तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)
Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा
९८ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ९
भिन्नता आती है, करणरूपी शक्तियों के भेद से कर्ताओं में भेद आते
हैं। यह भी ज्ञातव्य है कि जो शक्ति कर्ता से अभिन्न है वैसी शक्ति को
ही करण रूप में ग्रहण किया जा सकता है—दूसरे को नहीं, अन्यथा
अनवस्था का प्रसंग आता है। वस्तुतः एक ही प्रमाता है जो चित्
स्वातन्त्र्य और आनन्द में विश्रान्त है। जब पृथिवी केवल स्वरूप में ही
विश्रान्त रह कर वेद्य बनती है उस समय उसका स्वरूप ही केवल प्रतीति-
गोचर होता है।
चैत्र के आँखों द्वारा देखी हुई चैत्र के द्वारा विदित वस्तु को मैं
जानता हूँ इस प्रकार अनुभव में सब प्रकार शक्ति के द्वारा सब
प्रकार शक्तिमान के द्वारा विशेषित अन्य स्वरूप अवश्य ही भासते
हैं—इस प्रकार शिव तक तत्त्वों के सम्बन्ध में ऐसा कहना उचित
होगा, क्योंकि शिव और शक्ति में निष्ठित शिवस्वभाव में विश्रान्त
विश्व को मैं जानता हूँ इस प्रकार विलक्षण अनुभव भी होता है। अब
प्रश्न उठता है—अगर भावों की वेद्यता निजी स्वरूप है तो वह सबके
लिए वेद्य क्यों न बन जाता है, और वेद्यता भी फिर वेद्य हो जाती है
इस प्रकार अनवस्था आ जाती है और ऐसे होने पर जगत का अन्धत्व
स्पष्ट ही प्रतीत होने लगेगा। केवल इतना ही नहीं वेद्यत्व अवेद्यत्व रूप
विरुद्ध धर्म का योगरूपी महान् दोष भी आ जायेगा। इस आपत्ति के
उत्तर में मैं कहता हूँ कि वेद्यता भावों का निजी स्वरूप नहीं अपितु स्वरूप
उससे भिन्न है ऐसा वर्णित किया गया है। तब वह क्या है ? प्रमातारूपी
शक्ति में और प्रमाता में जो विश्राम प्राप्त हो सकता है वही उसका
स्वरूप है, वह वास्तविकतया स्वप्रकाशरूप है जो प्रकाशित होता है,
इस लिए वह किसी के प्रति प्रकाशमान नहीं होता है--अतः अनवस्था-
रूप दोष और विरुद्ध धर्म योग की आपत्ति दूर हो गयी है। अनन्त
प्रकार के प्रमाताओं के द्वारा संवेद्यमान होते हुए भी वह ( वेद्यता ) एक
ही है, उसका रूप ( शक्ति-शक्तिमद् रूप ) उतना ( एक ) ही है, क्योंकि
उन सभी का आभास एक ही है, अतः भिन्न भिन्न प्रमाताओं के संवेदनों
में किसी प्रकार बाधा उत्पन्न नहीं होती है। उसका जो रूप है वह
कल्पित नहीं अपितु सत्य है, क्योंकि अर्थक्रियाकारिता का निर्वाह भी उसी
प्रकार है। दूसरे के द्वारा देखी गयी अपनी प्रियतमा पर भर्ता की ईर्ष्या
उत्पन्न होती है, फिर शिव स्वभाव विश्राम भूमिरूपी कुम्भ को देख कर
समावेश उत्पन्न होता है, सब प्रकार और अनन्तप्रमाताओं के विश्रामभूमि-
आ. ९ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ ९९
रूपी वस्तु को देख कर परिपूर्णता आती है जैसे नृत्य करने वाली के नृत्य
को देखने के समान उसी नील का जो स्वरूप प्रमाता में विश्रान्त रहता
है उसके उसी रूप में स्वप्रकाश विमर्श का उदय होता है—अतः पृथिवी
से प्रधान तक तत्त्वों की पंचदशात्मकता सिद्ध होता है। जिन प्रमाताओं
में राग आदि कंचुकों की जागरुकता आ जाती है उन सकल अर्थात् कला
से युक्त प्रमाता में वेद्यधर्मता आने के कारण उनमें भी पंचदशता रहती
है। इस विषय का विस्तृत विवरण तंत्रालोक में वर्णित किया गया है।
पुरुष से लेकर कलातत्त्व तक तत्त्वों का स्वरूप तेरह हैं—सकल आत्मा
की प्रमातृता रहने के कारण उसमें शक्ति और शक्तिमान् इन दो रूप
प्रत्यस्तमित हो जाते हैं, उस सकल आत्मा में केवल स्वरूप ही स्थित
रहता है। प्रलयाकल आत्मा का स्वरूप को लेकर और पाँचों को प्रमाता
के रूप में ग्रहण करने पर शक्ति शक्तिमान के भेद ग्यारह होते हैं। उसी
प्रकार विज्ञानाकल के स्वरूप को लेकर और बाकी चारों को प्रमाता के
रूप में ग्रहण करने पर नौ भेद हैं। मन्त्र के स्वरूप को लेकर तीनों को
प्रमाता के रूप में ग्रहण करने पर सात भेद हैं। मन्त्रेश्वर के स्वरूप को
लेकर और दो को प्रमाता के रूप में ग्रहण करने पर पाँच भेद हैं। मन्त्र-
महेश्वर के स्वरूप को लेकर एकमात्र परमेश्वर को प्रमाता के रूप में
ग्रहण करने पर शक्ति तथा शक्तिमान के भेद से तीन भेद हैं। शिव जो
एकमात्र प्रकाश तथा चैतन्यमय और स्वातन्त्र्य-निर्भर हैं उसमें कोई भेद
नहीं है क्योंकि वे परिपूर्ण-स्वभाव हैं।
इस प्रकार तत्त्वों के जो भेद 'परमेश्वरानुत्तरनयैक' नामक ग्रंथ में
निरूपण किये गये हैं वही भुवनों के भेद-हेतु नाना विचित्रता के कारण
बनते हैं; क्योंकि नरक, स्वर्ग और रुद्र के भुवनों की पार्थिवता समान
होने पर भी दूर में स्थित स्वभाव के जो भेद हैं वही उसका कारण
बतलाया गया है।
इस विषय में परस्पर भेदों की गणना होने पर कितने अवान्तर भेद
होते हैं कौतहूली पाठक इसे जानने के लिए तन्त्रालोक से जान लें। अतः
एक-एक घंटे के अनुसरण के द्वारा भी पृथ्बी आदि तत्त्वों के भेद का
निरूपण हुआ है।
अब समग्र पृथ्वी तत्त्व जो प्रमाता और प्रमेय रूप है उसके सम्बन्ध
में निर्देश किया जा रहा है। जो प्रकाश धरातत्त्व के साथ अभिन्न रूप
१०० ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ९
में प्रकाशित होता है वह शिव है—जैसे श्रुति में कहा गया है—'यह जो
पृथिवी है वही ब्रह्म है।' जो धरातत्त्व में सिद्धि प्राप्तों को प्रेरित करते हैं
वे धरामन्त्रमहेश्वर हैं, जो प्रेरित होते हैं वे धरामन्त्रेश्वर हैं, उस धरातत्त्व
में अभिमानवश जो विग्रह धारण किये हैं उनका वाचक मन्त्र हैं। सांख्य
आदि पशु शास्त्रों में निरूपित विद्या से उत्तीर्ण और शिवशास्त्रोक्त विद्या
के द्वारा पार्थिव योग में जो अभ्यस्त हुए हैं अथच ध्रुवपद को प्राप्त नहीं
हुए हैं वे धराविज्ञानाकल कहलाते हैं। पशुशास्त्र में कथित विद्या की
प्रक्रिया से जो व्यक्ति पार्थिव योग में अभ्यस्त हुआ है वह कल्प के अन्त
में या मृत्यु के अनन्तर धराप्रलयाकेवल स्थिति को प्राप्त करता है।
सुषुप्त अवस्था में विचित्र स्वप्नों का उदय होगा, जिसमें धरासम्बन्धी
अभिमान वर्तमान है वह धरा-सकलरूपी आत्मा है। इसमें भी शक्ति के
उद्रेक और न्यग्भाव के कारण चतुर्दशता है, इस प्रकार प्रमातारूप धारण
करनेवाले धरातत्त्व के भेद हैं, इसका स्वरूप शुद्ध प्रमेय है। इस प्रकार
अन्यस्थल में भी जानना चाहिए।
अब एक प्रमाता के प्राण में उसकी स्थिति के अनुसार जो भेद उत्पन्न
होते हैं उसका निरूपण हो रहा है।
नील के ग्रहण करते समय प्राण सोलह त्रुटियों का स्वरूप धारण कर
वेद्य वस्तु तक उदित होता है। इन सोलहों में पहली त्रुटि केवल अविभाग
रूपी है, दूसरी त्रुटि ग्राहकरूपता को उल्लसित ( जगाता ) करता है,
सबसे अन्तिम त्रुटि ग्राह्य वस्तु से अभिन्न है और ग्राह्य वस्तु का स्वरूप
धारण करता है, अन्तिम त्रुटि के संलग्न ( उपान्त्य ) त्रुटि स्फुट
ग्राहक रूपी है। इन चारों से भिन्न मध्य में स्थित जो बारह त्रुटियाँ हैं
उनमें से पहले की छः त्रुटियाँ निर्विकल्प-स्वभाव हैं ओर वे विकल्पों के
आच्छादक हैं। इन षट्कों में सबसे पहली स्वरूपतः एक त्रुटि है।
विकल्पों को आवृत्त करनेवाली त्रुटियाँ पाँच हैं जैसे उन्मेष करने की
इच्छा, उन्मिषत्ता—ये दो स्फुट क्रियारूपी होने के कारण दो त्रुटिवाली
हैं, क्योंकि स्पन्दन ( क्रिया ) एकक्षण स्थायी नहीं होती है, उन्मिषितता,
अपने कार्यों का कर्तृत्व इस प्रकार आवृत्त किये जानेवाले विकल्पों की
संख्या पाँच होने के कारण और निजी स्वरूप इन सबको लेकर निर्वि-
कल्पक स्थिति छः क्षण स्थायी है। इसके उपरान्त विकल्प की ध्वंस-
मान्ता, विकल्प का नाश, उन्मेष की उन्मुखता और उन्मिषत्ता जो दो
आ. ९ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १०१
त्रुटिवाली है, उन्मिषितता ये छः त्रुटियाँ हैं। परन्तु स्वकार्यकर्तृता जो
ग्राहक रूप है अतः इसकी गिनती नहीं होती है। इसलिए विचारशील
विद्वान जो गुरु के उपदेश के अनुसार चलते हैं सब जगह (अर्थात् धरा
से प्रकृति तत्त्व तक सभी जगह) इस प्रकार पञ्चदशात्मकता का विवेचन
करते हैं। विकल्पों की न्यूनता आने पर त्रुटियों की न्यूनता आती है जैसे
सुख के अनुभव के समय दुःख के विस्मरण के समान विकल्प का भी
विश्राम अविकल्प स्थिति तक हो जाता है। विकल्प की विश्रान्ति के
द्वारा लोग उस अहन्तामयी स्थिति जो अहन्ता द्वारा आवृत इदं-भाव-रूप
विकल्प की प्रसरभूमि निर्विकल्प स्थिति रूपी विमर्श भूमि है जो अभी
अप्रकाशित है ऐसे मानते हैं। दुःखरूपी स्थिति को सुख में विश्रान्त होने
के समान विकल्प के ह्रास के द्वारा उसका प्रकाशन होता है, इसलिए
ग्राह्य और ग्राहकों में जो सम्बन्ध है उसकी ओर अवधानता आवश्यक
है—ऐसा ही श्रीअभिनवगुप्त के गुरुओं का अभिमत है।
पञ्चदशात्मकता की स्थिति इस प्रकार होनेपर स्फुट इदन्तात्मक भेद
की न्यूनता दो-दो के क्रम से जैसे-जैसे होती रहती है और अन्त में दो
त्रुटिवाले शिवावेश सम्पन्न होता है। उन दो त्रुटियों में पहली त्रुटि सब
प्रकार से परिपूर्ण है और दूसरी त्रुटि सब प्रकार ज्ञान और करणों से
परिपूर्ण है इस प्रकार अभ्यास से वह सर्वज्ञत्व और सर्वकर्तृत्व के प्रदान
करनेवाली बन जाती है—लेकिन आद्य त्रुटि ऐसी नहीं है। श्रीकल्लट
आचार्य ने इसलिए कहा है—‘त्रुटिपात इति’। यहाँ पात शब्द से वही
भगवती श्रीमत्काली, मातृसद्भाव, भैरव, प्रतिभा को समझना चाहिए।
अब इस रहस्य को खोलना उचित नहीं लगता है।
इस प्रकार मन्त्रमहेश्वर सम्बन्धी त्रुटि से आरम्भ कर अन्य-अन्य
त्रुटियों के अभ्यास से भिन्न-भिन्न प्रकार की सिद्धियाँ आती हैं। इसके
उपरान्त इसीमें जाग्रत् आदि स्थितियों का निरूपण हो रहा है। उसमें वेद्य
के और उसके सम्बन्धी संवित् की जो विचित्रता है उसके परस्पर की अपेक्षा
से जिन अवस्थाएँ हैं वही जाग्रत् आदि हैं। यह न केवल वेद्य और संवित्
की अवस्था नहीं, न तो यह एक दूसरे से पृथक् भी नहीं। जब अधिष्ठेय
(आधार) के रूप में बाह्य वस्तु के रूप में इसकी प्रतीति होती है तब
जाग्रत स्थिति मेय, माता और मान (प्रमाण) के रूप में प्रकट होती
है। जब उसी स्थिति में अधिष्ठान (प्रमाण) के रूप में उसका भान
१०२ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ९
अर्थात् संकल्प का उदय होता है तब उसे स्वप्नावस्था कहते हैं। जब
उसी स्थिति में प्रमाता के साथ एकात्मता अर्थात् भावी कार्यों के बीज
के रूप में भान होता है तब वही सुषुप्तावस्था है। यही तीन प्रमेय, प्रमाण
और प्रमाता रूप अवस्थाएँ जाग्रदादि के भेद से चार प्रकार स्थितियों से
प्राप्त करती हैं—ऐसा कहा गया है।
जब प्रमाता के स्वरूप में विश्रान्त प्रमाता की पूर्णता के प्रति जो
आभिमुख्य है उस उन्मुखता के द्वारा पूर्णता-उन्मुखीन जो भान है तब
वही तुर्यावस्था है। इसका रूप 'मैं इस रूप को दृष्टि के द्वारा इस प्रकार
प्रमेय, प्रमाण और प्रमाता आदि तीन रूपों को अतिक्रमण कर देखता
हूँ' इस प्रकार उपायहीन (अनुपायिक) प्रमातृता के रूप में भासित होता
है जिसका सार ही स्वतन्त्रता है जो नैकट्य, मध्यत्व और दूरत्व के द्वारा
अवस्थाओं में प्रमाणता और प्रमेयता रूप धर्म का आधान करती है और
तीन अवस्थाओं का अनुग्राहक बन जाती है और तीन प्रकार बन जाती
है। ये चार अवस्थाएँ योगिगण पिण्डस्थ, पदस्थ, रूपस्थ, रूपातीत शब्दों
के द्वारा वर्णन करते हैं। ज्ञानी पुरुषगण इन्हें सर्वतोभद्र, व्याप्ति, महा-
व्याप्ति, प्रचय आदि शब्दों से वर्णना करते हैं। इन शब्दों की सार्थकता
का उल्लेख तन्त्रालोक और मालिनीविजयवार्तिक में हुआ है। सबमें
अनुस्यूत जो पूर्णरूप है और जो तुर्यातीत और सबके अतीत स्वरूप है
उसे ही महाप्रचय के रूप में ज्ञानियों के द्वारा निरूपण हुआ हैं। अपितु
जिसका स्वरूप जब स्फुट, स्थिर, अनुबन्धी (एक दूसरे से सम्बन्धित)
रहता है वह जाग्रत् है। उसका विपरीत जो स्वरूप है वह स्वप्न है।
प्रलयाकल का जो भोग है और जो वस्तु के बोध का अभाव रूप है वह
सुषुप्त है। विज्ञानाकल आत्मा का जो भोग है तथा भोग्य वस्तु के साथ
अभिन्नता का आपादन करता है वही तुर्य है और वही मन्त्र आदि
अधिकारी पुरुषों का भोग है। सभी भावों की शिव के साथ जो अभिन्नता
है वह तुर्यातीत है जो सबकी अतीत स्थिति है। उसमें स्वरूपसकल
१. प्रलयाकल, २. विज्ञानाकल, ३. मन्त्र मन्त्रेश्वर मन्त्रमहेश्वर, ४ शिव
इनके पन्द्रह भेदों में पाँच अवस्थाएँ हैं। स्वरूप, प्रलयाकल आदि के क्रम
से तेरह भेद हैं। स्वरूप, विज्ञानाकल की शक्ति, विज्ञानाकल आदि के
क्रम से ग्यारह भेद हैं। स्वरूप, मन्त्र, मन्त्रेश्वर, मन्त्रमहेश्वर, शिव आदि
के क्रम से नौ भेद हैं। स्वरूप, मन्त्रेश्वर, मन्त्रमहेश्वर, शक्ति और शिव
आ. ९ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १०३
आदि के क्रम से सात भेद हैं । स्वरूप, महेशशक्ति, महेश, शक्ति और शिव
ये पाँच भेद हैं । स्वरूप, क्रियाशक्ति, ज्ञानशक्ति, इच्छाशक्ति और शिव
तीन भेदों में हैं। शिवतत्त्व में भिन्नता का अभाव है इसलिए उसमें क्रिया,
ज्ञान, इच्छा, आनन्द और चित् की कल्पना से ज्ञानी तथा योगीगण
पञ्चरूपता का अङ्गीकार करते हैं ।
पृथ्वी आदि तत्त्वों के समूहों में प्रमाता का वास्तविक स्वरूप संवित्
में विश्रान्त न रहकर विचित्र तथा विविध रूपों में भासित होता है
लेकिन उनका जो प्रमातृरूप निखिल वेद्यसमूहों में विविध क्रमरूपी है
वह निर्विकल्प अहन्तात्मक है उसका सार स्वातन्त्र्य परामर्शमय है।
आप इस भूमि में स्थित हों और अपना आत्मस्वरूप प्राप्त करें ।
इति श्री अभिनवगुप्त रचित तन्त्रसार का
नवम आह्निक ।
अथ दशममाह्निकम्
उक्तस्तावत् तत्त्वाध्वा । कलाद्यध्वा तु निरूप्यते, तत्र यथा भुवनेषु
अनुगामि किञ्चिद्रूपं तत्त्वम् इत्युक्तम्, तथा तत्त्वेषु वर्गशो यत् अनुगामि
रूपं तत् कला—एकरूपकलनासहिष्णुत्वात् । तद्यथा पृथिव्यां निवृत्तिः—
निवर्तते यतस्तत्त्वसर्ग इति । जलादिप्रधानान्ते वर्गे प्रतिष्ठा—कारणतया-
प्यायनपूरणकारित्वात् । पुमादिमायान्ते विद्या—वेद्यतिरोभावे संविदा-
धिक्यात् । शुद्धविद्यादिशक्त्यन्ते शान्ता कञ्चुकतरङ्गोपशमात् । एतदेव
अण्डचतुष्टयं—पार्थिव-प्राकृत-मायीय-शाक्ताभिधम् । पृथिव्यादिशक्तीनाम्
अत्र अवस्थानेन शक्तितत्त्वे यावत् परस्पर्शो विद्यते स्पर्शस्य च सप्रति-
घत्वमिति तावति युक्तम् अण्डत्वम् । शिवतत्त्वे शान्तातीता—तस्यो-
पदेशभावणार्चादौ कल्पमानत्वात् । स्वतन्त्रं तु परं तत्त्वं, तत्रापि यत्
अप्रमेयं तत्कलातीतम् । एवं पञ्चैव कलाः षट्त्रिंशत्तत्त्वानि । तथाहि—
प्रमेयत्वं द्विधा—स्थूलसूक्ष्मत्वेन इति दश । करणत्वं द्विधा—शुद्धं
कर्तृतास्पर्शि च इति दश । करणतोपसर्जनकर्तृभावस्फुटत्वात् पञ्च,
शुद्धकर्तृभावात् पञ्च, विगलितविभागतया विकासोन्मुखत्वे पञ्च, सर्वा-
वच्छेदशून्यं शिवतत्त्वं षट्त्रिंशम् । तद्यदा उपदिश्यते भाव्यते वा यत्
तत्प्रतिष्ठापदम्, तत् सप्तत्रिंशम्, तस्मिन्नपि भाव्यमाने अष्टात्रिंशम्, न
च अनवस्था—तस्य भाव्यमानस्य अनवच्छिन्नस्वातन्त्र्ययोगिनो वेद्यीकरणे
सप्तत्रिंश एव पर्यवसानात्, षट्त्रिंशं तु सर्वतत्त्वोत्तीर्णतया सम्भाव्याव-
च्छेदम् इति पञ्चकलाविधिः । विज्ञानाकलपर्यन्तम् आत्मकला, ईशान्तं
विद्याकला, शिष्टं शिवकला इति त्रितत्त्वविधिः । एवं नवतत्त्वाद्यपि
ऊह्येत इति । मेयांशगामी स्थूलसूक्ष्मपररूपत्वात् त्रिविधो भुवनतत्त्व-
कलात्माध्वभेदः, मातृविश्रान्त्या तथैव त्रिविधः, तत्र प्रमाणतायां
पदाध्वा, प्रमाणस्यैव क्षोभतरङ्गशाम्यत्तायां मन्त्राध्वा, तत्प्रशमे पूर्ण-
प्रमातृतायां वर्णाध्वा, स एव च असौ तावति विश्रान्त्या लब्धस्वरूपो
भवति इति एकस्यैव षड्विधत्वं युक्तम् ।
पदमन्त्रवर्णमेकं पुरषोडशकं धरेति च निवृत्तिः ।
तत्त्वार्णमग्निनयनं रसशरपुरमस्त्रमन्त्रपदमन्त्या ॥१॥
आ. १० ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १०५
मुनितत्त्वार्णं द्विकपदमन्त्रं वस्वक्षिभुवनमपरकला ।
अग्न्यर्णतत्त्वमेककपदमन्त्रं सैन्यभुवनमिति तुर्या ॥२॥
षोडश वर्णाः पदमन्त्रतत्त्वमेकं च शान्त्यतीतेयम् ।
अभिनवगुप्तेनार्यत्रियमुक्तं संग्रहाय शिष्येभ्यः ॥३॥
भुवनजालसअलउ परिसरसहअवसीसइतत्ताहंसकूउ ।
तत्तभाउकलणा इविमरिसहसीसइपञ्चकलाहंसरूउ ॥
पञ्चकलामउएहु महेसरकुण्डइविउज्जइ । -
इच्छइसुहमउ भरिहिविबोधतरङ्गमहासह ॥
सोच्चिअभासइ भवतहविसरउ ।
सअलउअद्धजालु निअधअणिपरिमरिमेहहरो ॥
चेअणुभरिअभरिउ अप्पहमणिसच्चिअपाणिमणु ।
माणसपाणधण धीसामसुपूरितजज्जिबणु ॥
तंजिघडाइ निलहु परभइरवगाहहुहोइतणु ।
मत्तिदाणुआवाहणु प्रअणुसणिणहाणुइउ अहिणउउडु ॥
सब्बिबहअद्धकलण निव्वॉहाराएतिलडेचिअएहइतत्त्व ।
इति श्रीमदभिनवगुप्ताचार्यविरचिते तन्त्रसारे कलाद्यध्वप्रकाशनं
नाम दशममाह्निकम् ॥१०॥
अथ दशम आह्निक
तत्त्वरूपी अध्वा का विवरण प्रस्तुत किया गया है, अब कला आदि
अध्वाओं¹ का निरूपण किया जा रहा है। इस विषय में जैसे भुवनों में
अनुगामी जो कुछ रूप है वही तत्त्व है, उसी प्रकार सभी तत्त्वों के एक
एक वर्ग में² जो रूप अनुगामी है वही कला है—क्योंकि कला ही एक
विशेष प्रकार रूप की कलना करने में समर्थ है। जैसे पृथ्वी में निवृत्ति
कला वर्तमान है; क्योंकि तत्त्वों का सृष्टिप्रवाह उसी से समाप्त (निवृत्त)
होता है। जल से प्रकृति तक जो वर्ग है³ उसमें प्रतिष्ठा कला व्यापृत है,
क्योंकि उसी के द्वारा उक्त वर्ग का आप्यायन (नवीन निर्माण या पुष्टि)
और पूर्णता सम्पन्न होता है। पुरुष से माया तक वर्ग में विद्या कला काम
में आती है, क्योंकि उस वर्ग में वेद्योँ का तिरोभाव और संवित् (चैतन्य)
की अधिकता आती है। शुद्धविद्या से शक्तितत्त्व तक वर्ग में शान्ता नाम
की कला व्यापृत हैं, क्योंकि वहाँ कंचुक की लहरें उपशमित (शान्त)
होती है।
१. कलाध्वा कला, तत्त्व और भुवनरूप है। कला सूक्ष्मतम है जो तत्त्वों की
रचना में सहायक है। कला की तरह भुवनों के निर्माण में तत्त्व आवश्यक
है। उदाहरण के रूप में पृथ्वी तत्त्व के द्वारा कुछ भुवनों की रचना हुई है,
कुछ जल तत्त्व से, कुछ तेजस्तत्त्व से, इस प्रकार सभी तत्त्वों के साथ
भुवनों का सम्बन्ध है।
२. पृथ्वी शब्द से केवल धरित्री को ही समझना नहीं चाहिए। स्थूल ग्रह
नक्षत्र आदि भी पृथ्वी तत्त्व के अन्तर्गत है। इस प्रकार जो परिभाषिक
पृथ्वी है जिसके धृति और कठिनता आदि धर्म हैं निवृत्ति कला के द्वारा
उसकी रचना हुई है। छत्तीस तत्त्वों का पाँच कलाओं के द्वारा जो वर्गी-
करण हुआ है वह परमेश्वर का स्वातन्त्र्यकल्पित है।
३. भुवनों के परस्पर विभाजन के कारण और एक दूसरे से अलग होने के
कारण शक्तितत्त्व तक अण्डभाव माना जाता है। अण्ड आवरण रूपी है
इसलिए प्रत्येक अण्ड पृथक् है। शिवतत्त्व विश्वोत्तीर्ण स्वरूप है, यद्यपि
शिवतत्त्व के अन्तर्गत भुवन भी हैं तो भी वे शून्यरूप होने के कारण वे
एक दूसरे से पृथक् नहीं हैं।
आ. १० ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १०७
यही चार ( वर्ग ) पार्थिव, प्राकृत, मायीय और शाक्त नाम के अण्ड
हैं । पृथिवी आदि शक्तियों की अवस्थिति सूक्ष्म रूप से शक्तितत्त्व तक
होती है और परम-स्वरूप का स्पर्श वर्तमान रहता है । स्पर्श स्वभाव से
सप्रतिघ ( बाधा उत्पन्न करनेवाला ) हैं, इसलिए शक्तितत्त्व तक अण्ड
भाव १ है ।
शिवतत्त्व में शान्त्यतीत कला है—शिवसम्बन्धी उपदेश, भावना और
अर्चना आदि कार्यों के लिए इसकी कल्पना होती है । परमतत्त्व स्वतंत्र
है उसमें भी जो अप्रमेय स्वरूप है वही कलातीत है । इस प्रकार पाँच
ही कलाएँ हैं और तत्त्वों की संख्या छत्तीस हैं । अब प्रमेयता दो प्रकार
हैं—एक स्थूल और दूसरा सूक्ष्म है, अतः प्रमेय दस हैं ।२ करणता भी
दो प्रकार है—एक उसका शुद्धरूप है और दूसरा कर्तृभाव को स्पर्श
१. अध्वाओं के दो भेदों में पहला भाग मेयगत है और दूसरा प्रमाणगत है ।
प्रमेयगत भाग भुवन, तत्त्व और कलारूप है और प्रमाणगत भाग पद,
मन्त्र और वर्णरूप है । इनमें पद स्थूल है, मन्त्र उससे सूक्ष्म और वर्ण
सूक्ष्मतम है । पद स्थूल होने पर भी वह प्रमाता का ही प्रक्षुब्ध रूप है
जो बहिर्मुख है । प्रमाता ही क्षुब्ध होकर प्रमाण रूप धारण करने पर वह
पद बनता है । जिसके द्वारा अर्थ का बोध होता है उसे पद कहते हैं ।
पद प्रमाणरूपी होने पर भी उसमें प्रकाशरूपी प्रमाता का निकट सम्बन्ध
बना रहता है, क्योंकि प्रकाश के अन्तःप्रवेश के बिना कोई भी ज्ञेय वस्तु
प्रकाश्य बन नहीं सकता । जब वही पद प्रमाणात्मकता छोड़कर अन्तर्मुख
हो जाता है और उसका स्वरूप अक्षुब्ध रूप प्राप्त करता है तब वह
प्रमाता का रूप धारण करता है । उस समय उसे मन्त्र कहते हैं । उस
समय मन्त्र अन्तःपरामर्शात्मक है । मन्त्र और पद दोनों ही स्वभाव से
विमर्शात्मक हैं, पद प्रमाणरूप है, वह क्षुब्धरूप है लेकिन मंत्र, प्रमाता
का अक्षुब्धरूप है । इन दोनों के स्वभाव से कुछ अंश में भिन्न पूर्णतारूपी
जो प्रमिति है वही वर्ण है, उस प्रमिति में सब प्रकार क्षोभों का उपशम
हो जाता है । प्रमिति स्वरूपतः प्रमाता, प्रमाणों का अभिन्नरूप है ।
२. भुवनों की संख्या एक सौ अठारह हैं, तत्त्वों की संख्या छत्तीस, कलाएँ
पाँच हैं, पद दस हैं, मंत्र भी दस और वर्ण पचास हैं । अध्वाएँ छः हैं ।
१०८ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. १०
करनेवाली है।१ अतः उसकी संख्या भी दस हैं। करणभाव जहाँ गौण
होकर कर्तृभाव मुख्य होता है वहाँ भी उसकी संख्या पाँच है। शुद्ध
कर्तृभाव आ जाने से उसकी संख्या पाँच हैं। जहाँ सब प्रकार भेदों का
विगलन हो चुका है और शुद्ध स्वरूप विकासोन्मुख हो जाता है तो उसकी
संख्या है पाँच। सब प्रकार अवच्छेद जहाँ नहीं रहता है वही शिवतत्त्व है
जो छत्तीसवाँ तत्त्व है। जब उसके सम्बन्ध में उपदेश किया जाता है,
उसकी भावना की जाती है और जो सब का आधारभूत है, तब वही
सैतीसवाँ२ तत्त्व है। अगर उसके सम्बन्ध में भी भावना की जाती है तो
वही अड़तीसवाँ तत्त्व बनता है। इससे अनवस्था का दोष नहीं आता
है। जिसके सम्बन्ध में यह भावना होती है वह स्वरूपतः अनवच्छिन्न
तथा स्वतंत्रस्वभाव हैं, जब उसे भी वेद्यरूप में ग्रहण किया जाता है तब
वही सैतीसवाँमें ही अन्ततोगत्या पर्यवसित होता है। छत्तीसवाँ तत्त्व को
१. सभी अध्वाएँ शक्ति का ही स्पन्दनरूप हैं लेकिन वे पूर्णप्रकाश से
अभिन्न हैं और उन्हीं की इच्छा से उनसे अभिन्न होते हुए भी बाहर भिन्न
रूप में अवभासित होती हैं। मन्त्र आदि अध्वाएँ प्रमातृभागगत हैं ऐसा
पहले कहा गया है, इसलिए प्रमाता का स्वतन्त्रभाव उनमें वर्तमान है,
इसलिए जब सभी वाच्य वस्तुएँ चिद्विमर्श के द्वारा आत्मस्वरूप में विगलित
की जाती हैं तब स्वतंत्रतारूपी ज्ञान और क्रियात्मक मननरूपी परामर्श
का उदय होता हैं, और इसके फलस्वरूप सभी इदन्ताओं का अहन्ता में
विश्राम आ जाता है। यही संक्षेप में मन्त्रों की मननधर्मता और
त्राणधर्मता है।
२. संविद् की स्फुरणधारा दो प्रकार हैं एक उसकी क्षुब्धधारा और
दूसरी अक्षुब्ध धारा है। प्रमाता में विश्रान्त वर्णों को संक्षुब्ध कर उनसे
पदों की निष्पत्ति होती है और पदों से अर्थों के अधिगम होने पर क्षोभ
का उपशमन होता है। पद संजल्पनात्मक है, जो भोगरूप विषयों का रूप
धारण करना, विभिन्न प्रकार की प्रतीतियों की उत्पत्ति के द्वारा सीमित
प्रमाताओं के हृदय में सुख या दुःख का अनुभव करवाना ही वर्णों का
कार्य है।
प्रमाण के रूप में वर्तमान रहकर प्रमेयों का रूप धारण करना ही
कलाध्वा है। शुद्ध प्रमेय रूपी अध्वाएँ दो हैं, एक तत्त्वरूप है और दूसरा
भुवन है।
आ. १० ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १०९
सब तत्त्व से उत्तीर्ण तथा काल्पनिक अवच्छिन्नता ( भावना के द्वारा )
होने पर पंचकलाविधि सम्पन्न होती है ( पृथ्वी से ) विज्ञानाकल तक
आत्मकला व्याप्त है, ईश्वर तक विद्याकला और शेष शिवकला द्वारा व्याप्त
है—यही त्रितत्त्व विधि है।१ इसी क्रम से नवतत्त्व२ विधि के सम्बन्ध
में कल्पना करनी चाहिए।
प्रमेयवर्ग में अनुगामी स्थूल, सूक्ष्म और परस्वरूप भुवन, तत्त्व और
कला ये तीन अध्वाओं के भेद हैं।३ प्रमाता में विश्रान्त स्वरूप भी उसी
प्रकार तीन प्रकार है।४
१. नौ तत्त्वों में प्रकृति, पुरुष, नियति, काल, माया, शुद्धविद्या, ईश्वर, सदा-
शिव और शिव अन्तर्भूत हैं।
२. निवृत्तिकला के अन्तर्गत तत्त्व पृथ्वी है। उस कला में १६ भुवन है, पद
वर्ण और मन्त्रों की संख्या एक-एक हैं। जल तत्त्व से प्रकृति तत्त्व तक
तेईस तत्त्व में ह से ट तक वर्ण हैं, भुवनों की संख्या छप्पन है, मंत्र और
पदों की संख्या पाँच-पाँच हैं। जिस कला के द्वारा ये तत्त्व व्याप्त है उसका
नाम प्रतिष्ठा है। विद्याकला के द्वारा व्याप्त तत्त्व पुरुष से माया तक
तत्त्व समूह हैं, इनकी संख्या सात हैं। ञ से घ तक वर्ण इसके अन्तर्गत हैं,
दो पद और दो मन्त्र हैं और भुवनों की संख्या अठाईस हैं। शान्तिकला
में तत्त्व तीन, ग ख और क वर्ण हैं। पद और मंत्र एक, एक-एक है।
शान्त्यतीत कला में तत्त्व शिव है जो शक्ति से अभिन्न है, वर्ण सोलह स्वर
है। यहाँ भुवन नहीं है, मंत्र पद एक-एक है।
३. अद्वैत शैवसिद्धान्त के अनुसार तत्त्वों की संख्या छत्तीस हैं, उनमें कुछ
प्रमेयकोटि के अन्तर्गत हैं, कुछ प्रमाण कोटि में और कुछ प्रमातारूपी
कर्त्ता की कोटि में वर्तमान हैं। प्रमेय दो प्रकार हैं—एक स्थूल है और
दूसरा उससे सूक्ष्म है। स्थूल प्रमेय पृथ्वी आदि भूतपंचक है और सूक्ष्म
प्रमेय पाँच तन्मात्राएँ हैं। इसलिए प्रमेयों की संख्या दस हैं।
४. प्रमेयों की तरह करण भी दस हैं--कुछ स्थूल करण हैं जिन्हें कर्मेन्द्रिय
कहते हैं। वाक्, पाणि, पाद, पायु और उपस्थ स्थूल करण हैं। सूक्ष्म
करण ज्ञानेन्द्रियाँ हैं। ज्ञानेन्द्रियाँ करणरूपी होने पर भी उनमें कर्तृभाव
स्वल्पमात्रा में प्रतीत होता है। जहाँ करणभाव गौण होकर स्पष्टरूप से
प्रतीयमान कर्तृभाव ( वास्तविक नहीं ) आ जाता है वहाँ उनकी संख्या
पाँच हैं। इस वर्ग में मन, बुद्धि, अहंकार, प्रकृति और पुरुष अन्तर्गत हैं।
११० ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. १०
प्रमाता में विश्रान्त स्वभाव इनका जब प्रमाणरूपता है तब उसे
पदाध्वा कहते हैं।
प्रमाण के क्षोभ की लहरें जब समाप्त होने जा रही है तो उस समय
मन्त्ररूपी अध्वा बनती है। उस क्षोभ की शान्ति होने पर जब पूर्ण
प्रमातृता आती है तब वर्णाध्वा है। वही वर्ण पूर्णस्वरूप है १ और उसमें
अर्थात् स्वरूप में जब उसकी विश्रान्ति आती है तब उसकी स्वरूप प्राप्ति
होती है, अतः एक ही स्वरूप छः प्रकार हैं ऐसा कहना यथार्थ ही है।
पद, मन्त्र और वर्ण एक-एक है, भुवन की संख्या सोलह हैं, इस
प्रकार धरातत्त्व में निवृत्ति कला काम करती है। अर्थात् निवृत्ति कला
धरा की धारिका है, यहाँ वर्ण क्ष है।
अग्नि तीन हैं, नयन दो हैं इसलिये तेईस तत्त्वों में अर्थात् जल से
प्रकृति तक तत्त्वों में ह से ङ तक तेईस वर्ण हैं। रस छः हैं, शर पाँच
हैं इसलिए भुवनों की संख्या छप्पन हैं। मन्त्र की संख्या पाँच है, पद भी
पाँच हैं। कला आप्यायिनी है जिसका अन्य नाम प्रतिष्ठा है।
पुरुष से माया तक तत्त्वों में ञ से घ तक मुनि अर्थात् सात वर्ण हैं।
पद और मन्त्र पंचाक्षरात्मक है। वसु आठ, अक्षि दो हैं इसलिए अठाईस
भुवन हैं और कला बोधिनी या विद्या है।
अग्नि तीन हैं, इसलिए गखक ये तीन वर्ण हैं। तीन तत्त्व है, मन्त्र
शुद्ध कर्तृभाव जहाँ प्रतीत होता है वहाँ कला, विद्या, राग, नियति, काल
ये पाँच हैं। माया आवरण करने वाली है लेकिन माया सब तत्त्वों की जो
पारस्परिक विभिन्नताएँ हैं उन्हें मिटाकर उन पर एक परदा जैसा आवरण
डाल देती है जिससे सब तत्त्वों में जो पारस्परिक भेद है वह तिरोहित हो
जाता है। सृष्टिप्रक्रिया में उसी आवरण ( Screen ) पर चित्रों के समान
तीस तत्त्वों का निर्माण होता है। संहारक्रम में जब वह आवरण हट
जाता है तब शुद्ध प्रकाश धीरे-धीरे खोलने लगता है।
१. शिवस्वरूप सब प्रकार अवच्छिन्नता से रहित है, लेकिन उनके सम्बन्ध में
जब भावना की जाती है तब उनमें कुछ परिच्छिन्नता आ जाती है इस
कारण सब प्रकार परिच्छिन्नता से शून्य जो उनका स्वरूप है वही सैतीसवाँ
तत्त्व है।
आ. १० ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १११
त्र्यक्षर और पद भो सैन्य = अक्षौहिणी अर्थात् अठारह भुवन हैं। इसमें
उत्पूयिनी नाम की कला अर्थात् शान्ता नाम की कला हैं।
सोलह वर्ण ( अ से अः तक ) । पद, वर्ण, मन्त्र एक-एक हैं। इसमें
शान्त्यतीत कला व्यापृत है। ८
श्री अभिनवगुप्त नाम के आचार्य ने शिष्यों के लिए संक्षेप के कारण
इन तीन आर्या का निर्माण किया।
इति तंत्रसार के कलाध्वप्रकाशन
नाम का दशम आह्निक ।
८. छत्तीस तत्त्वों को तीन खण्डों में देखना ही त्रितत्त्वविधि है। आत्मकला
पृथ्वी से विज्ञानाकल तक व्याप्त है, विद्याकला ईश्वर तक और शक्ति और
शिवतत्त्व शिवकला द्वारा व्याप्त है। आत्मकला, विद्याकला और शिव-
कला ये तीन कलाएँ हैं।
अथ एकादशमाह्निकम्
तत्र यावत् इदम् उक्तम् तत् साक्षात् कस्यचित् अपवर्गप्रिये यथोक्त-
संग्रहनीत्या भवति, कस्यचित् वक्ष्यमाणदीक्षायाम् उपयोगगमनात् इति
दीक्षादिकं वक्तव्यम् । तत्र कः अधिकारी इति निरूपणार्थं शक्तिपातो
विचार्यते । तत्र केचित् आहुः ज्ञानाभावात् अज्ञानमूलः संसारः तदपगमे
ज्ञानोदयात् शक्तिपात इति तेषां सम्यक् ज्ञानोदय एव किंकृत इति वाच्यम्,
कर्मजन्यत्वे कर्मफलवत् भोगत्वप्रसङ्गे भोगिनि च शक्तिपाताभ्युपगतौ
अतिप्रसङ्गः, ईश्वरेच्छानिमित्तत्वे तु ज्ञानोदयस्य अन्योन्याश्रयता वैयर्थ्यं
च, ईश्वरे रागादिप्रसङ्गः, विरुद्धयोः कर्मणोः समबलयोः अन्योन्य-
प्रतिबन्धे कर्मसाम्यं, ततः शक्तिपात इति चेत्, न—क्रमिकत्वे विरोधा-
योगात् विरोधेऽपि अन्यस्य अविरुद्धस्य कर्मणो भोगदानप्रसङ्गात्,
अविरुद्धकर्माप्रवृत्तौ तदैव देहशतप्रसङ्गात्, जात्यायुष्प्रदं कर्म न प्रति-
बध्यते भोगप्रदमेव तु प्रतिबध्यते इति चेत्, कुतः—तत्कर्मसद्भावे यदि
शक्तिः पतेत् तर्हि सा भोगप्रदात् किं बिभियात् । अथ मलपरिपाके
शक्तिपातः सोऽपि किंस्वरूपः ? किं च तस्य निमित्तम् ? इति, एतेन
वैराग्यं धर्मविशेषो विवेकः सत्सेवा सत्प्राप्तिः देवपूजा इत्यादिहेतुः
प्रत्युक्त इति भेदवादिनां सर्वम् असमञ्जसम् । स्वतन्त्रपरमेशाद्वयवादे तु
उपपद्यते एतत्, यथाहि—परमेश्वरः स्वरूपाच्छादनक्रीडया पशुः पुद्ग-
लोऽणुः सम्पन्नः, न च तस्य देशकालस्वरूपभेदविरोधः तद्वत् स्वरूप-
स्थगनविनिवृत्त्या स्वरूपप्रत्यापत्तिं झटिति वा क्रमेण वा समाश्रयन्
शक्तिपातपात्रम् अणुः उच्यते, स्वातन्त्र्यमात्रसारश्च असौ परमशिवः
शक्तेः पातयिता इति निरपेक्ष एव शक्तिपातो यः स्वरूपप्रथाफलः, यस्तु
भोगोत्सुकस्य स कर्मापेक्षः, लोकोत्तररूपभोगोत्सुकस्य तु स एव शक्ति-
पातः परमेश्वरेच्छाप्रेरितमायागर्भाधिकारीयरुद्रविष्णुब्रह्मादिद्वारेण,
मन्त्रादिरूपत्वं मायापुंविवेकं पुंकलाविवेकं पुंप्रकृतिविवेकं पुंबुद्धिविवेक-
मन्यच्च फलं प्रस्नुवानः तदधरतत्त्वभोगं प्रतिबध्नाति, भोगमोक्षो-
भयोत्सुकस्य भोगे कर्मापेक्षो, मोक्षे तु तन्निरपेक्षः इति सापेक्षनिरपेक्षः ।
न च वाच्यं—कस्मात् कस्मिंश्चिदेव पुंसि शक्तिपात इति, स एव
परमेश्वरः तथा भाति इति सत्तत्त्वे कोऽसौ पुमान् नाम यदुद्देशेन विषय-
कृता चोदना इयम् । स चायं शक्तिपातो नवधा, —तीव्र-मध्य-मन्दस्य
उत्कर्ष-माध्यस्थ्य-निकर्षैः पुनस्त्रैविध्यात्, तत्र उत्कृष्टतीव्रात् तदैव देहपाते
आ. ११ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ ११३
परमेशता, मध्यतीव्रात् शास्त्राचार्यानपेक्षिणः स्वप्रत्ययस्य प्रातिभज्ञा-
नोदयः यदुदये बाह्यसंस्कारं विनैव भोगापवर्गप्रदः प्रातिभो गुरुरित्युच्यते
तस्य हि न समयादिकल्पना काचित्, अत्रापि तारतम्यसद्भावः-
इच्छावैचित्र्यात् इति, सत्यपि प्रातिभत्वे शास्त्राद्यपेक्षा संवादाय स्यादपि,
इति निर्भित्तिसभित्त्यादिबहुभेदत्वम् आचार्यस्य प्रातिभस्यागमेषु उक्तम्,
सर्वथा प्रतिभांशो बलीयान्- तत्संनिधौ अन्येषाम् अनधिकारात् ।
भेददर्शन इव अनादिशिवसंनिधौ मुक्तशिवानां सृष्टिल्यादिकृत्येषु मन्द-
तीव्रात् शक्तिपातात् सद्गुरुविषया विश्राता भवति, असद्गुरुविषयायां
तु तिरोभाव एव, असद्गुरुतस्तु सद्गुरुगमनं शक्तिपातादेव । सद्गुरुस्तु
समस्तैतच्छास्त्रतत्त्वज्ञानपूर्णः साक्षात् भगवद्भैरवभट्टारक एव, योगि-
नोऽपि स्वभ्यस्तज्ञानतयैव मोचकत्वे तत्र योग्यत्वस्य सौभाग्यलावण्या-
दिमत्त्वस्येवानुपयोगात् । असद्गुरुस्तु अन्यः सर्व एव । एवं यियासुः
गुरोः ज्ञानलक्षणां दीक्षां प्राप्नोति यया सद्य एव मुक्तो भवति जीवन्नपि,
अत्र अवलोकनात् कथनात् शास्त्रसम्बोधनात् चर्यादर्शनात् चरुदानात्
इत्यादयो भेदाः । अभ्यासवतो वा तदानीं सद्य एव प्राणवियोजिकां
दीक्षां लभते- सा तु मरणक्षण एव कार्या इति वक्ष्याम इति । तीव्रस्त्रिधा
उत्कृष्टमध्यात् शक्तिपातात् कृतदीक्षाकोऽपि स्वात्मनः शिवतायां न
तथा दृढप्रतिपत्तिः भवति, प्रतिपत्तिपरिपाकक्रमेण तु देहान्ते शिव एव,
मध्यमध्यात् तु शिवतोत्सुकोऽपि भोगप्रेप्सुः भवति इति तथैव दीक्षायां
ज्ञानभाजनम्, स च योगाभ्यासलब्धम् अनेनैव देहेन भोगं भुक्त्वा देहान्ते
शिव एव । निकृष्टमध्यात् देहान्तरेण भोगं भुक्त्वा शिवत्वम् एति,
इति । मध्यस्तु त्रिधा- भोगोत्सुकता यदा प्रधानभूता तदा मन्दत्वं-
पारमेश्वरमन्त्रयोगोपायतया यतस्तत्र औत्सुक्यम्, पारमेशमन्त्र-
योगादेश्च यतो मोक्षपर्यन्तत्वम् अतः शक्तिपातरूपता । तत्रापि
तारतम्यात् त्रैविध्यम्, इत्येष मुख्यः शक्तिपातः । वैष्णवादीनां तु राजा-
नुग्रहवत् न मोक्षान्तता इति न इह विवेचनम् । शिवशक्त्यधिष्ठानं तु
सर्वत्र इति उक्तम्, सा परं ज्येष्ठा न भवति अपि तु घोरा घोरतरा वा,
स एष शक्तिपातो विचित्रोऽपि तारतम्यवैचित्र्यात् भिद्यते, कश्चित्
वैष्णवादिस्थः समयादिक्रमेण स्रोतःपञ्चके च प्राप्तपरिपाकः सर्वोत्तीर्ण-
भगवत्षडर्धशास्त्रपरमाधिकारिताम् एति, अन्यस्तु उल्लङ्घनक्रमेण
अनन्तभेदेन, कोऽपि अक्रमम् इति अत एव अपराधरशासनस्था गुरवोऽपि
इह मण्डलमात्रदर्शनेऽपि अनधिकारिणः, ऊर्ध्वशासनस्थस्तु गुरुः अधरा-
८
[११४ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ११
धरशासनं प्रत्युत प्राणयति—पूर्णत्वात् इति सर्वाधिकारी। स च दैशिको
गुरुः आचार्यो दीक्षकः चुम्बकः, स चायं पूर्णज्ञान एव सर्वोत्तमः—तेन
विना दीक्षाद्यसम्पत्तेः। योगी तु फलोत्सुकस्य युक्तो यदि उपायोपदेशेन
अव्यवहितमेव फलं दातुं शक्तः उपायोपदेशेन तु ज्ञाने एव युक्तो मोक्षेऽपि
अभ्युपायात् ज्ञानपूर्णताकाङ्क्षी च बहूनपि गुरून् कुर्यात्। उत्तमोत्त-
मादिज्ञानभेदापेक्षया तेषु तु वर्तेत, सम्पूर्णज्ञानगुरुत्यागे तु प्रायश्चित्तमेव।
ननु सोऽपि अब्रुवन् विपरीतं वा ब्रुवन् किं न त्याज्यः, नैव इति ब्रूमः,
तस्य हि पूर्णज्ञानत्वात् एव रागाद्यभाव इति अवचनादिकं शिष्यगतेनैव
केनचित् अयोग्यत्वानाश्वस्तत्वादिना निमित्तेन स्यात् इति, तदुपासने
यतनीयं शिष्येण, न तत्त्यागे। एवम् अनुग्रहनिमित्तं शक्तिपातो निरपेक्ष
एव—कर्मादिनियत्यपेक्षणात्। तिरोभाव इति, तिरोभावो हि कर्माद्य-
पेक्षगाढदुःखमोहभागित्वफलः, यथा हि—प्रकाशस्वातन्त्र्यात् प्रबुद्धोऽपि
मूढवत् चेष्टते हृदयेन च मूढचेष्टां निन्दति, तथा मूढोऽपि प्रबुद्धचेष्टां
मन्त्राराधनादिकां कुर्यात्, निन्देच्च, यथा च अस्य मूढचेष्टा क्रियमाणापि
प्रबुद्धस्य ध्वंसम् एति तथा अस्य प्रबुद्धचेष्टा, सा तु निन्द्यमाना—
निषिद्धाचरणरूपत्वात् स्वयं च तथैव विशङ्कमानत्वात् एनं दुःखमोहपङ्के
निमज्जयति, न तु उत्पन्नशक्तिपातस्य तिरोभावोऽस्ति, अत्रापि च
कर्माद्यपेक्षा पूर्ववत् निषेध्या, तत्रापि च इच्छावैचित्र्यात् एतद्देहमात्रोप-
भोग्यदुःखफलत्वं वा दीक्षासमयचर्यागुरुदेवाग्न्यादौ सेवानिन्दनोभय-
प्रसक्तानामिव प्राक् शिवशासनस्थानां तत्त्यागिनामिव। तत्रापि इच्छा-
वैचित्र्यात् तिरोभूतोऽपि स्वयं वा शक्तिपातेन युज्यते, मृतो वा बन्धु-
गुर्वाद्युपमुखेन, इत्येवं पञ्चकृत्यभागित्वं स्वात्मनि अनुसंदधत् परमेश्वर
एव, इति न खण्डितमात्मानं पश्येत्।
यथा निरर्गलस्वात्मस्वातन्त्र्यात्परमेश्वरः।
आच्छादयेन्निजं धाम तथा विवृणुयादपि॥
अप्रबुद्धेऽपि वा धाम्नि स्वस्मिन्बुद्धवदाचरेत्।
भूयो बुध्येत वा सोऽयं शक्तिपातोऽनपेक्षतः॥
जह निअझंउ महेसरु अच्छवि संविरवितपह।
पुणुस अत्ति विपर पसरु अच्छ इविमल सरूइ ॥
इति श्रीमदभिनवगुप्ताचार्यविरचिते तन्त्रसारे शक्तिपातप्रकाशनं
नाम एकादशमाह्निकम् ॥११॥
एकादश आह्निक
इतने दूर तक जो कुछ कहा गया है वह किसी के लिए साक्षात् रूप
से कथित संक्षिप्त विधि के द्वारा अपवर्ग (मोक्ष) प्राप्ति का कारण बनता
है, फिर किसी को आगे बतलायी जानेवाली दीक्षा के द्वारा इष्ट विषय की
प्राप्ति होती है इसलिए दीक्षा आदि विषयों का उल्लेख होना चाहिए।
अब उसमें (दीक्षा का) अधिकारी कौन है इस प्रश्न के निर्णय के लिए
शक्तिपात¹ पर विचार किया जाता है। इस विषय में कुछ लोगों का
विचार यह है कि ज्ञान के अभाव के कारण अज्ञानमूलक संसार का उदय
होता है, अज्ञान के तिरोधान होने पर ज्ञान का उदय होता है जिसके
फलस्वरूप शक्तिपात होता है²। ऐसे विचार करनेवाले को यह बताना
होगा कि यथार्थ ज्ञान का उदय किस कारण से होता है। अगर कर्म से
उसकी उत्पत्ति मानी जाती है तो कर्म के फल के सदृश उसकी भोग्यता
का प्रसंग आ जाता है और भोग करनेवालों में शक्तिपात मानने पर
अतिप्रसंग का दोष अवश्य आता है³। ईश्वर की इच्छा ही ज्ञानके उदय
१. जीव स्वभावतः शिव ही है, वही उसका स्वरूप है। जीव उस स्वरूप को
किसी न किसी उपाय से प्राप्त कर लेते हैं। इन उपायों में कोई शीघ्रता
से अथवा विलम्ब से उन्हें स्वरूपप्राप्ति के सहायक बन जाते हैं, अथवा
उन उपायों में कुछ क्रम के बिना और कुछ सक्रम भाव से जीवों को
अपने स्वरूप प्राप्त कराने में सहायक होते हैं। आचार्यों की परिभाषा के
अनुसार इस उपाय को शक्तिपात कहते हैं। शक्तिपात भगवदनुग्रह का ही
नामान्तर है। परमेश्वर के पाँच कृत्यों में अनुग्रह या कृपा एक है। उनके
अन्य कृत्यों के समान अनुग्रह भी इन्हीं की इच्छा का खेल है।
२. किन्हीं-किन्हीं का मत है कि शक्तिपात ज्ञान के उदय से होता है। वे कहते
हैं कि ज्ञान के उदय होने पर अज्ञान की निवृत्ति होती है जिसके फल-
स्वरूप शक्तिपात होता है। लेकिन यथार्थज्ञान किस प्रकार से उदित होता
है इसका समाधान इससे नहीं होता।
३. कर्म को ज्ञान का कारण मानने पर ज्ञान को कर्म का फल मानना पड़ता
है। इस अवस्था में ज्ञान और कर्मफल समानार्थक हो जाते हैं। अतः
११६ ] तन्त्रसार-अभिनव गुप्त [ आ. ११
का कारण है ऐसा मानने पर अन्योन्याश्रयरूप दोष¹ के कारण दोनों ही
असिद्ध होते हैं। अपितु ईश्वर में राग आदि गुणों का प्रसंग आता है।
दो विरुद्ध समबल कर्म जब एक दूसरे को फलोन्मुख होने से रोकते हैं तब
कर्मसाम्य² होता है और उसी से शक्तिपात होता है, लेकिन ऐसा कहना
उचित नहीं लगता क्योंकि कर्म स्वरूपतः क्रमिक होने के कारण युगपत्
दो कर्मों का सहावस्थान नहीं होता है इसलिए दोनों में विरोध उत्पन्न
नहीं होता। अगर दो कर्मों में विरोध मान भी लिया जाता है तो जो
अविरुद्ध कर्म है उससे फल की उत्पत्ति स्वीकार करना पड़ता है, यदि
अविरुद्ध कर्म की अप्रवृत्ति है अर्थात् फलोन्मुखता नहीं मानी जाती है तो
उसी क्षण में देहपात का प्रसंग उठता है—इस आपत्ति के उत्तर में अगर
कहा जाता है कि जन्म और आयु के निष्पादक कर्म ही प्रतिरुद्ध नहीं
होते हैं अन्य भोग प्रदान करनेवाले कर्म ही केवल प्रतिरुद्ध रहते हैं—यह
भी कहना ठीक नहीं है, क्योंकि भोग प्रदान करनेवाले कर्मों की वर्तमानता
के काल में यदि शक्तिपात होता है तो भोगसम्पादक कर्मों से शक्ति का
कौन-सा डर है ?
अगर कहा जाय मल के परिपाक होनेपर शक्तिपात होता है तो प्रश्न
ज्ञानी को भी कर्मफलभोगो के रूप में ग्रहण करना पड़ता है। ज्ञान के
उदय से शक्तिपात स्वीकार करने पर प्रकारान्तर से भोगों में ही शक्तिपात
मानना पड़ता है। इसलिए अतिप्रसंग का दोष आ जाता है।
१. ज्ञान के उदय से ईश्वरेच्छा के अनुमान और ईश्वरेच्छा के अनुमान से
ज्ञानोदय इस प्रकार अन्योन्याश्रय रूप दोष आ जाता है।
२. दो समान बलवाले कर्मों के पारस्परिक प्रतिबन्ध से कर्म का जो समभाव है
वही कर्मसाम्य है। दो परस्पर विरोधी कर्म वे हैं जो एक दूसरे के फल
को रोकते हैं जिससे किसी क्षण उनकी युगपत् प्रवृत्ति नहीं होती। लेकिन
जो कर्म अविरुद्ध है वह फल प्रदान करता रहता है। अगर अविरुद्ध कर्म
एक क्षण के लिए भी फल प्रदान नहीं करता है तो उसी क्षण देहपात हो
जाना चाहिए। यदि कहा जाय कि जाति (जन्म) और आयु इन दो फलों के
देनेवाले कर्म प्रतिबद्ध नहीं होता, केवल भोगप्रद कर्म ही प्रतिबद्ध होता है,
तो प्रश्न यह होगा यदि जाति और आयुप्रद कर्म रहते हुए भी शक्तिपात
होता है, तो भोगप्रद कर्म रहने पर शक्तिपात क्यों नहीं हो सकेगा यह प्रश्न
रह जाता है।
आ. ११ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ ११७
यह उठता है कि मलपरिपाक का स्वरूप क्या है ? उसका कारण भी
कैसा है ? १
इस कथन के द्वारा वैराग्य, धर्मविशेष, विवेक, सत्संग, सत्वस्तु की
प्राप्ति, देवपूजन आदि शक्तिपात के कारण हैं ऐसे विचार भी खण्डित
हुए। अतः भेदवादियों का सब कथन युक्तिसिद्ध नहीं है।
स्वतन्त्र परमेश्वराद्वयवाद में ये सभी युक्तियुक्त हैं और उपपन्न भी
हैं। जैसे परमेश्वर अपने स्वरूप गोपन करने की इच्छा से स्वयं पशु जीव,
पुद्गल अणु बन जाते हैं। देश और काल उनके स्वरूप में भेदरूपी विरोध
का उत्पन्न नहीं करते हैं। उनके स्वरूप गोपनरूप स्थगन की निवृत्ति
के द्वारा स्वरूप का उन्मोचन बिना किसी क्रम से अथवा क्रम के अवलम्बन
के द्वारा वह अणु शक्तिपात का पात्र बन जाता है।
परमेश्वर जिनका वास्तविक स्वरूप स्वतन्त्रता है वही शक्ति का
पात करनेवाले हैं, अतः शक्तिपात सब प्रकार से निरपेक्ष है। और जिसका
फल है स्वरूप का प्रकाशन। भोग के प्रति उत्सुक जीवों में शक्तिपात कर्म
की अपेक्षा रखता है, लेकिन लोकोत्तर भोग की अभिलाषा जिनमें वर्तमान
उनमें शक्तिपात परमेश्वर की इच्छा से प्रेरित मायागर्भ में अवस्थित
रुद्र, विष्णु और ब्रह्मा आदि अधिकारी पुरुषों के द्वारा सम्पन्न होता है।
मन्त्र आदि का स्वरूप प्राप्त करना, माया और पुरुष का विवेक, पुरुष
और कला का विवेक, पुरुष प्रकृति विवेक, पुरुष और बुद्धि का विवेक
आदि एवम् अन्य प्रकार फलों को उत्पन्न करते हुए शक्तिपात निम्नभूमि
में स्थित तत्त्वों में भोग उत्पन्न करने में बाधा डालता है। भोग और
मोक्ष उभय प्रकार फल के उत्सुक जीवों में जो भोग की अभिलाषा है
उसमें कर्म की अपेक्षा रहती है, मोक्ष के प्रति अभिलाषा में कर्म की
अपेक्षा नहीं रहती है। इसलिए शक्तिपात सापेक्ष-निरपेक्ष है। अब यह
१. द्वैत आगमों के अनुसार ज्ञान अथवा कर्मसाम्य शक्तिपात का कारण नहीं
हो सकता है, मलपाक ही शक्तिपात का हेतु है। मल द्रव्यरूप है। यह
मल अनादि है, परन्तु सान्त है। यह क्रम से पक्व हो रहा है। जब मल
पूर्णरूप से परिपक्व हो जाता है तब परमेश्वर दीक्षा के द्वारा उसे हटाते
हैं। मल द्रव्यरूप होने के कारण परमेश्वर क्रियात्मक दीक्षा के द्वारा उसे
हटाते हैं।