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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 156

विनय-पत्रिका १४५
भावार्थ—ऐ पागल ! राम जप, राम जप, राम जप। इस घोर संसाररूपी
समुद्रको पार करनेके लिए रामनाम ही अपनी नौका है ॥१॥ इस एक ही
साधनसे तू सब रिद्धि-सिद्धियोंको साध ले; क्योंकि कलिकालरूपी रोगने योग,
संयम और समाधिको ग्रस लिया है, अर्थात् इनसे उद्धार नहीं हो सकता ॥२॥
भला हो अथवा बुरा, सम्मुख हो अथवा विमुख, अन्तमें एक राम-नामहीसे
सबको काम पड़ेगा ॥३॥ यह संसाररूपी आकाश-वाटिका फूली-फली दिख रही
है। (सारांश, यह संसार मिथ्या है; जैसे पुष्पवाटिका में तरह-तरहके फूल-फल
दिखाई पड़ते हैं, वैसे ही आकाशमें रंग-बिरंगे बादल दिखाई पड़ते हैं; वास्तवमें
यह संसार भ्रमात्मक है और इसके सब सम्बन्ध और सुख भी मिथ्या हैं।) धुएँके
महलोंको अर्थात् स्त्री, पुत्र, कलत्रादिको देखकर तू न भूल ॥४॥ जो मनुष्य
राम-नामको छोड़कर दूसरेका भरोसा करता है, तुलसीदास कहते हैं कि वह उस
मूर्खके समान है जो आगेका परोसा हुआ भोजन छोड़कर (कुत्तेकी तरह) कौरा
माँगता फिरता है ॥५॥
विशेष
१—'निज नाव रे'—अपनी नौका कहनेका आशय यह है कि राम-नाम-
रूपी नौका अपने अधीन है। उसके द्वारा भव-सागर पार होनेमें कोई
बाधा नहीं।
२—'एक ही......साधि रे'—इसपर गोस्वामीजीने एक जगह क्या ही
उत्तम कहा है:—
“एकहि साधे सब सधै, सब साधे सब जाइ ।
तुलसी घर-बन बीच ही, राम-प्रेमपुर छाइ ॥”
३—'जोग'—योगके आठ अंग हैं—यम, नियम, आसन, प्राणायाम,
प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि । समाधिके बाद 'निर्विकल्प समाधि' है;
उसी समय आत्मसाक्षात्कार होता है।
( ६७ )
राम राम जपु जिय सदा सानुराग रे।
कलि न विराग, जोग, जाग, तप, त्याग रे ॥१॥
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