विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
विनय-पत्रिका १४३
राग-भैरव
राम राम रमु¹, राम राम रटु, राम राम जपु जीहा ।
रामनाम नव नेह-मेह को, मन ! हठि होहि पपीहा ॥१॥
सब साधन-फल कूप-सरित-सर, सागर-सलिल निरासा ।
रामनाम-रति-स्वाति-सुधा-सुभ, सीकर प्रेमपियासा ॥२॥
गरजि, तरजि, पाषान वरषि पवि, प्रीति परखि जिय जानै ।
अधिक अधिक अनुराग उमँग उर, पर परमिति पहिचानै ॥३॥
रामनाम-गति, रामनाम-मति, रामनाम-अनुरागी ।
ह्वै गये, हैं, जे होहिंगे त्रिभुवन² तेइ गनियत बड़भागी ॥४॥
एक अंग मग अगमु गवन करि, बिलमु न छिन-छिन छाहैं ।
तुलसी हित अपनो अपनी दिसि, निरुपाधि नेम निबाहैं ॥५॥
शब्दार्थ-जीहा = जीभ । मेह = बादल । हठि = जबर्दस्ती । बूँद = बूँद । पवि = वज्र ।
परमिति = पराकाष्ठा । बिलमु = विलम्ब, विभोर होना ।
भावार्थ-हे जीभ ! तू राम राममें रम जा, राम राम रट और राम राम
जप । हे मन ! तू रामनाममें प्रेमरूपी नवीन-मेघके लिए जबर्दस्ती पपीहा बन
जा ॥१॥ तू अन्य सब साधनोंके फलरूपी कूप, नदी, तालाब और समुद्रके जलकी
आशा न रखकर केवल रामनामकी भक्तिरूपी स्वातीकी अमृततुल्य कल्याणकारी
बूँदके लिए प्रेमका प्यासा बन जा । अर्थात् जैसे पपीहा, कूप, नदी आदिके
जलकी परवाह न करके स्वातीके जलके लिए लालायित रहता है, वैसे ही हे
मन, तू भी और सब साधनोंके फलकी आशा छोड़कर रामनाममें लीन होनेके
लिए प्रेमकी प्यास लगा ॥२॥ पपीहेका प्रेमी मेघ गरजकर, डाँट बतलाकर तथा
पत्थर और वज्र बरसाकर उसके प्रेमको परखता है, उसके बाद वह अपने दिलमें
उसे समझकर पहचान लेता है कि पपीहेके हृदयानुरागकी उमंग अत्यन्त अधिक है,
चरम सीमाको भी पार कर गयी है ॥३॥ इसी प्रकार तू भी (कष्टोंकी ओर ध्यान
१. पाठान्तर 'रटु' ।
२. पाठान्तर 'होहिंगे आगे' ।
१४४ विनय-पत्रिका
न देकर) रामनाममें ही अपनी गति समझ, राम-नाममें ही बुद्धि लगा और केवल
राम-नामका ही प्रेमी बन जा । इस तरहके जितने भक्त हो गये हैं, तथा जो
(भविष्यमें) होंगे, वे ही तीनों लोकमें बड़भागी हैं ॥४॥ यह एकांगी मार्ग बड़ा
ही कठिन है। इसपर चलकर क्षण-क्षणपर छाया देखकर भूल न जा । ऐ तुलसी-
दास ! अपनी ओरसे कपट-रहित नेम निभानेमें ही तेरा निजी हित है ॥५॥
विशेष
१—'रटु' 'जपु'—ऊँचे स्वरमें रामनामका उच्चारण करनेके लिए 'रटु'
कहा है और धीरे-धीरे कहनेको 'जपु' कहा है । जप केवल अपनेहीको सुनाई
पड़ता है, दूसरेको नहीं। जप तीन प्रकारसे होता है, (१) ऊँचे स्वरमें जिसे
आस-पासके लोग सुनें, (२) जो केवल अपनेहीको सुनाई पड़े (३) जो अपनेको
भी सुनाई न पड़े; इसे मानसिक जप कहते हैं । मानसिक जप सर्वश्रेष्ठ है ।
२—'छिन छिन छाँहँ'—यहाँ स्त्री, पुत्र, धन-सम्पत्ति, भोग आदि वस्तुएँ
ही छायारूप हैं। जो मनुष्य इनके फेरमें पड़कर इन्हींमें अटक जाता है, वह
उस स्थानतक नहीं पहुँच सकता ।
( ६६ )
राम जपु, राम जपु, राम जपु, बावरे ।
घोर भव-नीर-निधि नाम निज नाव रे ॥१॥
एक ही साधन सब रिद्धि-सिद्धि साधि रे।
ग्रसे कलि-रोग जोग-संजम-समाधि रे ॥२॥
भलो जो है, पोच जो है, दाहिनो जो, बाम रे।
राम-नाम ही सो अंत सब ही को काम रे ॥३॥
जग नभ-वाटिका रही है फलि फूलि रे।
धुवाँ कैसे धौरहर देखि तू न भूलि रे ॥४॥
राम-नाम छाँड़ि जो भरोसो करै और रे।
तुलसी भरोसो त्यागि माँगै कूर कौर रे ॥५॥
शब्दार्थ—पोच=नीच। दाहिनो = सम्मुख, सीधा। बाम = विमुख, उलटा।
धौरहर = मीनार, धौरहरा, अटारी, महल । और = दूसरेका । कौर = ग्रास ।
विनय-पत्रिका १४५
भावार्थ—ऐ पागल ! राम जप, राम जप, राम जप। इस घोर संसाररूपी
समुद्रको पार करनेके लिए रामनाम ही अपनी नौका है ॥१॥ इस एक ही
साधनसे तू सब रिद्धि-सिद्धियोंको साध ले; क्योंकि कलिकालरूपी रोगने योग,
संयम और समाधिको ग्रस लिया है, अर्थात् इनसे उद्धार नहीं हो सकता ॥२॥
भला हो अथवा बुरा, सम्मुख हो अथवा विमुख, अन्तमें एक राम-नामहीसे
सबको काम पड़ेगा ॥३॥ यह संसाररूपी आकाश-वाटिका फूली-फली दिख रही
है। (सारांश, यह संसार मिथ्या है; जैसे पुष्पवाटिका में तरह-तरहके फूल-फल
दिखाई पड़ते हैं, वैसे ही आकाशमें रंग-बिरंगे बादल दिखाई पड़ते हैं; वास्तवमें
यह संसार भ्रमात्मक है और इसके सब सम्बन्ध और सुख भी मिथ्या हैं।) धुएँके
महलोंको अर्थात् स्त्री, पुत्र, कलत्रादिको देखकर तू न भूल ॥४॥ जो मनुष्य
राम-नामको छोड़कर दूसरेका भरोसा करता है, तुलसीदास कहते हैं कि वह उस
मूर्खके समान है जो आगेका परोसा हुआ भोजन छोड़कर (कुत्तेकी तरह) कौरा
माँगता फिरता है ॥५॥
विशेष
१—'निज नाव रे'—अपनी नौका कहनेका आशय यह है कि राम-नाम-
रूपी नौका अपने अधीन है। उसके द्वारा भव-सागर पार होनेमें कोई
बाधा नहीं।
२—'एक ही......साधि रे'—इसपर गोस्वामीजीने एक जगह क्या ही
उत्तम कहा है:—
“एकहि साधे सब सधै, सब साधे सब जाइ ।
तुलसी घर-बन बीच ही, राम-प्रेमपुर छाइ ॥”
३—'जोग'—योगके आठ अंग हैं—यम, नियम, आसन, प्राणायाम,
प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि । समाधिके बाद 'निर्विकल्प समाधि' है;
उसी समय आत्मसाक्षात्कार होता है।
( ६७ )
राम राम जपु जिय सदा सानुराग रे।
कलि न विराग, जोग, जाग, तप, त्याग रे ॥१॥
१०
१४६ विनय-पत्रिका
राम सुमिरन सब विधि ही को राज रे ।
राम को बिसरिबो निषेध-सिरताज रे ॥२॥
राम-नाम महामनि, फनि जग-जाल रे ।
मनि लिये फनि जियै ब्याकुल बिहाल रे ॥३॥
राम-नाम कामतरु देत फल चारि रे ।
कहत पुरान, बेद, पंडित, पुरारि रे ॥४॥
राम-नाम प्रेम-परमारथ को सार रे ।
राम-नाम तुलसी को जीवन-अधार रे ॥५॥
शब्दार्थ-सानुराग = प्रेम-सहित। फनि = साँप। जग-जाल = जगत्-प्रपंच। कामतरु =
कल्पवृक्ष।
भावार्थ-हे जीव ! प्रेमके साथ राम राम जपा कर। कलियुगमें न तो
वैराग्य ही है, और न योग, यज्ञ, तप एवं त्याग ही (अर्थात् ये सफल नहीं हो
सकते) ॥१॥ राम-नामका स्मरण करना सब विधि-कर्मोंमें श्रेष्ठ है और उसे
भुला देना निषेध-कर्मोंमें सिरमौर है ॥२॥ राम-नाम महामणि है और जगजाल
सर्प है। सर्पकी मणि ले लेनेपर क्या वह व्याकुल और विहाल सर्प जीवित रह
सकता है ? (कदापि नहीं) तात्पर्य यह कि जिस प्रकार मणि ले लेनेपर सर्प
मर जाता है, उसी प्रकार राम-नामरूपी मणि अपना लेनेसे सांसारिक कष्टरूपी
सर्प मृतवत् हो जाता है ॥३॥ रामका नाम चारों फल देनेवाला कल्पवृक्ष है;
सारांश, कल्पवृक्ष केवल अर्थ, धर्म और काम तीन ही फल देता है—मोक्ष नहीं
देता; पर राम-नाम-रूपी कल्पतरु चारों फल देता है; इस बातको वेद, पुराण,
पण्डित और शिवजी कहते हैं ॥४॥ राम-नाम, प्रेम यानी भक्ति और परमार्थका
सार है। राम-नाम ही तुलसीदास के जीवनका आधार ॥५॥
विशेष
१—'विधि'—शास्त्रोंमें विधि और निषेध दो तरहका कर्म बतलाया गया है;
उन्हीं दोनों कर्मोंकी यहाँ चर्चा की गयी है।
२—'जीवन अधार'—रामका नाम ही तुलसीदासके जीवनका आधार है।
विनय-पत्रिका १४७
अभिप्राय यह कि नामके ही प्रभावसे तुलसीदासको इहलोकमें मुट्ठीभर अन्न
मिल रहा है। उन्होंने स्वयं ही कहा है:—
'नाम लै भरै उदर एक प्रभु-दासी-दास कहाइ ।
इस नामके प्रभावसे अलौकिकके सिवाय पारलौकिक सिद्धि भी हो जाती
है। कहा भी है:—
सुमिरत सुलभ सुखद सब काहू। लोकलाहु पर-लोक निबाहू ॥
( ६८ )
राम राम राम जीह जौ लौं तू न जपिहै।
तौ लौं, तू कहूँ जाय, तिहूँ ताप तपिहै ॥१॥
सुरसरि-तीर बिनु नीर दुख पाइहै।
सुरतरु तरे तोहि दारिद सताइहै ॥२॥
जागत, बागत, सपने न सुख सोइहै।
जनम-जनम, जुग जुग जग रोइहै ॥३॥
छूटिबे के जतन विसेष बाँधौ जायगो।
ह्वै है विष भोजन को सुधा-सानि खायगो ॥४॥
तुलसी तिलोक, तिहूँ काल तोसे दीनको।
राम नाम ही की गति जैसे जल मीनको ॥५॥
शब्दार्थ—लौ = तक। सुरसरि = गंगाजी। सुरतरु = कल्पवृक्ष। बागत = फिरते हुए।
सानि = मिलाकर। तिहूँकाल = तीनों काल, भूत, वर्तमान और भविष्य। मीन = मछली।
भावार्थ—जबतक तू जीभसे राम-नाम नहीं जपेगा, तबतक तू कहीं भी
जा,—तीनों तापोंसे तपता ही रहेगा ॥१॥ तबतक तू गंगाजीके तटपर रहकर
भी बिना पानीके दुख पाता रहेगा और कल्पवृक्षके नीचे पहुँचनेपर भी तुझे
दरिद्रता सताती रहेगी ॥२॥ जागते, चलते, सोते और स्वप्नमें भी तुझे सुख नहीं
मिलेगा और जन्म-जन्म, युग-युग इस संसारमें रोता रहेगा ॥३॥ ज्यों-ज्यों तू
अपनेको छुड़ानेके लिए यत्न करेगा, त्यों-त्यों अधिक कसकर बाँधा जायगा।
उस दशामें तू जो भोजनकी सामग्री अमृतमें सानकर खायगा, वह भी तेरे लिए
विष हो जायगा ॥४॥ ऐ तुलसीदास ! त्रिलोकमें तेरे जैसा दीन कौन हुआ,
१४८ विनय-पत्रिका
कौन है अथवा कौन होगा ? बस, जैसे मछलीके लिए जल ही आधार है, उसी
प्रकार तुझे केवल राम-नामका ही भरोसा है ॥५॥
विशेष
१—'तिलोक तिहूँकाल'—पर गुसाईंजीने कहा है:—
चहुँ जुग तीन काल तिहुँ लोका । भये नाम जपि जीव बिसोका ॥
बेद पुरान संत मत एहू । सकल सुकृत फल राम-सनेहू ॥
( ६९ )
सुमिरु सनेह सों तू नाम रामराय को।
संबल निसंबल को, सखा असहाय को ॥१॥
भाग है अभागेहू को, गुन गुनहीन को।
गाहक गरीब को, दयालु दानि दीन को ॥२॥
कुल अकुलीन को, सुन्यो है बेद साखि है।
पाँगुरे को हाथ-पाँय, आँधरे को आँखि है ॥३॥
माय बाप भूखे को, अधार निराधार को।
सेतु भव-सागर को, हेतु सुखसार को ॥४॥
पतित पावन राम-नाम सो न दूसरो।
सुमिरि सुभूमि भयो तुलसी सो ऊसरो ॥५॥
शब्दार्थ—अकुलीन = कुलहीन, नीच कुलवाला। पाँगुरे = पंगु, लँगड़े-लूले। सुखसार
= सुखका सार, ब्रह्मानन्द। सुभूमि = सुन्दर भूमि, उपजाऊ भूमि। ऊसरो = ऊसर।
भावार्थ—हे जीव ! तू स्नेहसे महाराज रामचन्द्रजीके नामका स्मरण कर।
उनका नाम (भक्ति-मार्गपर जानेवालोंमें) जिनके पास मार्गव्यय नहीं है, उनके
लिए मार्गव्यय या सहारा है और असहायका सखा है ॥१॥ राम-नाम अभागेका
भाग्य और मूर्खोंका गुण है, वह गरीबका ग्राहक और दीनोंके लिए दयालु दानी
है ॥ २ ॥ वह अकुलीनका कुल है, यह मैंने सुना है और वेद भी इस बातके
साक्षी हैं। वह लँगड़े-लूलेका हाथ-पैर तथा अन्धोंकी आँख है ॥३॥ राम-नाम
भूखोंका माई-बाप, निराधारका आधार, भवसागरका पुल और ब्रह्मानन्दका
विनय-पत्रिका १४९
कारण है ॥४॥ पतितोंको पवित्र करनेके लिए राम-नामकी तरह दूसरा कुछ भी
नहीं है। राम-नामके स्मरणसे ही तुलसीदासके समान ऊसर उपजाऊ भूमि
बन गया ॥५॥
विशेष
१—'कुल······साखि'—ठीक ही है, भगवद्भक्तोंकी कुलीनता या अकु-
लीनताको कौन पूछता है ? रामभक्तोंका तो कुल ही न्यारा है; उस कुलमें
अकुलीन भी वैसे ही कुलीन हैं जिस प्रकार कुलीन । भगवान्की दृष्टिमें भेदभाव
नहीं । देखिये न, युधिष्ठिरके यज्ञमें जबतक श्वपच (चांडाल) नहीं आया,
तबतक परमात्माका पांचजन्य शंख बजा ही नहीं । सत्य है:—
जाति-पाँति पूछै नहिं कोई । हरिको भजै सो हरि को होई ॥
२—'पतित पावन राम-नाम'—इसके लिए इतना कहना पर्याप्त है ।
सबरी गीध सुसेवकनि, सुगति दीन्हि रघुनाथं ।
नाम उधारे अमित खल, वेद-विदित गुनगाथ ॥
✕ ✕ ✕
अघत अजामिल गज गनिक़ाऊ । भये मुकुत हरि-नाम-प्रभाऊ ॥
( ७० )
भलो भली भाँति है जो मेरे कहे लागिहै
मन राम नाम साँ सुभाय अनुरागिहै ॥१॥
राम नामको प्रभाउ जानि जूड़ी आगि है ।
सहित सहाय कलिकाल भीरु भागिहै ॥२॥
राम-नाम साँ बिराग, जोग, जप जागिहै ।
वामविधि भाल हू न करम दाग दागिहै ॥३॥
राम-नाम मोदक सनेह सुधा पागिहै ।
पाइ परितोष तू न द्वार द्वार वागिहै ॥४॥
राम-नाम काम-तरु जोइ जोइ माँगिहै।
तुलसिदास स्वारथ परमारथ न खाँगिहै ॥५॥
४. श्री लक्ष्मण, भरत व सीता स्तुति
१५० विनय-पत्रिका
शब्दार्थ-जूड़ी = कँपाकर आनेवाला ज्वर। सहाय = सेना। भीरु = डरपोक। वाम =
प्रतिकूल। दाग = अङ्क। दागिहै = लिख सकेंगे। बागिहै = घूमेगा। खाँगिहै = घटेगा।
भावार्थ-रे मन! यदि तू मेरे कहेपर चलकर स्वभावसे ही राम-नामसे
प्रेम करेगा, तो तेरा हर तरहसे भला होगा ॥१॥ तू यह जान ले कि जैसे गुड़गुड़ी
देकर आनेवाले ज्वरके लिए आग है, उसी प्रकार सेना-सहित डरपोंक कलिकाल-
के लिए रामनामका प्रभाव है। नामके प्रभावसे कलिकाल भाग जायगा ॥२॥
राम-नामके प्रभावसे वैराग्य, योग, जप आदि जाग्रत् हो जायेंगे, और ब्रह्मा
प्रतिकूल रहनेपर भी ललाटको कर्मरूप दागसे न दाग सकेंगे ॥३॥ यदि तू राम-
नामरूपी मोदकको प्रेम-सुधामें पागेगा अर्थात् पकावेगा, तो तू सन्तोष प्राप्त
करके द्वार-द्वार न घूमेगा ॥४॥ राम-नाम कल्पवृक्ष है, उससे तू जो-जो वस्तु
माँगेगा, सब पायेगा। ऐ तुलसीदास, उससे न तो तुझे स्वार्थकी ही कमी रहेगी
और न परमार्थकी ही ॥५॥
विशेष
१- 'जूड़ी आगि है-' इसके कई अर्थ हो सकते हैं। राम-नामका प्रभाव
सर्दी दूर करनेके लिए अग्निके समान है; अथवा नामके प्रभावसे आग भी ठण्डी
जान पड़ेगी; या नामके प्रभावको शीतल अग्नि जानकर (तात्पर्य यह कि राम-
नामके प्रभावमें कहने या देखनेमें तो किसी प्रकारका ताप प्रतीत नहीं होता,
पर नामके आश्रित जीवको यदि कोई बाधाएँ ग्रहण करती हैं तो वे जलकर
भस्म हो जाती हैं; जैसे पाला शीतल प्रतीत होता है, किन्तु लताओं और
वृक्षोंको झुलस देता है, उसी प्रकार राम-नाम सबके लिए शीतल है, किन्तु
कलिकालके लिए अग्निरूप है।) कलिकाल भाग जायगा।
२- 'न करम दाग दागिहै' - अर्थात् नामके प्रभावसे सब कर्म क्षीण
हो जायेंगे। कहा भी है-
'मेटत कठिन कुअंक भालके।'
अथवा-
'भाविउ मेटि सकहिं 'त्रिपुरारी'।
-रामचरितमानस
विनय-पत्रिका १५१
७१ )
ऐसेहुँ साहब की सेवा सों होत चोर रे ।
अपनी न बूझ, न कहै को राँडरार रे ॥१॥
मुनि-मन-अगम, सुगम माइ-बापु सो।
कृपासिन्धु, सहज सखा, सनेही आपु सो ॥२॥
लोक-वेद-विदित बड़ो न रघुनाथ सो।
सब दिन सब देस, सबहि के साथ सो ॥३॥
स्वामी सर्वग्य सों चलै न चोरी चार की।
प्रीति पहिचानि यह रीति दरवार की ॥४॥
काय न कलेस-लेस, लेत मानि मन की।
सुमिरे सकुचि रुचि जोगवत जन की ॥५॥
रीझे बस होत, खीझे देत निज धाम रे।
फलत सकल फल कामतरु-नाम रे ॥६॥
बेंचे खोटो दाम न मिलै, न राखै काम रे।
सोऊ तुलसी निवाज्यो ऐसो राजाराम रे ॥७॥
शब्दार्थ—राँडरौर = राँड़ोंकी आवाज। चार = सेवक, दूत। जोगवत = बचाते हैं,
रखते हैं। खीझे = नाराज होनेपर। निवाज्यो = निहाल किया।
भावार्थ—रे मन ! तू ऐसे भी स्वामीकी सेवा करनेसे जी चुरा रहा है! न
तो तुझमें अपना हित पहचाननेकी समझ है और न किसीके कहनेका ही तुझपर
कुछ असर पड़ता है। तू बिलकुल ही निकम्मा है ॥१॥ वह मुनियोंके मनके
लिए भी अगम और भक्तोंके लिए माँ-बापकी तरह सुगम हैं। वह कृपाके समुद्र
हैं, सहज सखा हैं और स्वभावतः स्नेही हैं ॥२॥ लोक और वेदमें यह बात
प्रकट है कि रघुनाथजीसे बड़ा कोई नहीं है। वह सर्वदा (भूत, वर्तमान, भविष्य)
सर्वत्र (स्वर्ग और नरक) और सबके साथ रहते हैं ॥३॥ सर्वज्ञ स्वामीसे सेवककी
चोरी नहीं चलती। उनके दरबारकी यह रीति है कि केवल प्रेमकी ही पहचान
की जाती है ॥४॥ उनकी सेवामें शरीरको रंचमात्र भी क्लेश नहीं होता। वह
मनकी भावनाको ही मान लेते हैं। स्मरण करनेपर वह ससंकोच भक्तोंकी रुचि
रखते हैं। सारांश, भक्तकी रुचिके अनुसार बड़ीसे बड़ी वस्तु दे डालनेपर भी
१५२ विनय-पत्रिका
संकोच करते हैं कि कुछ नहीं दिया ॥५॥ वह रीझनेपर वशीभूत हो जाते हैं
(जैसे हनुमान्जीपर रीझकर उनके वशीभूत हुए थे) और खीझनेपर मुक्ति (निज
धाम) देते हैं (जैसे रावण, बालि आदिको)। कल्पवृक्ष-सदृश जो राम-नाम है, वह
सब फल फलता है ॥६॥ जिसे (तुलसीदासको) न तो बेचनेपर फूटी कौड़ी मिल
सकती है और न रखनेसे कोई काम ही निकल सकता है, उस तुलसीदासको
भी निहाल कर दिया—ऐसे महाराज रामचन्द्रजी हैं ॥७॥
विशेष
१—'मुनि-मन.......बापु सो'—श्रीरामजी अगम भी हैं और सुगम भी।
अगम तो ऐसे हैं कि मुनियोंके ध्यानमें भी नहीं आते, और सुगम भी इस कदर
हैं कि अवधवासियों और ब्रजवासियोंको हर समय दर्शन दिया करते हैं। जैसे
माता-पिता अपने बच्चोंकी शुश्रूषा करनेमें सदैव लगे रहते हैं, उसी प्रकार
भगवान् भी अपने भक्तोंके पीछे-पीछे रहा करते हैं।
२—'सनेही आपु सो'--वह किसी भी समयमें किसी जीवको नहीं
भूलते। गर्भ सरीखे निषिद्ध स्थानमें भी परमात्मा प्रत्येक प्राणीका पालन
करते हैं।
३—'सकल फल'—कल्पवृक्ष तीन फल देता है, पर राम-नाम चारों फल।
इसीसे 'सकल फल' लिखा गया है।
७२ )
मेरो भलो कियो राम आपनी भलाई।
हौं तो साईं-द्रोही पै सेवक हित साईं ॥१॥
राम सों बड़ो है कौन, मो सों कौन छोटो।
राम सों खरो है कौन, मो सों कौन खोटो ॥२॥
लोक कहै रामको गुलाम हौं कहावों।
एतो बड़ो अपराध भो न मन बावों ॥३॥
पाथ माथे चढ़े तृन तुलसी ज्यों नीचो।
बोरत न बारि ताहि जानि आपु सींचो ॥४॥
शब्दार्थ—द्रोही = शत्रु। पै = पर। भो = हुआ। बावों = बाम, टेढ़ा। पाथ = जल।
विनय-पत्रिका १५३
भावार्थ—श्रीरामजीने अपनी भलाईके लिए (अपना बाना रखनेके लिए)
मेरा भला कर दिया। मैं तो स्वामीका शत्रु हूँ, पर स्वामी श्रीरामजी सेवकके
हितू हैं ॥१॥ भला श्रीरामजीसे बड़ा कौन है, और मुझसे छोटा कौन है ? रामजीके
समान कौन खरा है और मुझ-सा कौन खोटा है ? ॥२॥ संसार कहता है कि मैं
रामजीका गुलाम हूँ; (किन्तु वह तब कहता है जब) मैं ऐसा कहलवाता हूँ।
मुझसे इतना बड़ा अपराध हुआ, तो भी श्रीरामजीका मन मेरी ओरसे बाम नहीं
हुआ ॥३॥ हे तुलसी ! यह बात ठीक वैसी ही है, जैसे नीच तृण (तिनका)
जलके मस्तकपर चढ़ जाता है, फिर भी जल यह जानकर उसे नहीं डुबोता कि
उसने उसे सींचा है या पाला-पोसा है ॥४॥
विशेष
१—'साईं-द्रोही'—कहनेका यह आशय है कि तुच्छ और बुरा होनेपर
भी जो मैं अपनेको श्रीरामजीका गुलाम कहलवाता हूँ, उससे श्रीरामजीकी
बदनामी होगी; क्योंकि श्रीरामजीके सेवकको संसार बहुत उच्च दृष्टिसे देखता
है, पर मेरे जैसे अकिंचनको देखकर लोगोंकी क्या धारणा होगी ? भला यह
स्वामीके द्रोहीका काम नहीं तो और किसका है ?
२—'नीचो'--जलसे ही तृण उत्पन्न होता है और समय पाकर वह उसके
माथेपर चढ़ जाता है। जन्मदाताके मस्तकपर चढ़ना घोर नीचता है। इसीसे
ग्रन्थकारने 'नीचो' शब्द लिखा है।
३—'पाथ······सींचो'—यह चरण बड़ा सरस है। एक ओर जल हूँ और
दूसरी ओर कृपा । आह ! धन्य हैं गोस्वामीजी !
[ ७३ ]
जागु, जागु, जीव जड़ ! जोहै जग-जामिनी ।
देह-गेह-नेह जानि जैसे घन-दामिनी ॥१॥
सोवत सपनेहुँ सहै संसृति-संताप रे ।
बूड्यो मृग-वारि खायो जेवरी को साँप रे ॥२॥
कहँहिं वेद बुध, तू तो बूझि मन माँहिं रे ।
दोष-दुख सपने के जागे ही पै जाहिं रे ॥३॥
१५४ विनय-पत्रिका
तुलसी जागे ते जाय ताप तिहूँ ताय रे ।
राम-नाम सुचि रुचि सहज सुभाय रे ॥४॥
शब्दार्थ—नेह = स्नेह । दामिनी = बिजली । संसृति = संसार । बुध = पण्डित ।
भावार्थ—ऐ जड़ जीव ! जाग, जाग; और संसाररूपी रात्रिको देख;
अर्थात् सांसारिक अविद्या या मोहको समझ । यह जान ले कि देह और घरका
स्नेह मानो बादलोंके बीचकी बिजली है (जो जरा-सी देरके लिए कौंधकर गायब
हो जाती है) । (यदि तू यह समझता हो कि जागनेपर कष्टका ही अनुभव होगा
तो ) जो आदमी सो जाता है, वह स्वप्नमें ही मृगजालमें डूबा, रस्सीके साँपसे डस
लिया, इस प्रकार संसारका सन्ताप सहता है ॥२॥ चारों वेदों और पंडितोंका
कथन है और तू भी अपने मनमें समझ ले कि स्वप्नके दोष और दुःख जागनेपर
ही दूर होते हैं ॥३॥ तुलसीदास कहते हैं कि दैहिक, दैविक और भौतिक इन
तीनों तापोंके दुःख जागनेपर ही जाते हैं और तभी राम-नाममें पवित्र प्रीति सहज
स्वभावसे उत्पन्न होती है ॥४॥
विशेष
१—‘जागु जागु’ इस विषयमें गोस्वामीजीने रामचरितमानसमें कहा है:—
‘इहि जग जामिनि जागहिं जोगी । परमारथ एरपंच वियोगी ॥
२—‘मृगजाल’—यहाँ पुत्र, कलत्र, धन आदि ही मृगजल है ।
राग-विभास
[ ७४ ]
जानकीस की कृपा जगावती सुजान जीव,
जागि त्यागि मूढ़ताऽनुरागु श्रीहरे ।
करि विचार, तजि विकार, भजु उदार रामचंद्र-
भद्रसिंधु, दीनबंधु, वेद वदत रे ॥१॥
मोहमय कुहू-निसा विसाल काल विपुल सोयो,
खोयो सो अनूप रूप स्वप्न जो परे ।
विनय-पत्रिका १५५
अब प्रभात प्रगट ग्यान-भानुके प्रकास वास-
ना, सराग मोह-द्वेष निविड़ तम टरे ॥२॥
भागे मद-मान चोर-भोर जानि जातुधान ।
काम-कोह-लोभ-छोभ-निकर अपडरे ।
देखत रघुबर-प्रताप, बीते संताप-पाप,
ताप त्रिविध प्रेम-आप दूर ही करे ॥३॥
श्रवन सुनि गिरा गँभीर, जागे अतिधीर बीर,
बर विराग-तोष सकल संत आदरे ।
तुलसिदास प्रभु कृपालु, निरखि जीवजन विहालु,
भंज्यो भव-जाल परम मंगलाचरे ॥४॥
शब्दार्थ—वदत = कहते हैं। कुहू = अमावास्या। विपुल = बहुत । आप = जल ।
गिरा = वाणी। विहालु = व्याकुल । भंज्यो = तोड़ दिया, नष्ट कर दिया ।
भावार्थ—बुद्धिमान् जीवोंको श्रीरामजीकी कृपा जगा देती है। तू जागकर
और मूर्खताको त्यागकर परमात्माके साथ प्रीति कर। तू (सत-असतका)
विचार करके (कामक्रोधादि) विकारोंको छोड़ दे, उदार श्रीरामजीका भजन
कर; क्योंकि चारों वेद उन्हें कल्याण-सागर और दीनबन्धु कहते हैं ॥१॥ मोह-
मयी अमावास्याकी रात्रिमें तू चिरकालतक खूब सोया। जो माया-स्वप्नमें पड़
जाता है, वह अनुपम आत्म-स्वरूपको खो बैठता है। अब सबेरा प्रकट हो गया
है; ज्ञान-सूर्यका प्रकाश होते ही वासना तथा राग-सहित मोह और द्वेषरूपी
सघनान्धकार टल गया है ॥२॥ भोर हुआ जानकर मद और मानरूपी चोर
भाग गये हैं और काम, क्रोध, लोभ, क्षोभरूपी राक्षस-समूह स्वयं ही डर गये हैं।
श्रीरामजीका प्रताप देखते ही पाप-सन्ताप समाप्त हो गये हैं और तीनों तापोंको
प्रेम-रूपी जलने दूर कर दिया है ॥३॥ अपने कानसे यह गम्भीर वाणी सुनकर
अत्यन्त धीर-वीर सन्त मोह-निद्रासे जाग उठे हैं और श्रेष्ठ वैराग्य, सन्तोष
आदिका आदर करने लगे हैं। हे तुलसीदास ! कृपालु श्रीरामजीने सब प्राणियों-
को व्याकुल देखकर संसार-रूपी जालको नष्ट कर दिया है और परमानन्द देने
लगे हैं ॥४॥
१५६ विनय-पत्रिका
विशेष
१—'विसाल काल···सोयो'—संसारमें कर्मानुसार अनन्त बार जन्म लेना
और मरना ही सोना है ।
२—'खोयो'—कहा भी है, 'जो सोया सो खोया, जो जागा सो पाया' ।
राग-ललित
( ७५ )
खोटो खरो रावरो हौं, रावरे सों झूठ
क्यों कहौंगो, जानौ सबही के मनकी ।
करम-वचन-हिये, कहौं न कपट किये,
ऐसी हठ जैसी गाँठि, पानी परे सनकी ॥१॥
दूसरो भरोसो नाहिं, वासना उपासना की,
वासव, विरंचि सुर-नर-मुनिगन की ।
स्वारथ के साथी मेरे हाथी खान लेवा देई,
काहू तो न पीर रघुबीर ! दीन जन की ॥२॥
साँप-सभा साबरैं लबार भये, देव दिव्य,
दुसह साँसति कीजै आगे ही या तन की ।
साँचे परौं पाऊँ पान, पंचमें पन प्रमान,
तुलसी चातक आस राम स्यामघन की ॥३॥
शब्दार्थ—खोटो = बुरा । खरो = भला । रावरो = आपका । वासव = इन्द्र । लेवा देई =
लेन-देन । तो = तुम्हारे सदृश । साबर = एक मंत्रका नाम है । लबार = झूठा ।
भावार्थ—मैं बुरा हूँ तो भी आपका हूँ और भला हूँ तो भी आपका ही ।
भला मैं आपसे झूठ क्यों कहूँगा ? क्योंकि आप प्रत्येक प्राणीके दिलकी बात
जानते हैं । इसे मैं निष्कपट होकर मन, वचन और कर्मसे कहता हूँ । मेरे हठकी
ठीक वही दशा है जैसे पानी पड़नेपर सनकी गाँठकी । न तो मुझे दूसरा कोई
सहारा है और न इन्द्र, ब्रह्मा, देवता, मनुष्य तथा मुनियोंकी उपासना करनेकी
इच्छा है । ये सब मतलबके यार हैं, हाथीसे कुत्तेकी लेन-देन करनेवाले हैं—
विनय-पत्रिका १५७
अर्थात् मेरे आयुर्बलरूप हाथीको अपनी सेवामें खपाकर श्वान (कुत्ता) रूपी स्त्री-
पुत्रादि नश्वर पदार्थ देनेवाले हैं। हे श्रीरामजी ! दीनोंकी पीड़ाका ध्यान तुम्हारे
समान किसीको भी नहीं है ॥२॥ यदि मेरी यह बात झूठी हो तो हे दिव्यदेव !
आप अपने आगे ही मेरे इस शरीरकी कठिनसे कठिन वही दुर्दशा कीजिये, जो
दुर्दशा सर्पोंकी सभामें सावर मंत्र झूठा साबित होनेपर सँपेरेकी हुआ करती है;
किन्तु यदि मैं सच्चा साबित हो जाऊँ, तो मुझे पंचोंके बीचमें प्रतिज्ञाके प्रमाण-
स्वरूप पानका बीड़ा मिलना चाहिये-ताकि भक्तमंडली समझ सके कि तुलसी-
रूपी चातकको केवल रामरूपी श्याम-मेघकी ही आशा है ॥३॥
विशेष
१—इस पदमें ग्रंथकारने अपनी अनन्य भक्तिका पुष्टीकरण किया है।
अनन्य भक्तिका लक्षण गुसाईंजीने इस प्रकार कथन किया है:—
सो अनन्य जाके असि, मति न टरै हनुमंत ।
मैं सेवक सचराचर, रूप-स्वामि भगवन्त ॥
-रामचरितमानस
७६ )
राम को गुलाम, नाम 'रामबोला' राख्यो राम,
काम इहै, नाम द्वै हौं कबहुँ कहत हौं।
रोटी-लूगा नीके राखे, आगे हू की वेद भाखे,
भलो है है तेरो, ताते आनँद लहत हौं ॥१॥
बाँध्यो हौं करम जड़ गरब गूढ़ निगड़,
सुनत दुसह हौं तौ साँसति सहत हौं।
आरत-अनाथ-नाथ, कौसलपाल, कृपाल,
लीन्हों छीन दीन देख्यो दुरित दहत हौं ॥२॥
बूझ्यो ज्यों, कह्यो, मैं हूँ चेरो है रावरोजू,
मेरो कोऊ कहूँ नाहिं चरन गहत हौं।
मींजो गुरु पीठ, अपनाइ गहि बाँह, बोलि
सेवक-सुखद, सदा विरद वहत हौं ॥३॥
१५८ विनय-पत्रिका
लोग कहैं पोचु, सो न सोच न सँकोच मेरे
ब्याह न बरेखी, जाति-पाँति न चहत हौं।
तुलसी अकाज-काज राम ही के रीझे-खीझे,
प्रीति की प्रतीति मन मुदित रहत हौं ॥४॥
शब्दार्थ—लूगा = धोती, वस्त्र। निगड़=बेड़ी। दुरित = पाप। मींजो = हाथ रख
दिया, ठोंक दिया। विरद = बाना। अकाज-काज = नफा-नुकसान।
भावार्थ—मैं श्रीरामजीका गुलाम हूँ। रामजीने मेरा नाम 'रामबोला' रखा
है। मेरा काम यही है कि दो अक्षरका राम-नाम कभी-कभी कह लेता हूँ। इससे
रामजीने मुझे अन्न-वस्त्रसे खुशहाल रखा है, और आगे (परलोक) के लिए भी
वेदोंका कथन है कि तेरा भला होगा। इससे मैं सदा प्रसन्न रहता हूँ ॥१॥
रामजीका गुलाम होनेके पहले मैं जड़ कर्मोंकी अभिमानरूपी पुष्ट बेड़ियोंसे
बँधा हुआ था, यह सुनते ही कि मैं तो असह्य कष्ट सह रहा हूँ, आत्तों और
अनाथोंके स्वामी कृपालु श्रीरघुनाथजीने देखा कि मैं दीन हूँ और पापोंसे
जल रहा हूँ, अतः उन्होंने मुझे कर्मबन्धनसे छुड़ा लिया ॥२॥ उन्होंने ज्यों ही
मुझसे पूछा, त्यों ही मैंने भी कहा कि मैं भी आपका दास होना चाहता हूँ,
मेरा कोई कहीं नहीं है, मैं आपके चरणोंको पकड़ता हूँ। इसपर गुरुरूप
श्रीरामजीने मेरी पीठ ठोंक दी और बुलाकर मेरी बाँह पकड़ ली; तभीसे मैं भक्तों-
को सुख पहुँचानेवाला (भगवान्का वैष्णवी) बाना धारण किये रहता हूँ ॥३॥
इससे लोग मुझे नीच कहते हैं; किन्तु इसका न तो मुझे सोच है और न मेरे
दिलमें किसी तरह का संकोच ही हो रहा है। क्योंकि न तो मुझे ब्याह-बरेखी
(सगाई) करनेकी ही जरूरत है और न मैं जाति-पाँतिका ही कायल हूँ।
तुलसीदासका नफा-नुकसान श्रीरामजीके ही रीझने और खीझनेपर निर्भर है;
किन्तु मुझे उनके प्रेमपर विश्वास है, इसीसे मैं मन ही मन प्रसन्न रहा
करता हूँ ॥
विशेष
१—'रामबोला'—कुछ लोग जो यह कहते हैं कि गोसाईंजीका पूर्व नाम
रामबोला था, वह इसीके आधारपर जान पड़ता है। काशी नागरीप्रचारिणी
विनय-पत्रिका १५९
सभाके पाँच सदस्यों द्वारा सम्पादित रामचरितमानसमें लिखा है कि “इससे
हमारा यह भी अनुमान होता है कि इनका विवाह नहीं हुआ था। माता-
पिताको छोड़ देना तथा बचपनसे गुरुके साथ घूमना रामायण आदिसे भी
प्रमाणित होता है और उसकी दृढ़ता इस पदसे भी होती है।”
२—'रोटी लूगा'—के स्थानपर श्रीरामेश्वर भट्टने तो 'रोटी लूँगा' अर्थ
किया ही है, वियोगी हरिजीने भी टीकाके प्रथम संस्करणमें 'सिर्फ रोटी लूँगा'
(और कुछ नहीं चाहिये), अर्थ लिखा है। उक्त टीकाकारोंने यह नहीं सोचा कि
'लेना' क्रियाका 'लूगा' रूप हो सकता है या नहीं। इसीसे ऐसी भद्दी भूल
हुई है।
( ७७ )
जानकी-जीवन, जग जीवन, जगत हित,
जगदीस, रघुनाथ, राजीवलोचन राम।
सरद-बिधु-वदन, सुखसील, श्रीसदन,
सहज सुंदर तनु, सोभा अगनित काम ॥१॥
जग-सुपिता, सुमातु, सुगुरु, सुहित, सुमीत,
सबको दाहिनो, दीनबन्धु, काहू को न बाम।
आरतिहरन, सरनद, अतुलित दानि,
प्रनतपाल, कृपालु, पतित-पावन नाम ॥२॥
सकल विस्व बंदित, सकल सुर-सेवित,
आगम-निगम कहैं रावरेई गुनग्राम।
इहै जानिकै तुलसी तिहारो जन भयो,
न्यारो कै गनिबो जहाँ गने गरीब गुलाम ॥३॥
शब्दार्थ—बिधु = चन्द्रमा। श्रीसदन = लक्ष्मीका निवासस्थान। दाहिनो = अनु-
कूल। आगम = वेद। निगम = शास्त्र। कै = या, अथवा। सरनद = शरण देनेवाले।
भावार्थ—हे रामजी ! आप जानकीजीके, और संसारके जीवन, जगत्के
हितकारी, जगदीश, रघुकुलके स्वामी तथा कमलके समान नेत्रवाले हैं। आपका
मुख शारदीय पूर्णिमाके समान है। आप सुख प्रदान करनेवाले हैं और लक्ष्मीजी-
१६० विनय-पत्रिका
के निवासस्थान हैं। सहज (बिना बनावट-सजावटके) ही आपके सुन्दर शरीर-
की शोभा अगणित कामदेवोंके समान है ॥१॥ आप जगत्के पिता, माता, गुरु,
हितू, मित्र, सबपर अनुकूल रहनेवाले, दीनबन्धु तथा किसीके भी प्रतिकूल न
रहनेवाले हैं। आप दुःखोंके हरनेवाले, (शरणागतोंको) शरण देनेवाले, अमित-
दानी, भक्तोंका पालन करनेवाले और कृपालु हैं। आपका नाम पापियोंको पवित्र
करनेवाला है ॥२॥ विश्व-ब्रह्माण्ड आपकी वन्दना करता है, समस्त देवता
आपकी सेवा करते हैं तथा वेद और शास्त्र आपकी ही गुणावली गाते हैं ! यही
सब जानकर तुलसीदास आपका सेवक हुआ है; आप इसे (तुलसीदासको)
अलग गिनेंगे या गरीब गुलामोंमें गिनेंगे ? ॥३॥
राग तोड़ी
( ७८ )
देव—
दीन को दयालु दानि दूसरो न कोऊ ।
जाहि दीनता कहौं हौं देखौं दीन सोऊ ॥१॥
सुर, नर, मुनि, असुर, नाग साहिब तौ घनेरे ।
पै तौ लों जौ लों रावरे न नेकु नयन फेरे ॥२॥
त्रिभुवन, तिहुँकाल विदित, वेद वदति चारी ।
आदि-अंत-मध्य राम ! साहिबी तिहारी ॥३॥
तोहि माँगि माँगनौ न माँगनो कहायो ।
सुनि सुभाव-सील-सुजसु जाचन जन आयो ॥४॥
पाहन-पसु, विटप-विहँग अपने करि लीन्हे ।
महाराज दसरथ के ! रंक राय कीन्हे ॥५॥
तू गरीब को निवाज, हौं गरीब तेरो ।
बारक कहिये कृपालु ! तुलसिदास मेरो ॥६॥
शब्दार्थ—हौं = मै । घनेरे = बहुतेरे । लौ = तक । कहति = कहते हैं । पाहन = पत्थर,
यहाँ यह शब्द अहिल्याके अर्थमें है । विटप = पेड़, (यमलार्जुन) । विहँग = पक्षी (गीध जटायु
और काकभुशुंडि) । रंक = भिखारी । राय = राजा । बारक = एक बार ।
विनय-पत्रिका १६१
भावार्थ—हे श्रीरामजी ! दीनोंके लिए दयालु दानी (आपके सिवा) दूसरा
कोई नहीं है। मैं जिसे अपनी दीनता सुनाता हूँ, वह (स्वयं ही) दीन नजर आता
है ॥१॥ यों तो देवता, मनुष्य, मुनि, दैत्य, नाग आदि बहुत-से मालिक हैं, पर
ये सब तभीतक हैं, जबतक आपकी दृष्टि जरा भी टेढ़ी नहीं होती ॥२॥ तीनों
लोक और तीनों कालमें यही प्रसिद्ध है तथा चारों वेद भी कह रहे हैं कि हे
राम ! आदि, अन्त और मध्यमें (केवल) आपकी ही साहबी है ॥३॥ आपसे
माँगनेके बाद कोई भी भिक्षुक फिर मंगन नहीं रह गया। आपका यही स्वभाव,
शील और सुयश सुनकर यह दास माँगने आया है ॥४॥ आपने पाषाण
(अहल्या), पशु (वानर-भालू), वृक्ष (यमलार्जुन) और पक्षी (जटायु, काक-
भुशुंडि आदि) तकको अपना लिया है। हे महाराज दशरथके पुत्र ! आपने
दरिद्रोंको राजा बना दिया है ॥५॥ आप गरीबोंको निहाल करनेवाले हैं, और
मैं आपका गरीब दास हूँ। हे कृपालु ! एक बार कह दीजिये कि तुलसीदास
मेरा है ॥६॥
विशेष
१—'विटप'—एक बार कुबेरके पुत्र नलकुबर और मणिग्रीवके मजाक
उड़ानेपर नारदजीने उन्हें वृक्ष हो जानेके लिए शाप दे दिया था। अन्तमें उनके
प्रार्थना करनेपर नारदजीने कह दिया था कि भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंके स्पर्शसे
तुम्हारा उद्धार हो जायगा। वे दोनों भाई नारदके शापसे गोकुलमें अर्जुन वृक्ष
बन गये। एक दिन यशोदाजीने किसी अपराधके कारण बालक श्रीकृष्णको
ऊखलमें बाँध दिया। भगवान् धीरे-धीरे उन जुड़े हुए पेड़ोंके पास पहुँचे और
ऊखलको दोनों वृक्षोंके बीचमें फँसाकर ऐसा झटका दिया कि दोनों पेड़ गिर
पड़े। इस प्रकार वे दोनों वृक्ष-योनि छोड़कर यक्ष हो गये और भगवान्की
स्तुति करने लगे। परमात्माने उन्हें मुक्त कर दिया।
२—विहंग—(जटायु) ४३ वें पदके विशेषमें देखिये।
( ७९ )
देव—
तू दयालु, दीन हों, तू दानि, हों भिखारी।
हों प्रसिद्ध पातकी, तू पाप-पुंज-हारी ॥१॥
१०
१६२ विनय-पत्रिका
नाथ तू अनाथ को, अनाथ कौन मोसों ?
मो समान आरत नहिं, आरतिहर तोसों ॥२॥
ब्रह्म तू, हौं जीव, तू है ठाकुर, हौं चेरो ।
तात-मातु, गुरु-सखा तू सब बिधि हितु मेरो ॥३॥
तोहिं मोहिं नाते अनेक, मानिये जो भावै ।
ज्यों त्यों तुलसी कृपालु ! चरन-सरन पावै ॥४॥
शब्दार्थ—पातकी = पापी । आरत = दुखी । आरतिहर = पीड़ाको हरनेवाला । ठाकुर =
स्वामी । चेरो = दास, सेवक । तात = पिता । नाते = सम्बन्ध ।
भावार्थ—हे प्रभो ! तुम दयालु हो, और मैं दीन हूँ । तुम दानी हो और
मैं भिखारी हूँ । मैं प्रसिद्ध पापी हूँ, और तुम पाप-समूहका नाश करनेवाले हो
॥१॥ तुम अनाथोंके नाथ हो, और मेरे जैसा अनाथ कोई भी नहीं है । न तो
मेरे समान कोई दुखिया है, और न तुम्हारे जैसा कोई दुःखका हरनेवाला ही है
॥२॥ तुम साक्षात् ब्रह्म हो, और मैं जीव हूँ । तुम स्वामी हो, मैं सेवक हूँ ।
तुम्हीं मेरे पिता, माता, गुरु, सखा तथा सब प्रकारसे हितकारी हो ॥३॥ तुम्हारे
और मेरे बीच बहुत-से नाते हैं, उनमें जो रुचे उसे मान लो । हे कृपालु ! किसी
तरह भी हो, तुलसीदासको तुम्हारे चरणोंकी शरण मिलनी चाहिये ॥४॥
विशेष
१—'तोहि मोहि नाते अनेक'—कविने ऊपर कई नाते गिना दिये हैं;
जैसे—तुम दयालु हो और मैं दीन हूँ; अर्थात् दयालुको दीनोंकी ही आवश्यकता
रहा करती है । यदि दीन ही न हों तो आप दयालुता किसपर दिखायेंगे ?
इसी प्रकार दीनको भी दयालुकी आवश्यकता रहती है ।
[ ८० ]
दंद—
और काहि माँगिये, को माँगिवो निवारै ।
अभिमतदातार कौन, दुख दरिद्र दारै ॥१॥
धरमधाम राम काम-कोटि-रूप रूरो ।
साहब सब बिधि सुजान, दान-खड्ग-सूरो ॥२॥