विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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न देकर) रामनाममें ही अपनी गति समझ, राम-नाममें ही बुद्धि लगा और केवल
राम-नामका ही प्रेमी बन जा । इस तरहके जितने भक्त हो गये हैं, तथा जो
(भविष्यमें) होंगे, वे ही तीनों लोकमें बड़भागी हैं ॥४॥ यह एकांगी मार्ग बड़ा
ही कठिन है। इसपर चलकर क्षण-क्षणपर छाया देखकर भूल न जा । ऐ तुलसी-
दास ! अपनी ओरसे कपट-रहित नेम निभानेमें ही तेरा निजी हित है ॥५॥
विशेष
१—'रटु' 'जपु'—ऊँचे स्वरमें रामनामका उच्चारण करनेके लिए 'रटु'
कहा है और धीरे-धीरे कहनेको 'जपु' कहा है । जप केवल अपनेहीको सुनाई
पड़ता है, दूसरेको नहीं। जप तीन प्रकारसे होता है, (१) ऊँचे स्वरमें जिसे
आस-पासके लोग सुनें, (२) जो केवल अपनेहीको सुनाई पड़े (३) जो अपनेको
भी सुनाई न पड़े; इसे मानसिक जप कहते हैं । मानसिक जप सर्वश्रेष्ठ है ।
२—'छिन छिन छाँहँ'—यहाँ स्त्री, पुत्र, धन-सम्पत्ति, भोग आदि वस्तुएँ
ही छायारूप हैं। जो मनुष्य इनके फेरमें पड़कर इन्हींमें अटक जाता है, वह
उस स्थानतक नहीं पहुँच सकता ।
( ६६ )
राम जपु, राम जपु, राम जपु, बावरे ।
घोर भव-नीर-निधि नाम निज नाव रे ॥१॥
एक ही साधन सब रिद्धि-सिद्धि साधि रे।
ग्रसे कलि-रोग जोग-संजम-समाधि रे ॥२॥
भलो जो है, पोच जो है, दाहिनो जो, बाम रे।
राम-नाम ही सो अंत सब ही को काम रे ॥३॥
जग नभ-वाटिका रही है फलि फूलि रे।
धुवाँ कैसे धौरहर देखि तू न भूलि रे ॥४॥
राम-नाम छाँड़ि जो भरोसो करै और रे।
तुलसी भरोसो त्यागि माँगै कूर कौर रे ॥५॥
शब्दार्थ—पोच=नीच। दाहिनो = सम्मुख, सीधा। बाम = विमुख, उलटा।
धौरहर = मीनार, धौरहरा, अटारी, महल । और = दूसरेका । कौर = ग्रास ।