तत्त्वार्थ सूत्र (मोक्षशास्त्र - संस्कृत सूत्र एवं हिन्दी व्याख्या)
Tattvartha Sutra / Mokshashastra with Hindi Commentary
आचार्य उमास्वामी (उमास्वाति) / आचार्य पूज्यपाद द्वारा
अध्याय - २
शेषाणां सम्मूर्च्छनम् ॥३५॥
[ शेषाणां ] गर्भ और उपपाद जन्म वाले जीवों के अतिरिक्त
शेष जीवों के [ सम्मूर्च्छनम् ] सम्मूर्च्छन जन्म ही होता है
अर्थात् सम्मूर्च्छन जन्म शेष जीवों के ही होता है।
The birth of the rest is by spontaneous generation.
औदारिकवैक्रियिकाहारकतैजसकार्मणानि शरीराणि
॥३६॥
[ औदारिक वैक्रियिक आहारक तैजस कार्मणानि ]
औदारिक, वैक्रियिक, आहारक, तैजस और कार्मण
[ शरीराणि ] यह पाँच शरीर हैं।
The gross, the transformable, the projectable or
assimilative, the luminous (electric), and the
karmic are the five types of bodies.
परं परं सूक्ष्मम् ॥३७॥
पहिले कहे हुए शरीरों की अपेक्षा [ परं परं ] आगे-आगे के
शरीर [ सूक्ष्मम् ] सूक्ष्म-सूक्ष्म होते हैं, अर्थात् औदारिक की
अपेक्षा वैक्रियिक सूक्ष्म, वैक्रियिक की अपेक्षा आहारक सूक्ष्म,
आहारक की अपेक्षा तैजस सूक्ष्म, और तैजस की अपेक्षा से
कार्मण शरीर सूक्ष्म होता है।
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अध्याय - २
(The bodies are) more and more subtle successively.
प्रदेशतोऽसंख्येयगुणं प्राक्तैजसात् ॥३८॥
[ प्रदेशतः ] प्रदेशों की अपेक्षा से [ तैजसात् प्राक् ] तैजस
शरीर से पहिले के शरीर [ असंख्येयगुणं ] असंख्यातगुने हैं।
Prior to the luminous body, each has innumerable
times the number of space-points of the previous
one.
अनन्तगुणे परे ॥३९॥
[ परे ] शेष दो शरीर [ अनन्तगुणे ] अनन्तगुने परमाणु
(प्रदेश) वाले हैं अर्थात् आहारक शरीर की अपेक्षा अनन्तगुने
प्रदेश तैजस शरीर में होते हैं और तैजस शरीर की अपेक्षा
अनन्तगुने प्रदेश कार्मण शरीर में होते हैं।
The last two have infinite fold (space-points).
अप्रतीघाते ॥४०॥
तैजस और कार्मण ये दोनों शरीर [ अप्रतीघाते ] अप्रतीघात
अर्थात् बाधा रहित हैं।
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अध्याय - २
(The last two are) without impediment.
अनादिसम्बन्धे च ॥४१॥
[ च ] और यह दोनों शरीर [ अनादिसम्बन्धे ] आत्मा के
साथ अनादिकाल से सम्बन्ध वाले हैं।
(These are of) beginning-less association also.
सर्वस्य ॥४२॥
ये तैजस और कार्मण शरीर [ सर्वस्य ] सब संसारी जीवों के
होते हैं।
(These two are associated) with all.
तदादीनि भाज्यानि युगपदेकस्मिन्नाचतुर्भ्यः ॥४३॥
[ तदादीनि ] उन तैजस और कार्मण शरीरों से प्रारम्भ करके
[ युगपत् ] एक साथ [ एकस्मिन् ] एक जीव के
[ आचतुर्भ्यः ] चार शरीर तक [ भाज्यानि ] विभक्त करना
चाहिये अर्थात् जानना चाहिये।
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अध्याय - २
Commencing with these, up to four bodies can be
had simultaneously by a single soul.
निरुपभोगमन्त्यम् ॥४४॥
[ अन्त्यम् ] अन्त का कार्मण शरीर [ निरुपभोगम् ] उपभोग
रहित होता है।
The last is not the means of enjoyment.
गर्भसम्मूर्च्छनजमाद्यम् ॥४५॥
[ गर्भ ] गर्भ [ सम्मूर्च्छनजम् ] और सम्मूर्च्छन जन्म से उत्पन्न
होने वाला शरीर [ आद्यं ] पहिला - औदारिक शरीर
कहलाता है।
The first is of uterine birth and spontaneous
generation.
औपपादिकं वैक्रियिकम् ॥४६॥
[ औपपादिकं ] उपपादजन्म वाले अर्थात् देव और नारकियों
के शरीर [ वैक्रियिकम् ] वैक्रियिक होते हैं।
The transformable body originates by birth in
special beds.
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अध्याय - २
लब्धिप्रत्ययं च ॥४७॥
वैक्रियिक शरीर [ लब्धिप्रत्ययं च ] लब्धि-नैमित्तिक भी होता
है।
Attainment is also the cause (of its origin).
तैजसमपि ॥४८॥
[ तैजसम् ] तैजस शरीर [ अपि ] भी लब्धि-नैमित्तिक है।
The luminous body also (is caused by attainment).
शुभं विशुद्धमव्याघाति चाहारकं प्रमत्तसंयतस्यैव ॥४९॥
[ आहारकं ] आहारक शरीर [ शुभम् ] शुभ है अर्थात् वह
शुभ कार्य करता है [ विशुद्धम् ] विशुद्ध है अर्थात् वह
विशुद्धकर्म (मंद कषाय से बंधने वाले कर्म) का कार्य है।
[ च अव्याघाति ] और व्याघात-बाधारहित है तथा
[ प्रमत्तसंयतस्यैव ] प्रमत्तसंयत (छठवें गुणस्थानवर्ती) मुनि के
ही वह शरीर होता है।
The projectable body, which is auspicious and pure
and without impediment, originates in the saint of
the sixth stage only.
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अध्याय - २
नारकसम्मूर्च्छिनो नपुंसकानि ॥५०॥
[ नारकसम्मूर्च्छिनो ] नारकी और सम्मूर्च्छन जन्म वाले
[ नपुंसकानि ] नपुंसक होते हैं।
The infernal beings and the spontaneously
generated are of the neuter sex.
न देवाः ॥५१॥
[ देवाः ] देव [ न ] नपुंसक नहीं होते, अर्थात् देवों के
पुरुषलिंग और देवियों के स्त्रीलिंग होता है।
The celestial beings are not (of neuter sex).
शेषास्त्रिवेदाः ॥५२॥
[ शेषाः ] शेष के गर्भज मनुष्य और तिर्यंच [ त्रिवेदाः ] तीनों
वेद वाले होते हैं।
The rest are of three sexes (signs).
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अध्याय - २
औपपादिकचरमोत्तमदेहासंख्येयवर्षायुषोऽनपवर्त्यायुषः
॥५३॥
[ औपपादिक ] उपपाद जन्मवाले देव और नारकी, [ चरम
उत्तम देहाः ] चरम उत्तम देह वाले अर्थात् उसी भव में मोक्ष
जाने वाले तथा [ असंख्येयवर्ष आयुषः ] असंख्यात वर्ष आयु
वाले भोगभूमि के जीवों की [ आयुषः अनपवर्ति ] आयु
अपवर्तन रहित होती है।
The lifetime of beings born in special beds, those
with final, superior bodies and those of
innumerable years, cannot be cut short.
॥ इति तत्त्वार्थाधिगमे मोक्षशास्त्रे द्वितीयोऽध्यायः॥
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अध्याय - ३
अथ तृतीयोऽध्यायः
The Lower World and the Middle World
रत्नशर्करावालुकापंकधूमतममोमहातमःप्रभाभूमयो
घनाम्बुवाताकाशप्रतिष्ठाः सप्ताधोऽधः ॥१॥
अधोलोक में रत्नप्रभा, शर्कराप्रभा, वालुकाप्रभा, पंकप्रभा,
धूमप्रभा, तमप्रभा और महातमप्रभा - ये सात भूमियाँ हैं और
क्रम से नीचे-नीचे घनोदधिवातवलय, घनवातवलय,
तनुवातवलय तथा आकाश का आधार है।
The lower world consists of seven earths* one
below the other, surrounded by three kinds of air
and space.
तासु त्रिंशत्पञ्चविंशतिपञ्चदशदशत्रिपञ्चोनैकनरक-
शतसहस्राणि पञ्च चैव यथाक्रमम् ॥२॥
उन पृथ्वियों में क्रम से पहली पृथ्वी में 30 लाख, दूसरी में
25 लाख, तीसरी में 15 लाख, चौथी में 10 लाख, पाँचवीं
में 3 लाख, छठवीं में पाँच कम एक लाख (99,995) और
सातवीं में 5 ही नरक बिल हैं। कुल 84 लाख नरकवास
बिल हैं।
- Ratna, Şarkarā, Vālukā, Pańka, Dhūma, Tamaḥ and
Mahātamaḥ – the word prabhā is taken with each of these.
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अध्याय - ३
In these (earths) there are thirty hundred
thousand, twenty-five hundred thousand, fifteen
hundred thousand, ten hundred thousand, three
hundred thousand, one hundred thousand less five
and only five infernal abodes, respectively.
नारका नित्याशुभतरलेश्यापरिणामदेहवेदना-
विक्रियाः ॥३॥
नारकी जीव सदैव ही अत्यन्त अशुभ लेश्या, परिणाम, शरीर,
वेदना और विक्रिया को धारण करते हैं।
The thought-colouration, environment, body,
suffering, and shape of body (or deeds) are
incessantly more inauspicious in succession among
the infernal beings.
परस्परोदीरितदुःखाः ॥४॥
नारकी जीव परस्पर एक-दूसरे को दुःख उत्पन्न करते हैं
(- वे कुत्ते की भांति परस्पर लड़ते हैं)।
They cause pain and suffering to one another.
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अध्याय - ३
संक्लिष्टासुरोदीरितदुःखाश्च प्राक्चतुर्थ्याः ॥५॥
और उन नारकियों के चौथी पृथ्वी से पहिले-पहिले (अर्थात्
तीसरी पृथ्वी पर्यन्त) अत्यन्त संक्लिष्ट परिणाम के धारक
अम्ब-अम्बरिष आदि जाति के असुरकुमार देवों के द्वारा दुःख
पाते हैं अर्थात् अम्ब-अम्बरिष असुरकुमार देव तीसरे नरक
तक जाकर नारकी जीवों को दुःख देते हैं तथा उनके पूर्व के
वैर का स्मरण करा-करा के परस्पर लड़ाते हैं और दुःखी
देख राजी होते हैं।
Pain is also caused by the incitement of malevolent
asurkumāras prior to the fourth earth.
तेष्वेकत्रिसप्तदशसप्तदशद्वाविंशतित्रयस्त्रिंशत्सागरोपमा
सत्त्वानां परा स्थितिः ॥६॥
उन नरकों के नारकी जीवों की उत्कृष्ट आयुस्थिति क्रम से
पहिले में एक सागर, दूसरे में तीन सागर, तीसरे में सात
सागर, चौथे में दस सागर, पाँचवें में सत्रह सागर, छठे में
बाईस सागर और सातवें में तेंतीस सागर है।
In these infernal regions the maximum duration of
life of the infernal beings is one, three, seven, ten,
seventeen, twenty-two, and thirty-three
sāgaropamas.
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अध्याय - ३
जम्बूद्वीपलवणोदादयः शुभनामानो द्वीपसमुद्राः ॥७॥
इस मध्यलोक में अच्छे-अच्छे नाम वाले जम्बूद्वीप इत्यादि
द्वीप, और लवणसमुद्र इत्यादि समुद्र हैं।
Jambūdvīpa, Lavaṇoda, and the rest are the
continents and the oceans with auspicious names.
द्विर्द्विविष्कम्भाः पूर्वपूर्वपरिक्षेपिनो वलयाकृतयः ॥८॥
प्रत्येक द्वीप-समुद्र दूने-दूने विस्तार वाले और पहिले-पहिले
के द्वीप-समुद्रों को घेरे हुए चूड़ी के आकार वाले हैं।
(These) are of double the diameter of the preceding
ones and circular in shape, each encircling the
immediately preceding one.
तन्मध्ये मेरुनाभिर्वृत्तो योजनशतसहस्रविष्कम्भो
जम्बूद्वीपः ॥९॥
उन सब द्वीप-समुद्रों के बीच में जम्बूद्वीप है, उसकी नाभि
के समान सुदर्शन मेरु है, तथा जम्बूद्वीप थाली के समान
गोल है और एक लाख योजन उसका विस्तार है।
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अध्याय ३: अधोलोक व मध्यलोक की रचना / भूगोल
अध्याय - ३
In the middle of these oceans and continents is
Jambūdvīpa, which is round and which is one
hundred thousands yojanas in diameter. Mount
Meru is at the centre of this continent like the
navel in the body.
भरतहैमवतहरिविदेहरम्यकहैरण्यवतैरावतवर्षाः
क्षेत्राणि ॥१०॥
इस जम्बूद्वीप में भरत, हैमवत, हरि, विदेह, रम्यक, हैरण्यवत
और ऐरावत - ये सात क्षेत्र हैं।
Bharata, Haimavata, Hari, Videha, Ramyaka,
Hairaṇyavata, and Airāvata are the seven regions.
तद्विभाजिनः पूर्वापरायता हिमवन्महाहिमवन्निषधनील-
रुक्मिशिखरिणो वर्षधरपर्वताः ॥११॥
उन सात क्षेत्रों का विभाग करने वाले पूर्व से पश्चिम तक
लम्बे 1- हिमवत्, 2- महामहिमवत्, 3- निषध, 4- नील,
5- रुक्मि और 6- शिखरिन् - ये छह वर्षधर-कुलाचल
पर्वत हैं। (वर्ष=क्षेत्र)
The mountain chains Himavan, Mahāhimavan,
Niṣadha, Nīla, Rukmi, and Ṣikhari, running east
to west, divide these regions.
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अध्याय - ३
हेमार्जुनतपनीयवैडूर्यरजतहेममयाः ॥१२॥
ऊपर कहे गये पर्वत क्रम से 1- स्वर्ण, 2- चाँदी, 3- तपाया
सोना, 4- वैडूर्य (नील) मणि, 5- चाँदी और 6- स्वर्ण जैसे
रंग के हैं।
They are of golden, white, like purified gold, blue,
silvery, and golden in colour.
मणिविचित्रपार्श्वा उपरि मूले च तुल्यविस्ताराः ॥१३॥
इन पर्वतों का तट चित्र-विचित्र मणियों का है और
ऊपर-नीचे तथा मध्य में एक समान विस्तार वाला है।
The sides (of these mountains) are studded with
various jewels, and the mountains are of equal
width at the foot, in the middle and at the top.
पद्ममहापद्मतिगिञ्छकेशरिमहापुण्डरीकपुण्डरीका
ह्रदास्तेषामुपरि ॥१४॥
इन पर्वतों के ऊपर क्रम से 1- पद्म, 2- महापद्म,
3- तिगिञ्छ, 4- केशरि, 5- महापुण्डरीक और 6- पुण्डरीक
नाम के ह्रद-सरोवर हैं।
41
अध्याय - ३
Padma, Mahāpadma, Tigiñcha, Keṣari,
Mahāpundarīka, and Pundarīka are the lakes on
the tops of these (mountains).
प्रथमो योजनसहस्रायामस्तदर्द्धविष्कम्भो ह्रदः ॥१५॥
पहिला पद्म सरोवर एक हजार योजन लम्बा और लम्बाई से
आधा अर्थात् पाँच सौ योजन चौड़ा है।
The first lake is 1,000 yojanas in length and half of
it in breadth.
दशयोजनावगाहः ॥१६॥
पहिला सरोवर दश योजन अवगाह (गहराई) वाला है।
The depth is ten yojanas.
तन्मध्ये योजनं पुष्करम् ॥१७॥
उसके बीच में एक योजन विस्तार वाला कमल है।
In the middle of this first lake, there is a lotus of
the size of one yojana.
42
अध्याय - ३
तद्द्विगुणद्विगुणा ह्रदाः पुष्कराणि च ॥१८॥
आगे के सरोवर तथा कमल पहिले के सरोवरों तथा कमलों
से क्रम से दूने-दूने विस्तार वाले हैं।
The lakes as well as the lotuses are of double the
magnitude.
तन्निवासिन्यो देव्यः श्रीह्रीधृतिकीर्तिबुद्धिलक्ष्म्यः
पल्योपमस्थितयः ससामानिकपारिषत्काः ॥१९॥
एक पल्योपम आयु वाली और सामानिक तथा पारिषद् जाति
के देवों सहित श्री, ह्री, धृति, कीर्ति, बुद्धि और लक्ष्मी नाम
की देवियाँ क्रम से उन सरोवरों के कमलों पर निवास करती
हैं।
In these lotuses live the nymphs called Śrī, Hrī,
Dhṛti, Kīrti, Buddhi and Lakṣmī, whose lifetime is
one palya and who live with Sāmānikas and
Pāriṣatkas.
गंगासिन्धुरोहिद्रोहितास्याहरिद्धरिकान्तासीतासीतोदा-
नारीनरकान्तासुवर्णरूप्यकूलारक्तारक्तोदाः
सरितस्तन्मध्यगाः ॥२०॥
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अध्याय - ३
( भरत में) गंगा, सिंधु, (हैमवत में) रोहित, रोहितास्या,
(हरिक्षेत्र में) हरित्, हरिकान्ता, (विदेह में) सीता, सीतोदा,
(रम्यक् में) नारी, नरकान्ता, (हैरण्यवत् में) स्वर्णकूला,
रूप्यकूला और (ऐरावत में) रक्ता, रक्तोदा, इस प्रकार ऊपर
कहे हुए सात क्षेत्रों में चौदह नदियाँ बीच में बहती हैं।
द्वयोर्द्वयोः पूर्वाः पूर्वगाः ॥२१॥
(ये चौदह नदियाँ दो के समूह में लेना चाहिये) हर एक दो
के समूह में से पहली नदी पूर्व की ओर बहती है (और उस
दिशा के समुद्र में मिलती है)।
शेषास्त्वपरगाः ॥२२॥
बाकी रही सात नदियाँ पश्चिम की ओर जाती हैं (और उस
तरफ के समुद्र में मिलती हैं)।
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अध्याय - ३
The rest are the western rivers.
चतुर्दशनदीसहस्रपरिवृता गंगासिन्ध्वादयो नद्यः ॥२३॥
गंगा-सिन्धु आदि नदियों के युगल चौदह हजार सहायक
नदियों से घिरे हुए हैं।
The Gangā, the Sindhu, etc. are rivers having
14,000 tributaries.
भरतः षड्विंशतिपञ्चयोजनशतविस्तारः
षट्चैकोनविंशतिभागा योजनस्य ॥२४॥
भरत क्षेत्र का विस्तार, पाँच सौ छब्बीस योजन और एक
योजन के उन्नीस भागों में से 6 भाग अधिक है।
Bharata is 526 6/19 yojanas in width.
तद्द्विगुणद्विगुणविस्तारा वर्षधरवर्षा विदेहान्ताः ॥२५॥
विदेहक्षेत्र तक के पर्वत और क्षेत्र भरतक्षेत्र से दूने-दूने विस्तार
वाले हैं।
The mountains and the regions are double in width
up to Videha.
45
अध्याय - ३
उत्तरा दक्षिणतुल्याः ॥२६॥
विदेह क्षेत्र से उत्तर के तीन पर्वत और तीन क्षेत्र, दक्षिण के
पर्वत और क्षेत्रों के समान विस्तार वाले हैं।
Those in the north are equal to those in the south.
भरतैरावतयोर्वृद्धिह्रासौ
षट्समयाभ्यामुत्सर्पिण्यवसर्पिणीभ्याम् ॥२७॥
छह कालों से युक्त उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी के द्वारा भरत
और ऐरावत क्षेत्र में जीवों के अनुभवादि की वृद्धि-हानि होती
रहती है।
In Bharata and Airāvata there is rise and fall
(regeneration and degeneration) during the six
periods of the two aeons of regeneration and
degeneration.
ताभ्यामपरा भूमयोऽवस्थिताः ॥२८॥
भरत और ऐरावत क्षेत्र को छोड़कर दूसरे क्षेत्रों में एक ही
अवस्था रहती है - उनमें काल का परिवर्तन नहीं होता।
The regions other than these are stable.
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अध्याय - ३
एकद्वित्रिपल्योपमस्थितयो
हैमवतकहारिवर्षकदैवकुरवकाः ॥२९॥
हैमवतक, हारिवर्षक और देवकुरु (विदेहक्षेत्र के अन्तर्गत एक
विशेष स्थान) के मनुष्य, तिर्यंच क्रम से एक पल्य, दो पल्य
और तीन पल्य की आयु वाले होते हैं।
The human beings in Haimvata, Hari and
Devakuru are of one, two and three palyas
respectively.
——————
तथोत्तराः ॥३०॥
उत्तर के क्षेत्रों में रहने वाले मनुष्य भी हैमवतकादिक के
मनुष्यों के समान आयु वाले होते हैं।
The condition is the same in the north.
——————
विदेहेषु सङ्ख्येयकालाः ॥३१॥
विदेह क्षेत्रों में मनुष्य और तिर्यंचों की आयु संख्यात वर्ष की
होती है।
In Videhas the lifetime is numerable years.
——————
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अध्याय - ३
भरतस्य विष्कम्भो जम्बूद्वीपस्य नवतिशतभागः ॥३२॥
भरत क्षेत्र का विस्तार जम्बूद्वीप के एक सौ नव्वेवाँ (190)
भाग के बराबर है।
The width of Bharata is one hundred and ninetieth
(1/190) part of that of Jambūdvīpa.
द्विर्धातकीखण्डे ॥३३॥
धातकीखण्ड नाम के दूसरे द्वीप में क्षेत्र, कुलाचल, मेरु, नदी
इत्यादि सब पदार्थों की रचना जम्बूद्वीप से दूनी-दूनी है।
In Dhātakīkhaṇḍa it is double.
पुष्करार्द्धे च ॥३४॥
पुष्करार्द्ध द्वीप में भी सब रचना जम्बूद्वीप की रचना से
दूनी-दूनी है।
In the (nearest) half of Puṣkaradvīpa also.
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