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यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

उत्तरार्ध छत्तीसवां अध्याय

उत्तरार्ध छत्तीसवां अध्याय
अभी षु णः सखीनामविता जरितॄणाम्. शतं भवास्यूतिभिः.. (६)
हे इंद्र देव! आप सखा की तरह हमारी रक्षा करने की कृपा कीजिए. आप धन
देने की कृपा कीजिए. हम आप के सैकड़ों रक्षा साधनों से रक्षित हों. (६)
कया त्वं न ऽ ऊत्याभि प्र मन्द्र से वृषन्. कया स्तोतृभ्य ऽ आ भर.. (७)
हे परमात्मा! आप अपनी रक्षाओं से किस के लिए आनंद की वर्षा नहीं करते
हैं ? आप अपने स्तोताओं को जो भरपूर धन प्रदान करते हैं. वह किस को आनंदित
नहीं करता ? (७)
इन्द्रो विश्वस्य राजति. शं नो अस्तु द्विपदे शं चतुष्पदे.. (८)
इंद्र देव विश्व की शोभा हैं. वे हमारे लिए सुखदायी हैं. वे दोपायों व चौपायों
के लिए सुखदायी हैं. (८)
शं नो मित्रः शं वरुणः शं नो भवत्वर्यमा.
शं न ऽ इन्द्रो बृहस्पतिः शं नो विष्णुरुरुक्रमः.. (९)
मित्र देव, वरुण देव, अर्यमा देव हमारे लिए कल्याणदायी हों. इंद्र देव व
बृहस्पति देव व जगत्पालक विष्णु हमारे लिए कल्याणकारी हों. (९)
शं नो वातः पवता २४ शं नस्तपतु सूर्यः.
शं नः कनिक्रदद्देवः पर्जन्यो अभि वर्षतु.. (१०)
वायु हमारे लिए कल्याणदायी हों. वे हमें पवित्र बनाने की कृपा कीजिए. सूर्य
देव हमारे लिए सुखदायी हो कर तपने की कृपा करें. गड़गड़ाहट करने वाले पर्जन्य
देव हमारे लिए कल्याणदायी हो कर बरसात करें. (१०)
अहानि शं भवन्तु नः श २४ रात्रीः प्रति धीयताम्.
शं न ऽ इन्द्राग्नी भवतामवोभिः शं न ऽ इन्द्रावरुणा रातहव्या.
शं न ऽ इन्द्रापूषणा वाजसातौ शमिन्द्रासोमा सुविताय शं योः.. (११)
दिन हमारे लिए कल्याणदायी हो. हम बुद्धिपूर्वक प्रार्थना करते हैं. रात्रि हमारे
लिए कल्याणदायी हो. हम बुद्धिपूर्वक प्रार्थना करते हैं. इंद्र देव हमारे लिए
कल्याणदायी हों. इंद्र देव हमारी रक्षा करने की कृपा करें. अग्नि हमारे लिए
कल्याणदायी हों. वे हमारी रक्षा करने की कृपा करें. इंद्र देव हमारे लिए कल्याणदायी
हों. वे हमारी हवि स्वीकारने की कृपा करें. वरुण देव हमारे लिए कल्याणदायी हों
व हमारी हवि स्वीकारने की कृपा करें. इंद्र देव हमारे लिए कल्याणदायी हों और रोग
दूर करें. पूषा देव हमारे लिए कल्याणदायी हों और रोग दूर करें. (११)
शं नो देवीरभिष्टय ऽ आपो भवन्तु पीतये. शं योरभि स्रवन्तु नः.. (१२)
४०० - यजुर्वेद 632/25