तत्त्वार्थ सूत्र (मोक्षशास्त्र - संस्कृत सूत्र एवं हिन्दी व्याख्या)
Tattvartha Sutra / Mokshashastra with Hindi Commentary
आचार्य उमास्वामी (उमास्वाति) / आचार्य पूज्यपाद द्वारा
पृष्ठ 46, कुल 177 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय - २
लब्धिप्रत्ययं च ॥४७॥
वैक्रियिक शरीर [ लब्धिप्रत्ययं च ] लब्धि-नैमित्तिक भी होता
है।
Attainment is also the cause (of its origin).
तैजसमपि ॥४८॥
[ तैजसम् ] तैजस शरीर [ अपि ] भी लब्धि-नैमित्तिक है।
The luminous body also (is caused by attainment).
शुभं विशुद्धमव्याघाति चाहारकं प्रमत्तसंयतस्यैव ॥४९॥
[ आहारकं ] आहारक शरीर [ शुभम् ] शुभ है अर्थात् वह
शुभ कार्य करता है [ विशुद्धम् ] विशुद्ध है अर्थात् वह
विशुद्धकर्म (मंद कषाय से बंधने वाले कर्म) का कार्य है।
[ च अव्याघाति ] और व्याघात-बाधारहित है तथा
[ प्रमत्तसंयतस्यैव ] प्रमत्तसंयत (छठवें गुणस्थानवर्ती) मुनि के
ही वह शरीर होता है।
The projectable body, which is auspicious and pure
and without impediment, originates in the saint of
the sixth stage only.
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