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तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)

तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)

पण्डित तेनाली रामकृष्णन / लोक संकलन द्वारा

स्रोत: तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ) · भारतीय लोक साहित्य संकलन · 1950 (उद्गम)

DevanagariHindipublished118 पृष्ठ

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आवश्यक लगे, कर लें। हम लोग समारोह देखने के लिए पहुँचेंगे।”
महाराज की झेंप को तेनाली राम ने भाँप लिया। वह समझ गया कि सभासदों के समक्ष
प्रसेनजित का यह व्यवहार महाराज को भी अनुकूल नहीं लगा। मन-ही-मन तेनाली राम ने
प्रसेनजित के आचरण की समीक्षा की और इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि यह व्यक्ति भले ही
राजा हो मगर है अशिष्ट। इसे सामान्य लोक-व्यवहार की भी समझ नहीं है।
अन्ततः महाराज के बिना ही सभी सभासद उठकर समारोह-स्थल की ओर प्रस्थान कर
गए। जिस समय वे लोग कक्ष से बाहर जा रहे थे उसी समय प्रसेनजित ने सभासदों को
सम्बोधित करते हुए कहा, “कुछ कार्य तुम लोग स्वयं कर लिया करो। आयोजन की
व्यवस्था करना या उसका निरीक्षण करना राजाओं का कार्य नहीं होता।”
प्रसेनजित द्वारा आदेशात्मक स्वर में कही गई यह बात किसी भी सभासद को पसन्द नहीं
आई। वर्षों से वे महाराज कृष्णदेव राय की सेवा में हैं। कभी भी महाराज ने उनसे इस शैली
में बातें नहीं कीं। वे सभी मन-ही-मन प्रसेनजित को कोसते हुए कक्ष से बाहर हो गए।
नववर्ष का रंगारंग कार्यक्रम शुरू हो चुका था। एक के बाद एक मंच पर कलाकार आते,
अपनी कला का प्रदर्शन करते और लौट जाते। पहले बाल कलाकारों को कला प्रदर्शन का
अवसर दिया गया, फिर पुरुष कलाकारों को और अन्त में महिला कलाकारों को। महिला
कलाकारों में एक से बढ़कर एक नृत्यांगनाएँ मंच पर आती रहीं। नृत्य प्रस्तुत कर जाती
रहीं।
तेनाली राम ने देखा कि दर्शकों की अगली पाँत में महाराज के साथ बैठा प्रसेनजित
महिला कलाकारों की ओर बहुत ही लोलुप -ष्टि से देख रहा है। उसकी -ष्टि में छिपे अश्लील
भाव को पहचानकर मन-ही-मन तेनाली राम क्षुब्ध हो उठा कि महाराज ऐसे व्यक्ति को
अपना बाल-सखा कहते नहीं अघाते मगर तेनाली राम अपने स्थान पर बने रहने के लिए
बाध्य था। इस अशिष्ट व्यक्ति को दंडित करने का अधिकार तो उसे कतई नहीं था। मगर
प्रसेनजित के प्रति उसके मन में वितृष्णा का भाव अवश्य गहरा गया था।
मध्य रात्रि तक समारोह चलता रहा। समारोह के समापन के बाद महाराज अपने मित्रों
के साथ भवन में चले गए।
सभासदों को घोर विस्मय हुआ कि महाराज ने अन्य अतिथियों से यह भी नहीं पूछा कि
उन्हें समारोह में आनन्द आया या नहीं। ‘शुभ रात्रि’ कहने की औपचारिकता भी उन्होंने
नहीं निभाई। तेनाली राम को महाराज के व्यवहार में आया यह परिवर्तन पसन्द नहीं
आया। महाराज कृष्णदेव के दरबार में उसकी हैसियत मात्र एक विदूषक की थी। वह संशय
में था कि महाराज को उनके आचरण में उत्पन्न हो रहे दोष के प्रति कैसे सचेत करे।
नववर्ष का समारोह सम्पन्न हो चुका था। अतिथि वापस लौट चुके थे। किन्तु महाराज