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बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)

Vrihat Samudrika Shastra and Hastarekha Vijnana

महर्षि गर्ग एवं नारद परम्परा द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

( १६२ )
ग्रहान् दह दह सर्वस्थलवासी ग्रहान् दह दह सर्वान्तरिक्ष वासी ग्रहान् दह दह श्मशान
वासी ग्रहान् दह दह सर्व गिरिगुहा दुर्गवासी ग्रहान् दह दह श्रापित ग्रहान् दह दह
सर्वनाथ पंथि ग्रहान् दह दह सर्वभूवासी प्रेत ग्रहान् दह दह (अमुक गृहे) असद्गति
ग्रहान् दह दह वक्रपिण्ड ग्रहान् दह दह सर्वदुष्ट ग्रहान् दह दह शतकोटि योजने दोष-
दायी ग्रहान् दह दह सहस्र कोटि योजनान् दोषदायि ग्रहान् दह दह शतकोटि दोष
कोष दह दह सहस्रकोटि दोष दह दह आसमुद्रात् पृथ्वी मध्ये देवभूत पिशाचादि (अमु-
कस्यो) परिकृत दोषान् तस्य दोषान् दह दह शत्रुकृतभिचार दोषान् दह दह घे घे
स्फोटय स्फोटय मारय मारय धगि थगि धागत मुखे ज्वालामालिनी हां हीं हूं हैं
हौं हः सर्व ग्रहाणां हृदये दह दह पच पच छिदि छिदि भिदिभिदि दह दह हा हा स्फुट
स्फुट घे घे ।
क्ष्म्लुं क्षां क्षीं क्षुं क्षैं क्षौं क्षः स्तंभयः स्तंभपः । म्भ्लुं म्भ्रां म्भ्रीं म्भ्रू ं म्भ्रैं म्भ्रौं म्भ्रं
अः बाडय बाडय । म्स्नूं म्श्रां म्श्रीं म्श्रू ं म्श्रैं म्श्रौं म्नः नेत्रं स्फोटय स्फोटय दर्शय दर्शय ।
य्म्लूं यां यीं यू यें यौं यः प्रेषय प्रेषय । ष्म्लुं ध्रा धी धू ं ध्रैं ध्रौं ध्रः जठेर भेदय ।
ग्लुं ग्रां ग्रीं गुं ग्रैं ग्रो ग्रः मुखं बंधयः बंधयः । र्लू ं खां खीं खू ं खैं , खौं खः ग्रीवां
मंजय मंजयः । छप्लुं छां छीं छू ं छैं छौं छः मंत्रान् भेदय भेदयः । ढ्प्लुं ढां ढीं ढू ं
द्रौं ढू ः महाविद्युत्पाषापाणा स्त्रैहन स्त्रैहन । म्प्रु द्रा व्रीं द्रं भ्रैं द्रौं द्रः समुद्रे भंजय
मंजय । द्म्रूं द्रां द्री द्रू द्रौ द्रः सर्व डाकिनी सुन्दरी मर्दय मर्दय सर्व योगिनीं स्वञ्जय
स्वञ्जय । सर्व शत्रु ग्रासय ग्रासय ख ख ख ख ख ख ख खादय खादय सर्व दैत्यान्
विध्वंसय विध्वंसय सर्व मृत्युं नाशय नाशय सर्वोपद्रवान् स्तंभय स्तंभय जः जः जः जः
जः जः जः ज्वरान् दह दह पच पच घुमु घुमु घुरु घुरु घुरु घुरु खरु खरु खंग रावण
सुविघायां घातय प्रखिन्न रुजान् दोषोदयान् कृत कार्याणामिचारोत्थान (अमुकस्य) देहे
स्थितान् अधुना रुज कारकान् चन्द्रहास शस्त्रेण छेदय छेदय भेदय भेदय उरु उरु छरु
छरु स्फुट स्फुट घे श्रां क्रौं क्षीं क्षं क्षैं क्षौं क्षः ज्वाला मालिनीं (अमुकस्य) सौख्यं कुरु
कुरु निरूजं कुरु कुरु अभिलाषित कामना देहि देहि ज्वाला मालिनीं विज्ञापयते स्वाहा ।

हस्त-परिचय
संसार में जितने भी पुरुष हैं उनके हाथों में कुछ न कुछ विशेषता पाई जाती
है । परन्तु अनुभव में ऐसा आया है कि एक विशेष वर्ग के व्यक्तियों के हाथों में एक
रूपता या समानता पाई जाती है । नीचे की पंक्तियों में मैं समाज के विभिन्न वर्गों से
सम्बन्धित हाथ की विशेषताओं का संक्षिप्त परिचय स्पष्ट कर रहा हूं ।
१. व्यवसायी :
जो व्यक्ति व्यापार या व्यवसाय करता है उसके हाथ
का अंगूठा सीधा तथा पीछे की तरफ किंचित् झुका हुआ होता है
इसके साथ ही हथेली में उसकी मस्तिष्क रेखा सीधी और
स्पष्ट होती है एवं बुध पर्वत सामान्यतः उभरा हुआ होता है ।
यह बात भी ध्यान में रखनी चाहिए कि एक सफल व्यवसायी
के बुध पर्वत पर किसी प्रकार का कोई जाल नहीं होता । बुध
की उंगली अर्थात् कनिष्ठिका कुछ लम्बाई लिये हुए होती है ।
बुध पर्वत की ओर यदि मस्तिष्क रेखा की कोई शाखा
आ रही हो तो यह तुरन्त समझ लेना चाहिए कि यह व्यक्ति
अपने क्षेत्र में पूर्ण सफल सम्पन्न व्यक्ति है । इसके साथ ही
जिसके हाथ की उंगलियां हथेली की अपेक्षा लम्बाई लिये हुए
हों तो उसके जीवन में व्यवसाय की दृष्टि से किसी प्रकार की कोई कमी नहीं रहती ।
[चित्र: व्यवसायी]
२. लखपती :
जिसके हाथ में सूर्य रेखा अपने आप में प्रबल हो,
साथ ही जिसका शुक्र पर्वत विकसित हो और उस पर किसी
प्रकार का कोई जाल या टूटी हुई रेखा न हो तो समझ लेना
चाहिए कि यह व्यक्ति आर्थिक दृष्टि से अनुकूल है परन्तु जब
भाग्य रेखा सीधी स्पष्ट और लालिमा लिये हुऐ हो तथा उसकी
कोई एक शाखा सूर्य पर्वत की ओर जा रही हो तथा मस्तिष्क
रेखा पूर्णतः विकसित हो तो निश्चय ही वह व्यक्ति लखपति
होता है तथा आर्थिक दृष्टि से पूर्ण अनुकूलता प्राप्त कर पूर्ण
सुख उपभोग करता है ।
[चित्र: लखपति]

( १६४ )
३. एकाउन्टेन्ट :
एकाउन्टेन्ट या मुनीम के हाथ में यह विशेषता
होती है कि उसका बुध पर्वत अपने आप में विकसित तथा
ऊंचा उठा हुआ होता है । साथ ही उसका सूर्य पर्वत भी उभरा
हुआ होता है एवं उस पर सूर्य रेखा पूरी तरह से देखी जा सकती
है । साथ ही साथ भाग्य रेखा का भी अध्ययन किया जाना
चाहिए । यदि भाग्य रेखा बिना कहीं से कटे मध्यमा के मूल
में स्थित शनि पर्वत पर सफलता के साथ जा रही हो तो ऐसा
व्यक्ति एक सफल एकाउन्टेन्ट होता है ।
यदि ऊपर लिखे तथ्य हों और मध्यमा उंगली एवं
कनिष्ठिका उंगली सामान्यतः कुछ लम्बाई लिये हुए हो साथ
ही अंगूठे मजबूत हों तो वह व्यक्ति बैंक में महत्वपूर्ण पद पर [Image Caption: एकाउन्टेन्ट]
होता है । ऐसा व्यक्ति इनकमटैक्स अधिकारी भी हो सकता है ।
यदि इन लक्षणों के अलावा चन्द्र रेखा पूर्णतः विकसित हो तथा भाग्य रेखा
भी सहायक हो तो वह व्यक्ति चार्टर्ड एकाउन्टेन्ट होता है ।
४. न्यायाधीश :
जिस व्यक्ति के हाथ में तर्जनी उंगली अनामिका
से कुछ लम्बाई लिये हुए हो तथा कनिष्ठिका उंगली अनामिका
के तीसरे पोर से ऊपर उठी हुई हो, साथ ही साथ सभी
उंगलियां सुन्दर हों, गुरु पर्वत पूर्णतः विकसित हो तथा उस पर
क्रॉस का चिह्न हो तो ऐसा व्यक्ति विख्यात् वकील होता है ।
ऊपर लिखे गुण होने के साथ-साथ यदि व्यक्ति की
हथेली में भाग्य रेखा निर्दोष पतली तथा स्पष्ट हो, साथ सूर्य
पूर्ण प्रभाव युक्त हो और अंगूठा लम्बा तथा पीछे की तरफ
झुका हुआ हो तो वह व्यक्ति निश्चय ही सफल न्यायाधीश
होगा ।
ऊपर लिखे गुण होने के साथ-साथ यदि भाग्य रेखा
[Image Caption: न्यायाधीश] से कोई शाखा गुरु पर्वत पर पहुंचती हो तो वह व्यक्ति निश्चय
ही मुख्य न्यायाधीश होता है ।

( १२५ )
५. शिल्पकार :
यदि हाथ की उंगलियां लम्बी हों तथा ऊपर के सिरे
चौकोर हों साथ ही सूर्य रेखा पूर्णतः विकसित स्पष्ट तथा
गहरी हो एवं शनि क्षेत्र पर किसी प्रकार की बाधक रेखाएं
न हों और उसका अंगूठा पतला तथा कुछ लम्बाई लिये हुए
हो तो निश्चय ही ऐसा व्यक्ति एक सफल मूर्तिकार अथवा
शिल्पकार होता है ।
शिल्पकार
६. सैनिक :
जिस व्यक्ति का शरीर अपने आप में स्वस्थ, पुष्ट,
प्रबल तथा पूरी लम्बाई लिये हुए हो और उसके हाथ सामा-
न्यतः लम्बे हों तो ऐसे व्यक्ति में सैनिक के चिह्न देखने को
मिलते हैं ।
इसके साथ ही साथ उसकी हथेली में यदि मंगल क्षेत्र
विस्तार लिये हुए हो तथा मंगल पर किसी उज्ज्वल तारे का
चिह्न हो साथ ही उसकी भाग्य रेखा विकसित तथा स्पष्ट हो
तो वह व्यक्ति निश्चय ही एक सफल स्थल सैनिक बनता है ।
यदि ऊपर लिखे हुए गुणों के साथ-साथ दोनों मंगल
हथेली मे बहुत अधिक विकसित हों एवं सूर्य पर्वत पर सूर्य
सैनिक रेखा स्पष्ट और निर्दोष रूप से अंकित हो तथा अंगूठा मजबूत
लम्बाई लिये हुए तथा सामान्यतः पीछे की तरफ झुका हुआ हो तो वह व्यक्ति
निश्चय ही जनरल या ब्रिगेडियर होता है ।
ऊपर लिखे गुणों के अलावा यदि सूर्य रेखा पर सुन्दर त्रिकोण का चिह्न हो
तथा सभी उंगलियां अपने आप में पूर्ण लम्बाई लिये हुए हों तो ऐसा व्यक्ति निश्चय
ही स्थल सेनाध्यक्ष होता है ।

( १६६ )
७. आई० ए० एस० :
आई० ए० एस० व्यक्ति कलेक्टर, सेक्रेटरी या
प्रशासन के महत्वपूर्ण पद पर रहते हैं और ऐसे व्यक्ति शासन
में बहुत अधिक सहायक होते हैं ।
जिनके हाथों में बुध की उंगली अर्थात् कनिष्ठिका
लम्बाई लिये हुए हो और उसका अन्तिम सिरा अनामिका के
तीसरे पोर से आगे अर्थात् आधे से अधिक हिस्से तक पहुंच
चुकी हो इसके साथ ही साथ सूर्य रेखा अत्यन्त उच्च कोटि की
हो तो वह व्यक्ति आई० ए० एस० अधिकारी होता है ।
यदि सूर्य रेखा में कमजोरी होती है, या कटी हुई
होती है, तो वह व्यक्ति मात्र आई० ए० एस० अधिकारी
आई. ए. एस. ही होकर रह जाता है ।
यदि कनिष्ठिका लम्बी हो, सूर्य रेखा भी अपने आप में पुष्ट हो तथा मस्तिष्क
रेखा पूर्ण विकसित हो और उसके साथ ही साथ भाग्य रेखा लम्बी निर्दोष तथा पूर्ण
हो तो वह व्यक्ति केन्द्रीय सरकार में उच्च पदस्थ अधिकारी होता है ।
भाग्य रेखा तथा गुरु पर्वत बहुत अधिक श्रेष्ठ हों तो वह व्यक्ति निश्चय ही
केन्द्रीय सेवा में सेक्रेटरी या अत्यन्त उच्च पदस्थ व्यक्ति होता है, जिसके कार्यों का
प्रशासन पर पूरा-पूरा प्रभाव पड़ता है ।
८. नाविक :
( जल सेना ) :-जो नाव पर या जहाज पर कार्य
करने वाले होते हैं अथवा नेवी में उच्चपदस्थ अधिकारी होते
हैं उनको यहां नाविक के नाम से सम्बोधित कर रहा हूं । एक
श्रेष्ठ तथा कुशल जलसेना नायक का हाथ पूर्ण लम्बाई लिये
हुए होता है तथा उस पर चन्द्र पर्वत पूर्ण विकसित अवस्था में
होता है । जिसकी हथेली में चन्द्र पर्वत विकसित हो तथा
चन्द्रमा के पर्वत से रेखा निकलकर सूर्य की तरफ जा रही हो
एवं भाग्य रेखा तथा मस्तिष्क रेखा अपने आप में पूर्ण विक-
सित हो तो वह व्यक्ति निस्संदेह जल सेनाध्यक्ष होता है ।
यदि चन्द्र पर्वत कम उभरा हुआ हो या चन्द्र रेखा
कमजोर हो और अन्य सभी गुण हथेली में हों तो वह नेवी में
नाविक
उच्च पद पर कार्य करने वाला होता है ।

( १५७ )
यदि चन्द्र पर्वत अत्यन्त दबा हुआ हो तथा भाग्य रेखा कमजोर हो तो वह
केवल नाव चलाने वाला नाविक होता है।
६. डाक्टर :
जिस की हथेली में बुध पर्वत पूर्ण विकसित हो तथा
कनिष्ठिका पूरी लम्बाई लिये हुए हो जिसका सिरा अनामिका
के ऊपरी पौर के मध्य तक जाता हो तथा बुध क्षेत्र पर तीन
चार खड़ी रेखाएं हों तो ऐसा व्यक्ति एक सफल डाक्टर
होता है।
यदि ऊपर लिखे गुण हथेली में हों पर इसके साथ ही
साथ मंगल पर्वत अत्यन्त विकसित हो तथा मंगल रेखा भी
पुष्ट एवं प्रबल हो तो वह व्यक्ति एक सफल सर्जन होता है।
यदि मंगल पर्वत दबा हुआ हो इसके अलावा अन्य
सभी गुण हथेली में हों तथा बृहस्पति पूर्ण विकसित हो और
उस पर वर्ग का चिह्न हो तो वह व्यक्ति ख्याति प्राप्त वैद्य
होता है।
[चित्र: डाक्टर]
१०. इंजीनियर :
यहां इन्जीनियर से मेरा तात्पर्य वैज्ञानिक एवं
मैकेनिक से भी है। यदि किसी मनुष्य की सभी उंगलियां
पूरी लम्बाई लिये हुए हों तथा शनि पर्वत विकसित हो तथा
उस पर भाग्य रेखा निर्दोष रूप से आकर ठहरी हुई हो एवं
पर्वत पर तीन-चार खड़ी रेखाएं हों तो वह व्यक्ति एक
बुध सफल वैज्ञानिक होता है।
यदि ऊपर लिखे गुण हों पर बृहस्पति पर्वत कमजोर
हो तो वह एक सफल इन्जीनियर होता है। यदि इन्जीनियर
के चिह्न हों तथा चन्द्र पर्वत श्रेष्ठ हो तो वह वाटर वर्क्स में
इन्जीनियर होता है।
यदि ऊपर लिखे चिह्न हथेली में हों तथा मस्तिष्क
रेखा और शनि रेखा पूर्ण विकास लिये हुए हो तो वह एक [चित्र: इंजीनियर]
सफल वायुयान चालक होता है पर उसमें चन्द्र पर्वत तथा चन्द्र रेखा अत्यन्त श्रेष्ठ
होनी आवश्यक है।

( १६८ )
११. धर्माचार्य :
यदि किसी मनुष्य की हथेली में तर्जनी अनामिका से
लम्बी हो तथा गुरु पर्वत पूर्ण विकास लिये हुए हो और उस
पर क्रॉस का चिह्न हो तो वह व्यक्ति निश्चय ही एक सफल
पुरोहित या धार्मिक व्यक्ति होता है।
यदि ऊपर लिखे चिह्न हों तथा सूर्य पर्वत और सूर्य
रेखा बहुत अधिक विकसित हो तो वह व्यक्ति प्रसिद्ध उपदेशक
या धर्माचार्य होता है।
यदि ऊपर लिखे चिन्ह हों तथा जीवन रेखा कटी हुई
हो तो ऐसा व्यक्ति निश्चय ही सन्यासी होता है और
सन्यासी होने के बाद ही उसको यश तथा सम्मान मिलता है। धर्माचार्य
१२. कलाकार :
जब किसी व्यक्ति की हथेलियां पूरी लम्बाई लिये
हुए तथा गांठ रहित हों एवं उसकी उंगलियां ढलवीं हों और
उंगली के ऊपर के सिरे नौकीले हों तो वह व्यक्ति सफल
कलाकार होता है।
यदि ऊपर लिखे गुण हों साथ ही चन्द्र पर्वत पूर्ण
विकसित हो तो वह व्यक्ति श्रेष्ठ चित्रकार माना जाता है।
यदि बुध पर्वत विकसित हो तथा बुध रेखा भी पूर्ण लम्बी
तथा निर्दोष रूप से बढ़ी हुई हो तो वह व्यक्ति सफल संगीतज्ञ
होता है। यदि ऊपर लिखे गुण हों तथा शुक्र पर्वत पूरी तरह
से विकास पर हो तथा उसका क्षेत्र अत्यन्त फैला हुआ हो तो
कलाकार वह व्यक्ति सफल नृत्यकार होता है तथा प्रसिद्धि प्राप्त करता है।
इसके साथ-साथ भाग्य रेखा तथा सूर्य रेखा जितनी ही ज्यादा स्पष्ट, गहरी
तथा लालिमा लिये हुए होगी वह व्यक्ति उतना ही ज्यादा सफल लोकप्रिय तथा
विख्यात होगा।

( १६६ )
१३. साहित्यकार :
जिस व्यक्ति की हथेली में गुरु पर्वत तथा चन्द्र पर्वत
पूर्ण उभार लिये हुए हो तथा सूर्य की उंगली तर्जनी से लम्बी
हो और उंगलियों में गांठें नहीं हों तो वह व्यक्ति एक सफल
साहित्यकार होता है ।
इसके साथ ही साथ सूर्य रेखा यदि लम्बी हो, निर्दोष
हो तथा सूर्य पर्वत अपने स्थान पर हो तो वह लेखन के
माध्यम से प्रसिद्धि प्राप्त करता है ।
यदि ऊपर लिखे गुण हों और चन्द्र रेखा धनुष
रूप में होकर बुध पर्वत की ओर आ रही हो तो वह
व्यक्ति एक सफल कवि होता है ।
इसके साथ ही साथ यदि भाग्य रेखा तथा मस्तिष्क
रेखा पूर्ण विकसित एवं स्पष्ट हो तो वह व्यक्ति निश्चय ही
अपने क्षेत्र में यश, सम्मान, तथा प्रसिद्धि प्राप्त करता है ।
साहित्यकार
१४. अभिनेता अभिनेत्री :
यदि हाथ की सभी उंगलियां कोमल तथा ढलवीं हों
तथा सूर्य की उंगली विशेष लम्बी हो तथा ऊपर से नौकदार
हों तथा मस्तिष्क रेखा एवं भाग्य रेखा पूरी लम्बाई
लिये हो तो वह व्यक्ति सफल अभिनेता या अभिनेत्री
होती है ।
यदि सूर्य रेखा विशेष रूप से सुन्दर, लम्बी, स्पष्ट,
मुलायम और निर्दोष रूप से लम्बाई लिये हुए हो तो वह
अद्वितीय कलाकार होता है ।
यदि सूर्य रेखा पर नक्षत्र का चिह्न हो तो वह कला-
कार या अभिनेत्री विश्वविख्यात होती है ।
अभिनेता

( २०० )
१५. कामी हाथ :
यदि हथेली में शुक्र क्षेत्र बेडौल, जरूरत से ज्यादा उभरा
हुआ, कोमल तथा फला हुआ हो इसके साथ ही अंगूठे का पोरु
अधिक लम्बा हो तथा शुक्र पर्वत पर नक्षत्र चिह्न अंकित हो तो
वह व्यक्ति जरूरत से ज्यादा कामी होता है ।
यदि इसके साथ ही शनि रेखा पर बिन्दु या क्रॉस हो तो
वह इस क्षेत्र में बदनामी उठाता है ।
कामी हाथ

१६. हत्यारा :
यदि हथेली में हृदय रेखा का अभाव हो तथा शुक्रवलय दोहरा
हो इसके साथ ही साथ पूरा हाथ सख्त तथा मजबूत हो और
अंगूठा ठिगना, मोटा तथा थुलथुला हो तो वह व्यक्ति निश्चय ही
हत्यारा होता है ।
यदि इसके साथ ही साथ हृदय रेखा मस्तिष्क रेखा और
जीवन रेखा तीनों मंगल पर्वत पर मिलती हों तो वह व्यक्ति
निश्चय ही क्रूर और निर्दयी हत्यारा होगा तथा जीवन में एक
से अधिक हत्याएं करेगा ।
हत्यारा

१७. गुप्तचर :
यदि हथेली मे शनि पर्वत अविकसित हो तथा बुध
पर्वत दबा हुआ हो पर भाग्यरेखा पूरी लम्बाई लिए हुए हो
और मंगल पर्वत पर त्रिभुज का चिह्न लिए हुए हो तो वह
व्यक्ति सफल गुप्तचर होता है ।
गुप्तचर

( २०१ )
१८. शिक्षक :
१८. शिक्षक हाथ :—जिसके हाथ में जीवन रेखा,
भाग्यरेखा तथा सूर्य रेखा विकसित हो तथा गुरु पर्वत विकसित
हो और उस पर क्रॉस का चिह्न हो तथा अनामिका से तर्जनी
उंगली लम्बी हो तो वह सफल शिक्षक (लेक्चरार) होता है।
शिक्षक

हस्तरेखा योग

गजलक्ष्मी योग :
यदि दोनों हाथों में भाग्यरेखा मणिबन्ध से प्रारम्भ होकर सीधी शनि पर्वत
पर जा रही हो तथा सूर्य पर्वत विकसित होने के साथ-साथ
उस पर सूर्य रेखा भी पतली लम्बी तथा लालिमा लिये हुए
हो। इसके साथ ही साथ मस्तिष्क रेखा, स्वास्थ्य रेखा तथा
आयु रेखा पुष्ट हो तो उसके हाथ में गजलक्ष्मी योग बनता है।
फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह व्यक्ति साधारण
घराने में जन्म लेकर के भी अत्यन्त उच्चस्तरीय सम्मान प्राप्त
करता है। इसके साथ ही साथ वह अपने कार्यों से पहिचाना
जाता है। आर्थिक एवं भौतिक दृष्टि से ऐसे व्यक्तियों के
जीवन में किसी प्रकार की कोई कमी नहीं रहती। ऐसे व्यक्ति
स्वभाव से नम्र, विवेकवान तथा गुणवान होते हैं। व्यापार तथा विदेशों में कार्य करने
से वे व्यक्ति विशेष सफल होते हैं। वस्तुतः गजलक्ष्मी योग रखने वाला व्यक्ति जीवन
में पूर्ण सफलता प्राप्त करता है तथा मृत्यु के बाद भी उसकी कीर्त्ति अपने क्षेत्र में
अक्षुण्य रहती है।
टिप्पणी : इस योग मे यह ध्यान रखने की बात है कि यदि ऐसी स्थिति दोनों
ही हाथों में हो तभी यह योग पूर्ण माना जाता है। यदि एक ही हाथ में हो तो इसका
आधा फल समझना चाहिए ।
अमलायोग :
यदि हाथ में चन्द्र पर्वत विकसित हो और उसके साथ ही साथ सूर्य पर्वत तथा
शुक्र पर्वत भी अपने पूर्ण उभार पर हो तथा चन्द्र रेखा बुध पर्वत की ओर जाती हो
तो ऐसी स्थिति होने पर उसके हाथ में अमला योग बनता है ।

( २०६ )
फल : जिस व्यक्ति के हाथ में अमला योग होता है, वह व्यक्ति
बुद्धिमान चतुर तथा प्रसिद्धि प्राप्त करने वाला व्यक्ति माना
जाता है। आर्थिक एवं भौतिक दृष्टि से ऐसा व्यक्ति पूर्ण सफल
होता है तथा अपने जीवन में व्यापारिक कार्यों से कई बार
विदेश यात्राएं करता है। यदि हाथ में शुक्र पर्वत पूर्ण विकास
पर होता है तथा उस पर बाधक रेखाएं नहीं होतीं तो निश्चय
ही ऐसा व्यक्ति भौतिक सुख प्राप्त करता है तथा उसके जीवन
में पत्नी के अलावा भी अन्य स्त्रियों से सम्बन्ध रहते हैं।
जीवन में उसे बदनामी का सामना नहीं करना पड़ता।
अमला योग
शुभ योग :
परिभाषा : यदि दाहिने हाथ में शनि का पर्वत विकसित
हो तथा उस पर स्पष्ट भाग्य रेखा आकर बनी हो तो उसके
हाथ में शुभ योग होता है।
फल : जिस व्यक्ति के हाथ में शुभ योग होता है वह
प्रसिद्ध वक्ता, तथा जनता को सम्मोहित करने की क्षमता रखने
वाला होता है। ऐसे व्यक्ति के हाथ में इस प्रकार का योग
होता है कि वह जो कुछ भी चाहता है जनता से प्राप्त कर
लेता है। उसकी वाणी में मंत्र मुग्ध करने की शक्ति होती है।
तथा जनता की भावनाओं को अपने पक्ष में करने की उसे पूर्ण शुभ योग
कला आती है। ऐसे व्यक्ति का व्यक्तित्व अपने आप में आकर्षक एवं भव्य होता है।
टिप्पणी : शुभ योग से सम्पन्न व्यक्ति का भाग्योदय अपने जन्म स्थान
से दूर जाने पर ही होता है।
बुध योग :
परिभाषा : यदि दाहिने हाथ में बुध पर्वत अपने आप में
विकसित हो और चन्द्र पर्वत से धनुषाकार रेखा बुध पर्वत पर
पहुंचती हो और वह रेखा मार्ग में कहीं पर भी टूटी हुई या
कमजोर न हो अथवा जंजीरदार एवं बहुत अधिक मोटी न
हो तो ऐसे व्यक्ति के हाथ में बुध योग बनता है।
फल : जिस व्यक्ति के हाथ में बुध योग होता है वह
व्यापार के माध्यम से जीवन में पूर्ण सफलता प्राप्त करता है।
उसके जीवन में धन का तथा सम्मान का किसी प्रकार का कोई
बुध योग अभाव नहीं रहता। शारीरिक दृष्टि से वह पूर्णतः स्वस्थ एवं

( २०४ )
आकर्षक होता है तथा वह अपने प्रयत्नों से अपने व्यापार का विस्तार विदेशों में भी
करता है। ऐसा व्यक्ति शीघ्र निर्णय करने वाला तथा स्वस्थ मस्तिष्क का धनी होता
है। शत्रुओं का प्रबल रूप से संहार करने वाला बुद्धिमान तथा चतुर होता है।
टिप्पणी : इस योग में यह बात ध्यान रखने की है कि उसके हाथ में बुध पर्वत
विकसित हो, लालिमा लिए हुए तथा अपने स्थान पर स्थित हो। वह न तो हथेली
के बाहर निकला हुआ हो और न सूर्य की ओर झुका हुआ हो ।
इन्द्र योग :
परिभाषा : जिसके हाथ में मंगल पर्वत अपने स्वाभाविक
रूप से विकसित हो तथा मस्तिष्क रेखा तथा भाग्य रेखा पूर्ण
लम्बाई लिए हुए सीधी और स्पष्ट हो तो उस व्यक्ति की हथेली
इन्द्र में योग होता है।
फल : जिस व्यक्ति के हाथ में इन्द्र योग होता है वह व्यक्ति
बलिष्ठ, चतुर तथा सफल रणनीतिज्ञ होता है। ऐसा व्यक्ति
मिलिट्री में या पुलिस में उच्च पद प्राप्त करता है एवं राजा के
समान अपना जीवन व्यतीत करता है। ऐसा व्यक्ति बातचीत
करने में चतुर एवं सरल स्वभाव का होता है तथा उसका भाग्यो-
दय २८वें साल के बाद ही विशेष रूप से होता देखा गया है।
टिप्पणी : यह योग राज योग के समान है ऐसा अनुभव हुआ है कि जिसके हाथ में
यह योग होता है, उसकी आयु बहुत अधिक बड़ी नहीं होती परन्तु फिर भी ऐसा
व्यक्ति छोटी आयु में ही पूर्ण प्रसिद्धि प्राप्त करके अपना नाम चारों ओर फैला देता
है। भौतिकता की दृष्टि से देखा जाय तो इनके जीवन में किसी प्रकार की कोई कमी
नहीं रहती। ऐसे व्यक्ति जीवन में पूर्ण यश, सम्मान, तथा प्रसिद्धि प्राप्त करते हैं।
मरुत योग :
यदि हाथ में शुक्र पर्वत पूर्ण विकसित हो और उस पर
किसी प्रकार की बाधक रेखाएं न हों साथ ही गुरु पर्वत स्पष्ट
हो और उस पर क्रास का चिह्न हो एवं चन्द्र रेखा बलवान एवं
सीधी व स्पष्ट हो तो ऐसे व्यक्ति के हाथ में मरुत् योग होता है।
फल : जिस व्यक्ति के हाथ में मरुत् योग्य होता है वह व्यक्ति
बातचीत की कला में अत्यधिक निपुण तथा योग्य होता है।
उसका हृदय विशाल और दूसरों की सहायता करने में आनन्द

( २०५ )
अनुभव करता है । जीवन में ये व्यक्ति आर्थिक दृष्टि से पूर्णतः सुखी व सफल होते
हैं । तथा अपने प्रयत्नों से व्यापार को बहुत अधिक फैला देते हैं। ऐसे व्यक्ति तुरन्त
निर्णय लेने वाले व सही रूप में समय को पहचानने वाले होते हैं । निश्चय ही इन
व्यक्तियों के हाथों में कोई चीज अप्राप्य नहीं रहती ।
टिप्पणी : इस योग का अध्ययन करते समय यह बात ध्यान रखनी चाहिए कि हाथ
में शुक्र, गुरु तथा चन्द्र पर्वत अपने आप में पूर्ण विकसित हों तथा शुक्र रेखा एवं चन्द्र
रेखा में किसी प्रकार की कोई न्यूनता न हो ।

लग्नाधि योग :
परिभाषा : यदि हथेली में भाग्य रेखा पूर्ण विकसित हो और
पूरी हथेली में सभी पर्वत अपने आप में विकसित हों और
बुध रेखा पूरी लम्बाई लिए हुए हो तो उस व्यक्ति के हाथ में
लग्नाधियोग होता है ।
फल : जिस व्यक्ति के हाथ में लग्नाधियोग होता है वह पूर्ण
विद्वान् और चतुर वक्ता होता है । उसकी विद्वता का लोहा
अन्य लोग भी मानते हैं । शारीरिक रूप से व्यक्ति स्वस्थ, सबल,
और आकर्षक होता है । हृदय से यह उच्च विचारों वाला होता
है । सांसारिक कार्य और प्रपंचों में इसकी रुचि नहीं होती ।
यह अपने कार्य से प्रसिद्धि प्राप्त करता है ।
टिप्पणी : हथेली में यह योग तभी माना जायगा जब सभी पर्वत पूर्णतः विकसित
हों और अपने-अपने स्थान पर स्थित हों । यदि पर्वत इधर-उधर विशृंखलित हों तो इस
योग का लाभ व्यक्ति को नहीं मिल पाता ।

अधि योग :
परिभाषा : यदि चन्द्र रेखा विकसित हो और बुध पर्वत तक
पहुंची हो साथ ही उसकी एक शाखा शनि पर्वत को स्पर्श करती
हो तो उसके हाथ में अधियोग होता है ।
फल : इस योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति विनम्र होता है
तथा अपने कार्य में चतुर, सावधान तथा समय को पहचान कर
कार्य करने वाला होता है । ऐसे व्यक्ति का सम्पूर्ण जीवन
आनन्द के साथ व्यतीत होता है । भौतिक दृष्टि से उसे किसी
प्रकार की कोई कमी नहीं रहती । परन्तु कई बार ऐसे व्यक्ति
शत्रु पर विश्वास करके धोखा भी खा जाते हैं ।

टिप्पणी : इसमें चन्द्र रेखा पर विशेष बल है और ध्यान में रखने की बात यह है
कि चन्द्र रेखा का झुकाव तो बुध पर्वत की ओर ही होना चाहिए, परन्तु उसकी एक
शाखा ऊपर की ओर उठती हुई अन्य पर्वत की ओर अवश्य ही पहुँचनी चाहिए ।
शकट योग :
परिभाषा : यदि हथेली में शनि पर्वत एवं चन्द्र पर्वत दबे हुए हों । शुक्र पर्वत पर
जरूरत से ज्यादा आड़ी तिरछी रेखाएं हों तथा भाग्य रेखा
अत्यन्त कमजोर हो तो उसकी हथेली में शकट योग बनता है ।
फल : शकट योग में जिस व्यक्ति का जन्म होता है, वह
जीवन भर अभाग्यशाली ही रहता है । उसके जीवन में बरा-
बर संघर्ष बना रहता है, तथा कई बार जीवन में कर्ज लेकर
के काम चलाना पड़ता है । समाज में इसका कोई सम्मान नहीं
होता और उसका जीवन एक साधारण स्तर का ही व्यतीत
होता है ।
(चित्र: शकट योग)
टिप्पणी : जिसके हाथ मे शकट योग होता है उसमें ऊपर लिखा फल ही अधिकतर
मिलता है, परन्तु यदि उसके हाथ में बुध पर्वत तथा गुरु पर्वत विकसित हो और गुरु
पर क्रॉस का चिह्न हो तो शकट योग का इतना बुरा फल उसे देखने को नही मिलता ।
दरिद्र योग :
परिभाषा : यदि हथेली मे सभी पर्वत कमजोर हो तथा
चन्द्र पर्वत पर बिन्दु हो साथही बुध की उंगली पर तारे का
चिह्नहो तो उसकी हथेली में दरिद्र योग बनता है ।
फल : दरिद्र योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति चाहे करोड़पति
के घर में भी जन्म ले फिर भी वह अपने दुष्कर्मों के कारण
संचित पूंजी समाप्त कर देता है । तथा उसे दरिद्र जीवन
बिताने को बाध्य होना पडता है । उसका सम्पूर्ण जीवन सभी
दृष्टियों से सामान्य स्तर का होकर रह जाता है ।
(चित्र: दरिद्र योग)
टिप्पणी : हस्तरेखा के विद्वानों ने ऊपर लिखे योग के अतिरिक्त निम्न योगों को
भी दरिद्र योग माना है ।
१. यदि हथेली मे सूर्य रेखा तथा भाग्य रेखा अत्यन्त कमजोर या टूटी हुई हो ।

( २०७ )
२. यदि भाग्य रेखा मोटी तथा हथेली में धंसी हुई हो और वह मध्यमा
उंगली के प्रथम पौर तक पहुंच गई हो ।
३. यदि शुक्र पर्वत दबा हुआ हो और उस पर जरूरत से ज्यादा बाधक
रेखाएं हों ।
४. यदि हथेली में बहुत अधिक रेखाएं ऊपर से नीचे की ओर जा रही हों ।
५. यदि मध्यमा उंगली के सबसे नीचे के पौर पर तारे का चिह्न हो तथा
भाग्य रेखा कमजोर हो ।
६. यदि सूर्य रेखा मुड़कर शुक्र पर्वत की ओर जा रही हो ।
७. यदि हथेली मोटी तथा भारी हो, साथ ही उस पर सभी पर्वत कमजोर
और दबे हुए हों ।
८. चन्द्र पर्वत कमजोर हो तथा उस पर एक से अधिक क्रास हों ।
६. यदि हाथ की उंगलियां छोटी हों तथा उंगलियों के सिरे वर्गाकार हों एवं
भाग्य रेखा पलट कर हथेली के बाहर जा रही हो ।
इनमें से कोई भी योग होने पर व्यक्ति आर्थिक दृष्टि से अत्यन्त कमजोर
रहता है ।
दुरधरा योग :
यदि हथेली में शुक्र पर्वत, सूर्य पर्वत एवं शनि पर्वत
दबे हुए हों तथा सूर्य रेखा टूटी हुई हो तो दुरधरा योग बनता
है ।
फल : जिसके हाथ में दुरधरा योग होता है उस व्यक्ति का
प्रारम्भिक जीवन अत्यन्त कष्ट के साथ व्यतीत होता है । परन्तु
उसका भाग्योदय जीवन के ३६वें साल से प्रारम्भ होता है और
इस आयु के बाद वह आश्चर्यजनक रूप से प्रगति करता है ।
[चित्र: दुरधरा]
टिप्पणी : वस्तुतः दुरधरा योग का फल विचित्र है, इस योग के होने से जीवन के
पहले ३६ वर्ष अत्यन्त दुखदायी, कष्टप्रद तथा परेशानीपूर्ण होते हैं । परन्तु ३६ वर्ष
से आगे की आयु पूर्णतः सुखमय एवं समृद्धिपूर्ण होती है । हकीकत में वह आगे चलकर
धन, मान, यश, पद, प्रतिष्ठा आदि सभी कुछ प्राप्त करने में सफल होता है ।

( २०८ )
केमद्रुम योग :
परिभाषा : यदि हथेली में शुक्र पर्वत तथा सूर्य पर्वत
अविकसित हों तथा सूर्य रेखा टूटी हुई हो तो उसकी हथेली में
केमद्रुम योग बनता है।
फल : केमद्रुम योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति हमेशा दुखी
बना रहता है। उसके हाथ में भले ही अन्य अच्छे योग हों परन्तु
केमद्रुम उन सभी अच्छे योगों का नाश कर देता है। ऐसा
व्यक्ति स्वयं गलतियां करता है, और अदूरदर्शी होने के कारण
बाद में पछताता रहता है। आर्थिक दृष्टि से यह बहुत अधिक
गरीब होता है तथा जीवन में आजीविका के साधन बार-बार
बदलता है। ऐसा व्यक्ति हमेशा दूसरों पर निर्भर रहता है।
टिप्पणी : कुछ विद्वानों का विचार है कि यदि भाग्य रेखा पुष्ट हो तो केमद्रुम
भंग हो जाता है। इसके अलावा कुछ विद्वानों ने केमद्रुम भंग के अन्य तथ्य भी स्पष्ट
किये हैं।
निम्न स्थितियां हाथ में होने पर केमद्रुम योग का प्रभाव उसके जीवन में नहीं
रहता। मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि यदि हथेली में केमद्रुम योग हो परन्तु निम्न
स्थितियों में से कोई भी एक स्थिति हो तो केमद्रुम का असर उसके जीवन में नहीं
रहता।
१. यदि हथेली में सूर्य रेखा पूर्णतः प्रबल, स्पष्ट तथा सीधी हो।
२. यदि सूर्य रेखा से कोई एक सहायक रेखा बुध पर्वत की ओर पहुंची हो।
३. शुक्र पर्वत पुष्ट तथा विस्तृत क्षेत्र वाला हो तथा उस पर किसी प्रकार की
अन्य रेखाएं या जाल न हो।
४. चन्द्र पर्वत पूर्ण विकसित हो तथा उससे एक रेखा निकल कर बुध पर्वत
पर पहुंची हो।
५. हथेली में चार मणिबन्ध पूर्ण एवं स्पष्ट हों।
६. हथेली में आयु रेखा स्वास्थ्य रेखा तथा मस्तिष्क रेखा सीधी और स्पष्ट
हों तथा इन तीनों का परस्पर पूर्ण सम्बन्ध बना हो।
विशेष टिप्पणी : वस्तुतः हथेली में केमद्रुम योग होना अत्यन्त दुखमय होता है।
सामुद्रिक सुधा में लिखा है कि यदि किसी के हाथ में पूर्ण राज्य योग तथा प्रबल भाग्य
योग भी हो परन्तु हथेली में केमद्रुम योग होने से उनका नाश हो जाता है तथा उन
शुभ योगों का भी अशुभ फल मिलने लग जाता है।

( २०६ )
अनफा योग :
परिभाषा : जिसके हाथ में शुक्र क्षेत्र विस्तार लिए हुए
प्रभाव पूर्ण हो तथा इसके साथ ही साथ सूर्य रेखा तथा भाग्य
रेखा का आगे चलकर सम्बन्ध बना हो तो हथेली में अनफा
योग होता है ।
फल : जिसके हाथ में अनफा योग होता है उसका व्यक्तित्व
अपने आप में पूर्ण प्रभाव युक्त एवं चुम्बकीय होता है । वह
दूसरों पर अपने व्यक्तित्व का प्रभाव डालने में समर्थ होता है ।
समाज में वह अपने कार्यों से विशेष सम्मानित होता है ।
[अनफा] ऐसा व्यक्ति अपने विचारों पर दृढ़ रहने वाला, समझदार,
सद्गुणी तथा सुशील होता है । वह स्वयं का सम्मान चाहता है तथा दूसरों को भी
सम्मानित करने की क्षमता रखता है । ऐसा व्यक्ति हमेशा प्रसन्नचित्त एवं सुखी
रहता है ।
टिप्पणी : यह योग शुक्र सूर्य तथा शनि से मिलकर बनता है । अतः अलग अलग
ग्रहों के प्रभाव से उसके फलादेश में भी अन्तर आ जाता है। यदि एक से अधिक
ग्रहों का फल सम्मिलित हो तो वहां मिश्रित फल समझना चाहिए ।
शुक्र :--- यदि हथेली में अनफा योग बन रहा हो और शुक्र पर्वत तथा शुक्र
रेखा सबसे अधिक विकसित हो तो वह व्यक्ति प्रसिद्ध प्रेमी होता है तथा जीवन में
अपनी पत्नी के अलावा अन्य कई स्त्रियों से सम्पर्क में आता है । वह व्यक्ति दूसरों के
दिल को सम्मोहित करने की कला पूर्णतः जानता है ।
शनि :--- यदि हथेली में अनफा योग हो और शनि पर्वत पूर्णतः विकसित हो
तथा शनि रेखा भी प्रभाव पूर्ण हो तो ऐसा व्यक्ति भाग्यवान होता है एवं प्रसिद्ध
कुल में जन्म लेकर सुखमय जीवन व्यतीत करता है । वह अपने शब्दों के माध्यम से
दूसरों पर प्रभाव डालने में समर्थ होता है । जनता को किस प्रकार से बातचीत के
माध्यम से सम्मोहित किया जा सकता है, यह उसे बखूबी आता है । जीवन भर उसे
वाहन सुख बना रहता है तथा जीवन में सुन्दर स्त्रियों से उसका सम्पर्क थोड़े बहुत
रूप में रहता ही है । ऐसा व्यक्ति गुणवान, पुत्रवान तथा धनवान होता है ।
सूर्य :--- यदि हथेली में अनफा योग हो तथा सूर्य पर्वत एवं सूर्य रेखा अपने
आप में पुष्ट एवं प्रबल हो तो वह व्यक्ति व्यापार में विशेष रुचि रखने वाला होता
है । साथ ही साथ काव्य संगीत आदि कलाओं में भी वह निपुण होता है । ऐसा व्यक्ति
नौकरी में विशेष सफलता प्राप्त करता है । तथा शीघ्र ही उच्च पद प्राप्त करने में
सफल हो जाता है । उसका शरीर अपने आप में स्वस्थ एवं आकर्षक होता है । तथा

( २१० )
उसके व्यक्तित्व का प्रभाव उससे मिलने वालों पर पड़ता है, जिसकी वजह से
समाज में वह अत्यन्त लोकप्रिय हो जाता है।
ऐसा व्यक्ति अपने जीवन में सुखी, सफल एवं आनन्दमय जीवन व्यतीत करता
हुआ समाज में सम्मानित होता है ।
सुनफा योग :
यदि हथेली में सूर्य शनि तथा बुध पर्वत विकसित हो
तथा ये तीनों ही रेखाएं स्पष्ट एवं बिना कटी हुई हों तो उसके
हाथ में सुनफा योग होता है ।
फल ‧ जिस व्यक्ति की हथेली में सुनफा योग होता है वह
जीवन में परिश्रमी होता है और परिश्रम के बल पर ही धन
संचय करता है और समाज में सम्माननीय स्थान बनाता है ।
उसके प्रत्येक कार्य में सावधानी और चतुराई होती है । दूरदर्शी
होने के कारण इसके सभी निर्णय सही होते हैं । ऐसा व्यक्ति
जीवन में पूर्णतः सुखमय जीवन व्यतीत करता है । [चित्र: सुनफा]
टिप्पणी . यह योग मुख्यतः सूर्य, शनि, तथा बुध पर्वत की वजह से होता है । इसमें
एक शर्त यह होती है कि बुध रेखा शनि रेखा तथा सूर्य रेखा का हथेली के बीच में
परस्पर सम्बन्ध होना आवश्यक होता है । नीचे मैं प्रत्येक ग्रह से संबंधित विशेष
फल स्पष्ट कर रहा हूँ :
बुध :—यदि हथेली में सुनफा योग हो और बुध पर्वत तथा बुध रेखा दूसरों
की अपेक्षा ज्यादा विकसित हो, स्पष्ट हो तो वह व्यक्ति कलाओं में विशेष रुचि रखने
वाला होता है। ऐसा व्यक्ति सामाजिक परम्पराओं तथा सामाजिक उत्तरदायित्व
को पूरी तरह से निभाता है । साथ ही ऐसा व्यक्ति सामाजिक रूढ़ियों को मानने
वाला बुद्धिमान सुन्दर एवं परोपकारी होता है ।
शनि :--यदि हथेली में सुनफा योग हो परन्तु शनि पर्वत एवं शनि रेखा
विशेष पुष्ट एवं सीधी हों तो वह व्यक्ति बुद्धिमान होता है तथा राजनीति में विशेष
सफलता प्राप्त करता है । ऐसे व्यक्ति को जीवन में धन की कोई चिंता नहीं रहती ।
मन में प्रत्येक बात छिपाकर रखने में सफल रहता है और जब तक कार्य सिद्धि नहीं
हो जाती तब तक वह उस बात को उजागर नहीं करता । उसका व्यवहार सरल,
सीधा तथा भेदपूर्ण होता है ।
सूर्यः —यदि हाथ में सुनफा योग हो परन्तु सूर्य पर्वत विशेष रूप से विकसित
हो तथा सूर्य रेखा बलवान हो तो वह व्यक्ति उच्च स्तर का सम्मानित अधिकारी

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होता है । प्रशासन के क्षेत्र में वह पूर्णतः सफल होता है । तथा उत्तरदायित्वपूर्ण कार्यों
को सही प्रकार से निपटाने में कुशल माना जाता है । ऐसे व्यक्ति साधारण पद से
प्रारंभ होकर अत्यन्त उच्च पद पर पहुंचने में सफल होते हैं ।
अशुभ योग :
परिभाषा : यदि हथेली में सूर्य रेखा टूटी हुई हो तथा सूर्य
पर्वत का अभाव हो तो उसके हाथ में अशुभ योग होता है ।
फल : जिसके हाथ में अशुभ योग होता है वह व्यक्ति
कामी, क्रोधी तथा सामान्य स्तर का जीवन व्यतीत करने के लिए
बाध्य होता है । वह दूसरों को धोखा देकर पैसा हड़पने में
ज्यादा विश्वास रखता है । ऐसा व्यक्ति जीवन में असफल होता
है तथा हर कदम पर उसे बाधाओं का सामना करना पड़ता
है ।
अशुभ
शुभकर्तरी योग :
परिभाषा :—यदि हथेली के बीच का हिस्सा गहरा हो
और सूर्य एवं गुरु पर्वत उभरे हुए हो तो उसके हाथ में शुभकर्तरी
योग बनता है ।
फल :—जिसके हाथ में शुभकर्तरी योग होता है । वह
व्यक्ति तेजस्वी एवं प्रभावपूर्ण जीवन व्यतीत करने में समर्थ
होता है । उसके जीवन में आय के एक से अधिक स्रोत होते हैं,
तथा धन संचय करने में वह योग्य होता है । शारीरिक दृष्टि से
भी ऐसा व्यक्ति आकर्षक सबल, एवं पुष्ट होता है ।
शुभकर्तरी
पापकर्तरी योग :
परिभाषा :—यदि हथेली उथली हो तथा सूर्य एवं
शनि पर्वत दबे हुए या कमजोर हों तो पापकर्तरी योग होगा
फल :—इस योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति पापपूर्ण
कार्यों में व्यस्त रहता है । दूसरी को धोखा देने या दूसरों को
हानि पहुंचाने में उसे आनन्द आता है । ऐसा व्यक्ति कठोर
हृदय निर्धन तथा दुखमय जीवन व्यतीत करने को बाध्य होता
है ।
पापकर्तरी योग