विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 166, कुल 475 में से
संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका १५५
अब प्रभात प्रगट ग्यान-भानुके प्रकास वास-
ना, सराग मोह-द्वेष निविड़ तम टरे ॥२॥
भागे मद-मान चोर-भोर जानि जातुधान ।
काम-कोह-लोभ-छोभ-निकर अपडरे ।
देखत रघुबर-प्रताप, बीते संताप-पाप,
ताप त्रिविध प्रेम-आप दूर ही करे ॥३॥
श्रवन सुनि गिरा गँभीर, जागे अतिधीर बीर,
बर विराग-तोष सकल संत आदरे ।
तुलसिदास प्रभु कृपालु, निरखि जीवजन विहालु,
भंज्यो भव-जाल परम मंगलाचरे ॥४॥
शब्दार्थ—वदत = कहते हैं। कुहू = अमावास्या। विपुल = बहुत । आप = जल ।
गिरा = वाणी। विहालु = व्याकुल । भंज्यो = तोड़ दिया, नष्ट कर दिया ।
भावार्थ—बुद्धिमान् जीवोंको श्रीरामजीकी कृपा जगा देती है। तू जागकर
और मूर्खताको त्यागकर परमात्माके साथ प्रीति कर। तू (सत-असतका)
विचार करके (कामक्रोधादि) विकारोंको छोड़ दे, उदार श्रीरामजीका भजन
कर; क्योंकि चारों वेद उन्हें कल्याण-सागर और दीनबन्धु कहते हैं ॥१॥ मोह-
मयी अमावास्याकी रात्रिमें तू चिरकालतक खूब सोया। जो माया-स्वप्नमें पड़
जाता है, वह अनुपम आत्म-स्वरूपको खो बैठता है। अब सबेरा प्रकट हो गया
है; ज्ञान-सूर्यका प्रकाश होते ही वासना तथा राग-सहित मोह और द्वेषरूपी
सघनान्धकार टल गया है ॥२॥ भोर हुआ जानकर मद और मानरूपी चोर
भाग गये हैं और काम, क्रोध, लोभ, क्षोभरूपी राक्षस-समूह स्वयं ही डर गये हैं।
श्रीरामजीका प्रताप देखते ही पाप-सन्ताप समाप्त हो गये हैं और तीनों तापोंको
प्रेम-रूपी जलने दूर कर दिया है ॥३॥ अपने कानसे यह गम्भीर वाणी सुनकर
अत्यन्त धीर-वीर सन्त मोह-निद्रासे जाग उठे हैं और श्रेष्ठ वैराग्य, सन्तोष
आदिका आदर करने लगे हैं। हे तुलसीदास ! कृपालु श्रीरामजीने सब प्राणियों-
को व्याकुल देखकर संसार-रूपी जालको नष्ट कर दिया है और परमानन्द देने
लगे हैं ॥४॥