सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

पृष्ठ 43, कुल 364 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 43

प्रतिषेधप्रकरणम् १७
अहं धीरिदमात्मोत्था वाचारम्भणगोचरा ।
निषिद्धात्मोद्भवत्वात्सा न पुनर्मांनतां व्रजेत् ॥२॥
अहं धीरिति- 'अहं' यह ज्ञान (बुद्धि), 'इदमात्मा' अर्थात् अन्तःकरणादि अनात्मवस्तु से उत्पन्न होने के कारण
वह वाणी से आरम्भ होनेवाले विकार के अन्तर्गत ही है। वह (अहम्) बुद्धि (ज्ञान) निषेध किये जाने वाले आत्मा (देहादि)
से उत्पन्न होने के कारण प्रमाण नहीं मानी जा सकती ॥ २ ॥
हृदयस्पर्शिनी
जिज्ञासु के मन में यह शंका हो सकती है कि 'अहं ब्रह्म' यह ज्ञान निर्दिष्ट रीति से उत्पन्न होने पर भी
उसे कैसे प्रमाण कहा जा सकता है ? क्योंकि देह, इन्द्रिय आदि में अभिमान तो निरन्तर होता रहता है। किन्तु ऐसी
शंका करना ठीक नहीं है। क्योंकि देहादि में होनेवाले आत्माभिमान का निरन्तर बाध होता रहता है। और जिसका
बाध होता है, उसे आभास कहते हैं, इसलिये दोनों (अभिमान-बुद्धि और ब्रह्मबुद्धि) की समानता नहीं है अपितु वेदान्त-
वाक्योत्पन्न ज्ञान ही प्रबल है। देहादि अनात्मा में होनेवाली आत्मबुद्धि को 'अहंधी' कहते हैं। उसकी उत्पत्ति अहंकर्त्ता
के बाधित स्वरूपवाले 'इदं' अंश से होती है। अर्थात् पूर्व-पूर्व अहंकार-वासना-वासित-अन्तःकरणरूप इदमात्मा से
उत्पन्न होती है। अतः वह (अहं धी) अध्यासरूप है। किन्तु वेदान्तवाक्य से उत्पन्न 'अहं ब्रह्म' बुद्धि यथार्थ है, अर्थात्
अध्यासरूप नहीं है। निष्कर्ष यह है कि दोनों बुद्धियाँ एक नहीं हैं। एवञ्च 'अहं धी' यह बुद्धि अयथार्थ है और 'अहं-
ब्रह्म' यह बुद्धि यथार्थ है। अतः 'अहं धी' स्वरूपतः दुर्बल है। उसी प्रकार दोनों बुद्धियों के विषय भी भिन्न होने से
वह (अहं धी) दुर्बल प्रतीत होती है। अहं बुद्धि का विषय अनृत, जड़, अनात्मरूप (वाचारंभण) है। उसकी (अहं-
बुद्धि के विषय की) स्वतः सत्ता न रहने पर भी अपरोक्ष व्यवहार (प्रत्यक्ष व्यवहार) का विषय बनती है। इसी कारण
'नेति-नेति' शास्त्र से अहं बुद्धि के विषयस्वरूपों का निषेध (बाध) किया जाता है। ऐसे निषिद्ध (बाधित) स्वरूपों से
उत्पन्न हुई इदमात्मबुद्धि (अहं धी), आत्मा का यथार्थ ज्ञान होने पर कैसे प्रमाण हो सकेगी? क्योंकि स्वप्नावस्था
के ज्ञान की तरह वह इदमात्मबुद्धि (अहं बुद्धि) (१) अवस्तुरूप है, (२) अवस्तुजन्य है, (३) अवस्तुविषयक है।
अतः वेदान्तवाक्योत्पन्न 'अहं ब्रह्मास्मि' ज्ञान ही प्रबल है। अहं बुद्धि (अहं धी) का स्वरूप भी निषिद्ध है और कारण
भी निषिद्ध है, इसलिये ब्रह्मात्मज्ञान के हो जाने पर उस अहंबुद्धि में प्रामाण्यबुद्धि नहीं रहती ॥२॥
पूर्वबुद्धिमबाधित्वा नोत्तरा जायते मतिः ।
दृशिरेका स्वयं सिद्धः फलत्वात्स न बाध्यते ॥३॥
पूर्वबुद्धिमिति - प्रथम उत्पन्न हुए ज्ञान (बुद्धि) का बाध किये बिना उत्तर (द्वितीय) ज्ञान (आत्मबुद्धि) उत्पन्न
नहीं हो सकता। किन्तु साक्षी चेतन, एक और स्वयंसिद्ध है। वह स्वयं फलरूप है, अतः उसका बाध नहीं होता ॥३॥
हृदयस्पर्शिनी
'मैं कर्त्ता हूँ, मैं भोक्ता हूँ' इस ज्ञान के रहते 'मैं अकर्त्ता, अभोक्ता ब्रह्म हूँ' यह ज्ञान कैसे हो सकता है ?
कर्तृत्व, भोक्तृत्व ज्ञान प्रथमतः होता है, प्रथम होने के कारण उसे ही प्रबल मानना होगा; अकर्तृत्व-अभोक्तृत्व ज्ञान
पश्चात् होता है, पश्चात् होने से उसे दुर्बल कहना होगा, तब प्रबल से दुर्बल का ही बाध होगा तो 'मैं ब्रह्म हूँ' यह
बुद्धि कैसे होगी ?
किन्तु यह शंका ठीक नहीं है, क्योंकि 'पौर्वापर्ये पूर्वदौर्बल्यं प्रकृतिवत्' इस नियम के अनुसार उत्तर-
कालिक ब्रह्मात्मज्ञान से पूर्वकालिक कर्तृत्व-भोक्तृत्वज्ञान का बाध हो जायगा। जैसे शुक्ति के अज्ञान से उत्पन्न होने
वाली रजतबुद्धि का बाध किये बिना शुक्तिबुद्धि नहीं हुआ करती । वैसे ही पूर्वकालिक कर्तृत्व-भोक्तृत्व बुद्धि
का बाध किये बिना उत्तरकालिक आत्मतत्त्वज्ञान उत्पन्न नहीं होता। क्योंकि प्रसक्त का (प्राप्त का) निषेध करना
ही 'बाध' का स्वरूप है। पूर्व के काल में उत्तरकालिक पदार्थ की प्रसक्ति (प्राप्ति) ही न होने के कारण पूर्व से
उत्तर का बाध हो ही नहीं सकता। अर्थात् पूर्व से पर का बाध नहीं हो सकता, बल्कि प्रसक्त हुए पूर्व का ही पर
(उत्तर) से बाध होना उचित है। एवंच उत्तरकालिक ब्रह्मात्मबुद्धि से पूर्वकालिक कर्तृत्व-भोक्तृत्व बुद्धि का बाध
३