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तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)

तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)

पण्डित तेनाली रामकृष्णन / लोक संकलन द्वारा

स्रोत: तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ) · भारतीय लोक साहित्य संकलन · 1950 (उद्गम)

DevanagariHindipublished118 पृष्ठ

पृष्ठ 77, कुल 118 में से

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पृष्ठ 77

राजकाज की सामान्य दिनचर्या में भाग नहीं ले रहे थे। कुछ आवश्यक होता तो सम्बन्धित
कर्मचारी को राजभवन में बुलाकर ही निर्देश दे देते और फिर अपने दोनों मित्रों के साथ या
तो चौसर खेलने में व्यस्त हो जाते या शिकार करने निकल जाते।
एक दिन उन्होंने किसी कार्यवश तेनाली राम को राजभवन में बुलवाया। जो निर्देश देना
था, दिए। जो बातें करनी थीं, कीं। अवसर देखकर तेनाली राम ने महाराज से कहा,
“महाराज, बादल यदि बरसना बन्द कर दे तो धरती उर्वर नहीं रहती। हवा यदि बहना
बन्द कर दे, सूर्य यदि चमकना बन्द कर दे तब प्रकृति का विनाश अवश्यम्भावी है। हवा,
बादल, सूरज जिस तरह अपने कर्तव्य में सतत निमग्न रहते हैं उसी तरह प्रजापालक राजा
को भी अपने कर्तव्य में लगा रहना चाहिए!”
महाराज कृष्णदेव राय चौंके। उन्होंने तेनाली राम की ओर प्रश्नसूचक -ष्टि से देखा। किसी
राजा के इस तरह देखने का अर्थ होता है- अवश्यम्भावी दंड! मगर तेनाली राम के चेहरे
पर रंचमात्रा भी भय नहीं था।
महाराज ने कुपित स्वर में पूछा, “तुम्हारे कहने का आशय क्या है, तेनाली राम?”
"महाराज! आप अन्नदाता हैं। मेरी विनती है कि आप मेरे और विजयनगरवासियों के
अन्नदाता बने रहें।“
महाराज कृष्णदेव राय की तनी भृकुटियों का तनाव तेनाली राम का उत्तर सुनकर थोड़ा
कम हुआ किन्तु तेनाली राम के कथन के निहितार्थ को समझते हुए वे उद्वेलित हो गए थे।
उन्होंने आवेश-भरे स्वर में पूछा, “तुम्हें क्या लगता है, मैं अपने कर्तव्यों का निर्वाह नहीं
कर रहा? राजकाज में व्यस्त रहना मात्र ही मेरी दिनचर्या होनी चाहिए? मेरे दो अभिन्न
मित्र वर्षों बाद मिले हैं...मेरा उनके प्रति भी तो कुछ कर्तव्य है!”
तेनाली राम ने उनकी ओर विस्मय-भरी दृष्टि से देखा और अनायास उसके मँुह से
निकला, “अभिन्न मित्र ?”
“क्यों, तुम्हें कोई सन्देह है?” महाराज ने पूछा।
तेनाली राम मौन उनकी ओर देखता रहा।
“बोलो तेनाली राम, बोलते क्यों नहीं? बताओ कि ये दोनों मेरे मित्रा हैं या नहीं? फिर
इनके प्रति मेरा कोई दायित्व है या नहीं?“
“मित्र?” तेनाली राम ने महाराज की ओर फिर से प्रश्नात्मक दृष्टि डाली।
तेनाली राम की प्रश्नात्मक -ष्टि से महाराज विचलित हो गए और संशययुक्त वाणी में