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तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary

महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished294 पृष्ठ

पृष्ठ 188, कुल 294 में से

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पृष्ठ 188

आ. १० ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १०७
यही चार ( वर्ग ) पार्थिव, प्राकृत, मायीय और शाक्त नाम के अण्ड
हैं । पृथिवी आदि शक्तियों की अवस्थिति सूक्ष्म रूप से शक्तितत्त्व तक
होती है और परम-स्वरूप का स्पर्श वर्तमान रहता है । स्पर्श स्वभाव से
सप्रतिघ ( बाधा उत्पन्न करनेवाला ) हैं, इसलिए शक्तितत्त्व तक अण्ड
भाव १ है ।
शिवतत्त्व में शान्त्यतीत कला है—शिवसम्बन्धी उपदेश, भावना और
अर्चना आदि कार्यों के लिए इसकी कल्पना होती है । परमतत्त्व स्वतंत्र
है उसमें भी जो अप्रमेय स्वरूप है वही कलातीत है । इस प्रकार पाँच
ही कलाएँ हैं और तत्त्वों की संख्या छत्तीस हैं । अब प्रमेयता दो प्रकार
हैं—एक स्थूल और दूसरा सूक्ष्म है, अतः प्रमेय दस हैं ।२ करणता भी
दो प्रकार है—एक उसका शुद्धरूप है और दूसरा कर्तृभाव को स्पर्श
१. अध्वाओं के दो भेदों में पहला भाग मेयगत है और दूसरा प्रमाणगत है ।
प्रमेयगत भाग भुवन, तत्त्व और कलारूप है और प्रमाणगत भाग पद,
मन्त्र और वर्णरूप है । इनमें पद स्थूल है, मन्त्र उससे सूक्ष्म और वर्ण
सूक्ष्मतम है । पद स्थूल होने पर भी वह प्रमाता का ही प्रक्षुब्ध रूप है
जो बहिर्मुख है । प्रमाता ही क्षुब्ध होकर प्रमाण रूप धारण करने पर वह
पद बनता है । जिसके द्वारा अर्थ का बोध होता है उसे पद कहते हैं ।
पद प्रमाणरूपी होने पर भी उसमें प्रकाशरूपी प्रमाता का निकट सम्बन्ध
बना रहता है, क्योंकि प्रकाश के अन्तःप्रवेश के बिना कोई भी ज्ञेय वस्तु
प्रकाश्य बन नहीं सकता । जब वही पद प्रमाणात्मकता छोड़कर अन्तर्मुख
हो जाता है और उसका स्वरूप अक्षुब्ध रूप प्राप्त करता है तब वह
प्रमाता का रूप धारण करता है । उस समय उसे मन्त्र कहते हैं । उस
समय मन्त्र अन्तःपरामर्शात्मक है । मन्त्र और पद दोनों ही स्वभाव से
विमर्शात्मक हैं, पद प्रमाणरूप है, वह क्षुब्धरूप है लेकिन मंत्र, प्रमाता
का अक्षुब्धरूप है । इन दोनों के स्वभाव से कुछ अंश में भिन्न पूर्णतारूपी
जो प्रमिति है वही वर्ण है, उस प्रमिति में सब प्रकार क्षोभों का उपशम
हो जाता है । प्रमिति स्वरूपतः प्रमाता, प्रमाणों का अभिन्नरूप है ।
२. भुवनों की संख्या एक सौ अठारह हैं, तत्त्वों की संख्या छत्तीस, कलाएँ
पाँच हैं, पद दस हैं, मंत्र भी दस और वर्ण पचास हैं । अध्वाएँ छः हैं ।