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तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)

तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)

पण्डित तेनाली रामकृष्णन / लोक संकलन द्वारा

स्रोत: तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ) · भारतीय लोक साहित्य संकलन · 1950 (उद्गम)

DevanagariHindipublished118 पृष्ठ

पृष्ठ 79, कुल 118 में से

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पृष्ठ 79

“तुम्हारी बातें मुझे समझ में नहीं आ रही हैं तेनाली राम!” महाराज ने जिज्ञासा-भरे
स्वरों में कहा।
“सुबह तक प्रतीक्षा करें महाराज!” तेनाली राम ने महाराज को यह कहते हुए आश्वस्त
किया।
रात्रि के भोजन का समय था। राजभवन में अतिथि के रूप में रह रहे प्रसेनजित और
वज्रबाहु के कक्ष में भोजन लाकर रखा गया था। भोजन से भूख जगानेवाली सुगन्ध उठ रही
थी जिससे आसपास का वातावरण महमहा उठा था। प्रसेनजित और वज्रबाहु अभी भोजन
करने के लिए उद्यत हुए ही थे कि दो प्रहरी दौड़ते हुए आए और बोले, “महाराज का
स्वास्थ्य बहुत खराब है। राजवैद्य उनकी शुश्रूषा में लगे हैं मगर उनकी स्थिति खराब
होती ही जा रही है।”
यह सूचना देकर दोनों प्रहरी लौट गए। वज्रबाहु तत्काल भोजन की थाल से उठ गए और
अपना हाथ अंगवस्त्राम् से पोंछते हुए महाराज के कक्ष की ओर दौड़ पड़े, जबकि प्रसेनजित
ने जी-भर के भोजन किया और थोड़ी देर लेटने के बाद वह महाराज के कक्ष की ओर गया।
तेनाली राम ने दोनों के जाने के बाद उनके कक्षों में जाकर भोजन की थाल में भोजन की
स्थिति देखी। प्रसेनजित की थाल रिक्त हो चुकी थी जबकि वज्रबाहु की थाल में भोजन ज्यों
का त्यों था। एक निवाला तैयार था, जैसे उसे हाथ में उठाकर फिर से थाल में रख दिया
गया हो!
सुबह तक राजवैद्य भवन में रहे। सूर्योदय से पहले ही महाराज स्वस्थ हो गए।
तेनाली राम महाराज के कक्ष में उन्हें देखने के बहाने पहुँचा।
उसे देखकर महाराज ने पूछा, “क्यों तेनाली राम! आज मेरे प्रश्न का उत्तर तो दे दोगे?”
“आज नहीं, अभी महाराज!” तेनाली राम ने मुस्कुराते हुए कहा।
“हाँ, बताओ तेनाली राम, मेरा मित्र इन दोनों में से कौन है? या दोनों ही हैं? या दोनों में
से कोई नहीं, संशयमुक्त होकर बताओ।” महाराज ने पुनः तेनाली राम से पूछा।
तेनाली राम ने महाराज की ओर देखते हुए कहा, “महाराज! आपका सच्चा मित्रा
वज्रबाहु है, प्रसेनजित नहीं।“ फिर तेनाली राम ने महाराज के अस्वस्थ होने के बाद की
घटना बता दी कि मित्रा का स्वास्थ्य खराब होने की सूचना से उद्वेलित होकर किस तरह
वज्रबाहु भोजन छोड़कर महाराज के शयन कक्ष की ओर दौड़ पड़ा और प्रसेनजित ने किस
तरह भोजन करने के बाद विश्राम किया और तब अपने कक्ष से निकला।