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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 173

१६२ विनय-पत्रिका
नाथ तू अनाथ को, अनाथ कौन मोसों ?
मो समान आरत नहिं, आरतिहर तोसों ॥२॥
ब्रह्म तू, हौं जीव, तू है ठाकुर, हौं चेरो ।
तात-मातु, गुरु-सखा तू सब बिधि हितु मेरो ॥३॥
तोहिं मोहिं नाते अनेक, मानिये जो भावै ।
ज्यों त्यों तुलसी कृपालु ! चरन-सरन पावै ॥४॥
शब्दार्थ—पातकी = पापी । आरत = दुखी । आरतिहर = पीड़ाको हरनेवाला । ठाकुर =
स्वामी । चेरो = दास, सेवक । तात = पिता । नाते = सम्बन्ध ।
भावार्थ—हे प्रभो ! तुम दयालु हो, और मैं दीन हूँ । तुम दानी हो और
मैं भिखारी हूँ । मैं प्रसिद्ध पापी हूँ, और तुम पाप-समूहका नाश करनेवाले हो
॥१॥ तुम अनाथोंके नाथ हो, और मेरे जैसा अनाथ कोई भी नहीं है । न तो
मेरे समान कोई दुखिया है, और न तुम्हारे जैसा कोई दुःखका हरनेवाला ही है
॥२॥ तुम साक्षात् ब्रह्म हो, और मैं जीव हूँ । तुम स्वामी हो, मैं सेवक हूँ ।
तुम्हीं मेरे पिता, माता, गुरु, सखा तथा सब प्रकारसे हितकारी हो ॥३॥ तुम्हारे
और मेरे बीच बहुत-से नाते हैं, उनमें जो रुचे उसे मान लो । हे कृपालु ! किसी
तरह भी हो, तुलसीदासको तुम्हारे चरणोंकी शरण मिलनी चाहिये ॥४॥
विशेष
१—'तोहि मोहि नाते अनेक'—कविने ऊपर कई नाते गिना दिये हैं;
जैसे—तुम दयालु हो और मैं दीन हूँ; अर्थात् दयालुको दीनोंकी ही आवश्यकता
रहा करती है । यदि दीन ही न हों तो आप दयालुता किसपर दिखायेंगे ?
इसी प्रकार दीनको भी दयालुकी आवश्यकता रहती है ।
[ ८० ]
दंद—
और काहि माँगिये, को माँगिवो निवारै ।
अभिमतदातार कौन, दुख दरिद्र दारै ॥१॥
धरमधाम राम काम-कोटि-रूप रूरो ।
साहब सब बिधि सुजान, दान-खड्ग-सूरो ॥२॥