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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 171

१६० विनय-पत्रिका
के निवासस्थान हैं। सहज (बिना बनावट-सजावटके) ही आपके सुन्दर शरीर-
की शोभा अगणित कामदेवोंके समान है ॥१॥ आप जगत्‌के पिता, माता, गुरु,
हितू, मित्र, सबपर अनुकूल रहनेवाले, दीनबन्धु तथा किसीके भी प्रतिकूल न
रहनेवाले हैं। आप दुःखोंके हरनेवाले, (शरणागतोंको) शरण देनेवाले, अमित-
दानी, भक्तोंका पालन करनेवाले और कृपालु हैं। आपका नाम पापियोंको पवित्र
करनेवाला है ॥२॥ विश्व-ब्रह्माण्ड आपकी वन्दना करता है, समस्त देवता
आपकी सेवा करते हैं तथा वेद और शास्त्र आपकी ही गुणावली गाते हैं ! यही
सब जानकर तुलसीदास आपका सेवक हुआ है; आप इसे (तुलसीदासको)
अलग गिनेंगे या गरीब गुलामोंमें गिनेंगे ? ॥३॥
राग तोड़ी
( ७८ )
देव—
दीन को दयालु दानि दूसरो न कोऊ ।
जाहि दीनता कहौं हौं देखौं दीन सोऊ ॥१॥
सुर, नर, मुनि, असुर, नाग साहिब तौ घनेरे ।
पै तौ लों जौ लों रावरे न नेकु नयन फेरे ॥२॥
त्रिभुवन, तिहुँकाल विदित, वेद वदति चारी ।
आदि-अंत-मध्य राम ! साहिबी तिहारी ॥३॥
तोहि माँगि माँगनौ न माँगनो कहायो ।
सुनि सुभाव-सील-सुजसु जाचन जन आयो ॥४॥
पाहन-पसु, विटप-विहँग अपने करि लीन्हे ।
महाराज दसरथ के ! रंक राय कीन्हे ॥५॥
तू गरीब को निवाज, हौं गरीब तेरो ।
बारक कहिये कृपालु ! तुलसिदास मेरो ॥६॥
शब्दार्थ—हौं = मै । घनेरे = बहुतेरे । लौ = तक । कहति = कहते हैं । पाहन = पत्थर,
यहाँ यह शब्द अहिल्याके अर्थमें है । विटप = पेड़, (यमलार्जुन) । विहँग = पक्षी (गीध जटायु
और काकभुशुंडि) । रंक = भिखारी । राय = राजा । बारक = एक बार ।