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विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)

Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha

विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा

DevanagariHindipublished704 पृष्ठ

४०० आनन्द मन्दिर
योनि की गांठ
गर्भाशय
मलाशय
मूत्राशय
मूत्रमार्ग
गुदाद्वार योनिमुख
गर्भाशय के मुख के सामने योनि मार्ग मे गांठ निकल आने
से रतिक्रिया के समय स्त्री को कष्ट होता है और गर्भ नहीं रहता।

'अत्याचारी पति को अत्याचार का फल। पृ० ५०८ (सर्वाधिकार सुरक्षित)

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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ४०१
गर्भाशय के मुख पर मस्सा
गर्भाशय
मलाशय मूत्राशय
योनिमार्ग
मूत्रमार्ग
गुदाद्वार योनिमुख
अनियम रतिक्रिया तथा अनियम आहार विहार व ऋतु के
दिनो मे कुपथ्य करने से गर्भाशय के मुख पर मस्सा उत्पन्न हो
जाता है और स्त्री वन्ध्या हो जाती है ।
२६

४०२ आनन्द मन्दिर
गर्भाशय के मुख पर खराबी
गर्भाशय
मलाशय मूत्राशय
मूत्रमार्ग
योनिमुख
गुदाद्वार
पति के गर्मी सुजाक आदि रोगो से रोगी होने से पत्नी के
गर्भाशय मे खराबी आजाती है इससे गर्भाधान के समय। स्त्री को
कष्ट होता है और गर्भ भी नही रहता ।

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ४०३
अनेको ऐसी स्त्रियां मेरे पास आया करती हैं जिनके गर्भा-
शय के मुख पर मस्सा पैदा हो जाता है और वे गर्भ धारण के
अयोग्य हो जाती हैं जैसा कि चित्र पृ० ४०१ मे दिखाया गया है।
बहुतेरी स्त्रियो के चित्र पृ० ४०२ की भांति गर्भाशय के
मुख पर खराबी आ जाती है और उससे संभोग के समय कष्ट
होता है तथा गर्भ नही रहता ।
मासिक धर्म्म के समय तथा गर्भधारण
के लिये शुद्ध गर्भाशय का मुख
यह बात पहिले ही बतला दीगई है कि मासिक धर्म के दिनो
मे गर्भाशय का मुख रक्त निकलने के लिये १६ दिन खुला रहता है।
जब गर्भधारण का समय व्यतीत हो जाता है तब गर्भाशय
का मुख बन्द हो जाता है जैसा कि आगे के चित्र मे है ।
जब गर्भाशय का मुह बन्द हो जाता है तब रतिक्रिया करना
व्यर्थ होता है क्योकि पुरुष का वीर्य गर्भाशय मे नही जा सकता।
जब गर्भाशय का मुंह बन्द हो जाता है तब स्त्री की इच्छा संभोग
की नही रहती ।
इसी प्रकार विपरीत रतिक्रिया से गर्भाशय का मुख उलट
जाने से भी गर्भ नहीं रहता, सभोग के समय स्त्री को कष्ट होता
है। किन्ही २ स्त्रियों को मेद रोग हो जाता है जिसमे योनि
मार्ग चर्बी से ढक जाता है और तब ठीक संभोग न होने से
गर्भ नहीं रहता । सबके चित्र आगे देखिए ।

१०४ आनन्द मन्दिर
बन्द मुंह गर्भाशय
गर्भाशय
मलाशय
मूत्राशय
योनिमार्ग
मूत्रमार्ग
योनिमुख
गुदाद्वार
ऋतु धर्म से १६ सोलह रात्रि के बाद गर्भाशय का मुख
बन्द होजाता है फिर स्त्री की इच्छा सभोग की नही रहती ।

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ४०५
गर्भाशय का भीतर को झुका हुआ मुख
गर्भाशय
मलाशय
मूत्राशय
मूत्रमार्ग
योनिमुख
गुदाद्वार
विपरीत आसन से रतिक्रिया करने से गर्भाशय का मुख
उलट जाता है इससे स्त्री को रतिक्रिया के समय कष्ट होता है
और गर्भ भी नहीं रहता ।

१०६ आनन्द मन्दिर
मेद रोग ( चर्बी का बढ़ जाना )
गर्भाशय
मलाशय
मूत्राशय
मूत्रमार्ग
योनि मुख
गुदाद्वार
जब स्त्री के मेद रोग होजाता है तब गर्भाशय और योनि
का मार्ग भी चर्बी से ढक जाता है इस लिये गर्भ नही रहता ।

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ४०७
अज्ञानतावश विषय वासना मे लिप्त जो रात दिन अनेक
प्रकार के आसनों और स्तम्भन की औषधियों की खोज मे रहते हैं
और नियम के विरुद्ध योनि संकोचन तथा इन्द्री वृद्धि कारक औषधि
की खोज मे रहा करते हैं तथा ऐसे हानिकारक प्रयोगो के आनन्द
में स्वर्ग का रास्ता ढूंढते हैं ऐसे पुरुषो की स्त्रियां जो अज्ञानता
से योनि संकोचन की औषधियां काम मे लाती हैं उन स्त्रियो
के गर्भाशय मे अनेक प्रकार की खराबियां आजाती हैं । किसी
का गर्भाशय तीक्ष्ण औषधियो के कारण खराब हो जाता है, किसी
के गर्भाशय का मुख सूख जाता है। गर्भाशय के मुख का रक्त
जल कर उसका मुख मुरझा जाता है। किसी के गर्भाशय का
मुख भीतर को धस जाता है, किसी के गर्भाशय का मुख लटक
कर बेकार हो जाता है और वे स्त्रियां सदैव के लिये वन्ध्या हो
जाती हैं तथा रति सुख से आयु पर्यन्त वचित रहती हैं।
प्रकृति के नियम के विरुद्ध गर्भाशय से काम लेने से उसमें
अनेक प्रकार की खराबिया उत्पन्न होती हैं और स्त्रियो तथा पुरुषो
दोनो को व्यर्थ के हानि कारक प्रयोगो से हानि पहुँचती है इसी
कारण पुरुषो को अनेक रोग घेर लेते हैं।
अधिक प्रसंग से तथा संकोचन की औषधियो से स्त्रियो की
योनि में सूजन उत्पन्न हो जाती है जैसा कि अन्यत्र चित्र मे दिखलाया
गया है गर्भाशय के मुख के सामने योनि की दीवार दोनो तरफ सूजी
हुई है। यदि इस सूजन का उपाय न किया जावे और अधिक
दिन तक सूजन उत्पन्न होने पर भी वरावर संभोग किया जावे तो.

४०८ आनन्द मन्दिर

यह सूजन बनी ही रहती है इससे पुरुष की इन्द्री भी प्रसंग के
समय छिल जाती है और स्त्री की योनि भी छिल जाती है जिससे
पति पत्नी दोनों को हानि पहुँचती है ।
जैसे कुत्ता हड्डीका टुकड़ा पाकर उसे चबाता है। मुंह मे
मसूड़ों मे हड्डी के गड़ने से रक्त निकलने लगता है उसी रक्त के
स्वाद को वह अज्ञानी हड्डी के टुकड़े का स्वाद समझ कर
बड़ा प्रसन्न होता है और उसे छोड़ता नही। कभी कभी जब वह
हड्डी मुंह मे छिद जाती है तब चिल्लाता फिरता है व्याकुल हो
जाता है । यही दशा उन अज्ञानी विषयी पतियो की है जो रोग
के कारण योनि की सूजन को योनि संकोचन समझ कर भ्रम
मे पड़कर कुछ दिनो मे रोते और पछताते हैं ।

जरूरी बात

पुरुषो की अज्ञानता और विषय लोलुपता के कारण स्त्रियो
के जितने प्रकार के गुप्त रोग देखने मे आये हैं और आते हैं उन
सब का सचित्र विस्तार से हाल लिखा जावे तो एक बड़ा भारी
ग्रन्थ बन जायगा इस लिये पुरुषो को सावधान करने के लिये और
स्त्री जाति को रोगो से बचाने के लिये यहां कुछ रोग लिखे गये हैं
आशा है पाठक ऊपर लिखे विषय को भलीभांति समझ कर
नियम से रहेगे । जिन्हें यह बात मालूम न थी उन्होने अनजान
में ऐसा किया है वे आगे को सावधान हो जायगे और सदैव
इन हानिकारक अनियमो से बचते रहेगे ।

आनन्द
मन्दिर
सोलहवां अध्याय
—•—

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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ४१९
अनियम आहार विहार से स्त्रियों के
अन्य रोग
भोग और संभोग अर्थात् आहार विहार और संभोग
आदि के अनियम से स्त्री पुरुषों मे जो रोगों की उत्पत्ति होती है
उन रोगों से सैकड़ा पीछे निन्यानवे स्त्रियां रोगी देखी जाती हैं
इसी कारण पुरुषों की भी रोगी संख्या स्त्रियों की रोगी संख्या
से कम नहीं है ।
वातज योनि रोग
वातलाहार चेष्टाया वातलाया समीरणः ।
विवृद्धो योनिमाश्रित्य योनेस्तोदं सवेदनम् ॥
स्तम्भ पिपीलिकास्तृसिमिव कर्कशतां तथा ।
करोति सुप्तिमायां वातजांश्चापरान् गदान् ॥
सा स्यात् सशब्दरुत्फेनं तनुरुक्तार्तवानिलात् ।
अर्थात्—वात प्रकृति वाली स्त्री यदि वात को बढ़ाने वाले
आहार विहार और चेष्टा करे तो वायु अत्यन्त कुपित होकर
योनि का आश्रय लेकर योनि रोगों को उत्पन्न करती है। इस दशा
मे योनि मे सुई चुभने की समान पीड़ा होती है और चींटी चलने

४१२ आनन्द मन्दिर


उत्पन्न होते है। वात के कारण उस स्त्री को योनि से पतला
रूखा झागदार रक्त निकलता है रक्त निकलते समय कुछ शब्द
भी होता है ।

आहार—खाने पीने के पदार्थों को आहार कहते है। विहार
आमोद प्रमोद स्नान चलना फिरना सोना घूमना और स्त्री प्रसंग
करना इत्यादि सब विहार कहलाता है ।

आहार और विहार मे मनुष्य के सभी कार्य समझने चाहिये
इनको नियम पूर्वक न करने से अनियम आहार विहार कहे जाते
है । अनियम आहार विहार से रोगो की उत्पत्ति होती है और
नियम पूर्वक आहार विहार करने से शरीर आरोग्य और हृष्ट पुष्ट
रहता है ।

पित्तज योनि रोग

व्यायत्तथास्लवणात्क्षारैः पित्तजा भवेत् ।
दाह पाकज्वरोष्णार्त्ता नीलपीतासितार्त्तवा ॥
भृशोष्णकुणपस्त्रावा योनिः स्यात् पित्तदूषिता ।

अर्थात्—खट्टे पदार्थों का अधिक सेवन करने से तथा नम-
कीन और क्षारवाले पदार्थों के अधिक सेवन करने से पित्त कुपित
होकर योनि रोगो को उत्पन्न करता है जिसे पित्तज योनि रोग
कहा है। पित्त के कुपित होने से जो रोग उत्पन्न होते है उनमे
स्त्री की योनि मे दाह जलन योनिपाक और योनि मे पीड़ा
उत्पन्न होती है ।

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ४१३
इस कारण योनि मे से नीला पीला और काला आर्तव
(ऋतु का रक्त) निकला करता है। यह रक्त गरम गरम जलन
के साथ निकलता है इसमे मुर्दे की सी गन्ध आती है।
कफज योनि रोग
कफोऽभिष्यन्दिभिर्वृद्धो योनिंचेद् दूषयते स्त्रियः ।
सशीतां पिच्छिलां कुर्यात् कण्डुग्रस्तां सवेदनाम् ॥
पाण्डुवर्णां तथा पाण्डुपिच्छलार्त्तव वाहिनीम् ।
अर्थात्—अभिष्यन्दी कफकारक अर्थात् कफ को बढ़ाने वाले
पदार्थों के अधिक सेवन करने से कफ बढ़कर स्त्री की योनि मे
कफज रोगो को उत्पन्न करता है, इन रोगो के कारण योनि मे
शीतलता, लिवलिवापन और खुजली उत्पन्न होती है। योनि मे
पीड़ा और पीलापन होता है इसलिये योनि से पीला गिलगिला
आर्तव निकलता है।
सन्निपातक योनि रोग
समशक्त्या रसान् सर्वान् दूषयित्वा त्र

५१४ आनन्द मन्दिर
पदार्थ वात पित्त कफ तीनों को बढ़ाने वाले हैं उनका अधिक
सेवन करने से सब रस दूषित होकर योनि गर्भाशय का
आश्रय लेकर अपने अपने लक्षणों को प्रकट करते हैं। तीनों दोषों
के कारण जो योनि रोग उत्पन्न होते हैं उनसे योनि में जलन
पीडा, आदि से कष्ट अधिक होता है तथा योनि से सफेद और
गिलगिला आर्तव निकलता है। इस प्रकार की दूषित योनि में
कभी २ बडी खराबी हो जाती है ।
रक्त पित्तज योनि रोग
रक्तपित्तकरैर्नार्या रक्त पित्तेन दूषितम् ।
अति प्रवर्त्तते योन्या लब्धे बीजेऽपि साप्रजा ॥
रक्त पित्तोत्पादक आहारादि सेवन करने से रक्त पित्त के
कारण दूषित होकर योनि मे से रक्त निकलने लगता है इस दशा
मे स्त्री गर्भधारण नही कर सकती इसे रक्त पित्तज कहते हैं।
अरजस्का योनि
योनिगर्भाशयस्थं चेत् पित्तं संदूषयेदसृक् ।
सारजस्का मता कार्श्यवैवर्ण्य जननी भृशम् ॥
अर्थात्—योनि और गर्भाशय मे रहने वाला पित्त जब रक्त
को दूषित कर देता है तब रजोधर्म होना वन्द होजाता है और

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ४१५
स्त्री अत्यन्त दुर्बल और विवर्ण होजाती है ऐसी योनि को
"अरजस्का योनि कहते हैं ।
अचरणा योनि
योन्यामधावनात् कण्डूं जाताः कुर्वन्ति जन्तवः ।
सा स्यादचरणा कण्ड्वा तयातिनरकांक्षिणी ॥
अर्थात्—योनि को न धोने से उसमें एक प्रकार के अदृश्य
छोटे छोटे कीडे पड़कर योनि में खुजली उत्पन्न करते हैं इस
खुजली के कारण वह स्त्री पुरुष समागम की अत्यन्त इच्छा करती
है ऐसी योनि को अचरणा कहते हैं ।
इसके विषय में पीछे भी लिखा जा चुका है और उपाय भी
बतलाया गया है। जो स्त्रियाँ सफ़ाई से नहीं रहती योनि को
कभी कभी धोती नहीं हैं उन्हीं में यह रोग पैदा होता है तब वे
दु.खी होती हैं ।
अतिचरणा योनि
पवनोऽति व्यवायेन शोफसुप्तिरुजः स्त्रियाः ।
करोति कुपितो योनौ सा चातिचरणा मता ॥
अर्थात्—अत्यन्त मैथुन करने के कारण वायु कुपित होकर
योनि में सूजन सुप्ति और पीड़ा उत्पन्न कर देती है ऐसी यानि
को अतिचरणा कहते हैं ।

४१६ आनन्द मन्दिर
प्राक्चरणा योनि
मैथुनादति बालायाः पृष्ठजंघोरुवंच्क्षणम् ।
रुजयन् दूषियेयोनिं वायुः प्राक्चरणा तु सा ॥
अत्यन्त वाला स्त्री के साथ मैथुन करने से उसकी पीठ जांघ
ऊरु और वक्षण मे वेदना उत्पन्न करके वायु योनि को दूषित
कर देती है ऐसी योनि को प्राकचरणा कहते हैं । प्राकचरणा उसे
कहते है जो स्त्री पुरुष सहवास के योग्य अवस्था वाली न होवे
किन्तु छोटी आयु में मूर्खतावश कामान्ध पुरुष से सहवास करे
तो ऊपर लिखा रोग उत्पन्न होता है उसे ही प्राक्चरणा कहते है ।
अतिबाला स्त्री उसे कहते है जिसकी अवस्था १६ वर्ष से कम
हो, आयुर्वेद के सुश्रुत ग्रन्थ मे बतलाया हैः—
ऊनषोडशवर्षायामप्राप्तः पंचविंशतिम् ।
यद्याधत्ते पुमान् गर्भं कुक्षिस्थः स विपद्यते ॥
जातो वा न चिरंजीवेज्जीवेद्वा दुर्बलेन्द्रियः ।
तस्मादत्यन्त बालायां गर्भाधानं न कारयेत् ॥
अर्थात्—सोलह वर्ष से कम अवस्था वाली स्त्री मे पचीस
वर्ष से कम अवस्थावाला पुरुष जो गर्भ को स्थापन करे तो वह
नष्ट हो जाता है यदि नष्ट न भी हो तो निर्बल और रोगी रहकर
शीघ्र ही यम का ग्रास बन जाता है ।

पर स्त्री गमन का फल । पृ० ५०८ (सर्वाधिकार सुरक्षित )