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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

१६२ उपदेशसाहस्री
हृदयस्पर्शिनी
उक्त आक्षेप का परिहार कर रहे हैं—जिस प्रकार स्वरूप से अदृश्य होनेपर भी चन्द्रमण्डल में राहु का
अथवा जल में चन्द्रबिम्ब का ग्रहण होता है, उसी प्रकार चक्षुराद्यगोचर वह परमात्मा सर्वव्यापक होनेपर भी ‘तत्त्व-
मसि’ आदि महावाक्य से उत्पन्न हुई बुद्धि में ही प्रतिबिम्बित होता है, और उसका (आत्मा का) ग्रहण होता हैं। उस
बुद्धि में प्रतिबिम्बित होने से उसका स्वतः स्फुरणात्मक ही ग्रहण होता है, विषयरूप में उसका ग्रहण नहीं होता ।
शास्त्रैकगम्य रहने पर भी उसका प्रत्यक्ष प्रमाण, राहु के दृष्टान्त से बताया गया है। सर्वत्र सबके सन्निहित भासमान
रहने पर भी यथावत् उसका स्फुरण नहीं होता, तथापि उपाधिविशेष के रहने पर यथावत् स्फुरण में प्रतिबिम्ब का
दृष्टान्त दिया गया है ॥ ३४ ॥
भानोर्बिम्बं यथा चौष्ण्यं जले दृष्टं न चाऽम्भसः ।
बुद्धौ बोधो न तद्धर्मस्तथैव स्याद्विधर्मतः ॥३५॥
भानोरिति—जल में दृश्यमान सूर्यबिम्ब और उसकी उष्णता, जल के धर्म नहीं हैं, उसी प्रकार बुद्धि में
प्रकाशमान 'ज्ञान' भी बुद्धि का धर्म नहीं है, क्योंकि बुद्धि, उसके विपरीत धर्मवाली हैं, अर्थात् जड़ है ॥ ३५ ॥
हृदयस्पर्शिनी
यदि बुद्धि में बोधरूप आत्मा का ग्रहण होता है तो वह बोध तो बुद्धि का धर्म होगा, इस शंका का निरास
एक दृष्टान्त देकर कर रहे हैं—जिस प्रकार जल में दिखाई देनेवाला सूर्य का बिम्ब और उष्णता सूर्य के ही हैं, जल के
धर्म नहीं कहलाते, क्योंकि जल का धर्म (स्वभाव) तो शैत्य (शीतलता) होता है। उसी तरह बुद्धि में स्फुरित
(प्रकाशित) होनेवाला बोध (ज्ञान) बुद्धि का धर्म नहीं है। क्योंकि बुद्धि उससे विपरीत धर्मवाली है अर्थात् जाड्यधर्म
वाली (जड़) है ॥ ३५ ॥
चक्षुर्युक्ता धियो वृत्तिर्या तां पश्यन्नलुप्तदृक् ।
दृष्टेर्द्रष्टा भवेदात्मा श्रुतेः श्रोता तथा *भवेत् ॥३६॥
चक्षुरिति—यह जीवात्मा, नेत्रेन्द्रिय से युक्त हुई बुद्धि की वृत्ति को देखता रहता है, इस कारण, वह ‘अलुप्तदृक्’
कहलाता है। इस प्रकार वह आत्मा, 'दृष्टि' का द्रष्टा और 'श्रवण' का श्रोता समझा जाता है ॥ ३६ ॥
हृदयस्पर्शिनी
केवल शास्त्रीय बुद्धि में ही चिद्धातु परमात्मा स्फुरित नहीं होता, किन्तु लौकिक विषयाकार बुद्धिवृत्ति में
भी वह आत्मा स्वतः अपरोक्ष होता हुआ साक्षी के रूप में स्फुरित होता रहता है। चक्षुरिन्द्रिय के माध्यम से रूपाकार
हुई बुद्धिवृत्ति को प्रकाशित करने के कारण यह आत्मा अकुण्ठितज्ञानशक्ति होता हुआ दृष्टि का द्रष्टा और श्रवण
का श्रोता माना जाता है ॥ ३६ ॥
केवलां मनसो वृत्तिं पश्यन् मन्ता मतेरजः ।
विज्ञाताऽलुप्तशक्तित्वात्तथा शास्त्रं न हीयतेः ॥३७॥
केवलामिति—वह अजन्मा विकाररहित आत्मा केवल मन की वृत्ति को देखता है, उस कारण उसे मति
का मनन करनेवाला और उसका विज्ञाता कहते हैं, क्योंकि उसकी चैतन्यशक्ति अकुण्ठित है। इसी बात को 'विज्ञाता के
विज्ञान का लोप नहीं होता है'—यह श्रुतिवचन बता रहा है ॥ ३७ ॥
हृदयस्पर्शिनी
बाह्येन्द्रिय की अपेक्षा किये बिना ही यह आत्मा, धीवृत्ति का साक्षी होता है। अर्थात् चक्षुरादि इन्द्रियों
के माध्यम से बाहर प्रवृत्त हुए बिना ही भीतर ही भीतर विषयाकार होनेवाली बुद्धिवृत्ति (मनोवृत्ति) को देखने के

  • श्रुतेः—पाठान्तरम् ।

सम्यङ्मतिप्रकरणम् १६३
कारण वह अज (विकाररहित) है। और मति (बुद्धि) का मनन करनेवाला एवं उसका विज्ञाता है, क्योंकि वह अलुप्त
चिच्छक्ति से युक्त अर्थात् अकुण्ठित चैतन्यशक्ति से युक्त है। इस विषय में “नहि द्रष्टुर्दृष्टेः”१ से आरंभ कर “नहि
विज्ञातुर्विज्ञातेर्विपरिलोपो विद्यते”१ यह श्रुति भी है। श्लोक में ‘नहीत्यतः’ यहां पर ‘एतत्’ के अर्थ में ‘अतः’ शब्द है।
क्योंकि ‘तसिल्’ प्रत्यय सार्वविभक्तिक माना गया है। कुछ लोग सप्तमी के अर्थ में इसे कहते हैं। दृष्टि के द्रष्टा होने में
“न दृष्टेर्द्रष्टारं पश्येर्न श्रुतेः श्रोतारं शृणुया न मतेर्मन्तारं मन्वीथा न विज्ञातेर्विज्ञातारं विजानीयाः। एष त आत्मा
सर्वान्तरः”२ यह श्रुति भी है ॥ ३७ ॥
ध्यायतीत्यविकारित्वं तथा लेलायतीत्यपि ।
अत्र स्तेनेति शुद्धत्वं *तथाऽनन्वागतश्रुतेः ॥३८॥
ध्यायतीति—‘ध्यायतीव लेलायतीव’३—आत्मा मानो ध्यान करता है, वह मानो चेष्टा करता है, इन श्रुति
वचनों से आत्मा का अविकारित्व स्पष्ट होता है। तथा इस अवस्था में चोर ‘अचोर’ हो जाता है ‘वह पुण्य से रहित है, पाप
से रहित है’—इत्यादि श्रुतियों से उसका शुद्धत्व स्पष्ट प्रतीत होता है ॥ ३८ ॥
हृदयस्पर्शिनी
आत्मा में द्रष्टृत्वादि के व्यपदेश से विकारित्व, अशुद्धत्व की प्रसक्ति होगी, ऐसी शंका करने पर उत्तर
देते हैं—श्रुति में ‘इव’ शब्द का प्रयोग करने से ध्यान और चलन में आभासत्व बताया गया है। अर्थात् ‘आत्मा मानो
ध्यान करता है’, ‘वह मानो चेष्टा करता है’३ इन श्रुतियों से आत्मा का अविकारित्व सिद्ध होता है। तथा “अत्र स्तेनो-
ऽस्तेनो भवति भ्रूणहाऽभ्रूणहा”४—इस अवस्था में चोर, चोरी न करनेवाला हो जाता है, बालघाती भी बालहत्या न
करनेवाला हो जाता है, एवं “अनन्वागतं पुण्येनानन्वागतं पापेन”५—वह पुण्य से रहित है, पाप से रहित है—इत्यादि
श्रुतियों से उसका शुद्धत्व सिद्ध होता है ॥ ३८ ॥
शक्त्यलोपात्सुषुप्ते ज्ञस्तथा बोधेऽविकारतः ।
ज्ञेयस्यैव विशेषस्तु यत्र वेति श्रुतेर्वचः ॥३९॥
शक्त्यलोपादिति—सुषुप्ति अवस्था में उसकी शक्ति का लोप न होने से वह (आत्मा) ज्ञान स्वरूप है। विशेष
भाव तो केवल ‘ज्ञेय’ में ही है। इसके सम्बन्ध में “जहाँ अन्य-सा होता हैं, वहाँ अन्य ‘अन्य’ को देखता है”—इत्यादि श्रुति
वचन प्रमाण है ॥ ३९ ॥
हृदयस्पर्शिनी
जबकि सुषुप्ति में ज्ञान का अभाव रहता है और जाग्रत् तथा स्वप्न में ज्ञान का अस्तित्व रहता है, तब
आत्मा को अविकारी कैसे कहा जाय ? इस प्रश्न का उत्तर दे रहे हैं—
सुषुप्ति अवस्था में शक्ति का लोप न होने के कारण आत्मा ज्ञान(ज्ञ)स्वरूप है६। उसी प्रकार बोध दशा
(जाग्रत् और स्वप्न अवस्था) में भी वह ज्ञानस्वरूप है क्योंकि वह निरवयव होने से उसमें विकार अनुपपन्न है। विशेष-
भाव तो केवल ज्ञेय में ही है। तीनों अवस्थाओं में यदि आत्मा निर्विशेष चिद्रूप है, तो ‘न अज्ञासिषम्’—मैंने नहीं जाना,
यह सुषुप्ति परामर्श कैसे होता है ? और बोध अवस्था में ‘जानामि’—मैं जानता हूँ, यह अनुभव कैसे होता है ? इन
१. ( बृ. उ. ४।३।२३-३० )
२. ( बृ. उ. ३।४।२ )
३. ( बृ. उ. ४।३।७ )
४. ( बृ. उ. ४।३।२२ )
५. ( बृ. उ. ४।३।२२ )
६. ‘यद्वै तन्न पश्यति पश्यन् वै तन्न पश्यति’—( बृ. उ. ४।३।२३-३० )

  • गतं श्रुतेः—पाठान्तरम् ।

१६४ उपदेशसाहस्री
प्रश्नों का समाधान यह है कि विषय का उपरम और विषय का अनुपरम ही उसमें कारण है। पूर्वोक्त परामर्श और
अनुभव दोनों स्वरूपनिबन्धन नहीं हैं। बृहदारण्यक श्रुति ने भी इसका समर्थन किया है१॥ ३९ ॥
व्यवधानाद्धि पारोक्ष्यं लोकदृष्टेर्नात्मनः ।
दृष्टेरात्मस्वरूपत्वात्प्रत्यक्षं ब्रह्म *तत्स्मृतम् ॥४०॥
व्यवधानादिति- घट-पटादि अनात्म (जड़) पदार्थों को ग्रहण करने वाली चक्षुरादि लौकिक दृष्टि है। वह
दृष्टि देश-काल आदि से व्यवहित होने के कारण 'परोक्ष' है। और आत्मस्वरूपभूता ज्ञानदृष्टि अलौकिक है। यह दृष्टि
स्वयं आत्मस्वरूपा होने से ब्रह्मज्ञानी विद्वान् 'ब्रह्म' को प्रत्यक्ष बताते हैं। अर्थात् आत्मा और ब्रह्म में अभेद होने से (भेद न
रहने से) 'ब्रह्म' सर्वदा ही प्रत्यक्ष है ॥ ४० ॥
हृदयस्पर्शिनी
इस प्रकार 'आत्मा नित्य और चैतन्यस्वरूप होने से नित्य अपरोक्ष (प्रत्यक्ष) और निर्विकार है', यह बताया
गया है, उसी को विस्तृत रूप से अब आगे तीन श्लोकों में बता रहे हैं-अनात्मरूप घट-पटादि विषय को ग्रहण करने-
वाली चक्षुरादि लोकदृष्टि, देश-काल आदि से व्यवहित (सन्निकृष्ट न) होने के कारण परोक्ष है, किन्तु स्वयं दृष्टि
आत्मस्वरूपा है। इस कारण आत्मा में दृष्टि का व्यवधान नहीं है। आत्मा तो ब्रह्मरूप ही है। वह ब्रह्म तो स्वतः ही
सदा प्रत्यक्ष है, ऐसा ब्रह्मज्ञ लोग कहते हैं। अभिप्राय यह है-लौकिक और अलौकिक दो प्रकार की दृष्टि होती है।
चक्षुरादि इन्द्रियों से होनेवाली दृष्टि (ज्ञान) लौकिक है, और आत्मस्वरूपभूता ज्ञानदृष्टि अलौकिक है। चक्षुरादि
इन्द्रिय से उसके विषय कहलानेवाले घट-पटादि में देश-काल आदि का व्यवधान रहता है, इसलिये वह परोक्ष दृष्टि है,
किन्तु आत्मा और ब्रह्म में अभेद रहने से ब्रह्म सर्वदा प्रत्यक्ष है। वह दृष्टि भी आत्मस्वरूपा है। अतः उसे परोक्ष नहीं
कहा जाता ॥ ४० ॥
न हि दीपान्तरापेक्षा यद्वद्दीपप्रकाशने ।
बोधस्यात्मस्वरूपत्वान्न बोधोऽन्यस्तथेष्यते ॥४१॥
नहीति-जैसे दीपक को प्रकाशित करने के लिये अन्य दीपक की अपेक्षा नहीं होती, वैसे ही 'बोध' आत्म-
स्वरूप होने के कारण उसे भी अपने प्रकाश के लिये किसी अन्य बोध की अपेक्षा नहीं होती है ॥ ४१ ॥
हृदयस्पर्शिनी
स्वरूपप्रकाश अनन्यपेक्ष होता है, इसे दृष्टान्त के द्वारा स्पष्ट कर रहे हैं-जिस प्रकार किसी दीपक
को प्रकाशित करने के लिये किसी दूसरे दीपक की आवश्यकता (अपेक्षा) नहीं रहती, उसी प्रकार बोध (ज्ञान) आत्म-
स्वरूप होने के कारण उसे भी अपने को प्रकाशित करने में किसी दूसरे बोध (ज्ञान) की अपेक्षा नहीं होती ॥ ४१ ॥
विषयत्वं विकारित्वं नानात्वं वा न हीष्यते ।
न हेयो नाप्युपादेय आत्मा नान्येन वा ततः ॥४२॥
विषयत्वमिति-इस प्रकार आत्मा (ज्ञान) को अपरोक्षता को स्पष्ट करके उसके अविकारित्व और निर्वि-
शेषता को बता रहे हैं- आत्मा का विषयत्व, विकारित्व और नानात्व का भी स्वीकार नहीं किया जा सकता । इस कारण
आत्मा अपने अथवा किसी अन्य के द्वारा ग्राह्य या त्याज्य भी नहीं है ॥ ४२ ॥
सबाह्याभ्यन्तरोऽजीर्णो जन्ममृत्युजरातिगः ।
अहमात्मेति यो वेत्ति कुतो न्वेव बिभेति सः ॥४३॥
१. 'यत्र वा अन्यदिव स्यात्तत्रान्योऽन्यत्पश्येत्' - (बृ. उ. ४।३।२१) तथा
'यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत् तत्केन कं पश्येत्'- (बृ. उ. ४।५।१५)

  • यत्स्मृतम्-पाठान्तरम् ।

सम्यङ्मतिप्रकरणम् १६५
स बाह्य ति—जो यह जान लेता है कि 'मैं बाहर, भीतर विद्यमान हूँ, मैं जीर्ण-शीर्ण नहीं हूँ, मैं जन्म-मृत्यु
तथा वार्धक्य से रहित हूँ, ऐसा मैं ही आत्मा हूँ', तब वह किसी से क्यों डर सकता है ? ॥४३॥
हृदयस्पर्शिनी
आत्मा की निर्विकारता कैसे हो सकती है ? क्योंकि नरकपात आदि का भय होने से उसकी निवृत्ति के
लिये धर्मानुष्ठान बताया गया है। पदार्थ के सम्यक् शोधन के द्वारा जो आत्मतत्त्व को जानता है, वह किससे भयभीत हो
सकता है ? क्योंकि भय के हेतुभूत द्वितीय तो बाधित है । अर्थात् अज्ञानावस्था में ही भीति और तन्निवृत्त्यर्थ धर्मानुष्ठान
होता है। ज्ञानावस्था में न भय है और न तन्निवृत्त्यर्थ धर्मानुष्ठान है। मैं बाहर-भीतर विद्यमान, प्राचीनता से रहित
और जन्म, मृत्यु, जरा से शून्य आत्मा हूँ, ऐसा जो जानता है, उसे किसी से भय नहीं होता ॥ ४३ ॥
प्रागेवैतद्विधेः कर्म वर्णित्वादेरपोहनात् ।
तदस्थूलादिशास्त्रेभ्यस्तत्त्वमेवेति निश्चयात् ॥४४॥
प्रागेवेति—'आत्मा अस्थूल है, अनणु है, इस श्रुति के द्वारा कर्माधिकार की प्राप्ति में कारणभूत वर्णित्वादि
का निराकरण (बाध) किया गया है, उस कारण और 'तत् त्वमसि' तुम वह (ब्रह्म) हो, इस महावाक्य के द्वारा अपने ब्रह्मत्व
का निश्चय होने से पूर्व ही 'यावज्जीवन अग्निहोत्र करे'—इस श्रुतिवचन से बताया गया कर्मानुष्ठान आवश्यक है ॥ ४४ ॥
हृदयस्पर्शिनी
ज्ञानी के लिये भी वेदविहित अग्निहोत्रादि कर्मों का अनुष्ठान यावज्जीवन करने के लिये कहा गया है,
और उसके न करनेपर प्रत्यवाय का भय ज्ञानी (विद्वान्) के लिये भी है, तत्परिहारार्थ ज्ञानी को भी अनुष्ठान करना ही
होगा, इस आशंका का समाधान इस प्रकार होगा—ब्रह्मात्मरूप के प्रतिपादन के पूर्व ही अग्निहोत्रादि कर्म बताये गये हैं,
उसके बाद नहीं, क्योंकि ब्रह्मात्मज्ञान से तो कर्मानुष्ठान के प्रयोजक वर्णित्व, आश्रमित्व आदि के अभिमान का बाध
हो जाता है। यदि कहें कि वर्णाश्रमादि से युक्त अधिकारी को कर्मानुष्ठान का त्याग करना उचित नहीं है, किन्तु
उसका समाधान यह है कि अस्थूलादि लक्षण वह ब्रह्म तू ही है, इस प्रकार 'तत्त्वमसि' आदि वाक्य से निश्चय होने के
कारण कर्मानुष्ठान के अधिकारी को 'अहं ब्रह्म' मैं ब्रह्म हूँ—इस प्रकार बोध (ज्ञान) हो जाने पर उसके लिये कर्मानुष्ठान
नहीं है। क्योंकि कर्माधिकार की प्राप्ति में कारण तो वर्णाश्रमित्व है, उसका अस्थूलादि शास्त्र से अपोहन (बाध) हो
जाता है। तब वह कर्मानुष्ठान का अधिकारी ही नहीं रहता। अतः जिसका जो अनधिकारी है, उसे उसके न करनेपर
प्रत्यवाय का होना संभव ही नहीं है। एवं च ब्रह्मज्ञानी के लिये कर्मानुष्ठान प्राप्त ही नहीं है ॥ ४४ ॥
पूर्वदेहपरित्यागे जात्यादीनां प्रहाणतः ।
देहस्यैव तु जात्यादिस्तस्याप्येवं ह्यनात्मता ॥४५॥
पूर्वदेहेति—देह का त्याग होनेपर उसकी जाति आदि का भी त्याग हो जाता है। अतः ये जाति आदि देह के
ही धर्म हैं। वे आत्मा के धर्म नहीं हैं, क्योंकि ये आगमापायी हैं। उसी तरह देह भी आगमापायी होने से वह भी अनात्मा
है ॥ ४५ ॥
हृदयस्पर्शिनी
आत्मा में वर्णाश्रमित्वादि की प्रतीति अध्यास के बल पर होती है। देह का परित्याग करने पर तत्सम्बद्ध
जाति का भी परित्याग होता है। अतः जाति आदि आगमापायी हैं, इस कारण उन्हें आत्मा के धर्म नहीं कह सकते;
वे जाति आदि तो देह के ही धर्म हैं। यदि देह को ही आत्मा कहें तो वह भी उचित नहीं है, क्योंकि देह भी
आगमापायी होने से उसे भी आत्मा नहीं मान सकते। एवं च देह भी अनात्मस्वरूप ही है। देह को जो कर्माधिकार
प्राप्त होता है, वह भी वर्णाश्रम के अनुरोध से ही है। अतः आत्मा में कर्माधिकार के हेतुभूत वर्णाश्रम के न होने
से उसे स्वभावतः ही कर्मकर्तृत्व नहीं है ॥ ४५ ॥

१६६ उपदेशसाहस्री
ममाहं चेत्यतोऽविद्या शरीरादिष्वनात्मसु ।
आत्मज्ञानेन हेया स्यादसुराणामिति श्रुतेः ॥४६॥
ममाहमिति—अतः शरीरादि अनात्म पदार्थों में जो ममता और अहंता होती रहती है, उसी को अविद्या
कहते हैं। उसका आत्मज्ञान के द्वारा (आत्मतत्त्वब्रह्मात्मानुसन्धान के द्वारा) बाध (नाश) करना चाहिये। इस प्रकार की
देहात्मदृष्टि को आसुरी सम्पत्ति कहा है, उसकी निन्दा भगवती श्रुति ने की है ॥ ४६ ॥
हृदयस्पर्शिनी
शरीरादि में आत्मा-आत्मीय होने का अभिमान तो सर्वत्र प्रसिद्ध ही है, उसे हेय (त्याज्य) कैसे कहा
जाय ? इस आशंका का समाधान यह है कि देह के आगमापायी रहने से उसका अनात्मत्व तो निश्चित ही है।
उस कारण शरीरादि अनात्माओं में जो ममता और अहंता का अभिमान है, वह मिथ्या प्रत्यय है, अर्थात् उसी का
नाम अविद्या है, उसका आत्मतत्त्वब्रह्मात्मानुसन्धान (आत्मज्ञान) के द्वारा बाध करना चाहिये। देहात्मदृष्टि (ज्ञान)
को आसुर ज्ञान कहा गया है, इसी कारण श्रुति ने उसकी निन्दा की है। इस ज्ञान को असुरों की उपनिषद् कहा
गया है¹। अतः देहात्मदर्शन को हेय समझना चाहिये ॥ ४६ ॥
दशाहाशौचकार्याणां पारिव्राज्ये निवर्तनम् ।
यथा ज्ञानस्य संप्राप्तौ तद्वज्जात्यादिकर्मणाम् ॥४७॥
दशाहेति—शास्त्रविधि के अनुसार संन्यास (पारिव्राज्य) ग्रहण करनेपर सपिण्डता का अभिमान नष्ट हो जाने
से किसी सपिण्ड की अथवा उसीकी मृत्यु होने के कारण जो दशाह (दस दिन) के अशौचादि कार्य होते हैं, वे किसी को
अथवा उस संन्यासी को नहीं करने पड़ते। उसी प्रकार आत्मज्ञान के होनेपर जाति आदि का अभिमान नष्ट हो जाने के
कारण उस ज्ञानी पुरुष को कर्मानुष्ठान नहीं करना पड़ता ॥ ४७ ॥
हृदयस्पर्शिनी
तत्त्वज्ञान के पश्चात् कोई कर्मानुष्ठान नहीं और न ही तत्प्रयोजक जाति आदि का सम्बन्ध आत्मा से
है, इसे दृष्टान्त देकर समझाते हैं—जिस प्रकार संन्यासाश्रम ग्रहण करने पर सपिण्डताभिमान के न होने से संन्यासी
को अशौचादि प्राप्त नहीं होते, उसी प्रकार ब्रह्मात्मज्ञान की प्राप्ति होने पर जात्यादि का अभिमान न रहने से
विद्वान् को कर्मानुष्ठान की आवश्यकता नहीं रहती ॥ ४७ ॥
यत्कामस्तत्क्रतुर्भूत्वा कृतं त्वज्ञः प्रपद्यते ।
यदा स्वात्मदृशः कामाः प्रमुच्यन्तेऽमृतस्तदा ॥४८॥
यत्कामइति—अज्ञानी पुरुष अपनी कामना (फल की इच्छा) के अनुसार ही सङ्कल्प करता है, तदनुरोधेन ही
कर्म करके फल प्राप्त करता है, किन्तु जिस समय आत्मज्ञानी की समस्त कामनाएँ समाप्त हो जाती हैं, उस समय वह
अमर अर्थात् संसारबन्धन से मुक्त हो जाता है ॥ ४८ ॥
हृदयस्पर्शिनी
जब कि ब्रह्मात्मता के अज्ञान के कारण आत्मा के लिये यह संसार देहाध्यासनिबन्धक रहता है, उस कारण
तत्त्वज्ञान होने से पूर्व कामादि से युक्त हुआ वह आत्मा धर्माधर्म के कारण संसरण करता रहता है, किन्तु ब्रह्मात्मज्ञान
होने पर कामादि का अभाव हो जाने से वह मुक्त हो जाता है। अज्ञानी पुरुष तो जैसी कामना करता है, उसी प्रकार
१. 'असुराणां ह्येषोपनिषद्'—(छां उ. ८।८।५)

सम्यङ्मतिप्रकरणम् १६७
के संकल्प से युक्त होकर उसका फल पाता है। किन्तु जिस समय आत्मज्ञानी की समस्त कामनाएँ निवृत्त हो जाती हैं,
उस समय वह अमर (अमृत) हो जाता है। अर्थात् संसारबन्धन से मुक्त हो जाता है१ ॥ ४८ ॥
आत्मरूपविधेः कार्यं क्रियादिभ्यो निवर्तनम् ।
न साध्यं साधनं वाऽऽत्मा नित्यतृप्तः* स्मृतेर्मतः ॥४९॥
आत्मरूपेति—आत्मा के स्वरूपप्रतिपादन का प्रयोजन—कर्म आदि से निवृत्त हो जाना ही है। ‘आत्मा’ न
साध्य है और न साधन ही है। वह तो नित्यतृप्त है, ऐसा स्मृति ने कहा है ॥ ४९ ॥
हृदयस्पर्शनी
काम्य कर्म की निवृत्ति से मोक्ष होने पर भी उस काम्य कर्म की निवृत्ति ही कैसे हो सकेगी ? इस आशंका
के होने पर कहते हैं कि यद्यपि क्रिया-कारक फल आदि से निवृत्त होना आत्मतत्त्वावबोध के द्वारा सम्पन्न होता है
अर्थात् कर्मादि से निवृत्त होना ही आत्मस्वरूप ज्ञान का फल है, तथापि उसका अन्तर्भाव, साध्य-साधन में से किसी
एक में होने के कारण क्रियासंस्पर्शित्व तो बना ही रहेगा—यह शंका हो सकती है, किन्तु वह ठीक नहीं है। क्योंकि
'एतस्यैवानन्दस्यान्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्ति'२, 'नित्यतृप्तो निराश्रयः३' इत्यादि श्रौत-स्मार्त प्रमाणों से आत्मा की
नित्यतृप्तता का बोध होता है। वह तो साध्य-साधन से विलक्षण है, अतः उसमें स्वभावतः क्रियादि का संस्पर्श नहीं है,
उसमें जो स्पर्शादि प्रतीति होती है, वह अध्यासमूलक है, ऐसा निश्चय कर आत्मतत्त्वज्ञान के द्वारा ही क्रिया आदि का
त्याग करना चाहिये ॥ ४९ ॥
उत्पाद्याप्यविकार्याणि संस्कार्यं च क्रियाफलम् ।
नातोऽन्यत्कर्मणा कार्यं त्यजेत्तस्मात्ससाधनम् ॥५०॥
उत्पाद्येति—क्रिया (कर्म) का फल 'उत्पाद्य', 'आप्य', विकार्य' और 'संस्कार्य' के भेद से चार प्रकार का
होता है। मुमुक्षु पुरुष को कर्म से कोई प्रयोजन नहीं है। अतः उसे चाहिये कि वह साधनसहित कर्म का त्याग करे ॥ ५० ॥
हृदयस्पर्शनी
आत्मस्वरूपावस्थानलक्षण मोक्ष तो चतुर्विधा क्रिया और उसके फल से विलक्षण है। कर्म का फल उत्पाद्य,
आप्य, विकार्य और संस्कार्य चार प्रकार का होता है। 'जैसे जुलाहा वस्त्र बनाता है', यहाँ 'बनाना' क्रिया का कर्मरूप
वस्त्र 'उत्पाद्य' है, 'देवदत्त भात पकाता है', यहाँ 'पकाना' क्रिया का कर्मरूप भात 'विकार्य' है, 'रघुनाथ घर जाता है'
यहाँ 'जाना' क्रिया का कर्मरूप घर 'आप्य' है, और 'यज्ञदत्त दर्पण स्वच्छ करता है', यहाँ 'स्वच्छ करना' क्रिया का
कर्मरूप दर्पण 'संस्कार्य' है। किन्तु आत्मा में ऐसा कोई गुण नहीं है। अतः वह किसी क्रिया का कर्म नहीं कहा जाता ।
अतः मुमुक्षु को मोक्ष के लिये किसी क्रियानुष्ठान की कोई आवश्यकता नहीं, क्योंकि मोक्ष तो क्रिया और फल से
विलक्षण है। अतः उसमें क्रिया का संभव नहीं है। इसलिये साधनसहित अर्थात् जाया, अपत्य, वित्त, शिखा
यज्ञोपवीतादि साधनसहित विधिरूप कर्म का त्याग कर देना चाहिये। क्योंकि कृतक अनित्य होता है। और मोक्ष
तो नित्य आत्मस्वरूप में अवस्थितिरूप है। अतः मुमुक्षु को कर्म से कोई प्रयोजन नहीं है ॥ ५० ॥
तापान्तत्त्वादनित्यत्वादात्मार्थत्वाच्च या बहिः ।
संहृत्याऽऽत्मनि तां प्रीतिं सत्यार्थी गुहामाश्रयेत् ॥५१॥
१. 'यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः ।
अथ मर्त्योऽमृतो भवति............................ ॥ (बृ. उ. ४।४।७)
२. (बृ. उ. ४।३।३२ )
३. (भ. गी. ४।२० )

  • तृप्तश्रुते—पाठान्तरम् ।

१६८ उपदेशसाहस्री
तांपानन्तत्वादिति—स्त्री-पुत्रादि बाह्य विषयों में जो प्रेम (प्रीति) है, वह परिणाम में दुःख (ताप) दायक होता
है, वह प्रेम अनित्य है, वह आत्मार्थ यानी स्वार्थप्रयुक्त (अपने लिये) है। अतः उस प्रेम का (अनात्मविषयक प्रेम का)
अपने आत्मा में उपसंहार कर सत्यार्थी (सत्य को चाहने वाला) पुरुष किसी ब्रह्मनिष्ठ सद्गुरु का आश्रय ले ॥ ५१ ॥
हृदयस्पशिनी
पुनः जिज्ञासा होती है कि साधन सहित कर्म के त्याग मात्र से ही मुक्ति हो जाती है किंवा उसके लिये
कुछ और भी करना पड़ता है ? उस पर कहा गया है कि आत्मतत्त्व का ज्ञान प्राप्त करने के लिये गुरूपसत्ति करनी
चाहिये। अथवा इस तरह समझिये कि समस्त प्रीति (प्रेम) कर्मनिबन्धन होने से अनित्य है, अर्थात् बाह्य पुत्र-
कलत्रादि विषयों में जो प्रीति है, वह परिणाम में दुःखरूप और स्वार्थप्रयुक्त है, इस कारण उस अनात्मविषयक
प्रीति को अपनी आत्मा में उपसंहृत कर नित्य पुरुषार्थी, सत्यसंकल्प गुरु का आश्रय ले, इस प्रकार मुमुक्षु को
शिक्षा दे रहे हैं ॥ ५१ ॥
शान्तं प्राज्ञं तथा मुक्तं निष्क्रयं ब्रह्मणि स्थितम् ।
श्रुतेराचार्यवान्वेद तद्विद्धीति स्मृतेस्तथा ॥५२॥
शान्तमिति—भगवती श्रुति—'आचार्यवान् पुरुष को ही ज्ञान होता है', तथा स्मृति—'उसे प्रणाम के द्वारा
जानो'—के अनुसार मुमुक्षु जिज्ञासु पुरुष उस गुरु का आश्रय ले, जो शान्त, मेधावी, मुक्त, निष्क्रिय और ब्रह्मनिष्ठ
हो ॥ ५२ ॥
हृदयस्पशिनी
उपगन्तव्य गुरु कैसा होना चाहिये ? उसे बता रहे हैं—अक्षुब्ध (शान्त) चित्तवाला, मेधावी (प्राज्ञ),
परित्यक्तबन्ध-सजातीयबन्ध से पुनः बद्ध न होने वाला अर्थात् मुक्त यानी निष्किञ्चन, ऐहिक और आमुष्मिक कार्य-
प्रवृत्ति रहित (निष्क्रिय), ब्रह्म में स्थित अर्थात् स्व-स्वरूपानन्द का अनुभव होने से सर्वत्र उदासीन, ऐसे गुरु के समीप
जाना चाहिये । क्योंकि श्रुति कहती है कि 'आचार्यवान् पुरुषो वेद१'—आचार्यवान् पुरुष को ही ज्ञान होता है—तथा
स्मृति “तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया । उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः२” भी कह रही है कि उसे
प्रणाम के द्वारा जानो ॥ ५२ ॥
स गुरुस्तारयेद्युक्तं शिष्यं शिष्यगुणान्वितम् ।
ब्रह्मविद्याप्लवेनाशु स्वान्तध्वान्तमहोदधिम् ॥५३॥
स गुरुरिति—शिष्य के पूर्वोक्त गुण जिसमें हो, उस समाहित चित्तवाले शिष्य को वह गुरु ब्रह्मविद्यारूप नौका
के द्वारा उसके अन्तः करण में स्थित अज्ञानरूप (अविद्यारूप) महासमुद्र के पार कर दे ॥ ५३ ॥
हृदयस्पशिनी
पूर्वोक्त प्रमाण के अनुरोध से उक्त विशेषणों से विशिष्ट सद्गुरु के समीप पहुँचने पर होनेवाली
निरतिशय फलप्राप्ति को बता रहे हैं—जिसका चित्त समाहित हो और भगवद्गीता में बताये हुए अमानित्वादि
गुणों से युक्त तथा पूर्वोक्त 'प्रशान्तचित्ताय जितेन्द्रियाय' के द्वारा बताये गये गुणों से युक्त हुए शिष्य को वह गुरु
ब्रह्मविद्यारूप अल्प नौका के द्वारा अन्तःकरणरूप उपाधि से युक्त जीव को स्वरूपावरक विक्षेप शक्तिवाले अनादि
अनिर्वाच्य, अज्ञान (संसार) समुद्र से तार दे ॥ ५३ ॥
दृष्टिः स्पृष्टिः श्रुतिर्घ्रातिर्मतिर्विज्ञातिरेव च ।
शक्तयोऽन्याश्च भिद्यन्ते चिद्रूपत्वेऽप्युपाधिभिः ॥५४॥
१. ( छां. उ. ६।१४।२ )
२. ( भ. गी. ४।३४ )

दृष्टिरिति- दर्शन, स्पर्शन, श्रवण, घ्राणन, मनन, विज्ञान तथा और भी अन्यान्य शक्तियाँ समान रूप से
यद्यपि चिद्रूप ही हैं, तथापि भिन्न-भिन्न उपाधियों के कारण उन शक्तियों में भिन्नता उपलब्ध होती है ॥ ५४ ॥
हृदयस्पर्शिनी
उक्त लक्षणों से सम्पन्न गुरु समाहितादि गुणों से युक्त हुए शिष्य को सम्यग् ज्ञान के द्वारा अनायास ही
इस संसार-सागर से किस प्रकार से पार करावेगा ? यह जिज्ञासा होने पर कहते हैं कि वह प्रथमतः पदार्थविवेक
करावे । उसके लिये पदार्थशुद्धि की अपेक्षा होती है । अतः उसे संक्षेपतः बता रहे हैं—दर्शन, स्पर्शन, श्रवण, घ्राणन,
मनन, विज्ञान तथा अन्यान्य शक्तियाँ यद्यपि अखण्डचिद्रूपा ही हैं, तथापि तत्तद् इन्द्रियद्वारक बुद्धिवृत्तिभेदरूप
भिन्न-भिन्न उपाधियों के कारण उनमें भेद होता है । वह भेद वास्तविक नहीं है । अतः तत्तद् वृत्त्यंश का परित्याग
कराते हुए समस्त वृत्तियों के साक्षी रूप से अनुगत प्रकाशस्वभाव आत्मा ही 'त्वं' पदार्थ है, यह ज्ञान उसे
प्रथमतः करावे ॥ ५४ ॥
अपायोद्भूतिहीनाभिर्नित्यं दीप्यन् रवैर्यथा ।
सर्वदृक् सर्वगः* शुद्धः सर्वं जानाति सर्वदा ॥५५॥
अपायेति—जैसे भगवान् भास्कर उत्पत्ति-विनाशशून्य अपनी रश्मियों [किरणों] द्वारा सर्वदा प्रकाश करते
हुए स्थित रहता है, वैसे ही सर्वज्ञ-सर्व साक्षी शुद्धस्वरूप आत्मा स्व-स्वरूपभूता अपनी चिच्छक्ति से सम्पूर्ण पदार्थों को
जानता है ॥ ५५ ॥
हृदयस्पर्शिनी
चिच्छक्तिभेद को उपाधिप्रयुक्त ही क्यों न माना जाय ? अनुभवानुरोधेन उसे स्वरूपप्रयुक्त क्यों न माना
जाय ? परन्तु यह शंका उचित नहीं है, क्योंकि वैसा मानने पर आत्मा को विकारी मानना पड़ेगा और कल्पनागौरव
भी होगा । आत्मा तो अखण्डरूप है, उसकी अखण्डरूपता को दृष्टान्त के द्वारा बताते हैं— जिस प्रकार सूर्य अकेला
ही अपनी जन्म-विनाशशून्य रश्मियों के द्वारा सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को प्रकाशित करता हुआ अविकृत रहता है, उसी
प्रकार सर्वज्ञ, सर्वसाक्षी शुद्धस्वरूप आत्मा भी अपनी स्वरूपभूत चिच्छक्तियों के द्वारा अर्थात् तत्तद् बुद्धिवृत्तिरूप
उपाधियों के भेद से भिन्न हुई चिच्छक्तियों के द्वारा समस्त पदार्थों को अच्छी तरह (विशेषरूप से) जानता है, और
सर्वदा सामान्यरूप से भी सब देखता रहता है । जबकि सम्पूर्ण दृश्य का अधिष्ठान होने से वह पूर्णतः अव्यभिचारी है,
तस्मात् वह शुद्ध अर्थात् निर्विकार है— ऐसा समझना चाहिये ॥ ५५ ॥
अन्यदृष्टिः शरीरस्थस्तावन्मात्रो ह्यविद्यया ।
जलेन्द्राद्युपमाभिस्तु तद्धर्मा च विभाव्यते ॥५६॥
अन्यदृष्टिरिति—शरीर में स्थित आत्मा, अनात्मदृष्टि (अन्यदृष्टि) सम्पन्न होने से, जैसे जल में प्रतिबिम्बित
चन्द्र, जल के चञ्चल रहने पर चञ्चल-सा दिखाई देता है, उसी तरह अविद्यावश देह (शरीर) में आत्मत्व का अध्यास होते
रहने से आत्मा को देहधर्मों से युक्त और देह (शरीर) परिमाण का समझते हैं ॥ ५६ ॥
हृदयस्पर्शिनी
यदि आत्मा उक्त लक्षण से लक्षित है, तो वह संसार से ग्रस्त क्यों होता है और उसका परिच्छेदप्रतिभास
क्यों होता है ? इस प्रश्न का उत्तर यह है कि अविद्या के कारण स्थूल-सूक्ष्म शरीरों में ही उपलभ्यमान होने के कारण
आत्मा शरीरपरिमाण मात्र समझा जाता है और शारीरिक धर्मों से युक्त जान पड़ता है, अर्थात् संसारी जान पड़ता
है । जैसे जल में प्रतिबिम्बित हुआ चन्द्रमा, जल की चञ्चलता के कारण चञ्चल प्रतीत होता है, उसी प्रकार देह में
आत्मत्व का अध्यास होने के कारण आत्मा, देह के धर्मों से युक्त और देहपरिमाण मात्र जान पड़ता है ॥ ५६ ॥

  • सर्वज्ञः सर्वदृक् ० — पाठान्तरम् ।
    २२

१७० उपदेशसाहस्री
दृष्ट्वा बाह्यं निमील्यैाथ स्मृत्वा तत्प्रविहाय च ।
*अथोन्मील्यात्मनो दृष्टिं ब्रह्म प्राप्नोत्यनध्वगः ॥५७॥
दृष्ट्वेति—मुमुक्षु पुरुष जाग्रत् काल के बाह्य पदार्थों को देखता रहता है, तथापि उनकी ओर से अपनी
दृष्टि को हटा लेता है, उन्हीं को स्वप्न में वासनामय पदार्थ के रूप से स्मरण करता है, तदनन्तर उस वासनामय पदार्थ
का भी त्याग कर देता है, बाद में सुषुप्ति की कारणभूत (बीजभूत) अज्ञान रूप दृष्टि का भी त्याग कर देता है, तब उसके
बाद आत्मा की ज्ञानप्रकाशरूप आत्मदृष्टि को खोलकर वह अर्चिरादि मार्ग से बिना गये ही ब्रह्म को पा लेता है ॥ ५७ ॥
हृदयस्पर्शिनी
इस प्रकार उपाधिपरामर्श हुए बिना आत्मा में भेद (संसार) आदि की उपलब्धि नहीं होती । और आत्मा
की उपाधियों की स्वतन्त्र सत्ता में कोई प्रमाण नहीं है । अविद्यामय होनेपर भी वह चिदात्मा नित्य शुद्ध एवं परिपूर्ण
ही है, इस प्रकार अवान्तर वाक्यों के द्वारा अवधारित हुआ आत्मा ही सत्यज्ञानादिलक्षण ब्रह्म है, इस प्रकार के महा-
वाक्य से आचार्य के द्वारा आत्मतत्त्व को समझा हुआ मुमुक्षु जब यह जान लेता है कि समस्त दृश्य अवस्थात्रयात्मक
ही है और उसका निरसन कर तत्साक्षीरूप में और तदधिष्ठान के रूप में अव्यभिचारी चिदेकरस ब्रह्म ही आत्मा है, ऐसा
अनुभव जब उसे होने लगता है, तब वह मुक्त हो जाता है । इसी तथ्य को ध्यान में रखकर अनुसंधान करने का प्रकार
बता रहे हैं—जाग्रत्-कालीन पञ्चीकृत पञ्चमहाभूतों के कार्यात्मक समष्टि-व्यष्टिरूप समस्त बाह्य पदार्थों को देखकर
(द्रष्टा और दृश्य यानी कारण और कार्य को अन्वय-व्यतिरेक के द्वारा देखकर) तत्पश्चात् उनकी ओर से दृष्टि हटाकर
अर्थात् समस्त दृश्य (कार्य) द्रष्टामात्र यानी सम्पूर्ण कार्य को कारणरूप ही समझे । उसके बाद जाग्रत् काल के अनुभव
से उत्पन्न संस्कारों का कार्य यह स्वप्न है, अतः स्वप्नदर्शन एक स्मरण (स्मृति) मात्र है, ऐसा समझकर विश्व-वैश्वानर
सहित स्थूल उपाधि को उस वासनामय लिङ्ग शरीर (सूक्ष्मभूत सहित सूक्ष्म-शरीर) में विलीन कर उस जाग्रत् प्रपञ्च
को वासनामय स्वप्नमात्र ही समझे । तदनन्तर वासनासहित मन, प्राण, इन्द्रियसंधात (समुदाय) रूप लिङ्ग (सूक्ष्म)
शरीर को भी उसके कारण में यानी पञ्चतन्मात्रा में विलीन कर दे, अर्थात् उस कार्यभूत सूक्ष्म शरीर को भी कारण
(पंचतन्मात्रा) रूप ही समझे । इस प्रकार उत्पत्तिक्रम के विपरीत क्रम का अनुसरण करते हुए उस पञ्चतन्मात्रा को भी
साभास अज्ञान से पृथक् न समझे, अर्थात् साभास अज्ञान में पञ्चतन्मात्राओं को विलीन कर दे । तदनन्तर सुषुप्ति में
बीजरूप जो अज्ञानमात्र शेष रहा, उसे भी विवेक के द्वारा बाधित कर दे । वह अज्ञान न सत् है, न असत् है,
न भिन्न है, न अभिन्न है, किसी प्रकार से भी उसको नहीं बताया जा सकता, अतः वह अन्ध पुरुष के द्वारा कल्पित
अन्धकार के समान यत्किंचित् है, अनिर्वचनीय है, मिथ्या है, इस प्रकार के विवेक के द्वारा उस अज्ञान का भी बाध
करे । तदनन्तर सभी अवस्थाओं का साक्षी बनकर रहने वाला सच्चिदानन्द मात्र मैं (आत्मा) हूँ, इस प्रकार ज्ञानप्रकाश
रूप दृष्टि को खोले अर्थात् ज्ञानस्वरूप आत्मा को निरुपाधिक समझे, तब वह सत्यज्ञानादिलक्षण ब्रह्म ही हो जाता है ।
अर्थात् उसे अर्चिरादि मार्ग से जाने की आवश्यकता नहीं रहती । क्योंकि ब्रह्म ही उसका आत्मा है, अतः उसकी ब्रह्म-
प्राप्ति अर्चिरादि मार्ग द्वारा गति के अधीन नहीं है ॥ ५७ ॥
प्राणाद्येवं त्रिकं हित्वा तीर्णोऽज्ञानमहोदधिम् ।
स्वात्मस्थो निर्गुणः शुद्धो बुद्धो मुक्तः स्वतो हि सः ॥५८॥
प्राणाद्येवमिति—इस तरह प्राणादि तीनों को अर्थात् प्राण, मन और बुद्धि रूप तीनों अन्तःकरणों को अथवा
जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति रूप तीनों अवस्थाओं को त्याग कर अज्ञानरूप महासागर को पार करता हुआ वह पुरुष स्वयं
आत्मनिष्ठ, निर्गुण तथा शुद्ध-बुद्ध-मुक्त स्वरूप हो जाता है ॥ ५८ ॥
हृदयस्पर्शिनी
अनध्वग होता हुआ ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है, इस कथन को ही और अधिक स्पष्ट करते हुए उसकी
मुक्ति को निरुपाचरित (पूर्णरूपसे) बता रहे हैं । अर्थात् वह उपासक की मुक्ति की तरह आपेक्षिक नहीं है । उपर्युक्त प्रकार

  • अथान्मील्या०—पाठान्तरम् ।

सम्यङ्मतिप्रकरणम् १७१
से प्राण, मन और बुद्धि इन तीनों अन्तःकरणों अथवा जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति इन तीनों अवस्थाओं को त्यागकर अज्ञान
महासागर से उत्तीर्ण (पार) हुआ पुरुष अचिरादिमार्गस्थ न होकर स्वयं आत्मनिष्ठ होता है, तथा अपनी आत्मा में ही
समस्त गुणों को विलीन कर देने से वह निर्गुण हो जाता है और निरूपाधिक हो जाने से शुद्ध होता है, अतः स्वभावतः
ही बुद्ध और मुक्त हो जाता है। अभिप्राय यह है कि पदार्थविवेक द्वारा वाक्यार्थज्ञान होता है, उससे अज्ञान की निवृत्ति
होती है, तब स्वतः ही मुक्त हो जाने से बिना अचिरादिगति के ही ब्रह्म को प्राप्त हुए उस ज्ञानी विद्वान् को पुनः प्रपञ्च
में आना नहीं पड़ता ॥ ५८ ॥
अजोऽहं चामरोऽमृत्युर्जरोऽभय एव च ।
सर्वज्ञः सर्वदृक् शुद्ध इति बुद्धो न जायते ॥५९॥
अजोऽहमिति—मैं जन्म रहित हूँ, अमर (ज्ञानरूप) हूँ, मृत्युरहित हूँ, जरारहित हूँ और भय से रहित हूँ
तथा मैं सर्वज्ञ हूँ, सर्वसाक्षी और शुद्ध हूँ—इस प्रकार 'मैं ब्रह्म हूँ'—'अहं ब्रह्मास्मि' यह जाननेवाला अर्थात् अज्ञाननिद्रा से
जगा हुआ पुरुष पुनः शरीर ग्रहण नहीं करता, यानी उसे पुनः जन्म नहीं लेना पड़ता ॥ ५९ ॥
पूर्वोक्तं यत्तमोबीजं तन्नास्तीति विनिश्चयः ।
तदभावे कुतो जन्म ब्रह्मैकत्वं विजानतः ॥६०॥
पूर्वोक्तमिति—आत्मज्ञानी पुरुष निश्चित रूप से यह जानता है कि पूर्वोक्त सुषुप्ति रूप अज्ञान है ही नहीं ।
तब ब्रह्मात्मैक्यज्ञान से सम्पन्न पुरुष की दृष्टि में अज्ञान का अभाव ही हो जाने से उसका पुनः जन्म कैसे हो सकेगा ? ॥ ६०॥
हृदयस्पर्शिनी
प्रबुद्ध पुरुष के जन्म न लेने में हेतु यह है कि उस विद्वान् का यह निश्चय रहता है कि 'सुषुप्त्याख्यं तमो-
ऽज्ञानम्' के द्वारा कहा गया जो सुषुप्तिरूप अज्ञान है, वह किसी भी काल में ( तीनों कालों में) नहीं है। इस प्रकार
आत्मा और ब्रह्म का एकत्व समझनेवाले उस विद्वान् पुरुष की दृष्टि में अज्ञान का अभाव रहने से पुनः उसका जन्म
कैसे हो सकेगा, क्योंकि कारण के अभाव में कार्य का भी अभाव रहता है। किसी भी काल में सत् वस्तु का ज्ञान होने
मात्र से तिरोधान नहीं होता किन्तु ज्ञान का उदय होते ही इस अज्ञान का तो शुक्ति-रजत के समान तिरोधान हो
जाता है ॥ ६० ॥
क्षीरात्सर्पिर्यथोद्धृत्य क्षिप्तं तस्मिन्न पूर्ववत् ।
बुद्ध्यादेर्ज्ञस्तथाऽसत्यान्न देही पूर्ववद्भवेत् ॥६१॥
क्षीरादिति—जैसे दूध (क्षीर) से निकाला गया घृत (सर्पि) दूध में पुनः मिला देने पर भी पहले की तरह
वह उसमें नहीं मिल पाता, वैसे ही असत्य बुद्धि आदि से 'ज्ञ' के रूप में पृथक् किया गया देही (आत्मा) पहले की तरह
अविवेकी नहीं हो सकता ॥ ६१ ॥
हृदयस्पर्शिनी
'अहं ब्रह्मास्मि'—मैं ब्रह्म हूँ, इस प्रकार प्रत्यक्ष अनुभव करनेवाले विद्वान् का भी व्यवहार पूर्ववत् ही
देखने में आता है, ऐसी स्थिति में उसके द्वारा किये जानेवाले धर्म-अधर्म के कारण उसे पुनः शरीरग्रहण (संसारप्राप्ति)
तो करना ही होगा, यह शंका हो सकती है, उसका उत्तर इस श्लोक के द्वारा दे रहे हैं—जिस प्रकार दूध से निकाला
हुआ घृत (नवनीत) पुनः उसी निःसार किये गये दूध में मिलाये जाने पर भी पूर्ववत् नहीं मिल पाता, उसी प्रकार
असत्य (मिथ्या) बुद्धि आदि के समुदाय से पृथक् किया हुआ आत्मा अर्थात् 'अहं ब्रह्मास्मि' वाक्य से अपने को ब्रह्मरूप
समझनेवाला वह विद्वान् पुनः देहद्वयसंघात (समुदाय) का अभिमान नहीं करता। अर्थात् पूर्ववत् वह अविवेकी नहीं
होता है। अहंकारयुक्त पुरुष के किये कर्म ही उसके बन्धन के हेतु होते हैं, निरहंकारी पुरुष के कर्म बन्धक नहीं होते।
भगवान् स्वयं कहते हैं— "यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते । हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते"१ ।
१. ( भ. गी. १८।१७ )

१७२ उपदेशसाहस्री
जिस ब्रह्मज्ञानी का अन्तःकरण अहंभाव से रहित है और जिसकी बुद्धि धर्माधर्म संस्कार से रहित है, उसे पुण्य-पाप का
बन्धन नहीं होता ॥ ६१ ॥
सत्यं ज्ञानमनन्तं च रसादेः पञ्चकात्परम् ।
स्यामदृश्यादिशास्त्रोक्तमहं ब्रह्मेति निर्भयः ॥६२॥
सत्यमिति—अदृश्यादि शास्त्र के द्वारा बताया हुआ, अन्नमयादि पञ्चकोषोंके परे स्थित, तथा सत्य, ज्ञान
और अनन्त रूप ब्रह्म मैं हूँ, यह जानकर आत्मज्ञानी पुरुष निर्भय हो जाता है ॥ ६२ ॥
हृदयस्पर्शिनी
पदार्थपरिशोधनपूर्वक महावाक्य से 'अहं ब्रह्मास्मि'-मैं ब्रह्म हूँ, इस प्रकार अनुभव करनेवाले ज्ञानी को
पुनः संसारभय की आशंका नहीं रहती, इस उक्त अर्थ में “आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्, न बिभेति कुतश्चन" इस श्रुति के
अर्थ को 'सत्यं ज्ञानमनन्तं' से बता रहे हैं। अदृश्यादि शास्त्र— “अदृश्येऽनात्म्येऽनिरुक्तेऽभयं प्रतिष्ठां विन्दते" के द्वारा
बताये गये और रसादि पञ्चक अर्थात् अन्नमय-प्राणमय-मनोमय-विज्ञानमय-आनन्दमय इन पंचकोशों के पर, यानी
आधारभूत “ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा" इस श्रुति से जिसका निर्देश किया गया है, उसी को 'अदृश्यादि शास्त्र' से गया है, वह
सत्य ज्ञान एवं अनन्तरूप परब्रह्म 'मैं' हूँ, ऐसा समझकर पुरुष निर्भय हो जाता है ॥ ६२ ॥
यस्माद्भीताः प्रवर्तन्ते वाङ्मनःपावकादयः ।
तदात्मानन्दतत्त्वज्ञो न बिभेति कुतश्चन ॥६३॥
यस्मादिति—जिससे डरकर वाणी, मन तथा अग्नि आदि अपना-अपना काम करने में प्रवृत्त होते रहते हैं,
उस आत्मानन्द के तत्त्व (रहस्य) को जानने वाला पुरुष कभी भी और किसी से भी भयभीत नहीं होता है ॥ ६३ ॥
हृदयस्पर्शिनी
भयंकरों के लिये भी भयंकर ऐसे ब्रह्मात्मभूत हुए पुरुष को भय की शंका होने का भी अवकाश कहां ?
इस प्रकार ब्रह्मज्ञ के पूर्वोक्त संसाराभाव को पुनः बताकर उसे दृढ़ कर रहे हैं। 'जिससे भयभीत होकर वाणी, मन एवं
अग्नि आदि अपने-अपने व्यापारों में प्रवृत्त होते हैं, उस आत्मानन्द के रहस्य को जानने वाला पुरुष किसी से भी भय-
भीत नहीं होता'। 'वाङ्मनः पावकादयः' के स्थान पर यदि 'वात्विनौ पावकादयः' पाठ हो तो 'इन' का अर्थ सूर्य
समझना चाहिए । और 'आदि' शब्द से इन्द्र, मृत्यु का ग्रहण करना चाहिए । तथाच श्रुतिः - "भीषाऽस्माद्वातः पवते ।
भीषोदेति सूर्यः । भीषाऽस्मादग्निश्चेन्द्रश्च । मृत्युर्धावति पञ्चमः"१ । इसके भय से वायु चलता है, इसी के भय से सूर्य
उदित होता है तथा इसी के भय से अग्नि, इन्द्र और पाँचवाँ मृत्यु दौड़ता है । "वाङ्मनःपावकादयः" पाठ में अध्यात्म
वागादि हैं, और अधिदैव अग्नि आदि हैं। ये भी उसीके भय से प्रवृत्त होते हैं। तथाच श्रुतिः — "केनेषितं पतति प्रेषितं
मनः केन प्राणः प्रथमः प्रैति युक्तः । केनेषितां वाचमिमां वदन्ति चक्षुः श्रोत्रं क उ देवो युनक्ति"२ । यह मन किसके
द्वारा इच्छित और प्रेरित होकर अपने विषयों में गिरता है ? किससे प्रयुक्त होकर प्रधान प्राण चलता है ? प्राणी
किसके द्वारा इच्छा की हुई यह वाणी बोलते हैं ? और कौन देव चक्षु तथा श्रोत्र को प्रेरित करता है ? तथा कठश्रुति
भी कह रही है :— "भयादस्याग्निस्तपति भयात्तपति सूर्यः ।
भयादिन्द्रश्च वायुश्च मृत्युर्धावति पञ्चमः"३ ॥
इस परमेश्वर के भय से अग्नि तपता है, इसी के भय से सूर्य तपता है, तथा इसी के भय से इन्द्र, वायु और पाँचवाँ
मृत्यु दौड़ता है ॥ ६३ ॥
१. ( तै. उ. २१८ ), भागवत ( ३।२५।४१-४४ ) से तुलना कर सकते हैं ।
२. ( के. उ. १।१ )
३. ( कठ उ. २।३।३ )

सम्यङ्मतिप्रकरणम् १७३
नामादिभ्यः परे भूम्नि स्वाराज्ये चेत्स्थितोऽद्वये ।
प्रणमेत्कं तदाऽऽत्मज्ञो न कार्यं कर्मणा *तथा ॥६४॥
नामेति—वह ब्रह्मात्मैक्यज्ञानसम्पन्नपुरुष यदि नाम आदि से अतीत, व्यापक, अद्वितीय स्वाराज्य में स्थित
हो गया है तो वह किसे प्रणाम करेगा ? उस समय तो उस पुरुष को कर्म से कोई प्रयोजन ही नहीं होता ॥ ६४ ॥
हृदयस्पर्शिनी
हरि, हर, हिरण्यगर्भ आदि बड़े-बड़े देवता, विद्वान् ब्रह्मज्ञानी के लिये भी प्रणम्य होते हैं। उनके अति-
क्रमण का भय संभव रहने से उस ब्रह्मवित् के लिये कार्यशेष तो मानना ही होगा ? —ऐसा यदि कोई कहे तो उसपर कह
रहे हैं कि ब्रह्मवित् यदि नामादि से अतीत, व्यापक, अद्वितीय स्वाराज्य में स्थित है तो वह किसको प्रणाम करेगा ?
उस समय तो उसको कर्म से कोई प्रयोजन ही नहीं रहता; क्योंकि परिपक्वज्ञान होने से वह कृतकृत्य रहता है, अतः
उसे किसी भी कर्म से कोई प्रयोजन नहीं होता । दूसरे के प्रति महद्भाव और अपने प्रति गौणीभाव रहने पर ही प्रणाम
किया जाता है, किन्तु आत्मज्ञ विद्वान् तो प्रणम्यों का भी आत्मरूप है, जब सर्वत्र वही है, तो कौन छोटा और कौन
बड़ा रहा ? सभी स्वस्वरूप हैं, अतः किसे प्रणाम करना होगा ? ॥ ६४ ॥
विराड्वैश्वानरो बाह्यः स्मरन्नन्तः प्रजापतिः ।
प्रविलीने तु सर्वस्मिन् प्राज्ञोऽव्याकृतमुच्यते ॥६५॥
विराडिति—वही आत्मा जाग्रदवस्था में बहिष्प्रज्ञ होने पर व्यष्टि और समष्टि के भेद से 'विराट्' और
'वैश्वानर', तथा स्वप्नावस्था में अन्तःकरण में स्मरण करने पर 'तैजस' और 'हिरण्यगर्भ', और सुषुप्तावस्था में सभी के
लीन हो जाने पर 'प्राज्ञ' और 'अव्याकृत' कहलाता है ॥ ६५ ॥
हृदयस्पर्शिनी
यह भूमा (ब्रह्म), नाम, वाक्, मन आदि से लेकर प्राण तक जितने भी हैं, उन सबके परे है, यह कहा
गया है¹। ऐसी स्थिति में उस ब्रह्म को अद्वय कैसे कहें ? ये नाम आदि अवस्थात्रयरूप होने से अध्यस्त हैं, अतः मिथ्या
हैं। उनका साक्षी तुरीय भूमा (ब्रह्म) तो अद्वय है, उसे बताने के लिए तीन अवस्थाओं को बताते हैं—वह आत्मतत्त्व
ही जाग्रदवस्था में बहिष्प्रज्ञ होने पर व्यष्टि-समष्टि भेद से विराट् और वैश्वानर, स्वप्नावस्था में अन्तःकरण में स्मरण
करने पर तैजस और हिरण्यगर्भ, तथा सुषुप्तावस्था में सबके लीन हो जाने पर प्राज्ञ और अव्याकृत कहा जाता है।
अध्यात्म और अधिदैवत के अभेदाभिप्राय से विराट्-वैश्वानर अर्थात् विश्व-वैश्वानर कहा। बाह्य का अर्थ बहिःप्रज्ञ है।
'अन्तः स्मरन्' कहकर यह बताया है कि स्वप्न में वासनामय विषयों को देखनेवाला प्रजापति हिरण्यगर्भ तैजस है।
अव्याकृत माया की उपाधि से युक्त ईश्वरतत्त्व को 'प्राज्ञ' कहा गया है ॥ ६५ ॥
वाचारम्भणमात्रत्वात्सुषुप्तादित्रिकं त्वसत् ।
सत्यो ज्ञश्चाहमित्येवं सत्यसन्धो विमुच्यते ॥६६॥
वाचारम्भणेति—सुषुप्तादि तीनों अवस्थाएँ तो मिथ्या हैं, क्योंकि ये वाचारम्भण मात्र हैं। 'मैं (आत्मा) ही
ज्ञानस्वरूप हूँ'—यह जाननेवाला सत्यसन्ध मुमुक्षु पुरुष मुक्त हो जाता है ॥ ६६ ॥
हृदयस्पर्शिनी
अवस्थात्रयात्मक जगत् को मिथ्या समझकर उसकी साक्षीभूत वस्तु जो ब्रह्म है, वह मैं हूँ, यह ज्ञान होनेपर
मुक्त हो जाता है। वाणी से आरंभ होने के कारण सुषुप्ति आदि तीनों अवस्थाएँ मिथ्या हैं', 'मैं ज्ञानस्वरूप आत्मा ही
सत्य हूँ' इस प्रकार का ज्ञान होनेपर सत्यप्रतिज्ञ पुरुष मुक्त हो जाता है ॥ ६६ ॥
१. ( के. उ. १।१-८ )

  • तदा—पाठान्तरम् ।

यहाँ पृष्ठ का पूर्ण देवनागरी पाठ प्रस्तुत है:

१७४ उपदेशसाहस्री
भारूपत्वाद्यथा भानोर्नाहोरात्रे तथैव *च ।
ज्ञानाज्ञाने न मे स्यातां चिद्रूपत्वाविशेषतः ॥६७॥
भारूपत्वादिति—जिस प्रकार सूर्य में दिन तथा रात्रि नहीं होती है, क्योंकि वह प्रकाशरूप है, इसी प्रकार
चिद्रूपत्त्व की समानता होने से मुझ (आत्मा) में न ज्ञान है और न अज्ञान ही है ॥ ६७ ॥
हृदयस्पर्शिनी
आत्मतत्त्व का ज्ञान न होने से अध्यस्त रहनेवाले संसार की निवृत्ति अधिष्ठानरूप आत्मतत्त्व के ज्ञान से
हो जाती है। यह कहने से ज्ञान और अज्ञान को आत्मधर्म कहना होगा ?—इस आशंका का समाधान दृष्टान्त देकर
कर रहे हैं—जिस प्रकार प्रकाशस्वरूप होने के कारण सूर्य में दिन-रात का अभाव रहता है, उसी प्रकार चिद्रूपता की
समानता होने से मुझ आत्मा में न ज्ञान है, न अज्ञान है। मैं तो ज्ञान-अज्ञान दोनों का ही साक्षी हूँ, और वे दोनों मेरे
साक्ष्य हैं, अतः वे दोनों कल्पित हैं। कल्पित होने के कारण वे दोनों मेरे धर्म नहीं हैं ॥ ६७ ॥
शास्त्रस्यानतिशङ्क्यत्वादब्रह्मैव स्यामहं सदा ।
ब्रह्मणो मे न हेयं स्याद्ग्राह्यं वेति च संस्मरेत् ॥६८॥
शास्त्रस्येति—शास्त्र का प्रामाण्य किसी प्रकार भी शङ्का करने के योग्य न होने से 'मैं सर्वदा ब्रह्मरूप ही हूँ' ।
अतः मुझ ब्रह्मस्वरूप के लिये 'न कुछ हेय (त्याज्य) है और न कुछ उपादेय (ग्राह्य) है'—यह सर्वदा स्मरण रखना
चाहिये ॥ ६८ ॥
हृदयस्पर्शिनी
आत्मा की निर्विशेषता शास्त्रप्रामाण्य से ही सिद्ध हैं, अतः कुतर्क से मन को दूषित नहीं करना चाहिए।
शास्त्र का प्रामाण्य किसी प्रकार से भी शंका करने योग्य नहीं है, उसका प्रामाण्य निःशङ्क है । अतः 'मैं सर्वदा ब्रह्म ही
हूँ, ब्रह्मरूप हुए मेरे लिये न कुछ हेय है और न ग्राह्य है', यह सर्वदा स्मरण रखना चाहिए ॥ ६८ ॥
अहमेव च भूतेषु सर्वेष्वेको नभो यथा ।
मयि सर्वाणि भूतानि पश्यन्नेवं न जायते ॥६९॥
अह्ममिति—जैसे आकाश सर्वत्र विद्यमान है, वैसे मैं ही समस्त भूतों में विद्यमान हूँ तथा समस्त भूत मुझमें
विद्यमान हैं, ऐसी दृष्टि रखने वाला पुरुष पुनः कभी उत्पन्न नहीं होता अर्थात् जन्म ग्रहण नहीं करता ॥ ६९ ॥
हृदयस्पर्शिनी
वह ब्रह्मपरक शास्त्र कौन-सा है, और सर्वदा अहेय अनुपादेय ब्रह्मात्मज्ञाननिष्ठा का फल क्या है ?
ऐसी अपेक्षा होनेपर 'यस्तु सर्वाणि भूतानि'१ इत्यादि मन्त्रार्थ को दे रहे हैं—मैं एकाकी ही आकाश के समान यच्चयावत्
सम्पूर्ण भूतमात्र में विद्यमान हूँ, तथा सम्पूर्ण भूतमात्र मुझमें स्थित हैं। इस प्रकार की दृष्टि (ज्ञान) होनेपर उस ज्ञानी
को जन्म नहीं लेना पड़ता ॥ ६९ ॥
न बाह्यं मध्यतो वाऽन्तर्विद्यतेऽन्यत्स्वतः क्वचित् ।
सबाह्यान्तःश्रुतेः किञ्चित्तस्माच्छुद्धः स्वयंप्रभः ॥७०॥
न बाह्यमिति—बाहर, भीतर या मध्य में आत्मा के अतिरिक्त अन्य कोई वस्तु नहीं है। इस तथ्य को भगवती
श्रुति ने बताया है। इसलिये वह आत्मा शुद्ध और स्वयम्प्रकाश है ॥ ७० ॥
१. (ई. उ. ६)

  • तु—पाठान्तरम् ।

हृदयस्पर्शिनी
आत्मा की अद्वितीय ब्रह्मरूपता में अर्थतः शास्त्र को बताकर अब उसकी निर्विशेष ब्रह्मरूपता में भी शास्त्र
(श्रुति) बता रहे है—“तदेतद् ब्रह्मापूर्वमनपरमनन्तरमबाह्यमयमात्मा ब्रह्म सर्वानुभूः¹” पूर्वोक्तगुणविशिष्ट यह ब्रह्म
अपूर्व (कारणरहित), अनपर (कार्यरहित), अनन्तर (विजातीय द्रव्य से रहित) और अबाह्य है। यह आत्मा ही सबका
अनुभव करनेवाला ब्रह्म है। इस श्रुति के कारण आत्मा से भिन्न उसके बाहर, भीतर या मध्य में अन्य कोई वस्तु है
ही नहीं। अतः वह शुद्ध और स्वयंप्रकाश है ॥ ७० ॥
नेति नेत्यादिशास्त्रेभ्यः ‘प्रपञ्चोपशमोऽद्वयः’ ।
अविज्ञातादिशास्त्राच्च नैव ज्ञेयो ह्यतोऽन्यथा ॥७१॥
नेतीति—नेति-नेति इत्यादि शास्त्र से तथा अविज्ञातादि-शास्त्र से वह आत्मा प्रपञ्चशून्य एवं अद्वितीय है,
इसके अतिरिक्त अन्य किसी रीति से वह ज्ञेय नहीं है॥ ७१ ॥
हृदयस्पर्शिनी
आत्मा की सर्वप्रपञ्चसंस्पर्शशून्यता को शास्त्रान्तरों के द्वारा भी बता रहे हैं—प्रपञ्च के निषेध द्वारा ही
आत्मा को जानना चाहिए, विषय के रूप में या प्रपञ्च संसृष्ट के रूप में नहीं। ‘आत्मा स्थूल नहीं है, सूक्ष्म शरीर भी
नहीं है’, इत्यादि शास्त्र से तथा ‘वह स्वयं ज्ञात हुए बिना ही दूसरों का ज्ञाता है’ इस श्रुति से आत्मा प्रपञ्चशून्य
एवं अद्वितीय है, वह इससे भिन्न प्रकार से ज्ञेय नहीं है। नेति-नेति शास्त्र अर्थात् प्रपञ्चनिषेध शास्त्र को बृहदारण्यक
में बताया है—‘नेति नेति न ह्येतस्मादिति नेत्यन्यत्परमस्त्यथ नामधेयं सत्यस्य सत्यमिति’। ‘नेति-नेति’ यह ब्रह्म का
संकेत है। ‘नेति’ ‘नेति’ से बढ़कर कोई उत्कृष्ट संकेत नहीं है। ‘सत्य का सत्य’ उसका नाम है²। उसी प्रकार
गौड़पादकारिका में उसे प्रपञ्चोपशम अद्वयरूप बताया है³। केनोपनिषद् में कहा है कि ‘अन्यदेव तद्विदितादथो
अविदितादधि’⁴—वह विदित से अन्य ही है तथा अविदित से भी परे है। तथा उसी में पुनः बताया है ‘यस्यामतं तस्य
मतं मतं यस्य न वेद सः⁵—ब्रह्म जिसको ज्ञात नहीं है, उसी को ज्ञात है और जिसको है, वह उसे नहीं जानता है।
बृहदारण्यक में कहा है ‘अविज्ञातं विज्ञातृ’⁶—बुद्धि का अविषय होने के कारण विज्ञात नहीं है, किन्तु स्वयं विज्ञानस्वरूप
होने से विज्ञाता है। इस प्रकार उसकी सर्वप्रपञ्चशून्यता स्पष्ट हो रही है ॥ ७१ ॥
सर्वस्यात्माऽहमेवेति ब्रह्म चेद्विदितं परम्।
स आत्मा सर्वभूतानामात्मा ह्येषाामिति श्रुतेः॥७२॥
सर्वस्येति—‘मैं ही सबका आत्मा हूँ’—इस प्रकार से यदि ब्रह्म का ज्ञान हो जाय तो वह समस्त प्राणियों का
‘आत्मा’ हो जाता है। इस तथ्य को भगवती श्रुति ने बताया है ॥ ७२ ॥
हृदयस्पर्शिनी
“तस्मादेषां तन्न प्रियं यदेतन्मनुष्या विद्युः⁷”—इसलिये देवताओं को यह प्रिय नहीं है कि मनुष्य
ब्रह्मतत्त्व को जानें—यह श्रुति बता रही है कि इस प्रकार अद्वयादि लक्षण आत्मा को जानने वालों की फलप्राप्ति
में देवता लोग विघ्न पैदा करते हैं—यह शंका यदि कोई करे तो वह ठीक नहीं है, क्योंकि ‘मैं ही सब का आत्मा
१. (बृ. उ. २।५।१९)
२. (बृ. उ. २।३।६)
३. (गौ. का. २।३५)
४. (के. उ. १।३)
५. (के. उ. २।३)
६. (बृ. उ. ३।८।११)
७. (बृ. उ. १।४।१०)

१७६ | उपदेशसाहस्री
हूँ' इस प्रकार यदि परब्रह्म का ज्ञान हो जाय तो वह समस्त प्राणिमात्र का आत्मा हो जाता है। वह विद्वान् ब्रह्म-
ज्ञानी देवताओं का भी आत्मा होने से उस विघ्नप्रतिपादक श्रुति को अविद्वद्विषयक समझना चाहिये । "तस्य ह
न देवाश्च ना भूत्या ईशते । आत्मा ह्येषां स भवति१"-उसके पराभव में देवता भी समर्थ नहीं होते, क्योंकि वह
उनका आत्मा ही हो जाता है, यह बृहदारण्यक श्रुति बता रही है ॥ ७२ ॥
जीवश्चेत्परमात्मानं स्वात्मानं देवमञ्जसा ।
देवो [वेदो] पास्यः स देवानां पशुत्वाच्च निवर्तते ॥७३॥
जीवश्चेदिति-यदि जीव अपने को परमात्मस्वरूप जानने लगता है, तो वह शीघ्र ही देवताओं का भी
उपास्य हो जाता है और देवताओं के पशुत्व से निवृत्त होता है ॥ ७३ ॥
हृदयस्पर्शिनी
उक्त साधनसम्पन्न ब्रह्मात्मज्ञानवान् विद्वान् अपनी जीवित अवस्था में ही देवताओं का भी उपास्य
बन जाता है, अतः उसके प्रति देवपशुत्व की शंका भी नहीं की जा सकती अर्थात् देवताओं के पशुत्व से वह निवृत्त
हो जाता है। अतः उसे किसी से भी भय नहीं रहता । इसी अभिप्राय को श्रुति ने भी बताया है—
"यदैव मनु पश्यत्यात्मानं देवमञ्जसा ।
ईशानं भूतभव्यस्य न तदा विजुगुप्सते२ ॥"
तथा तैत्तिरीय उपनिषद् ने भी बताया है कि "सर्वैस्मै देवा बलिमावहन्ति३" उसी प्रकार तैत्तिरीय आरण्यक ने भी
कहा है कि "तमेवं विद्वानमृत इह भवति४" ॥ ७३ ॥
अहमेव सदात्मज्ञः शून्यस्त्वन्यैरथाम्बरम् ।
इत्येवं सत्यसन्धत्वादसद्धाता* न बध्यते ॥७४॥
अह्मिति—'मैं ही सत्स्वरूप चेतन आत्मा हूँ, तथा आकाश के समान अन्य पदार्थों से रहित हूँ'-इस प्रकार
सत्यसन्ध होने के कारण असत्य का त्याग करने वाला पुरुष, चोर के समान बद्ध नहीं होता है ॥ ७४ ॥
हृदयस्पर्शिनी
यह जो पीछे कहा था कि "सत्यसन्धो विमुच्यते" उसी को स्पष्ट कर रहे हैं-मैं ही 'सत्' स्वरूप चेतन
आत्मा हूँ, और आकाश के तुल्य अन्य पदार्थों से रहित हूँ। इस प्रकार सत्यसन्ध होने के कारण असत्य का त्याग
करने वाला पुरुष, चोर के समान बन्धन को प्राप्त नहीं होता, या उसका वध नहीं किया जाता । 'सदात्मज्ञः' में
कर्मधारय समास 'सदात्मा चासौ ज्ञश्च-सदात्मज्ञः' करना चाहिये । इसका उदाहरण 'तत्सत्यं स आत्मा५' यह श्रुति
है। 'अन्यैः शून्यः' कहकर वाचारंभण श्रुति के अर्थ को बताया है। 'यथाम्बरम्' से दृश्यसंसर्गशून्य होने के कारण
शुद्ध रहने में दृष्टान्त बताया है। 'असद्धाता' से अनृताभिसन्धि से रहित होने के कारण अतस्कर के समान
बन्धनार्थहीन रहता है। इसके उदाहरण में “स यथा तत्र न दह्ये तैतदात्म्यमिदं सर्वम्६” यह श्रुति है। अथवा 'असत:
हाता'—असद्धाता अर्थात् कार्यसहित अज्ञान का नाशयिता अर्थ करना चाहिये ॥ ७४ ॥
कृपणास्तेऽन्यथैवातो विदुर्ब्रह्म परं हि ये ।
स्वराड्चोऽनन्यदृक् स्वस्थस्तस्य देवा असन्वशे ॥७५॥
१. ( बृ. उ. १।४।१० )
२. ( कठ. उ. ४।६ )
३. ( तै. उ. १।५ )
४. ( तै. आ. ३।१।३ )
५. ( छा. उ. ६।८।७ )
६. ( छा. उ. ६।१६।३ )

  • ह्तानाज्ञ-पाठान्तरम् ।

सम्यङ्मतिप्रकरणम् १७७

कृपणा इति—वे लोग कृपण (दीन) हैं, जो 'आत्मा' को 'ब्रह्म' से भिन्न समझते हैं, परन्तु जो लोग 'ब्रह्म'
और 'आत्मा' दोनों में अभेद देखते हैं, वे स्वयंप्रकाश और आत्मनिष्ठ कहलाते हैं। सम्पूर्ण देवतागण भी उसके वशंगत
रहते हैं ।। ७५ ।।
हृदयस्पर्शिनी
इस प्रकार का ज्ञान न होने से अन्य प्राकृत लोग शोच्य रहते हैं, इसे दिखाते हुए "अथ येऽन्यथाऽतो
विदुरन्यराजानस्ते क्षय्यलोका भवन्ति१” इस श्रुति के अर्थ को बता रहे हैं—जो लोग परब्रह्म को आत्मा से
भिन्न अर्थात् अनात्मरूप जानते हैं, वे कृपण यानी दीन (शोच्य) ही हैं। किन्तु जो अभेददर्शी है, वह कृपण नहीं है।
वह स्वयंप्रकाश और आत्मनिष्ठ रहता है, सम्पूर्ण देवगण उसके अधीन रहते हैं। छान्दोग्य श्रुति बता रही है—
'एवं विजानन्नात्मरतिरात्मक्रीड आत्ममिथुन आत्मानन्दः स स्वराड् भवति२' तथा “तस्य सर्वेषु लोकेषु कामचारो
भवति"—इस प्रकार विशेषरूप से जानने वाला आत्मरत, आत्मक्रीड़, आत्ममिथुन और आत्मानन्द होता है, वह
स्वराट् है, सम्पूर्ण लोकों में उसकी यथेच्छ गति होती है। 'आसम्' अर्थ में 'असन्' प्रयोग छान्दस है। "यस्त्वेवं
ब्राह्मणो विद्यात् । तस्य देवा असन् वशे" इस तैत्तिरीय आरण्यक के मन्त्र में 'असन्' प्रयोग हुआ है। जो इस प्रकार
का ब्रह्मनिष्ठ ब्राह्मण 'वेदाहमेतं पुरुषं महान्तम् ३' के अनुसार ब्रह्मात्मा को जानता है, देवता उस ब्रह्मनिष्ठ के वशवर्ती
हो जाते हैं ।। ७५ ।।
हित्वा जात्यादिसम्बन्धा *न्वाचोऽन्याः सह कर्मभिः ।
ओमित्येवं †स्वमात्मानं सर्वं शुद्धं प्रपद्यथ ॥७६॥
हित्वेति—जाति आदि सम्बन्धों का तथा कर्मकलाप के सहित अन्य समस्त वाक्यों का त्याग करके सम्पूर्ण
ब्रह्माण्ड का आधारभूत 'ॐ' शब्द से वाच्य जो शुद्ध आत्मा है, उसी के शरण में जाओ ।। ७६ ।।
हृदयस्पर्शिनी
यथोक्त आत्मज्ञान से ही कृतकृत्यता हो पाती है, अतः मुमुक्षु को उसी के लिये यत्न करना चाहिये ।
जाति आदि सम्बन्ध तथा कर्मों के सहित अन्य समस्त वाक्यों का त्याग करके सर्वदा सब के आधारभूत ॐ शब्दवाच्य
शुद्ध आत्मा के शरण जाओ । मुण्डक श्रुति कह रही है— "यस्मिन् द्यौः पृथिवी चान्तरिक्षमोतं मनः सह प्राणैश्च सर्वैः ।
तमेवैकं जानथ आत्मानमन्या वाचो विमुञ्चथामृतस्यैष सेतुः४ ।” “ओमित्येवं ध्यायथ आत्मानम्५"—जिसमें द्युलोक,
पृथिवी, अन्तरिक्ष और सम्पूर्ण प्राणों के सहित मन ओत-प्रोत है, उस एक आत्मा को ही जानो, और सब बातों को
छोड़ो, यही अमृत का सेतु (साधन) है। उस आत्मा का ॐ के रूप में ध्यान करो । इनके अतिरिक्त अन्य जो
वाक्य हैं, वे सब अनात्मविषयक प्रवृत्तिपरक हैं। 'सर्वम्' का अर्थ सर्वाधारभूत और 'शुद्धम्' का अर्थ विविक्त अर्थात्
निर्विशेष समझना चाहिये ।। ७६ ।।
सेतुं सर्वव्यवस्थानामहोरात्रादिवर्जितम् ।
तिर्यगूर्ध्वमधः सर्वं सकृज्ज्योतिरनामयम् ॥७७॥
सेतुमिति—वह आत्मा वर्णाश्रमादि सभी मर्यादाओं का सेतु है, दिन-रात्रिरूप काल से भी परे है अर्थात्
उसे काल का स्पर्श तक नहीं हो पाता । ऊपर-नीचे-पार्श्व भाग में यानी सभी ओर वह विद्यमान है। वही एक मात्र ज्योतिः-
स्वरूप और निर्दोष (अनामय) है ।। ७७ ।।

  • सम्बन्धं—पाठान्तरम् । † सदात्मानं— पाठान्तरम् ।
    १. ( छां. उ. ७।२५।२ )
    २. ( छां. उ. ७।२५।२ )
    ३. ( तै. आ. ३।१३ )
    ४. ( मु. उ. २।२।५ )
    ५. ( मु. उ. २।२।६ )
    २३

यहाँ दिए गए पृष्ठ का संपूर्ण पाठ (transcription) प्रस्तुत है:

१७८ उपदेशसाहस्री
—वह शरण्य (प्रतिपत्तव्य) आत्मा समस्त वर्णाश्रमादि मर्यादाओं का सेतु (विधारक) है। छान्दोग्य
श्रुति बता रही है—"अथ य आत्मा स सेतुर्विधृतिरेषां लोकानामसंभेदाय नैतं सेतुमहोरात्रे तरतः............
सकृद्विभातो ह्येवैष ब्रह्मलोकः।"१ जो आत्मा है, वह इन लोकों के पारस्परिक असंघर्ष (असंभेद) के लिये इन्हें विशेष-
रूप से धारण करने वाला सेतु है। दिन और रात्रि (अहोरात्र) भी इस सेतु का अतिक्रमण नहीं कर पाते। इस
सेतु को न जरा, न मृत्यु, न शोक और न सुकृत या दुष्कृत ही प्राप्त हो सकते हैं। संपूर्ण पाप इससे निवृत्त हो जाते
हैं, क्योंकि यह ब्रह्मलोक पापशून्य है। यह ब्रह्मलोक सर्वदा प्रकाशस्वरूप है। तात्पर्य यह है कि मुक्ति प्राप्ति में यह
आत्मरूप सेतु रात्रि-दिवसादि से रहित और ऊपर-नीचे, इधर-उधर सब ओर विद्यमान, एकमात्र ज्योतिःस्वरूप
और अनामय (दोषरहित) है ॥ ७७ ॥
धर्माधर्मविनिर्मुक्तं भूतभव्यात्कृताकृतात् ।
स्वमात्मानं परं विद्याद्विमुक्तं सर्वबन्धनैः ॥७८॥
धर्माधर्मेति—धर्म और अधर्म से भी रहित (विनिर्मुक्त) तथा भूत-भविष्य और कार्य-कारण से भिन्न और
सभी प्रकार के बन्धनों से मुक्त रहने वाले अपने आत्मा को जानना चाहिये ॥ ७८ ॥
हृदयस्पर्शिनी
वह शरण्य आत्मा, धर्माऽधर्म से शून्य, भूत-भविष्य और कार्य-कारण से भिन्न तथा सर्वविध समस्त
बन्धनों से मुक्त है, ऐसा समझते रहना चाहिये। काठक श्रुति कह रही है—"अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मादन्यत्रास्मात्कृता-
कृतात् । अन्यत्र भूताच्च भव्याच्च यत्तत्पश्यसि तद्वद२।" जो धर्म से पृथक्, अधर्म से पृथक् तथा इस कार्य-कारणरूप
प्रपञ्च से भी पृथक् है, और जो भूत एवं भविष्य से भी अन्य है—ऐसा आप जिसे देखते हैं, वही मुझे बताइये।
इसी श्रुत्यर्थ को श्लोक के द्वारा बताया गया है। 'कृताऽकृतात्' का अर्थ कार्य-कारण से है ॥ ७८ ॥
अकुर्वन्सर्वकृच्छुद्धस्तिष्ठन्नत्येति धावतः ।
मायया सर्वशक्तित्वादजः सन् बहुधा मतः ॥७९॥
अकुर्वन्निति—वह आत्मा कुछ न करता हुआ भी सब कुछ करता है, वह शुद्ध है, वह स्थित रहता हुआ भी
तेजी से दौड़नेवाले मन से भी आगे निकल जाता है, वह अजन्मा रहने पर भी माया के कारण सर्वशक्तिसम्पन्न होने से
उसको अनेक प्रकार का भी कहा गया है ॥ ७९ ॥
हृदयस्पर्शिनी
आत्मा को कर्ता, भोक्ता आदि कहने के कारण उसे बन्धनों से सर्वथा मुक्त कैसे कह सकते हैं? यह
शंका हो सकती है, किन्तु उसके कर्तृत्व श्रवण के साथ ही उसका अकर्तृत्व भी सुना जाता है, तब एक ही वस्तु में
दो विरुद्ध स्वभावों का सम्बन्ध हो नहीं सकता, अतः कहना होगा कि स्वभाव से प्राप्त कर्तृत्वादिक तो मायामय है,
और अकर्तृत्वादिक प्रमाणसिद्ध है, वह आत्मस्वभाव है, यही दोनों में अन्तर है, इसी को बताने वाली अर्थात्
विरुद्धधर्मवादिनी श्रुतियां हैं। श्लोकगत 'अकुर्वन्' से 'अनेजदेकं मनसो जवीयः३' इस मन्त्रभाग के अर्थ को बताया
गया है। उसी तरह 'शुद्धः' से 'शुद्धमपापविद्धम्' का अर्थ बताया है। 'तिष्ठन्' से 'तद्धावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत्'४
का अर्थ बताया है। 'अजः सन् बहुधा मतः' से 'अजायमानो बहुधा विकायते'५ का अर्थ बताया है। उपर्युक्त सभी में
'मायया सर्वशक्तित्वात्' हेतु दिया है, अर्थात् माया के लिये कोई बात असंभव नहीं है, माया तो 'अघटितघटना-
१. (छां. उ. ८।४।१-२)
२. (कठ. उ. २।१४)
३. (ई. उ. ४।)
४. (कठ. उ. २।१४)
५. (तै. आ. ३।१३)

सम्यङ्मतिप्रकरणम् १७९

पटीयसी' कहलाती है। निष्कर्ष यह है कि वह कुछ न करते हुए भी सब कुछ करनेवाला है, शुद्ध है, स्थित रहते हुए भी दौड़नेवाले मन आदि से आगे निकल जाता है, तथा माया के द्वारा सर्वशक्तिसम्पन्न होने के कारण वह अजन्मा होते हुए भी अनेक प्रकार से माना जाता है। मन, प्राण आदि अत्यन्त वेगवान् हैं, इनसे अधिक वेगवान् संसार में अन्य कोई नहीं देखा गया है, किन्तु इस आत्मा का वेग उनसे भी कहीं अधिक है, वह उनका भी उल्लंघन कर जाता है। क्योंकि जहाँ कहीं मन, प्राण आदि पहुँचते हैं, वहाँ सर्वत्र पहले से ही आत्मचैतन्य अभिव्यक्त हुआ पाया जाता है। अतः आत्मा स्थिर स्थित रहता हुआ भी चलता हुआ-सा (गच्छतीव) प्रतीत होता है ॥ ७९ ॥

राजवत्साक्षिमात्रत्वात्सांनिध्याद्भ्रामको यथा ।
भ्रामयञ्जगदात्मानं निष्क्रियोऽकारकोऽद्वयः ॥८०॥

राजवदिति—चुम्बक जैसे अपने सान्निध्यमात्र से लोहखण्ड का परिभ्रामक होता है, वैसे ही समस्त जगत् को घुमाता हुआ भी मैं (आत्मा) राजा के समान साक्षिमात्र हूँ, अतः मैं निष्क्रिय, अकर्ता और अद्वितीय हूँ ॥ ८० ॥

हृदयस्पर्शिनो

निष्क्रिय में भी क्रियावान् का जो उपचार किया गया है, उसी को दृष्टान्त देकर बताया जा रहा है। जैसे चुम्बक अपनी सन्निधिमात्र से लोहखण्ड को नचा देता है, वैसे ही समस्त जगत् को परिभ्रमण कराता हुआ भी यह आत्मा राजा के समान साक्षिमात्र है, अतः वह मैं आत्मा, निष्क्रिय, कर्तृत्वरहित और अद्वितीय हूँ ॥ ८० ॥

निर्गुणं निष्क्रियं नित्यं निर्द्वन्द्वं यन्निरामयम् ।
शुद्धं बुद्धं तथा मुक्तं तद्ब्रह्मास्मीति धारयेत् ॥८१॥

निर्गुणमिति—जो निर्गुण, निष्क्रिय, निर्द्वन्द्व, निरामय और शुद्ध, बुद्ध, मुक्त स्वरूप ब्रह्म है, वही 'मैं' हूँ—यह निश्चित रूप से समझना चाहिये ॥ ८१ ॥

हृदयस्पर्शिनो

जबकि आत्मा स्वयं (स्वतः) नित्य शुद्धस्वभाव का है और यह बात शास्त्र तथा न्याय से अवगत होती है, इस कारण उस आत्मा को उसी तरह जाना जाय' अन्यथा नहीं। जो निर्गुण, निष्क्रिय, निर्द्वन्द्व, निरामय एवं शुद्ध, बुद्ध,मुक्तस्वरूप ब्रह्म है, वही मैं हूँ—ऐसा दृढ़ निश्चय करना चाहिए। इन श्लोकों में यद्यपि पुनरुक्ति दृष्टिगोचर होती है, तथापि वह दोषावह नहीं है¹। क्योंकि प्रतिपाद्य बहुत दुर्बोध है, उस कारण मुमुक्षु पर उपकार करने के लिए परम कारुणिक आचार्य कभी शास्त्र के द्वारा, कभी फल बताकर, कभी विद्वानों के अनुभवों को बताकर पुनः पुनः उसी बात को बताया करते हैं। 'भूयोऽपि पथ्यं वक्तव्यम्' यह नियम है ॥ ८१ ॥

बन्धं मोक्षं च सर्वं यत इदमुभयं हेयमेकं द्वयं च
*ज्ञेयाज्ञेयाभ्यतीतं परममधिगतं तत्त्वमेकं विशुद्धम् ।
विज्ञायतैद्यथावच्छ्रुतिमुनिगदितं शोकमोहावतीतः
सर्वज्ञः सर्वकृत्स्याद्भवभयरहितो ब्राह्मणोऽवाप्तकृत्यः ॥८२॥

बन्धमिति—बन्ध-मोक्ष और ये दोनों जिन कारणों (अज्ञान-ज्ञान) से उपलब्ध होते हैं, उनको भी तथा एक (कारण) और अनेक (कार्य) रूप विषयों को भी त्याज्य समझकर, तथा श्रुति और मुनियों के द्वारा प्रतिपादित जो समस्त ज्ञेय हैं, उससे भी अतीत (परे) एक विशुद्ध आत्मतत्त्व है, उसका सम्यक् अनुभव करके ब्रह्मज्ञानी पुरुष शोक-मोह से अतीत (वह सर्वज्ञ, सर्वकृत्, संसारभय से रहित) और कृत-कृत्य हो जाता है ॥ ८२ ॥


१. "पौनरुक्त्यं न दोषोऽत्र शब्देनार्थेन वा भवेत् ।
अभ्यासेन गरीयस्त्वमर्थस्य प्रतिपाद्यते ॥" [ मानसोल्लास-८।४—इससे तुलना करिये ।]
* ज्ञेयं

१८० उपदेशसाहस्री
उक्त प्राकरणिक अर्थ का अनायास ज्ञान कराने के निमित्त संक्षेप में बता रहे हैं—बन्ध और मोक्ष कायथा-
वत् ज्ञान प्राप्त करके भव-भय से रहित होना चाहिए। प्रमातृत्व (ज्ञातृत्व), कर्तृत्ववादि का प्रतिभास होते रहना ही
'बन्ध' है और ब्रह्मस्वरूप में अवस्थित रहना ही 'मोक्ष' है। ये दोनों (बन्ध और मोक्ष) जिन हेतुओं (अज्ञान और ज्ञान)
से होते हैं, उन्हें भी जानना चाहिए। अर्थात् बन्ध-मोक्ष और उनके कारणों को, उसी तरह एक अर्थात् कारण और
द्वय यानी अनेक (कार्य) अर्थात् कार्य-कारणात्मक विषय को हेय (बाध्य) जानकर तथा श्रुति-मुनिगदित अर्थात् श्रुति-
वाक्य के द्वारा गुरु (मुनि) ने जिसका उपदेश किया है और वेदान्तवाक्यों में उपलब्ध होनेवाले तथा समस्त ज्ञेय वर्ग से
परे एक विशुद्ध परतत्त्व है, उसे यथार्थरूप से अनुभव कर अर्थात् अनात्म पदार्थों से उसे पृथक् समझकर आत्मतत्त्व-
निष्ठ होनेवाला मुमुक्षु शोक, मोह से अतीत, सर्वज्ञ, सर्वकर्मा, संसारभय से रहित और कृत-कृत्य हो जाता है। इसी
अभिप्राय को ईशावास्योपनिषद् ने भी बताया है१। सर्वात्मकता तो एकमात्र ब्रह्म में है, उसे जानकर कौन
सर्वज्ञ नहीं होगा। उसी तरह अपनी आत्मा में समस्त को एक करनेवाला ही सर्वकृत् समझने योग्य होता है। श्रुति
भी ऐसे मुक्त के विषय में बता रही है—'अहं विश्वं भुवनमभ्यभवा३म्'२। इस श्रुति में दीर्घता का प्रयोग गाने के लिये
किया गया है। (अभ्यभवम् का अर्थ मैंने 'अपने स्वाधीन' कर लिया है।) भवभयरहित होने में 'न बिभेति कुतश्चन'३
श्रुति प्रमाण है। उक्त पद्य में 'ब्राह्मण' शब्द का अर्थ मुख्य वृत्ति से ब्राह्मण ही समझना चाहिए। क्योंकि बृहदारण्यक
श्रुति कह रही है—'अमौनं च मौनं च निर्विद्याथ ब्राह्मणः४ और 'अथ य एतदक्षरं गार्गि विदित्वास्माल्लोकात्प्रैति स
ब्राह्मणः'५। उक्त दो श्रुतियों का अर्थ क्रमशः इस प्रकार है—अमौन और मौन का पूर्णतया संपादन करके ब्राह्मण
कृतकृत्य हो जाता है। तथा हे गार्गी ! जो इस अक्षर को जानकर इस लोक से मरकर जाता है, वह ब्राह्मण है।
मुमुक्षु की अवाप्तकृत्यता में यह श्रुति है—'सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह । ब्रह्मणा विपश्चिता'६। इसी अभिप्राय को
स्मृति भी कह रही है—'एतद्बुध्वा बुद्धिमान् स्यात् कृतकृत्यश्च भारत'७—ब्रह्मभूत विद्वान् ब्रह्मस्वरूप से ही एक साथ
सम्पूर्ण भोगों को प्राप्त करता है। अन्य लोगों के समान क्रम से नहीं। समस्त कर्मफल उसे प्राप्त हुए
रहते हैं ॥ ८२ ॥
न स्वयं स्वस्य *नान्यश्च नान्यस्यात्मा च हेयगः ।
उपादेयो न चाप्येवमिति सम्यङ्मतिः स्मृता ॥८३॥
न स्वयमिति—स्वयं आत्मा न अपना हेय है और न उपादेय है, उसी तरह परमात्मा (अन्य) भी न अपना
हेय है और न उपादेय है, इस प्रकार की निष्ठा को ही सम्यक् ज्ञान कहा गया है ॥ ८३ ॥
हृदयस्पर्शिनो
पूर्वोक्त आत्मज्ञानी की कृतकृत्यता को ही स्पष्ट कर रहे हैं—आत्मा (स्वयं) अपना हेय या उपादेय नहीं है,
क्योंकि एक ही में कर्म-कर्तृत्व का होना संभव नहीं। और स्वरूप की स्थिति या नाश होने पर स्वविषय का हान
(त्याग)-उपादान नहीं हो सकता। और उसी प्रकार अन्य (परमात्मा) भी अपना हेय या उपादेय नहीं है। क्योंकि
अद्वैत रहने पर अन्य का अभाव ही है। उसी कारण वह उपादेय भी नहीं। उसी तरह अन्य के द्वारा भी यह उपादेय
अथवा हेय नहीं हो सकता, क्योंकि आत्मान्तर है ही नहीं। और अनात्मा तो बाधित ही है, और वह अचेतन्य भी है।
इस प्रकार की निष्ठा को ही सम्यग् ज्ञान कहा गया है। तस्मात् इस प्रकार जाननेवाला कृत-कृत्य हो जाता है ॥ ८३ ॥

  • नान्यस्य नान्यश्चात्मा — पाठान्तरम्।
    १. (ई. उ. ७)
    २. (तै. उ. ३।१०)
    ३. (तै. उ. २।९)
    ४. (बृ. उ. ३।५।१)
    ५. (बृ. उ. ३।८।१०)
    ६. (तै. उ. २।१)
    ७. (भ. गी. १५।२०)

सम्यङ्मतिप्रकरणम् १८१
आत्मप्रत्यायिका ह्येषा सर्ववेदान्तगोचरा ।
ज्ञात्वैतां हि विमुच्यन्ते सर्वसंसारबन्धनैः ॥८४॥
आत्मेति—समस्त वेदान्तशास्त्र के द्वारा निरूपित (प्रतिपादित) इस सम्यक् ज्ञान से आत्मा का अनुभव होता
है। अतः इसे जानकर पुरुष सर्वविध भवबन्धनों से मुक्त होते हैं ॥८४ ॥
हृदयस्पर्शिनी
कूटस्थ चैतन्यैकरस पूर्ण वस्तु का हान आदि संभव न रहने से अनायास ही ‘परं ब्रह्मैवास्मि’ मैं परब्रह्म ही
हूँ यह ज्ञान ही सम्यग्ज्ञान है, क्योंकि समस्त वेदान्तवाक्यों से प्रतिपादित यह सम्यग्ज्ञान आत्मा का अनुभव कराने
वाला है। यह स्वानुभवसिद्ध है। सर्व वेदान्तगोचर (विषय) होने से यह ज्ञान प्रामाणिक है—इस प्रकार का ज्ञान होनेपर
पुरुष संसार के सम्पूर्ण बन्धनों से मुक्त अर्थात् कृत-कृत्य हो जाता है। भगवान् स्वयं कह रहे हैं—
“इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयाऽनघ । एतद् बुद्ध्वा बुद्धिमान् स्यात् कृतकृत्यश्च भारत”१ ॥
हे निष्पाप अर्जुन ! इस तरह मेरे द्वारा कहा गया यह शास्त्र अत्यन्त गोपनीय है। इसे सद्गुरु की कृपा से भली-भाँति
जानकर मनुष्य बुद्धिमान् और कृतकृत्य हो जाता है ॥८४॥
*रहस्यं सर्ववेदानां देवानां चापि †यत्परम् ।
पवित्रं परमं ह्येतत्तदेतत्संप्रकाशितम् ॥८५॥
रहस्यमिति—यह सम्यग्ज्ञान, सम्पूर्ण वेदों का गूढ़ रहस्य है, देवताओं को भी अतिप्रिय है, तथा यह सम्यक्-
ज्ञानरूप तत्त्वज्ञान परम पवित्र है, इसीलिये उसे अच्छी तरह प्रकाशित किया है ॥८५॥
हृदयस्पर्शिनी
अब प्रकरणोक्त ज्ञान की प्रशंसा करते हुए उसकी उपादेयता को सुदृढ़ कर रहे हैं—वह समस्त श्रुतियों
(वेदों) का गूढ़ रहस्य है अर्थात् उपदेश के बिना वह अविज्ञेय रहता है अर्थात् अवगत नहीं किया जा सकता, क्योंकि
‘आचार्यवान् पुरुषो वेद२’, ‘सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति३’—यह श्रुति बता रही है। आचार्यवान् पुरुष ही ‘सत्’ को जानता
है। सभी वेद उस पद का वर्णन करता है। ‘देवैरत्रापि विचिकित्सितं पुरा न हि सुविज्ञेयमणुरेष धर्मः४। पूर्वकाल में
इस विषय में देवताओं को भी सन्देह हुआ था। क्योंकि यह सूक्ष्मधर्म, सुगमता से जानने योग्य नहीं है। यह विषय
देवताओं के लिए भी रहस्यमय ही रहा है, यह ज्ञान परम पवित्र है। इसके सम्बन्ध में श्रुति कहती है—‘क्षीयन्ते
चास्य कर्माणि’५, ‘एवंविदि पापं कर्म न श्लिष्यते’६। उस परावर (कारण-कार्यरूप) ब्रह्म का साक्षात्कार कर लेनेपर
इसके कर्म क्षीण हो जाते हैं। जैसे कमलपत्र से जल का संबंध नहीं रहता तद्वत् ब्रह्मवित् के साथ पापकर्म का सम्बन्ध
नहीं रहता। क्योंकि वह सम्यक् ज्ञान परमपुरुषार्थरूप है अर्थात् निरतिशयानन्द प्रकाशमय है। ऐसे उस परमपवित्र
ज्ञान को इस प्रकरण में बताया गया है ॥८५ ॥
नैतद्देयमशान्ताय रहस्यं ज्ञानमुत्तमम् ।
विरक्ताय प्रदातव्यं शिष्यायानुगताय च ॥८६॥
नैतदिति—वेद का रहस्यभूत यह पवित्र उत्तम ज्ञान अशान्त चित्तवाले पुरुष को नहीं देना चाहिये। यह
सम्यक्ज्ञान उसी शिष्य को देना चाहिये, जो विरक्त हो और अपना आज्ञापालक अनुगत हो ॥८६ ॥

  • इदं रहस्यंवेदानां०—पाठान्तरम् । † दुर्लभं०—पाठान्तरम् ।
    १. ( भ. गी. १५।२० )
    २. ( छां. उ. ६।१४।२ )
    ३. ( कठ उ. १।२।१५ )
    ४. ( कठ उ. १।१।२१ )
    ५. ( मुं. उ. २।२।८ )
    ६. ( छां. उ. ४।१४।३ )