सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)

विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)

Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha

विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा

DevanagariHindipublished704 पृष्ठ

पृष्ठ 124, कुल 704 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 124

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ६७
लक्ष्मी अर्थात् धन सम्पत्ति तब ही स्थिरता पूर्वक अर्थात् अधिक
काल तक आनन्द सहित भोग में आती हैं जब पुण्य भी अधिक
किये हों अर्थात् शुभ कर्मों की भी अधिकता हो ।
शास्त्रकारों का वचन है:—
विच्छिन्ने नितरामनङ्ग कलह-
क्रीड़ानुटत्तन्तुके ।
मुक्ताजालमिव प्रयाति झटिति-
भ्रश्यद्दिशो दृश्यताम् ॥
कामदेव की क्रीड़ा की कलह से टूटे हुए मोतियों के हार की
समान सब सुख भोग शीघ्र ही छिन्न भिन्न हो जाते हैं अर्थात्
नष्ट हो जाते हैं ।
तात्पर्य यह कि जब पुण्य क्षय हो जाता है यानी किये हुए शुभ
कर्मों का फल भोग पूरा हो जाता है तब मनुष्य के सब सुख इस
प्रकार से छिन्न भिन्न हो जाते हैं जैसे पति पत्नी में रति क्रीड़ा की
कलह से मोतियों का हार टूट जाने से हार के मोती छिन्न भिन्न
हो जाते हैं, इधर उधर बिखर जाते हैं ।
इसीलिये ऋषियों ने बतलाया है कि सांसारिक सुख भोग
और सुन्दर स्त्री स्थिरता से अर्थात् अधिक काल तक तभी भोग
में आते हैं जब कि शुभकर्म भी अधिक किये हों । इसलिये
मनुष्य को चाहिये कि सुख भोगों के साथ ही साथ शुभकर्मों की