)
ओजश्च मे सहश्च म ऽ आत्मा च मे तनूश्च मे शर्म च मे वर्म च मेङ्गानि च मेस्थीनि
च मे परूंषि च मे शरीराणि च म ऽ आयुश्च मे जरा च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्.. (३)
इस यज्ञ से हमारा ओज फलीभूत हो. इस यज्ञ से हमारी सहिष्णुता फलीभूत
हो. इस यज्ञ से हमारा आत्मबल फलीभूत हो. इस यज्ञ से हमारा दैहिकबल फलीभूत
हो. इस यज्ञ से हमारा सुख फलीभूत हो. इस यज्ञ से हमारा कवच फलीभूत हो. इस
यज्ञ से हमारी अस्थियों की दृढ़ता फलीभूत हो. इस यज्ञ से हमारी संधियों की दृढ़ता
फलीभूत हो. इस यज्ञ से हमारी निरोगता फलीभूत हो. इस यज्ञ से हमारी आयु
फलीभूत हो. इस यज्ञ से हमारी परिपक्वता फलीभूत हो. (३)
ज्यैष्ठ्यं च म ऽ आधिपत्यं च मे मन्युश्च मे भामश्च मेमश्च मेम्भश्च मे जेमा च मे
महिमा च मे वरिमा च मे प्रथिमा च मे वर्षिमा च मे द्राघिमा च मे वृद्धं च मे वृद्धिश्च
मे यज्ञेन कल्पन्ताम्.. (४)
२२४ - यजुर्वेद 632/14
पूर्वार्ध अठारहवां अध्याय
पूर्वार्ध अठारहवां अध्याय
यज्ञ हमें फलीभूत हो. ज्येष्ठता हमारे आधिपत्य में रहे. अनीति हमारे नियंत्रण
में रहे. क्रोध हम से दूर रहे. दुष्टों का हम प्रतिकार कर सकें. हमारी परिपक्वता में
बढ़ोत्तरी हो. हमारी गरिमा में बढ़ोत्तरी हो. हमारी वरिष्ठता में बढ़ोत्तरी हो. हम सर्वत्र
प्रथम (श्रेष्ठ) साबित हों. हमारी व्यापकता में बढ़ोत्तरी हो. हमारी आयु में बढ़ोत्तरी
हो. हमारे बड़प्पन में बढ़ोत्तरी हो. हमारे वंश में बढ़ोत्तरी हो. हमारी उत्कृष्टता में
बढ़ोत्तरी हो. यज्ञ हमें (सर्वविध) फलीभूत हो. (४)
सत्यं च मे श्रद्धा च मे जगच्च मे धनं च मे विश्वं च मे महश्च मे क्रीडा च
मे मोदश्च मे जातं च मे जनिष्यमाणं च मे सूक्तं च मे सुकृतं च मे यज्ञेन
कल्पन्ताम्.. (५)
यज्ञ फलीभूत हो. सत्य की बढ़ोत्तरी हो. श्रद्धा की बढ़ोत्तरी हो. धन की
बढ़ोत्तरी हो. विश्व में स्तर की बढ़ोत्तरी हो. मनोविनोद की बढ़ोत्तरी हो. हर्ष स्तर
की बढ़ोत्तरी हो. संतान की बढ़ोत्तरी हो. सूक्तों में स्तर की बढ़ोत्तरी हो. यज्ञ
सर्वविध फलीभूत हो. (५)
ऋतं च मेमृतं च मेयक्ष्मं च मेनामयच्च मे जीवातुश्च मे दीर्घायुत्वं च मेनमित्रं च
मेभयं च मे सुखं च मे शयनं च मे सूषाश्च मे सुदिनं च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्.. (६)
यज्ञ से हमारे ऋत को बढ़ोत्तरी मिले. यज्ञ से हमारे अमृत को बढ़ोत्तरी मिले.
यज्ञ से हमारे यक्ष्मा में कमी हो. यज्ञ से हमारे आरोग्य में बढ़ोत्तरी हो. यज्ञ से हमारे
जीने की क्षमता में बढ़ोत्तरी हो. यज्ञ से हमारी आयु में बढ़ोत्तरी हो. यज्ञ से हमारे
शत्रुओं का अभाव हो. यज्ञ से हमारे अभय में बढ़ोत्तरी हो. यज्ञ से हमारे सुख में
बढ़ोत्तरी हो. यज्ञ से हमारे शयन में बढ़ोत्तरी हो. यज्ञ से हमारे संध्याकर्म में बढ़ोत्तरी
हो. यज्ञ से हमारे सुदिन में बढ़ोत्तरी हो. यज्ञ हमें सर्वविध फलीभूत हो. (६)
यन्ता च मे धर्ता च मे क्षेमश्च मे धृतिश्च मे विश्वं च मे महश्च मे संविच्च मे ज्ञात्रं
च मे सूश्च मे प्रसूश्च मे सीरं च मे लयश्च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्.. (७)
यज्ञ से हम धारक हो जाएं. धैर्य की क्षमता बढ़े. यज्ञ से हमें संसार की सारी
महानता प्राप्त हो. यज्ञ से हमें संपूर्ण सामर्थ्य प्राप्त हो. यज्ञ से हमें ज्ञान प्राप्त हो. यज्ञ
से उत्पादन की क्षमता में बढ़ोत्तरी हो. यज्ञ से खेती के साधनों की क्षमता में बढ़ोत्तरी
हो. यज्ञ से कष्टों में कमी हो. यज्ञ सर्वविध फलीभूत हो. (७)
शं च मे मयश्च मे प्रियं च मेनुकामश्च मे कामश्च मे सौमनसश्च मे भगश्च मे द्रविणं
च मे भद्रं च मे श्रेयश्च मे वसीयश्च मे यशश्च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्.. (८)
यज्ञ से सब सुखों में बढ़ोत्तरी हो. यज्ञ से सब आनंद में बढ़ोत्तरी हो. यज्ञ से सब
प्रकार के आमोदप्रमोद में बढ़ोत्तरी हो. यज्ञ से सब अनुकूल कामनाओं में बढ़ोत्तरी
हो. यज्ञ से सब सौमनस्य कामनाओं में बढ़ोत्तरी हो. यज्ञ से सब सौभाग्य में बढ़ोत्तरी
यजुर्वेद - २२५
पूर्वार्ध अठारहवां अध्याय
हो. यज्ञ से सब वैभव में बढ़ोतरी हो. यज्ञ से सब भद्रता में बढ़ोतरी हो. यज्ञ से सब
श्रेय में बढ़ोतरी हो. यज्ञ से सब वास सुख में बढ़ोतरी हो. यज्ञ से सब यश में बढ़ोतरी
हो. यज्ञ हमें सर्वविध फलीभूत हो. ( ८ )
ऊर्क् च मे सूनृता च मे पयश्च मे रसश्च मे घृतं च मे मधु च मे सग्धिश्च मे सपीतिश्च
मे कृषिश्च मे वृष्टिश्च मे जैत्रं च म ऽ औद्भिद्यं च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्.. ( ९ )
यज्ञ हमें फलीभूत हो. यज्ञ से अन्न की प्राप्ति हो. यज्ञ से अच्छी वाणी की प्राप्ति
हो. यज्ञ से पेय की प्राप्ति हो. यज्ञ से रस की प्राप्ति हो. यज्ञ से घी की प्राप्ति हो. यज्ञ
से मधु की प्राप्ति हो. हम संबंधियों के साथ भोजन करें. हम संबंधियों के साथ पीएं.
वर्षा हमारी कृषि को फलीभूत व बढ़ोतरी करे. हम शत्रुओं का भेदन करें. यज्ञ हमें
सर्वविध फलीभूत हो. ( ९ )
रयिश्च मे रायश्च मे पुष्टं च मे पुष्टिश्च मे विभु च मे प्रभु च मे पूर्णं च मे पूर्णतरं
च मे कुयवं च मेक्षितं च मेन्नं च मेक्षुच्च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्.. ( १० )
यज्ञ से हमारे धन में बढ़ोतरी हो. यज्ञ से हमारी संपत्ति में बढ़ोतरी हो. हम
धन से पुष्ट हों. हम वैभव से पुष्ट हों. हम प्रभु से पुष्ट हों. हम पूर्ण से पुष्ट हों.
हम पूर्णतर से पुष्ट हों. हमारे यहां पशुओं के खाद्य में बढ़ोतरी हो. हमारे यहां
अक्षय अन्न में व हमारी भूख में भी बढ़ोतरी हो. यज्ञ हमारे लिए सर्वविध फलीभूत
हो. ( १० )
वित्तं च मे वेद्यं च मे भूतं च मे भविष्यच्च मे सुगं च मे सुपथ्यं च म ऽ ऋद्धं च म ऽ
ऋद्धिश्च मे क्लृप्तं च मे क्लृप्तिश्च मे मतिश्च मे सुमतिश्च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्.. ( ११ )
यज्ञ से हमारे वित्त, ज्ञान, अतीत, भविष्य व अच्छे धन को बढ़ोतरी मिले. यज्ञ
से हमारे पथ सुगम हों. यज्ञ से हमारे पथ के रोड़े समाप्त हों. यज्ञ से हमारे अच्छे
कर्म, सामर्थ्य, सत्य, बुद्धि व सद्बुद्धि में बढ़ोतरी हो. यज्ञ हमारे लिए सर्वविध
फलीभूत हो. ( ११ )
व्रीहयश्च मे यवाश्च मे माषाश्च मे तिलाश्च मे मुद्गाश्च मे खल्वाश्च मे प्रियङ्गवश्च
मेणवश्च मे श्यामाकाश्च मे नीवाराश्च मे गोधूमाश्च मे मसूराश्च मे यज्ञेन
कल्पन्ताम्.. ( १२ )
यज्ञ से हमारे धान, जौ, उड़द, तिल, मूंग, चना, प्रियंग ( राई ), छोटे चावलों
में बढ़ोतरी हो. यज्ञ से हमारे सावां चावल, नीवार, गेहूं, मसूर में बढ़ोतरी हो. यज्ञ
हमें सर्वविध फलीभूत हो. ( १२ )
अश्मा च मे मृत्तिका च मे गिरयश्च मे पर्वताश्च मे सिकताश्च मे वनस्पतयश्च मे हिरण्यं
च मेयश्च मे श्यामं च मे लोहं च मे सीसं च मे त्रपु च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्.. ( १३ )
२२६ - यजुर्वेद
पूर्वार्ध अठारहवां अध्याय
यज्ञ कर्म से खनिज, मिट्टी, पहाड़ों, पर्वतों, रेत, वनस्पतियों में बढ़ोतरी हो.
यज्ञ कर्म से सोने, लोहे, कांसे, सीसे व टिन में बढ़ोतरी हो. यज्ञ हमारे लिए सर्वविध
फलीभूत हो. ( १३ )
अग्निश्च म ऽ आपश्च मे वीरुधश्च म ऽ ओषधयश्च मे कृष्टपच्याश्च मेऽकृष्टपच्याश्च
मे ग्राम्याश्च मे पशव ऽ आरण्याश्च मे वित्तं च मे वित्तिश्च मे भूतं च मे भूतिश्च मे
यज्ञेन कल्पन्ताम्.. ( १४)
इस यज्ञ से अग्नि, जल, पौधे, ओषधियां, कष्ट से पचने वाली ओषधियां हमारे
अनुकूल होने की कृपा करें. इस यज्ञ से आसानी से पचने वाली ओषधियां, गांव
के पशु, जंगल के पशु, वित्त, संपत्ति, अतीत व भविष्य की बढ़ोतरी हो. यज्ञ हमें
सर्वविध फलीभूत हों. ( १४ )
वसु च मे वसतिश्च मे कर्म च मे शक्तिश्च मेर्थश्च म ऽ एमश्च म ऽ इत्या च मे
गतिश्च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्.. ( १५)
यज्ञ से देवगण हमें धन, संपत्ति, कर्म सामर्थ्य, अर्थ, इष्ट साधन व गति प्रदान
करें. यह यज्ञ सर्वविध हमारे लिए फलीभूत हो. ( १५ )
अग्निश्च म ऽ इन्द्रश्च मे सोमश्च म ऽ इन्द्रश्च मे सविता च म ऽ इन्द्रश्च मे सरस्वती
च म ऽ इन्द्रश्च मे पूषा च म ऽ इन्द्रश्च मे बृहस्पतिश्च म ऽ इन्द्रश्च मे यज्ञेन
कल्पन्ताम्.. (१६)
यज्ञ से अग्नि, इंद्र देव, सोम और इंद्र देव, सविता देव और इंद्र देव, सरस्वती
देवी और इंद्र देव व पूषा देव और इंद्र देव की अनुकंपा में बढ़ोतरी हो. यज्ञ से
बृहस्पति देव और इंद्र देव की अनुकंपा में बढ़ोतरी हो. यज्ञ हमारे लिए सर्वविध
फलीभूत हो. ( १६ )
मित्रश्च म ऽ इन्द्रश्च मे वरुणश्च म ऽ इन्द्रश्च मे धाता च म ऽ इन्द्रश्च मे त्वष्टा च म ऽ
इन्द्रश्च मे मरुतश्च म ऽइन्द्रश्च मे विश्वे च मे देवा ऽ इन्द्रश्च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्.. (१७)
यज्ञ से मित्र देव और इंद्र देव, वरुण देव और इंद्र देव, धाता देव और इंद्र देव,
त्वष्टा और इंद्र देव व मरुत् और इंद्र देव की अनुकंपा में बढ़ोतरी हो. यज्ञ से विश्व
देव और इंद्र देव की अनुकंपा में बढ़ोतरी हो. यह यज्ञ हमारे लिए सर्वविध फलीभूत
हो. ( १७ )
पृथिवी च म ऽ इन्द्रश्च मेन्तरिक्षं च म ऽ इन्द्रश्च मे द्यौश्च म ऽ इन्द्रश्च मे समाश्च
म ऽ इन्द्रश्च मे नक्षत्राणि च म ऽ इन्द्रश्च मे दिशश्च म ऽ इन्द्रश्च मे यज्ञेन
कल्पन्ताम्.. (१८)
इस यज्ञ से हमारे लिए पृथ्वी देव इंद्र, अंतरिक्ष देव इंद्र, स्वर्गलोक के देव,
यजुर्वेद - २२७
पूर्वार्ध अठारहवां अध्याय
वृष्टि देव इंद्र, नक्षत्र देव इंद्र व दिशा देव इंद्र की अनुकंपा में बढ़ोतरी हो. यह यज्ञ
सर्वविध हमारे लिए फलीभूत हो. ( १८ )
अ ᳵ शुश्च मे रश्मिश्च मेदाभ्यश्च मेधिपतिश्च म ऽ उपा ᳵ शुश्च मेन्तर्यामश्च म ऽ
ऐन्द्रवायवश्च मे मैत्रावरुणश्च म ऽ आश्विनश्च मे प्रतिप्रस्थानश्च मे शुक्रश्च मे मन्थी
च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्.. (१९)
इस यज्ञ से अंशुग्रह, रश्मिग्रह, अदाभ्यग्रह, उपांशुग्रह, अंतर्याम, इंद्र देव और
वायु, मित्र देव और वरुण देव, आश्विनग्रह व प्रतिस्थानग्रह अधिपति होने की कृपा
करें. इस यज्ञ से शुक्रग्रह अधिपति होने की कृपा करें. इस यज्ञ से मंधीग्रह अधिपति
होने की कृपा करें. यह यज्ञ हमारे लिए सर्वविध फलीभूत हो. ( १९ )
आग्रयणश्च मे वैश्वदेवश्च मे ध्रुवश्च मे वैश्वानरश्च म ऽ ऐन्द्राग्नश्च मे
महावैश्वदेवश्च मे मरुत्वतीयाश्च मे निष्केवल्यश्च मे सावित्रश्च मे सारस्वतश्च मे
पात्नीवतश्च मे हारियोजनश्च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्.. (२०)
इस यज्ञ से आग्रयण, विश्व, ध्रुव देव, वैश्वानर, इंद्र देव और अग्नि, महावैश्व
देव, मरुत्वतीय देव, निष्केवल्य देव, सावित्र देव, सारस्वत देव हमारे अनुकूल होने
की कृपा करें. इस यज्ञ से पालीवत व हारियोजन हमारे अनुकूल होने की कृपा करें.
यज्ञ सर्वविध हमारे लिए फलीभूत हो. ( २० )
सुचश्च मे चमसाश्च मे वायव्यानि च मे द्रोणकलशश्च मे ग्रावाणश्च मेधिषवणे च
मे पूतभृच्च म ऽ आधवनीयश्च मे वेदिश्च मे बर्हिश्च मेवभृथश्च मे स्वगाकारश्च मे
यज्ञेन कल्पन्ताम्.. (२१)
यज्ञ से सुक ( घी डालने का पात्र ), चमस, वायव्य, द्रोणकलश, पत्थर,
अधिषवण ( सोम कूटने वाला पत्थर ) हमारे अनुकूल हो. यज्ञ से पूतभृत ( सोम
रखने का पात्र ) आह्वनीय पात्र, वेदिका, कुशा, अवभृथ स्नान व शम्युवाक हमारे
अनुकूल हो. यज्ञ सर्वविध फलीभूत होने की कृपा करे. ( २१ )
अग्निश्च मे घर्मश्च मेर्कश्च मे सूर्यश्च मे प्राणश्च मेश्वमेधश्च मे पृथिवी च मेदितिश्च
मे दितिश्च मे द्यौश्च मेङ्गुलयः शक्वरयो दिशश्च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्.. (२२)
यज्ञ से अग्नि, गर्मी, अर्क, सूर्य, प्राण, अश्वमेध, पृथ्वी, अदिति व दिति हमारे
अनुकूल होने की कृपा करे. यज्ञ से स्वर्गलोक विराट् पुरुष की अंगुलियां, शक्ति
व दिशाएं हमारे अनुकूल होने की कृपा करें. यह यज्ञ सर्वविध फलीभूत होने की
कृपा करे. ( २२ )
व्रतं च म ऽ ऋतवश्च मे तपश्च मे संवत्सरश्च मेहोरात्रे ऊर्ध्वष्ठीवे बृहद्रथन्तरे च मे
यज्ञेन कल्पन्ताम्.. (२३)
२२८ - यजुर्वेद
पूर्वार्ध अठारहवां अध्याय
यज्ञ से व्रत, तप, वर्षा, दिनरात व यज्ञ से ऊर्वष्ठि हमारे अनुकूल होने की कृपा
करे. यज्ञ से बृहद्रथंतर हमारे अनुकूल होने की कृपा करें. यह यज्ञ सर्वविध फलीभूत
होने की कृपा करे. ( २३ )
एका च मे तिस्रश्च मे तिस्रश्च मे पञ्च च मे पञ्च च मे सप्त च मे सप्त च मे नव
च मे नव च म ऽ एकादश च म ऽ एकादश च मे त्रयोदश च मे त्रयोदश च मे पञ्चदश
च मे पञ्चदश च मे सप्तदश च मे सप्तदश च मे नवदश च मे नवदश च म ऽ एकवि
ꣳ शतिश्च म ऽ एकवि ꣳ शतिश्च मे त्रयोवि ꣳ शतिश्च मे त्रयोवि ꣳ शतिश्च मे
पञ्चवि ꣳ शतिश्च मे पञ्चवि ꣳ शतिश्च मे सप्तवि ꣳ शतिश्च मे सप्तवि ꣳ शतिश्च
मे नववि ꣳ शतिश्च मे नववि ꣳ शतिश्च म ऽ एकत्रि ꣳ शच्च म ऽ एकत्रि ꣳ शच्च
मे त्रयस्त्रि ꣳ शच्च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्.. (२४)
यज्ञ से हम एक, तीन, पांच, पांच और सात, सात और नौ, नौ और ग्यारह,
ग्यारह और तेरह, तेरह और पंद्रह, पंद्रह और सत्रह, उन्नीस और इक्कीस, तेईस और
पच्चीस स्तोम इच्छा को फलीभूत करें. यज्ञ से हम पच्चीस और सत्ताईस, सत्ताईस
और उनतीस, उनतीस और इकतीस, इकतीस और तैंतीस स्तोम इच्छा को फलीभूत
करें. यज्ञ सर्वविध फलीभूत होने की कृपा करे. ( २४ )
चतस्रश्च मेष्टौ च मेष्टौ च मे द्वादश च मे द्वादश च मे षोडश च मे षोडश च मे
वि ꣳ शतिश्च मे वि ꣳ शतिश्च मे चतुर्वि ꣳ शतिश्च मे चतुर्वि ꣳ शतिश्च मेष्टावि
ꣳ शतिश्च मेष्टावि ꣳ शतिश्च मे द्वात्रि ꣳ शच्च मे द्वात्रि ꣳ शच्च मे षट्त्रि ꣳ शच्च
मे षट्त्रि ꣳ शच्च मे चत्वारि ꣳ शच्च मे चत्वारि ꣳ शच्च मे चतुश्चत्वारि ꣳ शच्च
मे चतुश्चत्वारि ꣳ शच्च मेष्टाचत्वारि ꣳ शच्च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्.. (२५)
यज्ञ से चार और आठ, आठ और बारह, बारह और सोलह, सोलह और बीस,
बीस और चौबीस, चौबीस और अट्ठाईस स्तोम अभीष्ट प्राप्ति की कृपा करें. यज्ञ
से अट्ठाईस और बत्तीस स्तोम, बत्तीस और छत्तीस, छत्तीस और चालीस, चालीस
और चवालीस व चवालीस और अड़तालीस स्तोम अभीष्ट प्राप्ति की कृपा करें.
यज्ञ सर्वविध हमारे लिए फलीभूत हो. ( २५ )
त्र्यविश्च मे त्र्यवी च मे दित्यवाट् च मे दित्यौही च मे पञ्चाविश्च मे पञ्चावी च
मे त्रिवत्सश्च मे त्रिवत्सा च मे तुर्यवाट् च मे तुर्यौही च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्.. (२६)
यज्ञ से तीन से आधे वर्ष का बछड़ा, तीन वर्ष की बछिया, दो वर्ष का बछड़ा,
बछिया, ढाई वर्ष का बछड़ा व बछिया. यज्ञ से तीन वर्ष का बैल व गाय सहायक
हो. यज्ञ से साढ़े तीन वर्ष का बैल व गाय सहायक हो. यज्ञ सर्वविध हमारे लिए
फलीभूत हो. ( २६ )
पष्ठवाट् च मे पष्ठौही च म ऽ उक्षा च मे वशा च म ऽ ऋषभश्च मे वेहच्च मेनड्वाँश्च
मे धेनुश्च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्.. (२७)
यजुर्वेद - २२१
पूर्वार्ध अठारहवां अध्याय
पूर्वार्ध अठारहवां अध्याय
यज्ञ से चार वर्ष का बैल और गाय सहायक हो. यज्ञ से सेचन समर्थ बैल और
वंध्या गाय सहायक हो, यज्ञ से तंदुरुस्त बैल गर्भ घातिनी गाय सहायक हो. गाड़ी
खींचने वाले बैल और हाल ही में ब्याई गाय हमें प्राप्त हो. अभिप्राय यह है कि हमें
सब प्रकार का पशु धन मिले. (२७)
वाजाय स्वाहा प्रसवाय स्वाहापिजाय स्वाहा क्रतवे स्वाहा वसवे स्वाहाहर्पतये
स्वाहाहे मुग्धाय स्वाहा मुग्धाय वैन १७ शिनाय स्वाहा विन १७ शिन ऽ आन्त्यायनाय
स्वाहान्त्याय भौवनाय स्वाहा भुवनस्य पतये स्वाहाधिपतये स्वाहा प्रजापतये स्वाहा.
इयं ते राण्मित्राय यन्तासि यमन ऽ ऊर्जे त्वा वृष्ट्यै त्वा प्रजानां त्वाधिपत्याय.. (२८)
यह आहुति अन्न रूप चैत्र मास के लिए समर्पित है. यह आहुति प्रसव रूप
वैशाख, मास के लिए समर्पित है. यह आहुति जलक्रीड़ा आदि में आनंददायक
ज्येष्ठ मास के लिए है. यह आहुति क्रतु रूप आषाढ़ मास के लिए है. यह आहुति
चातुर्मास में यात्रा निषेधक वसु रूप श्रावण मास के लिए है. यह आहुति भाद्र मास
के लिए है. यह आहुति मनमोहक आश्विन मास के लिए है. यह आहुति कार्तिक
मास के लिए है. यह आहुति विष्णु रूप मार्गशीर्ष मास के लिए है. यह आहुति पौष
मास के लिए है. यह आहुति माघ मास के लिए है. यह आहुति ऋतुराज रूप फाल्गुन
मास के लिए है. हे प्रजापति! आप हमारे मित्र के समान हितैषी हैं. आप यज्ञ आदि
के बनाने वाले हैं. ऊर्जा और प्रजा की बढ़ोतरी के लिए हम आप को प्रेमपूर्वक
प्रणाम करते हैं. (२८)
आयुर्यज्ञेन कल्पतां प्राणो यज्ञेन कल्पतां चक्षुर्यज्ञेन कल्पता १७ श्रोत्रं यज्ञेन कल्पतां
वाग्यज्ञेन कल्पतां मनो यज्ञेन कल्पतामात्मा यज्ञेन कल्पतां ब्रह्मा यज्ञेन कल्पतां
ज्योतिर्यज्ञेन कल्पता १७ स्वर्ग्यज्ञेन कल्पतां पृष्ठं यज्ञेन कल्पतां यज्ञो यज्ञेन कल्पताम्.
स्तोमश्च यजुश्च ऋक् च साम च बृहच्च रथन्तरं च. स्वर्देवा ऽ अगन्मामृता ऽ अभूम
प्रजापतेः प्रजा ऽ अभूम वेट् स्वाहा.. (२९)
यज्ञ से हमारी उमर बढ़े. प्राणों में तेज और बल बढ़े. नेत्र और कान श्रेष्ठ हों.
वाणी उत्कृष्ट हो. आत्मा आनंदमय हो. वेदों के ज्ञाता ब्रह्मा संतोषी हों. यज्ञ से
ज्योतिष्मान परम तत्त्व मिले, यज्ञ से स्वर्ग अर्थात् सुख मिले. यज्ञ और स्तुति के मंत्र
हमें अभीष्ट फल दें. सभी देव हमें देवत्व प्रदान करें. अर्थात् सुख दें. हम भी
प्रजापति परमात्मा के रूप में सुख भोगें. इसी लिए यह आहुति समर्पित है. (२९)
वाजस्य नु प्रसवे मातरं महीमदितिं नाम वचसा करामहे.
यस्यामिदं विश्वं भुवनमाविवेश तस्यां नो देवः सविता धर्म साविषत्.. (३०)
पृथ्वी माता अन्न पैदा करती हैं. हम पृथ्वी माता की महिमा को वाणी से गागा
कर व्यक्त करते हैं. उस में सारा विश्व और लोक समाए हुए हैं. सविता देव इस
पृथ्वी पर हमारी स्थिति को दृढ़तर करने की कृपा करें. (३०)
२३० - यजुर्वेद