सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariAwadhipublished475 पृष्ठ

पृष्ठ 167, कुल 475 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 167

१५६ विनय-पत्रिका
विशेष
१—'विसाल काल···सोयो'—संसारमें कर्मानुसार अनन्त बार जन्म लेना
और मरना ही सोना है ।
२—'खोयो'—कहा भी है, 'जो सोया सो खोया, जो जागा सो पाया' ।
राग-ललित
( ७५ )
खोटो खरो रावरो हौं, रावरे सों झूठ
क्यों कहौंगो, जानौ सबही के मनकी ।
करम-वचन-हिये, कहौं न कपट किये,
ऐसी हठ जैसी गाँठि, पानी परे सनकी ॥१॥
दूसरो भरोसो नाहिं, वासना उपासना की,
वासव, विरंचि सुर-नर-मुनिगन की ।
स्वारथ के साथी मेरे हाथी खान लेवा देई,
काहू तो न पीर रघुबीर ! दीन जन की ॥२॥
साँप-सभा साबरैं लबार भये, देव दिव्य,
दुसह साँसति कीजै आगे ही या तन की ।
साँचे परौं पाऊँ पान, पंचमें पन प्रमान,
तुलसी चातक आस राम स्यामघन की ॥३॥
शब्दार्थ—खोटो = बुरा । खरो = भला । रावरो = आपका । वासव = इन्द्र । लेवा देई =
लेन-देन । तो = तुम्हारे सदृश । साबर = एक मंत्रका नाम है । लबार = झूठा ।
भावार्थ—मैं बुरा हूँ तो भी आपका हूँ और भला हूँ तो भी आपका ही ।
भला मैं आपसे झूठ क्यों कहूँगा ? क्योंकि आप प्रत्येक प्राणीके दिलकी बात
जानते हैं । इसे मैं निष्कपट होकर मन, वचन और कर्मसे कहता हूँ । मेरे हठकी
ठीक वही दशा है जैसे पानी पड़नेपर सनकी गाँठकी । न तो मुझे दूसरा कोई
सहारा है और न इन्द्र, ब्रह्मा, देवता, मनुष्य तथा मुनियोंकी उपासना करनेकी
इच्छा है । ये सब मतलबके यार हैं, हाथीसे कुत्तेकी लेन-देन करनेवाले हैं—