तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)
पण्डित तेनाली रामकृष्णन / लोक संकलन द्वारा
स्रोत: तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ) · भारतीय लोक साहित्य संकलन · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 65, कुल 118 में से
संदर्भ में पढ़ेंअभी महाराज ऐसा सोच ही रहे थे कि उनकी आँखों में विस्मय के भाव गहरा गए।
उन्होंने देखा कि भोजन स्थल पर तेनाली राम केवल धोती पहने, नंगे बदन बैठा हुआ है
और उसकी पगड़ी, कुर्ता, फतूहा, गमछा, अंगवस्त्राम् भोजन की थाली के चतुर्दिक रखे हुए
हैं। सभासद तेनाली राम की ओर देख-देखकर मुस्कुरा रहे हैं और आँखों ही आँखों में
बतिया रहे हैं कि तेनाली राम का सिर फिर गया है।
भोजन परोसा जा चुका था। तेनाली राम की ओर सारे सभासद देख रहे थे। तेनाली राम
ने भोजन का एक निवाला उठाया और कुर्ते पर रखते हुए कहा, “कुर्ता! तू खा।” फिर
पगड़ी पर एक निवाला रखा और कहा, “पगड़ी! तू खा।” अंगवस्त्राम् पर एक निवाला
रखा और कहा, “अंगवस्त्राम्! तू खा।”
तेनाली राम का यह कृत्य महाराज की समझ में नहीं आया तब उन्होंने तेनाली राम को
घूरते हुए कहा, “तेनाली राम! तुम्हें हो क्या गया है? भोजन के साथ तुम यह क्या कर रहे
हो? अपने वस्त्र तुमने क्यों उतार दिये?“
एक सभासद ने कहा, “तेनाली राम का सिर फिर गया है।”
दूसरे उसकी हाँ में हाँ मिलाने लगे और कहने लगे, “कहीं कुर्ता भी भोजन करता है। यह
बावलापन नहीं तो और क्या है?“
तेनाली राम उनकी बातों को अनसुनी करते हुए अपने काम में लगा रहा-कुर्ता! तू खा।
अँगरखा! तू खा। अंगवस्त्राम्! तू खा। पगड़ी! तू खा।“
महाराज से रहा नहीं गया। उन्होंने टोका, “बावले मत बनो तेनाली राम। भोजन करो।
तुम्हें यहाँ भोजन के लिए बुलाया गया है।“
तेनाली राम ने महाराज की ओर देखा फिर अन्य अतिथियों की ओर, फिर कहा,
“महाराज! जिसे राजभवन में भोजन के लिए प्रवेश मिला, उसी को तो खिला रहा हूँ!”
”भोजन के लिए तो तुम्हें आमंत्राण दिया गया था, इसलिए भोजन के लिए प्रवेश तुम्हें ही
मिला है। तुम भोजन करो! एक तो विलम्ब से आए हो, अब और विलम्ब न करो।“
महाराज ने कहा।
“मैं विलम्ब से नहीं आया महाराज! मैं तो यहाँ सबसे पहले आया था। विलम्ब से तो यह
पगड़ी, कुर्ता आदि परिधान पधारे हैं!”
“उलझी बातें मत करो, तेनाली राम! कहो, जो कुछ भी कहना है मगर साफ-साफ!”
महाराज ने कहा।