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तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)

पण्डित तेनाली रामकृष्णन / लोक संकलन द्वारा

स्रोत: तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ) · भारतीय लोक साहित्य संकलन · 1950 (उद्गम)

DevanagariHindipublished118 पृष्ठ

परिणति है।” उसने भी उस सभासद की ओर कटाक्ष भरी -ष्टि से देखा।
उसे ऐसा करते महाराज कृष्ण चन्द्र राय ने देख लिया और वे भाँप गए कि सभा में इस
समय जो विमर्श हो रहा है उसके केन्द्र में उनका वह सभासद है जो अब तक मौन बैठा है-
निर्लिप्त और निस्पन्द-सा, मानो इन बातों में कोई सार ही न हो! महाराज अपने इस
सभासद की योग्यता के कायल थे। वे जानते थे कि अध्ययन और योग्यता की उसमें कोई
कमी नहीं है। उन्हें अपने इस सभासद का मौन खल रहा था। वे चाहते थे कि वह बोले और
व्यक्ति के बाह्य आवरण और आन्तरिक गुणों पर अपने विचार व्यक्त करे। मगर वह सभासद
था कि किसी भी कटाक्ष पर ध्यान नहीं दे रहा था और न किसी के तर्क पर अपनी कोई
प्रतिक्रिया ही प्रकट होने दे रहा था।
महाराज से रहा नहीं गया। उन्होंने अपने उस सभासद की ओर देखा और उसे टोका, तुम
मौन क्यों हो? तुम भी अपने विचार व्यक्त करो। सभा में इतनी देर से चर्चा का दौर चल
रहा है-तुम भी तो बताओ कि वस्त्रा तो केवल तन ढँकने के लिए अपेक्षित है, फिर क्यों कुछ
लोग बाह्य सज्जा पर अनाप-शनाप व्यय करते हैं? असली सौन्दर्य तो मन का सौन्दर्य है,
फिर क्यों वस्त्रा-आभूषण-अलंकरण पर इतना ध्यान दिया जाता है?“
उस सभासद ने अपने आसन से उठकर महाराज के सामने हाथ जोड़ लिये। यह सभासद
कोई और नहीं, गुंटूर जिले के गलीपाडु ग्राम से विजयनगर आया कृष्ण स्वामी तेनाली राम
मुदलियार था जिसे हाल में ही महाराज ने अपना सभासद बनाया था।
महाराज को अभिवादन करने के बाद तेनाली राम ने कहा, “महाराज, मुझे क्षमा करें! मैं
इस सभा मं े चल रहे विचार-विमर्श को गम्भीर नहीं मानता। मैं विश्वासपूर्वक कह सकता
हूँ िक इन बातों का न तो कोई अर्थ है और न ही ये बातें किसी निष्कर्ष तक पहुँच सकती
हैं। मेरी इस धारणा के प्रति आम सहमति भी नहीं हो सकती क्योंकि प्रायः सभी सभासदों
की राय है कि वस्त्रा का प्रयोजन मात्रा तन ढँकना होना चाहिए...जबकि मैं ऐसा नहीं
मानता। सभा में अभी जो भी बातें हो रही हैं, उसका प्रयोजन, मुझे नहीं लगता कि किसी
निष्कर्ष पर पहुँचने का है। मुझे तो लगता है कि ये बातें केवल बातों के लिए हो रही हैं
जिससे सभा का समय कट जाए। मुझे इस तरह की बातों में कोई रुचि नहीं है, महाराज!
जिसके कारण मैं मौन हूँ।”
महाराज को तेनाली राम से इस तरह के उत्तर की प्रत्याशा नहीं थी जिसके कारण वे
विस्मित हो गए मगर उन्हें लगा कि उसने जो कुछ भी कहा है वह सच है, फिर भी उनकी
उत्सुकता बनी रही कि आखिर इस विषय में तेनाली राम स्वयं क्या सोचता है। इसलिए
उन्होंने तेनाली राम से कहा, “नहीं, तेनाली राम, यूँ प्रश्न टालने से काम नहीं चलेगा।
तुम्हें अपनी राय व्यक्त करनी ही चाहिए। इतने लोगों ने इस प्रसंग में सभा के समक्ष अपनी
राय रखी और तुमसे सबकी यही अपेक्षा होनी चाहिए कि तुम भी अपनी सोच से सभा को
अवगत कराओगे।”

”जो आज्ञा महाराज!“ तेनाली राम ने विनम्रतापूर्वक कहा और एक भरपूर -ष्टि सभासदों
पर डाली।
सभा में थोड़ी देर के लिए सन्नाटा-सा छा गया। फिर खुसुर-फुसुर की आवाजें उभरने
लगीं। तेनाली राम सभा में अपने आसन के पास खड़ा था। माथे पर रेशमी साफा बाँधे
आभिजात्य परिधान में सजे तेनाली राम को देखकर सभासदों की फुसफुसाहटें तेज हो रही
थीं। उनमें से कुछ सभासद खीं-खीं करके हँस भी रहे थे।
महाराज ने भी सभासदों की फुसफुसाहटों और दबी-दबी-सी हँसी को सुना और वे समझ
गए कि सभासद तेनाली राम के वस्त्रा आदि को लक्ष्य करके हँस रहे हैं।
”महाराज!“ तेनाली राम ने गम्भीर स्वरों में कहना आरम्भ किया, “परिवेश और
परिस्थिति के अनुकूल परिधान पहनना नीति अनुकूल है। समाज में उचित स्थान प्राप्त
करने के लिए उचित परिधान का उपयोग करना व्यवहारशास्त्रा का प्रारम्भिक उपदेश है।
व्यक्ति के आन्तरिक गुणों का ज्ञान तो तब होता है जब उसे बोलने का अवसर प्राप्त हो किन्तु
वस्त्रा तो दूर से ही बतला देता है कि उसे धारण करनेवाला व्यक्ति किस उचित आसन का
अधिकारी है।”
“...तो तुम कहना चाहते हो कि व्यक्ति के आन्तरिक गुणों की अपेक्षा उसका बाह्य
परिधान अधिक महत्त्वपूर्ण है?” महाराज ने प्रश्न किया और सभासद ही-ही करते हुए हँसने
लगे।
हँसनेवाले सभासद इस बात पर प्रसन्न थे कि महाराज कृष्णदेव राय के प्रश्न में तेनाली
राम के विचारों से असहमति के संकेत थे।
तेनाली राम उसी सहजता से बोल पड़ा, “नहीं, महाराज! मैं तो यह कह रहा हूँ कि
परिधान के अभाव में व्यक्ति के आन्तरिक गुणों की पहचान नहीं हो पाती और व्यक्ति को
उपेक्षित होना पड़ता है।”
महाराज ने विस्मय-भरी -ष्टि से तेनाली राम को देखा। सभासदों ने शोर करते हुए
तेनाली राम की टिप्पणी से असहमति जताई। महाराज ने थोड़ी देर तक चुप्पी साधे रखी
फिर धीरे से पूछा, “तेनाली राम! सारे सभासद, लगता है, तुम्हारी राय से सहमत नहीं हैं।
क्या अब भी तुम अपनी टिप्पणी पर -ढ़ हो?”
“जी हाँ, महाराज! मैंने जो भी कहा, उसमें मेरा कुछ भी नहीं, यह आर्ष वचन है और
शाश्वत है, चिरन्तन है। यह हर युग में ऐसा ही था, है और रहेगा।” तेनाली राम ने कहा।
“तुम इसे प्रमाणित कर सकते हो?” महाराज ने पूछा।

“उचित अवसर पर।” तेनाली राम ने उत्तर दिया।
उस दिन सभा उसी समय विसर्जित हो गई। सभासदों में एक विशेष प्रकार की खुशी थी।
उन्हें विश्वास हो गया था कि महाराज तेनाली राम के उत्तर से सहमत नहीं हैं। ये सभासद
तेनाली राम के प्रति ईर्ष्या का भाव रखते थे क्योंकि वह प्रायः बहुमूल्य परिधान पहनकर
सभा में आया करता था। विद्वान तो वह था ही। सभा में उसकी टिप्पणियाँ सबसे भिन्न और
सटीक हुआ करती थीं जिसकी प्रायः महाराज सराहना करते थे। यही कारण था कि
सभासदों में तेनाली राम के प्रति ईर्ष्या का भाव था।
इस घटना के कुछ दिन बाद विजयनगर में एक समारोह का आयोजन हो रहा था।
महाराज कृष्णदेव राय के पिता के जन्मदिवस पर प्रतिवर्ष आयोजित होनेवाला यह
समारोह इस बार विशेष उल्लास के साथ मनाया जा रहा था क्योंकि यह वर्ष महाराज
कृष्णदेव राय के पिता की शतवार्षिकी जन्मोत्सव का वर्ष था। महाराज स्वयं समारोह की
तैयारियों पर -ष्टि रख रहे थे। राजभवन को इस अवसर पर विशेष रूप से सजाया गया
था। आमोद-प्रमोद के लिए विविध कार्यक्रम चल रहे थे। विजयनगर के संभ्रान्त परिवारों
को महाराज ने भोजन का आमंत्रण दिया था। कुछ पड़ोसी राजाओं को भी राजनयिक
सम्बन्ध -ढ़ करने के उद्देश्य से महाराज ने निमंत्रण भेजा था।
तेनाली राम सहित सभी सभासदों को महाराज कृष्णदेव राय ने स्वलिखित आमंत्राण-
पत्र भेजकर जन्मोत्सव समारोह के बाद अपने साथ रात्रि का भोजन करने का न्योता दिया
था। सभासदों को राजभवन के द्वार पर पुष्पमाला पहनाकर ससम्मान भोजन कक्ष तक
पहुँचाने की विशेष व्यवस्था की गई थी। रंग-बिरंगे परिधानों में सजी-धजी परिचारिकाएँ
इधर-उधर मँडरा रही थीं। शाम ढल चुकी थी। शरद पूर्णिमा की चाँदनी का उजास फैला
हुआ था। राजभवन की बगिया में लगी रजनीगन्धा की भीनी-भीनी सुगन्ध से वातावरण
मह-मह कर रहा था। तभी राजभवन के द्वार पर एक विचित्रा-सा शोर उभरने लगा। प्रहरी
एक भिखमंगे को राजभवन के द्वार से धक्का देकर दूर भगाने में लगे थे और वह भिखमंगा
स-श व्यक्ति चीख-चीखकर बोल रहा था, “मुझे मत भगाओ। मुझे राजभवन के भोजन कक्ष
तक पहुँचा दो। मैं भिखमंगा नहीं हूँ। मैं महाराज का आमंत्रित अतिथि हूँ। मुझे निरा-त
मत करो। मैं पंडित हूँ। काव्यशास्त्रा का ज्ञाता हूँ। मेरे साथ उचित व्यवहार करो।”
शोर सुनकर महाराज स्वयं राजभवन से बाहर आए और उचटती-सी -ष्टि उस व्यक्ति पर
डाली तथा प्रहरियों से कहा, “इस आदमी को थोड़ा भोजन देकर यहाँ से दूर भगाओ।
अतिथियों के आने का समय हो रहा है।”
शोर करनेवाले व्यक्ति ने महाराज की ओर देखा और मुस्कुराया। चाँदनी के उजास में
महाराज को उसकी मुस्कान पहचानी-सी लगी। मगर महाराज आयोजन की हड़बड़ी में थे
इसलिए उस व्यक्ति पर अधिक ध्यान नहीं दिया और राजभवन में चले गए। प्रहरी उस
व्यक्ति को भगाते, उससे पहले ही वह व्यक्ति बिना कुछ बोले वहाँ से चला गया। थोड़ी ही

देर में महाराज के आमंत्रित अतिथियों का आगमन होने लगा। एक से बढ़कर एक परिधान
में सजे-धजे लोगों के आने का क्रम थोड़ी देर तक जारी रहा फिर थम सा गया। राजभवन के
भोजन-कक्ष मंे लोगों की सज-धज देखकर ऐसा लगता था मानो कुबेर के कक्ष में देवताओं
की जमघट लगी हो!
महाराज स्वयं अतिथियों को आसन ग्रहण करने के लिए उनके लिए निर्धारित आसनों की
ओर इंगित कर रहे थे। सभी आसन भर चुके थे, मात्रा तेनाली राम का आसन रिक्त था।
महाराज बार-बार उस रिक्त आसन की ओर देखते और फिर प्रवेश द्वार की ओर उनकी -ष्टि
जाती। मन-ही-मन महाराज को तेनाली राम की अनुपस्थिति उत्तेजित कर रही थी। वे
सोच रहे थे-कितना ढीठ है यह तेनाली राम! उसे यह ज्ञान है कि भोजन किसके सान्निध्य में
करना है फिर भी वह निर्धारित समय पर नहीं आया। लेकिन मन में उठते आक्रोश को पी
जाने के अलावा महाराज कर भी क्या सकते थे। वहाँ उपस्थित सभासदों को तेनाली राम
की अनुपस्थिति से उसके विरुद्ध आग उगलने का अवसर मिल गया। वे आपस में तेनाली
राम की अनुपस्थिति का मजाक उड़ाने लगे। कोई कहता-तेनाली राम अपनी पगड़ी की तहें
सजाने में लगा होगा, तो कोई कहता-अरे भाई, तेनाली राम अपनी रेशमी धोती का फेंटा
कसने में लगा होगा। फेंटा कस ले, तो आएगा...और इस तरह की बातें खत्म भी नहीं हो
पातीं कि सभी ही-ही, ही-ही करने लग जाते।
अन्ततः तेनाली राम ने भोजन-कक्ष में प्रवेश किया। सचमुच, बहुत आकर्षक परिधान में
सजा-धजा था तेनाली राम। महाराज ने उसकी ओर आग्नेय -ष्टि से देखा मगर कुछ कहा
नहीं। -ष्टिमात्रा से ही उन्होंने तेनाली राम के प्रति अपना आक्रोश अभिव्यक्त कर दिया। बड़े
और सामर्थ्यवान लोग परिस्थिति विशेष में अपनी आंगिक भंगिमाओं से ही अपने
मनोभावांे को व्यक्त करते हैं। महाराज के मनोभावों को समझते हुए तेनाली राम ने
महाराज के सामने हाथ जोड़ लिये और कहा, “महाराज! क्षमा करें। यहाँ समय पर
उपस्थित नहीं हो पाया।”
महाराज आक्रोश में तो थे ही, तेनाली राम का अनुनय सुनकर उनकी उत्तेजना शान्त न
रह सकी और व्यंग्योक्ति में प्रकट हुई, “हाँ, देख रहा हूँू, आपका कुर्ता बहुत चमक रहा
है।”
महाराज की व्यंग्योक्ति सुनकर सारे अतिथि-सभासद ठठाकर हँस पड़े। तेनाली राम ने
इसी ठहाके के बीच अपना आसन ग्रहण किया। तेनाली राम की ओर महाराज ने देखा तो
उसे अतिशय गम्भीर पाया। महाराज सोचने लगे कि तेनाली राम के प्रति उन्हें
व्यंग्योक्तियों का व्यवहार नहीं करना चाहिए था। क्या पता, किस परिस्थिति में था वह!
बिना जाने-समझे इस तरह का व्यवहार किसी राजा के लिए कदापि शोभनीय नहीं है। यह
तो उच्छृंखलता है। हो सकता है कि तेनाली राम किसी संकट में पड़ गया हो जिसके कारण
वह समय पर नहीं पहँुच पाया।

अभी महाराज ऐसा सोच ही रहे थे कि उनकी आँखों में विस्मय के भाव गहरा गए।
उन्होंने देखा कि भोजन स्थल पर तेनाली राम केवल धोती पहने, नंगे बदन बैठा हुआ है
और उसकी पगड़ी, कुर्ता, फतूहा, गमछा, अंगवस्त्राम् भोजन की थाली के चतुर्दिक रखे हुए
हैं। सभासद तेनाली राम की ओर देख-देखकर मुस्कुरा रहे हैं और आँखों ही आँखों में
बतिया रहे हैं कि तेनाली राम का सिर फिर गया है।
भोजन परोसा जा चुका था। तेनाली राम की ओर सारे सभासद देख रहे थे। तेनाली राम
ने भोजन का एक निवाला उठाया और कुर्ते पर रखते हुए कहा, “कुर्ता! तू खा।” फिर
पगड़ी पर एक निवाला रखा और कहा, “पगड़ी! तू खा।” अंगवस्त्राम् पर एक निवाला
रखा और कहा, “अंगवस्त्राम्! तू खा।”
तेनाली राम का यह कृत्य महाराज की समझ में नहीं आया तब उन्होंने तेनाली राम को
घूरते हुए कहा, “तेनाली राम! तुम्हें हो क्या गया है? भोजन के साथ तुम यह क्या कर रहे
हो? अपने वस्त्र तुमने क्यों उतार दिये?“
एक सभासद ने कहा, “तेनाली राम का सिर फिर गया है।”
दूसरे उसकी हाँ में हाँ मिलाने लगे और कहने लगे, “कहीं कुर्ता भी भोजन करता है। यह
बावलापन नहीं तो और क्या है?“
तेनाली राम उनकी बातों को अनसुनी करते हुए अपने काम में लगा रहा-कुर्ता! तू खा।
अँगरखा! तू खा। अंगवस्त्राम्! तू खा। पगड़ी! तू खा।“
महाराज से रहा नहीं गया। उन्होंने टोका, “बावले मत बनो तेनाली राम। भोजन करो।
तुम्हें यहाँ भोजन के लिए बुलाया गया है।“
तेनाली राम ने महाराज की ओर देखा फिर अन्य अतिथियों की ओर, फिर कहा,
“महाराज! जिसे राजभवन में भोजन के लिए प्रवेश मिला, उसी को तो खिला रहा हूँ!”
”भोजन के लिए तो तुम्हें आमंत्राण दिया गया था, इसलिए भोजन के लिए प्रवेश तुम्हें ही
मिला है। तुम भोजन करो! एक तो विलम्ब से आए हो, अब और विलम्ब न करो।“
महाराज ने कहा।
“मैं विलम्ब से नहीं आया महाराज! मैं तो यहाँ सबसे पहले आया था। विलम्ब से तो यह
पगड़ी, कुर्ता आदि परिधान पधारे हैं!”
“उलझी बातें मत करो, तेनाली राम! कहो, जो कुछ भी कहना है मगर साफ-साफ!”
महाराज ने कहा।

तेनाली राम ने कहना शुरू किया, “महाराज! मैं तो शाम ढलते ही यहाँ पहुँच गया था।
मैंने ये परिधान नहीं पहने थे। साधारण कपड़ों में देखकर मुझे प्रहरियों ने द्वार पर ही रोक
लिया। मैं उन्हें समझाता रहा कि मैं पंडित हूँ, मैं काव्यशास्त्री हूँ, मैं यहाँ का आदरणीय
आमंत्रित अतिथि हूँ मगर उन्होंने मेरी एक न सुनी। शोर सुनकर आप स्वयं वहाँ आए
मगर मेरी पुकार सुनने की आवश्यकता आपने नहीं समझी और मुझे भोजन देकर द्वार से
ही भगा देने का निर्देश देकर लौट आए...।”
महाराज को सन्ध्या की घटना की स्मृति हो आई।
तेनाली राम ने अपनी बात जारी रखी, “...और महाराज, मुझे यहाँ आना ही था इसलिए
मैं अपने घर गया और ये वस्त्रा धारण किए, फिर मैं यहाँ आया।”
महाराज कृष्णदेव राय अचरज में डूबे तेनाली राम की बातें सुन रहे थे। तभी एक
सभासद ने कहा, “तेनाली राम! आप जैसे बुद्धिमान व्यक्ति से ऐसी आशा नहीं की जा
सकती कि वह ऐसी भूल करेगा। आप राजभवन में आमंत्रित थे। राजभवन की अपनी एक
मर्यादा है। राजभवन में यदि आप फकीरों जैसे वस्त्र में आएँगे तब भला कौन प्रहरी आपको
राजा का अतिथि स्वीकार करेगा? आपके साथ जो कुछ भी हुआ, उसके लिए दोषी आप
हैं।”
तेनाली राम ने मुस्कुराते हुए कहा, “जी हाँ, आप ठीक कह रहे हैं। परिवेश और
परिस्थिति का ध्यान रखते हुए परिधान का उपयोग अवश्य करना चाहिए। यही तो मैंने
राजसभा में कुछ दिन पहले कहा था-स्मरण करें महाराज!“ तेनाली राम ने महाराज से
सीधा संवाद किया। ”आपको अवश्य स्मरण होगा कि तब परिधान के स्थान पर व्यक्ति के
आन्तरिक गुणों को महत्त्वपूर्ण बताते हुए मुझे अपने विचारों में संशोधन के लिए प्रेरित
किया गया था...।”
महाराज ने तेनाली राम को गले से लगाते हुए कहा, “तुम ठीक कह रहे थे, तेनाली
राम...उस दिन भी!”

स्वर्ण-पिंडों की पहेली
“पृथ्वी का कण-कण हर क्षण एक नई रचना करने में निमग्न है। वायु सतत सन-सन-सन
कर सृष्टि में मस्ती का संचार करती रहती है। सूर्य उदित होकर संसार को उजास से भरता
है और गतिशील होने के लिए ऊष्मा प्रदान करता है। नदियाँ कल-कल, छल-छल के निनाद
के साथ बहती हुई जिधर से निकलती हैं उधर धरती में बीज अंकुरित करने की शक्ति
भरती जाती हैं। ..इनमें से कोई अपने कार्य का न तो मूल्य माँगता है और न कभी किसी से
किसी तरह की बाधा या अड़चनें आने की बात कहकर थोड़ा विश्राम करने की इच्छा व्यक्त
करता है। कार्यों की निरन्तरता ही जीवन की सफलता की कुंजी है।”
महाराज कृष्णदेव राय अपने सभासदों के साथ बैठे हुए थे। दरबार लगा हुआ था। तेनाली
राम अपने आसन के पास खड़ा होकर बोल रहा था। उसकी बातें समाप्त होते ही कृष्णदेव
राय ने अपने आसन से उठकर तालियाँ बजाईं और तेनाली राम को गले से लगा लिया।
उस समय दरबार में ‘जीवन में सफल होने के उपाय’ विषय पर सम्भाषण हो रहा था।
कई दरबारी आए और बोले। बड़ी-बड़ी शास्त्रीय बातें होती रहीं। अन्तिम वक्ता के रूप में
तेनाली राम ने बहुत कम शब्दों में अपनी बातें दरबार में रखीं और महाराज ने उसे विजेता
घोषित कर दिया।
विजयनगर के दरबार में इससे पहले भी ऐसे कई अवसर आ चुके थे जब तेनाली राम की
बुद्धि की सराहना महाराज ने मुक्त कंठ से की थी। दरबारियों में तेनाली राम की मेधा की
चर्चा होने लगी थी मगर कुछ सभासदों का विचार था कि तेनाली राम में कोई पांडित्य
नहीं है बल्कि वह एक सामान्य-सा इनसान है इसलिए वे उसकी प्रशंसा करने के स्थान पर
अवसर विशेष पर आलोचना करने लगते थे। मीन-मेख निकालते हुए तेनाली राम की
विशेषताओं को स्वीकार करने के स्थान पर उसमें दोष निकालते। स्थिति ऐसी बनती जा
रही थी कि विजयनगर के महाराज की सभा में तेनाली राम से ईर्ष्या करनेवाले सभासदों
का एक वर्ग तैयार होता जा रहा था जिसका एकमात्र काम यह था कि जब भी अवसर
मिले, महाराज के सामने तेनाली राम की शिकायत की जाए।
अपने विरुद्ध ईर्ष्यावश हो रहे इस तरह के कार्यों का ज्ञान तेनाली राम को था किन्तु वह
इसे सहज मानवीय प्रवृत्ति के रूप में लेता था तथा किसी भी सभासद के विरोधी आचरण
पर उत्तेजित नहीं होता था।
एक बार विजयनगर के महामंत्री के घर पर पौत्रा जन्मने के अवसर पर एक भोज का
आयोजन हुआ। वर्षों की प्रतीक्षा और मन्नतों के बाद अपने पौत्र के जन्म से महामंत्री की

खुशियों का ठिकाना नहीं था। उन्होंने भोज का इतना भव्य आयोजन किया था कि उसकी
तुलना विजयनगर में हुए किसी भी अन्य भोज से नहीं की जा सकती। रसोई तैयार करने के
लिए विभिन्न पड़ोसी राज्यों से विशिष्ट रसोइए बुलाए गए थे। उनके बनाए व्यंजनों की
सुगन्ध से महामंत्री के आवास से दूर-दूर तक का वातावरण महमहा उठा। इस भोज में
महामंत्री ने महाराज कृष्णदेव राय और विजयनगर के सभी सभासदों को भी आमंत्रित
किया था।
भोजन करने के बाद महाराज ने महामंत्री से पौत्र का मुँह दिखाने को कहा। महाराज के
साथ सभी सभासद नवजात शिशु को देखने के लिए महल के अन्तःकक्ष में गए।
बच्चा एक सुन्दर से खटोले पर रखा गया था। छः दिनों की वय का शिशु प्रायः सोया
रहता है। महाराज जब शिशु के पालने के पास गए तब उन्होंने महामंत्री से कहा,
“महामंत्री जी! इस बात का ध्यान रखा जाए कि बालक की नींद में कोई व्यवधान न पड़े।
नवजात शिशु जितनी चैन की नींद सोएगा, उसका शारीरिक एवं मानसिक विकास उतने
ही अच्छे ढंग से होगा।”
पास खड़े एक अन्य सभासद ने महाराज की हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा, “जी हाँ,
महामंत्री जी! ऐसे भी शिशु की नींद में दो ही कारणों से व्यवधान उत्पन्न होता है-पहला
यह कि शिशु को भूख लगती है और दूसरा यह कि वह बिस्तर गीला करता है। यदि आपकी
बहू सतर्क रहे, शिशु को समय पर दूध पिलाती रहे और बिस्तर गीला होते ही उसके
अधोवस्त्रा बदल दे तो शिशु की नींद में कोई अड़चन नहीं आएगी।”
महामंत्री इन लोगों की बातें मुस्कुराते हुए सुनते रहे।
इसी बीच वहाँ तेनाली राम पहुँचा और पालने पर झुककर बच्चे को देखने लगा। पालने
में सोया शिशु कुनमुनाया फिर जगकर अपने हाथ-पैर उछालने लगा। उसे देखकर तेनाली
राम ने महामंत्री से कहा, “यह बालक तेजस्वी है और आगे चलकर यह अपनी तेजस्विता
से नए कीर्तिमान स्थापित करेगा। इसकी कीर्ति की गूँज दूर-दूर तक फैलेगी।”
महामंत्री ने एक मुग्ध -दृष्टि उस शिशु पर डाली और फिर महाराज एवं सभासदों को विदा
करने के लिए उनके साथ द्वार तक आए।
महाराज और सभासद जब राजभवन की ओर चलने को उद्यत हुए तभी एक सभासद ने
व्यंग्यात्मक स्वर में महाराज से कहा, “देखा महाराज, तेनाली राम किस तरह महामंत्री
को प्रभावित कर रहा था! आप ही सोचिए महाराज कि भला एक नवजात को देखकर यह
कैसे कहा जा सकता है कि वह भविष्य में क्या करेगा? तेनाली राम ने तो महामंत्री जी के
पौत्रा को ऐसा तेजस्वी बता दिया जिसकी कीर्ति की गूँज दूर-दूर तक सुनी जाएगी!”

महाराज के कान खड़े हो गए इस सभासद की बात सुनकर। महाराज भी सोचने लगे कि
जरूर तेनाली राम ने महामंत्री को खुश करने के लिए यह बात कही है...तो क्या तेनाली
राम महामंत्री के साथ साँठ-गाँठ कर किसी कारनामे को अंजाम देने के चक्कर में है? क्या
तेनाली राम कुछ ऐसा कर सकता है जिससे विजयनगर की सत्ता पर आँच आए...?
महाराज के मन में तरह-तरह की आशंकाएँ पैदा होने लगीं। जरा सी बात पर महाराज के
मन में उत्पन्न हुई इस आशंका ने महाराज को बेचैन कर दिया। ठीक ही कहा गया है कि
सत्ता का स्वभाव सन्देह करना भी है। महाराज ने मन-ही-मन तय कर लिया कि जब तक वे
तेनाली राम की आन्तरिक भावनाओं को समझ नहीं लेते तब तक चैन से नहीं बैठेंगे और न
ही तेनाली राम पर विश्वास ही करेंगे। प्रकट रूप से महाराज ने अपना व्यवहार पूर्ववत्
रखा।
इस घटना के कुछ दिन व्यतीत हो जाने के बाद एक सन्ध्या महाराज कृष्णदेव राय अपनी
फुलवारी में तेनाली राम के साथ टहल रहे थे। टहलते-टहलते महाराज ने अचानक तेनाली
राम से पूछा, “तेनाली राम! उस दिन तुमने किस आधार पर महामंत्री से कहा कि उनका
पौत्रा बहुत तेजस्वी होगा?”
तेनाली राम ने हँसकर कहा, “अरे वो बात!...बस, ऐसे ही महाराज! मेरी -ष्टि बालक के
गतिशील पैरों पर पड़ी। उसके पैरों की सशक्त लययुक्त गतिशीलता से मुझे लड़के की सुगढ़
मानसिक संरचना का अनुमान हुआ और बरबस ही वह बात मेरे मँुह से निकल गई।“
महाराज मौन हो गए लेकिन उनका हृदय अभी भी आशंकित था। थोड़ी देर के बाद
उन्होंने तेनाली राम को विदा किया और स्वयं महल में चले गए।
इस घटना के भी कई दिन गुजर गए। तेनाली राम के मन में कोई बात थी ही नहीं। वह
अपनी सहज, स्वाभाविक शैली में सभा में आता। सभा की कार्रवाई में भाग लेता और लौट
जाता।
एक दिन महाराज कृष्णदेव राय की सभा में एक व्यक्ति आया और महाराज के सामने
एक बक्सा रखकर बोला, “महाराज! मैं चन्द्रावती नगर का एक व्यापारी हूँ। मेरा नाम
सोमदत्त है। मुझे व्यापार में घाटा लगा है। मेरा सारा धन समाप्त हो चुका है। बस, मेरे पास
स्वर्ण-निर्मित दो गोले शेष हैं।” इतना कहकर उस व्यापारी ने वह बक्सा खोल दिया।
सभासदों की आँखें यह देखकर विस्मय से फैल गईं कि बक्से में गेंद की आकृति के दो
स्वर्ण-पिंड रखे हुए हैं।
उस व्यापारी ने अपनी बात जारी रखी, “महाराज! इन दो स्वर्ण-पिंडों में से एक स्वर्ण-
पिंड ठोस है और दूसरा खोखला है। आपके दरबार में मैं इन स्वर्णपिंडों को एक स्थान पर
लटका दूँगा, जहाँ इसे आपके सभी सभासद देख सकें। यदि आपके दरबार का कोई

सभासद बिना इन पिंडों के निकट आए, बिना इन पिंडों को छुए, यह बता देगा कि इनमें से
कौन-सा पिंड ठोस है अथवा कौन-सा पिंड खोखला है तो मैं उसे ये दोनों पिंड मुफ्त में देकर
चला जाऊँगा और यदि यहाँ उपस्थित कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं कर सकेगा तब आपको
मुझे इन दोनों स्वर्ण-पिंडों के वजन के बराबर स्वर्ण दान करना होगा।”
महाराज ने इस विचित्र प्रस्ताव को सुनने के बाद सभासदों की ओर उनका मन्तव्य जानने
के उद्देश्य से देखा।
तभी एक सभासद ने अपने आसन से उठकर कहा, “महाराज! व्यापारी सोमदत्त का
प्रस्ताव स्वीकार कर लेने में कोई बुराई नहीं है। आपको स्मरण होगा कि हमारे बीच ऐसे
विद्वान भी हैं जो एक शिशु को देखकर अभी से उसकी कीर्ति पताका विश्व में लहराने का
दावा कर सकते हैं...यह तो साधारण से स्वर्ण-पिंडों की पहेली है। इसे भी यहाँ आसानी से
हल करने की योग्यता उनमें अवश्य होगी।”
यह वही सभासद था जिसने तेनाली राम के विरुद्ध महाराज के मन में आशंका के बीज
बोए थे।
सभाकक्ष में बैठा तेनाली राम उस सभासद की बात सुनकर चैकन्ना हो गया। वह समझ
गया कि महाराज ने कुछ दिन पूर्व उससे महामंत्री के पौत्र के प्रति की गई भविष्यवाणी के
बारे में क्यों पूछा था। जरूर इसी ने महाराज के कान भरे थे और आज भी यह महाराज को
मेरे विरुद्ध भड़का रहा है। तेनाली राम ने तत्क्षण ही अपने मन में संकल्प ले लिया कि चाहे
जो हो, वह इस चुनौती को स्वीकार करेगा।
महाराज को भी तेनाली राम की बातें याद हो आईं। उन्होंने इसे प्रकट नहीं होने दिया
और व्यापारी से कहा, “व्यापारी सोमदत्त, आप आज हमारी अतिथिशाला में विश्राम करें।
कल जब सभा लगेगी तब आपके प्रस्ताव पर विचार किया जाएगा।”
व्यापारी को महाराज ने अतिथिशाला में भेज दिया। सभा विसर्जित होने के बाद
महाराज ने तेनाली राम को बुलाकर कहा, “तेनाली राम! तुम्हें अब इस व्यापारी की शर्त
के अनुसार उसकी पहेली को हल करना होगा। ऐसा नहीं होने पर राज्य की बड़ी बदनामी
होगी। इसलिए आज रात भर सोच-विचार लो। कल सभा की कार्रवाई शुरू होते ही तुम्हें
स्वर्ण-पिंडों की पहेली हल करनी होगी।”
“जैसी आज्ञा महाराज!” तेनाली राम ने संक्षिप्त सा उत्तर दिया और अपने घर लौट
आया। उसे स्वर्ण-पिंडों को लेकर कोई तनाव नहीं था।
दूसरी ओर सभा में तेनाली राम से ईर्ष्या रखनेवाले सभासदों में इस बात की खूब चर्चा
हो रही थी कि तेनाली राम आज फँस ही गया। स्वर्ण-पिंडों की पहेली हल करने के लिए

अब यह तय है कि महाराज उससे ही कहेंगे। यह पहेली हल होनेवाली होती तो वह
व्यापारी इतना सोना दाँव पर नहीं लगाता! अब आएगा आनन्द! तेनाली राम की विद्वत्ता
की कलई इस बार खुलनी तय है। बड़ा ज्ञानी बना फिरता है...।'
दूसरे दिन नियत समय पर विजयनगर के राजप्रासाद में सभासद एकत्रित हुए। व्यापारी
सोमदत्त भी आया। महाराज भी पधारे। तेनाली राम का कहीं पता न था। महाराज मन-
ही-मन बेचैन हो उठे। आशंकित और संशययुक्त मन से महाराज विचार कर रहे थे कि कहीं
पहेली हल न होने के भय से तेनाली राम आया ही नहीं तो वे क्या करेंगे? अभी ऊहापोह के
बादल छँटे नहीं थे। सभासदों में भी बेचैनी थी।
व्यापारी सोमदत्त ने महाराज से पूछा, “महाराज! ‘स्वर्ण-पिंडों की समस्या का हल?’
महाराज ने उत्तर दिया, “तनिक प्रतीक्षा करो।”
व्यापारी अपने आसन पर बैठ गया। सभाकक्ष में फुसफुसाहटें तेज हो गईं। महाराज
असमंजस में थे और सिंहासन पर बैठे बार-बार पहलू बदल रहे थे कि अचानक उनकी दृष्टि
सभा में प्रवेश कर रहे तेनाली राम पर पड़ गई और उन्होंने राहत की साँस ली।
जब तेनाली राम अपनी जगह पर बैठ गया तो महाराज ने व्यापारी सोमदत्त से कहा,
“सोमदत्त! अब तुम अपनी समस्या सभासदों के बीच रखो।”
सोमदत्त ने पुनः दोनांे स्वर्ण-पिंडों के बारे में अपनी बातें सभा में दोहरा दीं।
महाराज ने सभा में घोषणा की, “इस समस्या के समाधान के लिए यदि कोई सभासद
स्वयं आगे आना चाहता हो तो आए अन्यथा इस समस्या का समाधान तेजस्वी तेनाली
राम करेंगे।” महाराज ने तेनाली राम के नाम के साथ ‘तेजस्वी’ विशेषण जान-बूझकर
जोड़ा था।
एक भी सभासद समस्या के समाधान के लिए नहीं आया तब महाराज ने तेनाली राम से
कहा, “तेनाली राम! आगे आओ और व्यापारी सोमदत्त द्वारा बताई गई समस्या को हल
करो!”
“महाराज! व्यापारी सोमदत्त से कहें कि वे स्वर्ण-पिंडों को अपनी इच्छा के अनुसार जहाँ
चाहें लटका दें। मैं उनकी समस्या का समाधान करने के लिए प्रस्तुत हूँ।।”
महाराज ने सोमदत्त को स्वर्ण-पिंडों को कहीं लटकाने का निर्देश दिया।
व्यापारी सोमदत्त ने उन स्वर्ण-पिंडों को महाराज और सभासदों के आसनों के मध्य के
खुले स्थान में, दीवार पर दो कीलें ठोककर अलगनी जैसी संरचना एक रस्सी के सहारे

तैयार कर ली तथा उस अलगनी में उसने दोनों स्वर्ण-पिंडों (जिनके सिरों पर सोने का ही
चेन लगा था) को लटका दिया और तेनाली राम की ओर देखकर कहा, “अब आपकी बारी
है, तेनाली राम जी।”
तेनाली राम ने अपने आसन से बिना हिले-डुले कहा, “महाराज! एक बार फिर सभासदों
और व्यापारी से पूछ लें कि कोई भी सभासद चाहे तो व्यापारी के प्रश्न का उत्तर दे दे।
व्यापारी चाहे तो अपना प्रस्ताव वापस ले ले। मैं सबको पुनर्विचार का एक अवसर देना
चाहता हूँ।”
तेनाली राम की बातें सुनकर सभासदों को लगा कि तेनाली राम स्वर्ण-पिंडों की पहेली
हल करने में असमर्थ है और वह किसी तरह अपना पिंड छुड़ाना चाहता है। सभा में
फुसफुसाहटें उभरीं और शान्त हो गईं।
व्यापारी ने घोषणा की, “वह अपने प्रस्ताव की वापसी नहीं चाहता है।”
अन्ततः तेनाली राम ने अपने आसन पर बैठे-बैठे ही ऊँचे स्वरों में कहा, “महाराज!
आपकी बाईं भुजा की ओर टँगा स्वर्ण-पिंड ठोस है और दाईं भुजा की ओर टँगा स्वर्ण-पिंड
खोखला है।”
तेनाली राम का स्वर इतना तेज था कि उसे सभी सभासदों ने सुना।
व्यापारी सोमदत्त के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगीं। फिर भी उसने तेनाली राम से कहा,
”यह दाएँ-बाएँ कहने से समस्या का सही हल नहीं हो सकता। आप ठोस पिंड के पास
पहुँचकर बताएँ कि यह ठोस है।”
तेनाली राम तत्परता से अपने आसन से उठा और महाराज के बाईं तरफ के पिंड के पास
पहुँचकर कहा, “महाराज! यह स्वर्ण-पिंड ठोस है।”
“क्यों, व्यापारी सोमदत्त। तेनाली राम का हल सही है?” महाराज कृष्णदेव राय ने पूछा।
“जी हाँ, महाराज!” ऐसा कहकर व्यापारी ने दोनों स्वर्ण-पिंड उतारे और उसे मंजूषा में
रखकर महाराज को सौंप दिया, “महाराज! अब इन स्वर्ण-पिंडों पर मेरा कोई अधिकार
नहीं है।”
महाराज ने स्वर्ण-पिंडों वाली मंजूषा थामते हुए कहा, “हाँ, अब इन स्वर्ण-पिंडों पर
तेनाली राम का अधिकार है।”
व्यापारी सोमदत्त भारी कदमों से महाराज की सभा से चला गया और महाराज ने
तेनाली राम को स्वर्ण-पिंडों वाली मंजूषा सौंपते हुए कहा, “यह तुम्हारी मेधा का पुरस्कार

है। इसका उपयोग अपनी और स्वजन-परिजनों की भलाई के लिए करना।”
सभा विसर्जित होने के पश्चात् महाराज कृष्णदेव राय ने तेनाली राम से पूछा, “तेनाली
राम! तुमने पिंडों का रहस्य कैसे सुलझा लिया? दोनों पिंड बिलकुल एक जैसे थे, फिर उन्हें
छुए बिना तुमने कैसे जान लिया कि इनमें से ठोस कौन है और कौन-सा पिंड खोखला है?”
तेनाली राम ने हँसते हुए कहा, “इसमें कोई रहस्य सुलझाने जैसी बात नहीं है महाराज!
खोखला पिंड हल्का होता है और ठोस पिंड भारी। पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति हर वस्तु
को अपनी ओर खींचती है। अलगनी पर चेन से लटकाए गए दोनों पिंडों को मैंने गम्भीरता
से देखा। ठोस पिंड को लटकानेवाले चेन में तनाव अधिक था तथा रस्सी के उस भाग में
खिंचाव भी अधिक था जिस भाग में ठोस स्वर्ण-पिंड लटकाया गया था। इस खिंचाव के
कारण ठोस पिंड थोड़ा नीचे आ गया था। खोखला पिंड थोड़ा ऊपर था और उसे
लटकानेवाली जंजीर में वैसा तनाव भी नहीं था जैसा कि ठोस पिंड लटकानेवाली जंजीर में
था।”
उस दिन महाराज ने फिर तेनाली राम को अपने आलिंगन में ले लिया और बोले,
“तेनाली राम! तुम सचमुच बुद्धिमान हो।”

मित्र की पहचान
महाराज कृष्णदेव राय आमोद प्रिय व्यक्ति थे। उल्लास के सामान्य अवसरों पर भी
महाराज उत्सव मनाते थे। उनके इस स्वभाव के कारण विजयनगरवासी प्रसन्न रहा करते
थे। कहा भी गया है- जैसा राजा, वैसी प्रजा।
एक बार, नव वर्ष के शुभागमन पर महाराज कृष्णदेव राय ने अपने मित्रों को बुलावा
भेजा। महाराज की इच्छा थी कि इस बार नववर्ष समारोहपूर्वक मनाया जाए। समारोह में
उन्होंने पड़ोसी राज्यों के नरेशों को भी आमंत्रण भेजा। नववर्ष के अवसर पर होनेवाले
समारोह में राज्य भर के कलाकारों को अपनी कला के प्रदर्शन का अवसर देने का निश्चय
कर महाराज ने वैसी व्यवस्था भी करवा ली।
समारोह के लिए अतिथियों का आना प्रारम्भ हो गया। पड़ोसी राज्यों के दो नरेश
समारोह के दो दिन पहले ही पहुँच चुके थे। महाराज ने इन दोनों नरेशों को अतिथिशाला
में नहीं ठहराया बल्कि उन दोनों नरेशों के लिए राजमहल के ही दो कक्षों को सजाया गया
था। दोनों नरेश उन्हीं कक्षों में ठहरे थे। इनमें से एक नरेश का नाम था-प्रसेनजित तथा
दूसरे का नाम था- वज्रबाहु! महाराज कृष्णदेव राय का बचपन इन दोनों के साथ व्यतीत
हुआ था। गुरुकुल के दिनों में महाराज कृष्णदेव राय के साथ ही इन दोनों ने शिक्षा ग्रहण
की थी। एक ही गुरुकुल, एक ही गुरु।
अतिथि-प्रेमी होने के कारण महाराज कृष्णदेव राय ऐसे भी अपने महल में आनेवालों का
खूब सत्कार किया करते थे। अब जब उनके दो बाल-सखा पधारे हों तो उनके स्वागत-
सत्कार में कोई कमी कैसे रह सकती थी! महाराज लगातार अपने इन दोनों अतिथियों के
पास ही बने रहते। कभी मित्रों के साथ चैसर खेलते तो कभी घुड़सवारी के लिए निकल
जाते।
दो दिन ऐसे ही बीत गए। नववर्ष समारोह का दिन आ गया। पिछले दो दिनों तक अपने
मित्रों की आवभगत में लगे रहने के कारण महाराज को इस बात का कोई ज्ञान नहीं था कि
मुख्य समारोह की क्या तैयारियाँ हुई हैं और क्या बाकी हैं। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था
कि महाराज मुख्य आयोजन के सन्दर्भ में स्वयं कोई रुचि न दिखाएँ।
महाराज के विशिष्ट सभासद भी महाराज के इस आचरण से अचम्भित थे। जिस दिन
नववर्ष का मुख्य समारोह आयोजित होनेवाला था, उस दिन प्रातःकाल में महाराज के
मुख्य सभासदों और विश्वसनीय माने जानेवाले लोगों ने मिलकर तय किया कि आज वे
लोग महाराज से मिलने महल में जाएँगे तथा महाराज से आग्रह करेंगे कि वे समारोह की

तैयारियाँ देख लें।
सुबह महाराज अभी बिस्तर से उठे ही थे कि उन्हें प्रहरी ने सूचना दी कि महाराज से
मिलने के लिए सभासदों का विशिष्ट मंडल आया हुआ है। महाराज ने प्रहरी को निर्देश
दिया कि वह उन लोगों को बाहरी कक्ष में बैठाए और प्रतीक्षा करने के लिए कहे।
थोड़ी ही देर के बाद महाराज कृष्णदेव राय अपने कपड़े बदलकर वहाँ पहुँच गए जहाँ
उनकी प्रतीक्षा में सभासद बैठे हुए थे। इन सभासदों में तेनाली राम भी था।
महाराज को सभी सभासदों ने समारोह की तैयारियों के विषय में जानकारियाँ दीं और
उन्हें समारोह स्थल पर चलने को कहा।
अभी महाराज अपने सभासदों की बातों का कोई उत्तर भी नहीं दे पाए थे कि महाराज के
भवन में आतिथ्य प्राप्त कर रहे उनके मित्र प्रसेनजित ने कक्ष में प्रवेश किया।
एक ऐसे कक्ष में जहाँ कोई राजा अपने विशिष्ट सभासदों के साथ विचार-विमर्श या
मंत्राण कर रहा हो वहाँ इस प्रकार बिना सूचना दिए प्रवेश कर जाना अशिष्टता समझी
जाती थी। सभासद चैंक पड़े और प्रश्नसूचक दृष्टि से प्रसेनजित की ओर देखने लगे।
महाराज ने भाँप लिया कि कक्ष में इस तरह प्रसेनजित का आना सभासदों को पसन्द नहीं
आया। इसे उनके राज्य में, स्वयं उनके महल में अशिष्टता माना जाता है। लेकिन प्रसेनजित
को वे कुछ कह भी नहीं सकते थे। बात बिगड़े नहीं इसलिए उन्होंने मुखर होते हुए कहा,
“आओ भाई प्रसेनजित, अपना आसन सँभालो। ये लोग मेरे विशिष्ट सलाहकार हैं और आज
नववर्ष समारोह के कार्यक्रम तय करने पधारे हैं।“ थोड़ी देर चुप रहने के बाद महाराज ने
अपने सभासदों से कहा, “और ये हैं-प्रसेनजित! कलिंग के महाराजा। मेरे गुरु-भाई और
बाल-सखा।”
तेनाली राम ने देखा कि प्रसेनजित की चाल में एक दर्प है। महाराज द्वारा परिचय दिए
जाने पर जब सभासदों ने उसका अभिवादन किया तो प्रसेनजित ने अपनी गर्दन अकड़ा ली
और उसे हल्का-सा हिलाकर अभिवादन स्वीकार किया। तेनाली राम ने उसकी मुद्रा
देखकर मन-ही-मन कहा-अरे! यह तो बड़ा दम्भी है।
प्रसेनजित ने सभासदों की उपेक्षा करते हुए महाराज कृष्णदेव राय से पूछा, “अरे
कृष्णदेव! यह सुबह-सुबह दरबार लगाकर क्यों बैठ गए? समारोह की तैयारी देखना कब से
राजाओं का कार्य हो गया? क्या तुम्हारे राज्य में ऐसे योग्यजनों का अभाव है जो समारोह
की तैयारी कर सकें?”
महाराज कृष्णदेव राय ने झेंपते हुए अपने सभासदों से कहा, “आप लोग सक्षम हैं। जो भी

आवश्यक लगे, कर लें। हम लोग समारोह देखने के लिए पहुँचेंगे।”
महाराज की झेंप को तेनाली राम ने भाँप लिया। वह समझ गया कि सभासदों के समक्ष
प्रसेनजित का यह व्यवहार महाराज को भी अनुकूल नहीं लगा। मन-ही-मन तेनाली राम ने
प्रसेनजित के आचरण की समीक्षा की और इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि यह व्यक्ति भले ही
राजा हो मगर है अशिष्ट। इसे सामान्य लोक-व्यवहार की भी समझ नहीं है।
अन्ततः महाराज के बिना ही सभी सभासद उठकर समारोह-स्थल की ओर प्रस्थान कर
गए। जिस समय वे लोग कक्ष से बाहर जा रहे थे उसी समय प्रसेनजित ने सभासदों को
सम्बोधित करते हुए कहा, “कुछ कार्य तुम लोग स्वयं कर लिया करो। आयोजन की
व्यवस्था करना या उसका निरीक्षण करना राजाओं का कार्य नहीं होता।”
प्रसेनजित द्वारा आदेशात्मक स्वर में कही गई यह बात किसी भी सभासद को पसन्द नहीं
आई। वर्षों से वे महाराज कृष्णदेव राय की सेवा में हैं। कभी भी महाराज ने उनसे इस शैली
में बातें नहीं कीं। वे सभी मन-ही-मन प्रसेनजित को कोसते हुए कक्ष से बाहर हो गए।
नववर्ष का रंगारंग कार्यक्रम शुरू हो चुका था। एक के बाद एक मंच पर कलाकार आते,
अपनी कला का प्रदर्शन करते और लौट जाते। पहले बाल कलाकारों को कला प्रदर्शन का
अवसर दिया गया, फिर पुरुष कलाकारों को और अन्त में महिला कलाकारों को। महिला
कलाकारों में एक से बढ़कर एक नृत्यांगनाएँ मंच पर आती रहीं। नृत्य प्रस्तुत कर जाती
रहीं।
तेनाली राम ने देखा कि दर्शकों की अगली पाँत में महाराज के साथ बैठा प्रसेनजित
महिला कलाकारों की ओर बहुत ही लोलुप -ष्टि से देख रहा है। उसकी -ष्टि में छिपे अश्लील
भाव को पहचानकर मन-ही-मन तेनाली राम क्षुब्ध हो उठा कि महाराज ऐसे व्यक्ति को
अपना बाल-सखा कहते नहीं अघाते मगर तेनाली राम अपने स्थान पर बने रहने के लिए
बाध्य था। इस अशिष्ट व्यक्ति को दंडित करने का अधिकार तो उसे कतई नहीं था। मगर
प्रसेनजित के प्रति उसके मन में वितृष्णा का भाव अवश्य गहरा गया था।
मध्य रात्रि तक समारोह चलता रहा। समारोह के समापन के बाद महाराज अपने मित्रों
के साथ भवन में चले गए।
सभासदों को घोर विस्मय हुआ कि महाराज ने अन्य अतिथियों से यह भी नहीं पूछा कि
उन्हें समारोह में आनन्द आया या नहीं। ‘शुभ रात्रि’ कहने की औपचारिकता भी उन्होंने
नहीं निभाई। तेनाली राम को महाराज के व्यवहार में आया यह परिवर्तन पसन्द नहीं
आया। महाराज कृष्णदेव के दरबार में उसकी हैसियत मात्र एक विदूषक की थी। वह संशय
में था कि महाराज को उनके आचरण में उत्पन्न हो रहे दोष के प्रति कैसे सचेत करे।
नववर्ष का समारोह सम्पन्न हो चुका था। अतिथि वापस लौट चुके थे। किन्तु महाराज

राजकाज की सामान्य दिनचर्या में भाग नहीं ले रहे थे। कुछ आवश्यक होता तो सम्बन्धित
कर्मचारी को राजभवन में बुलाकर ही निर्देश दे देते और फिर अपने दोनों मित्रों के साथ या
तो चौसर खेलने में व्यस्त हो जाते या शिकार करने निकल जाते।
एक दिन उन्होंने किसी कार्यवश तेनाली राम को राजभवन में बुलवाया। जो निर्देश देना
था, दिए। जो बातें करनी थीं, कीं। अवसर देखकर तेनाली राम ने महाराज से कहा,
“महाराज, बादल यदि बरसना बन्द कर दे तो धरती उर्वर नहीं रहती। हवा यदि बहना
बन्द कर दे, सूर्य यदि चमकना बन्द कर दे तब प्रकृति का विनाश अवश्यम्भावी है। हवा,
बादल, सूरज जिस तरह अपने कर्तव्य में सतत निमग्न रहते हैं उसी तरह प्रजापालक राजा
को भी अपने कर्तव्य में लगा रहना चाहिए!”
महाराज कृष्णदेव राय चौंके। उन्होंने तेनाली राम की ओर प्रश्नसूचक -ष्टि से देखा। किसी
राजा के इस तरह देखने का अर्थ होता है- अवश्यम्भावी दंड! मगर तेनाली राम के चेहरे
पर रंचमात्रा भी भय नहीं था।
महाराज ने कुपित स्वर में पूछा, “तुम्हारे कहने का आशय क्या है, तेनाली राम?”
"महाराज! आप अन्नदाता हैं। मेरी विनती है कि आप मेरे और विजयनगरवासियों के
अन्नदाता बने रहें।“
महाराज कृष्णदेव राय की तनी भृकुटियों का तनाव तेनाली राम का उत्तर सुनकर थोड़ा
कम हुआ किन्तु तेनाली राम के कथन के निहितार्थ को समझते हुए वे उद्वेलित हो गए थे।
उन्होंने आवेश-भरे स्वर में पूछा, “तुम्हें क्या लगता है, मैं अपने कर्तव्यों का निर्वाह नहीं
कर रहा? राजकाज में व्यस्त रहना मात्र ही मेरी दिनचर्या होनी चाहिए? मेरे दो अभिन्न
मित्र वर्षों बाद मिले हैं...मेरा उनके प्रति भी तो कुछ कर्तव्य है!”
तेनाली राम ने उनकी ओर विस्मय-भरी दृष्टि से देखा और अनायास उसके मँुह से
निकला, “अभिन्न मित्र ?”
“क्यों, तुम्हें कोई सन्देह है?” महाराज ने पूछा।
तेनाली राम मौन उनकी ओर देखता रहा।
“बोलो तेनाली राम, बोलते क्यों नहीं? बताओ कि ये दोनों मेरे मित्रा हैं या नहीं? फिर
इनके प्रति मेरा कोई दायित्व है या नहीं?“
“मित्र?” तेनाली राम ने महाराज की ओर फिर से प्रश्नात्मक दृष्टि डाली।
तेनाली राम की प्रश्नात्मक -ष्टि से महाराज विचलित हो गए और संशययुक्त वाणी में

तेनाली राम से पूछने लगे, “बताओ तेनाली राम! क्या ये दोनों मेरे मित्र नहीं हैं? क्या तुम्हें
इनकी मित्रता पर सन्देह है? क्या बात है, बिना डर के बोलो। तुम्हारे मन में इनके प्रति
क्या धारणा है?”
महाराज के स्वर में जिज्ञासा थी। महाराज के बदले स्वर को सुनकर तेनाली राम के मन
में विचार उत्पन्न हुआ कि सत्ता कितने आडम्बर से अपना दर्पपूर्ण चेहरा बनाए रखती है
किन्तु सच का एक झोंका उसे जड़ से हिला देता है। यही महाराज कृष्णदेव राय अभी दो
क्षण पहले अपनी मित्रता की बखान करते हुए अपने मित्रों के प्रति अपने कर्तव्य का उल्लेख
कर रहे थे और अब वही महाराज कृष्णदेव राय संशययुक्त मन से पूछ रहे हैं, ‘क्या वे मित्रा
नहीं हैं?’ तेनाली राम ने स्थिति अनुकूल पाते हुए उसका लाभ उठाया और बोला,
“महाराज! मित्र-अमित्र की पहचान मैंने नहीं की है किन्तु यदि आप चाहें तो वह भी कर
सकता हूँ।”
“हाँ, तेनाली राम! मैं चाहता हूँ कि तुम मुझे बताओ कि इन दोनों में से मेरा सच्चा मित्र
कौन है?” महाराज ने कहा। “तो ठीक है महाराज!” तेनाली राम ने विश्वास-भरी दृष्टि से
महाराज की आँखों में झाँकते हुए कहा, “आज रात्रि विश्राम मैं राजभवन में कर सकूँ,
ऐसी व्यवस्था करा दें। मेरे ठहरने का प्रबन्ध अपने इन दोनों मित्रों के कक्ष के आसपास करा
दें।”
महाराज मान गए।
शाम को तेनाली राम आया तो उसे महाराज के मित्र प्रसेनजित और वज्रबाहु के कक्षों के
सामने के एक कक्ष में ठहरा दिया गया। तेनाली राम के राजभवन में ठहरने की सूचना
गोपनीय रखी गई।
महाराज कृष्णदेव राय स्वयं एक बार तेनाली राम के कक्ष में आए। उन्होंने तेनाली राम
से कहा, “कुछ चाहिए तो बताओ।”
“नहीं महाराज, मुझे कुछ नहीं चाहिए। बस, आप इतना करें कि अपने मित्रों के कक्ष में
ही रात्रि का भोजन भेजें। भोजन में ऐसे पकवान हों जिनमें अच्छी सुगन्ध हो। सुस्वादु
पकवानों से भरे थाल जब आप अपने मित्रों के कक्ष में भिजवा दें तब तुरन्त यह समाचार
फैला दें कि आपका स्वास्थ्य अचानक बहुत खराब हो गया है। बाकी बातें हम लोग बाद में
करेंगे।” तेनाली राम ने कहा।
“लेकिन इससे होगा क्या?” महाराज ने पूछा।
“यही तो देखना है महाराज!” तेनाली राम ने कहा।

“तुम्हारी बातें मुझे समझ में नहीं आ रही हैं तेनाली राम!” महाराज ने जिज्ञासा-भरे
स्वरों में कहा।
“सुबह तक प्रतीक्षा करें महाराज!” तेनाली राम ने महाराज को यह कहते हुए आश्वस्त
किया।
रात्रि के भोजन का समय था। राजभवन में अतिथि के रूप में रह रहे प्रसेनजित और
वज्रबाहु के कक्ष में भोजन लाकर रखा गया था। भोजन से भूख जगानेवाली सुगन्ध उठ रही
थी जिससे आसपास का वातावरण महमहा उठा था। प्रसेनजित और वज्रबाहु अभी भोजन
करने के लिए उद्यत हुए ही थे कि दो प्रहरी दौड़ते हुए आए और बोले, “महाराज का
स्वास्थ्य बहुत खराब है। राजवैद्य उनकी शुश्रूषा में लगे हैं मगर उनकी स्थिति खराब
होती ही जा रही है।”
यह सूचना देकर दोनों प्रहरी लौट गए। वज्रबाहु तत्काल भोजन की थाल से उठ गए और
अपना हाथ अंगवस्त्राम् से पोंछते हुए महाराज के कक्ष की ओर दौड़ पड़े, जबकि प्रसेनजित
ने जी-भर के भोजन किया और थोड़ी देर लेटने के बाद वह महाराज के कक्ष की ओर गया।
तेनाली राम ने दोनों के जाने के बाद उनके कक्षों में जाकर भोजन की थाल में भोजन की
स्थिति देखी। प्रसेनजित की थाल रिक्त हो चुकी थी जबकि वज्रबाहु की थाल में भोजन ज्यों
का त्यों था। एक निवाला तैयार था, जैसे उसे हाथ में उठाकर फिर से थाल में रख दिया
गया हो!
सुबह तक राजवैद्य भवन में रहे। सूर्योदय से पहले ही महाराज स्वस्थ हो गए।
तेनाली राम महाराज के कक्ष में उन्हें देखने के बहाने पहुँचा।
उसे देखकर महाराज ने पूछा, “क्यों तेनाली राम! आज मेरे प्रश्न का उत्तर तो दे दोगे?”
“आज नहीं, अभी महाराज!” तेनाली राम ने मुस्कुराते हुए कहा।
“हाँ, बताओ तेनाली राम, मेरा मित्र इन दोनों में से कौन है? या दोनों ही हैं? या दोनों में
से कोई नहीं, संशयमुक्त होकर बताओ।” महाराज ने पुनः तेनाली राम से पूछा।
तेनाली राम ने महाराज की ओर देखते हुए कहा, “महाराज! आपका सच्चा मित्रा
वज्रबाहु है, प्रसेनजित नहीं।“ फिर तेनाली राम ने महाराज के अस्वस्थ होने के बाद की
घटना बता दी कि मित्रा का स्वास्थ्य खराब होने की सूचना से उद्वेलित होकर किस तरह
वज्रबाहु भोजन छोड़कर महाराज के शयन कक्ष की ओर दौड़ पड़ा और प्रसेनजित ने किस
तरह भोजन करने के बाद विश्राम किया और तब अपने कक्ष से निकला।

तेनाली राम से पूरा वृत्तान्त जानने के बाद महाराज ने उसे अपने गले से लगा लिया और
कहा, “भविष्य में भी तुम मेरे आचरण पर दृष्टि रखना। यदि कभी मैं कर्तव्यविमुख होता
दिखूँ तो इस बात की ओर मेरा ध्यान आकृष्ट करने के लिए जो भी उचित जान पड़े,
करना।”
उस दिन से ही महाराज कृष्णदेव राय पहले की भाँति दरबार में जाने लगे। महाराज को
सक्रिय और सजग देखकर सभासदों में भी उत्साह पैदा हो गया और विजयनगर में पैदा हुई
उदासीनता समाप्त हो गई।