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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 158, कुल 475 में से

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पृष्ठ 158

विनय-पत्रिका १४७
अभिप्राय यह कि नामके ही प्रभावसे तुलसीदासको इहलोकमें मुट्ठीभर अन्न
मिल रहा है। उन्होंने स्वयं ही कहा है:—
'नाम लै भरै उदर एक प्रभु-दासी-दास कहाइ ।
इस नामके प्रभावसे अलौकिकके सिवाय पारलौकिक सिद्धि भी हो जाती
है। कहा भी है:—
सुमिरत सुलभ सुखद सब काहू। लोकलाहु पर-लोक निबाहू ॥
( ६८ )
राम राम राम जीह जौ लौं तू न जपिहै।
तौ लौं, तू कहूँ जाय, तिहूँ ताप तपिहै ॥१॥
सुरसरि-तीर बिनु नीर दुख पाइहै।
सुरतरु तरे तोहि दारिद सताइहै ॥२॥
जागत, बागत, सपने न सुख सोइहै।
जनम-जनम, जुग जुग जग रोइहै ॥३॥
छूटिबे के जतन विसेष बाँधौ जायगो।
ह्वै है विष भोजन को सुधा-सानि खायगो ॥४॥
तुलसी तिलोक, तिहूँ काल तोसे दीनको।
राम नाम ही की गति जैसे जल मीनको ॥५॥
शब्दार्थ—लौ = तक। सुरसरि = गंगाजी। सुरतरु = कल्पवृक्ष। बागत = फिरते हुए।
सानि = मिलाकर। तिहूँकाल = तीनों काल, भूत, वर्तमान और भविष्य। मीन = मछली।
भावार्थ—जबतक तू जीभसे राम-नाम नहीं जपेगा, तबतक तू कहीं भी
जा,—तीनों तापोंसे तपता ही रहेगा ॥१॥ तबतक तू गंगाजीके तटपर रहकर
भी बिना पानीके दुख पाता रहेगा और कल्पवृक्षके नीचे पहुँचनेपर भी तुझे
दरिद्रता सताती रहेगी ॥२॥ जागते, चलते, सोते और स्वप्नमें भी तुझे सुख नहीं
मिलेगा और जन्म-जन्म, युग-युग इस संसारमें रोता रहेगा ॥३॥ ज्यों-ज्यों तू
अपनेको छुड़ानेके लिए यत्न करेगा, त्यों-त्यों अधिक कसकर बाँधा जायगा।
उस दशामें तू जो भोजनकी सामग्री अमृतमें सानकर खायगा, वह भी तेरे लिए
विष हो जायगा ॥४॥ ऐ तुलसीदास ! त्रिलोकमें तेरे जैसा दीन कौन हुआ,