उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 201, कुल 364 में से
संदर्भ में पढ़ेंहृदयस्पर्शिनी
आत्मा की अद्वितीय ब्रह्मरूपता में अर्थतः शास्त्र को बताकर अब उसकी निर्विशेष ब्रह्मरूपता में भी शास्त्र
(श्रुति) बता रहे है—“तदेतद् ब्रह्मापूर्वमनपरमनन्तरमबाह्यमयमात्मा ब्रह्म सर्वानुभूः¹” पूर्वोक्तगुणविशिष्ट यह ब्रह्म
अपूर्व (कारणरहित), अनपर (कार्यरहित), अनन्तर (विजातीय द्रव्य से रहित) और अबाह्य है। यह आत्मा ही सबका
अनुभव करनेवाला ब्रह्म है। इस श्रुति के कारण आत्मा से भिन्न उसके बाहर, भीतर या मध्य में अन्य कोई वस्तु है
ही नहीं। अतः वह शुद्ध और स्वयंप्रकाश है ॥ ७० ॥
नेति नेत्यादिशास्त्रेभ्यः ‘प्रपञ्चोपशमोऽद्वयः’ ।
अविज्ञातादिशास्त्राच्च नैव ज्ञेयो ह्यतोऽन्यथा ॥७१॥
नेतीति—नेति-नेति इत्यादि शास्त्र से तथा अविज्ञातादि-शास्त्र से वह आत्मा प्रपञ्चशून्य एवं अद्वितीय है,
इसके अतिरिक्त अन्य किसी रीति से वह ज्ञेय नहीं है॥ ७१ ॥
हृदयस्पर्शिनी
आत्मा की सर्वप्रपञ्चसंस्पर्शशून्यता को शास्त्रान्तरों के द्वारा भी बता रहे हैं—प्रपञ्च के निषेध द्वारा ही
आत्मा को जानना चाहिए, विषय के रूप में या प्रपञ्च संसृष्ट के रूप में नहीं। ‘आत्मा स्थूल नहीं है, सूक्ष्म शरीर भी
नहीं है’, इत्यादि शास्त्र से तथा ‘वह स्वयं ज्ञात हुए बिना ही दूसरों का ज्ञाता है’ इस श्रुति से आत्मा प्रपञ्चशून्य
एवं अद्वितीय है, वह इससे भिन्न प्रकार से ज्ञेय नहीं है। नेति-नेति शास्त्र अर्थात् प्रपञ्चनिषेध शास्त्र को बृहदारण्यक
में बताया है—‘नेति नेति न ह्येतस्मादिति नेत्यन्यत्परमस्त्यथ नामधेयं सत्यस्य सत्यमिति’। ‘नेति-नेति’ यह ब्रह्म का
संकेत है। ‘नेति’ ‘नेति’ से बढ़कर कोई उत्कृष्ट संकेत नहीं है। ‘सत्य का सत्य’ उसका नाम है²। उसी प्रकार
गौड़पादकारिका में उसे प्रपञ्चोपशम अद्वयरूप बताया है³। केनोपनिषद् में कहा है कि ‘अन्यदेव तद्विदितादथो
अविदितादधि’⁴—वह विदित से अन्य ही है तथा अविदित से भी परे है। तथा उसी में पुनः बताया है ‘यस्यामतं तस्य
मतं मतं यस्य न वेद सः⁵—ब्रह्म जिसको ज्ञात नहीं है, उसी को ज्ञात है और जिसको है, वह उसे नहीं जानता है।
बृहदारण्यक में कहा है ‘अविज्ञातं विज्ञातृ’⁶—बुद्धि का अविषय होने के कारण विज्ञात नहीं है, किन्तु स्वयं विज्ञानस्वरूप
होने से विज्ञाता है। इस प्रकार उसकी सर्वप्रपञ्चशून्यता स्पष्ट हो रही है ॥ ७१ ॥
सर्वस्यात्माऽहमेवेति ब्रह्म चेद्विदितं परम्।
स आत्मा सर्वभूतानामात्मा ह्येषाामिति श्रुतेः॥७२॥
सर्वस्येति—‘मैं ही सबका आत्मा हूँ’—इस प्रकार से यदि ब्रह्म का ज्ञान हो जाय तो वह समस्त प्राणियों का
‘आत्मा’ हो जाता है। इस तथ्य को भगवती श्रुति ने बताया है ॥ ७२ ॥
हृदयस्पर्शिनी
“तस्मादेषां तन्न प्रियं यदेतन्मनुष्या विद्युः⁷”—इसलिये देवताओं को यह प्रिय नहीं है कि मनुष्य
ब्रह्मतत्त्व को जानें—यह श्रुति बता रही है कि इस प्रकार अद्वयादि लक्षण आत्मा को जानने वालों की फलप्राप्ति
में देवता लोग विघ्न पैदा करते हैं—यह शंका यदि कोई करे तो वह ठीक नहीं है, क्योंकि ‘मैं ही सब का आत्मा
१. (बृ. उ. २।५।१९)
२. (बृ. उ. २।३।६)
३. (गौ. का. २।३५)
४. (के. उ. १।३)
५. (के. उ. २।३)
६. (बृ. उ. ३।८।११)
७. (बृ. उ. १।४।१०)