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तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary

महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished294 पृष्ठ

पृष्ठ 187, कुल 294 में से

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पृष्ठ 187

अथ दशम आह्निक
तत्त्वरूपी अध्वा का विवरण प्रस्तुत किया गया है, अब कला आदि
अध्वाओं¹ का निरूपण किया जा रहा है। इस विषय में जैसे भुवनों में
अनुगामी जो कुछ रूप है वही तत्त्व है, उसी प्रकार सभी तत्त्वों के एक
एक वर्ग में² जो रूप अनुगामी है वही कला है—क्योंकि कला ही एक
विशेष प्रकार रूप की कलना करने में समर्थ है। जैसे पृथ्वी में निवृत्ति
कला वर्तमान है; क्योंकि तत्त्वों का सृष्टिप्रवाह उसी से समाप्त (निवृत्त)
होता है। जल से प्रकृति तक जो वर्ग है³ उसमें प्रतिष्ठा कला व्यापृत है,
क्योंकि उसी के द्वारा उक्त वर्ग का आप्यायन (नवीन निर्माण या पुष्टि)
और पूर्णता सम्पन्न होता है। पुरुष से माया तक वर्ग में विद्या कला काम
में आती है, क्योंकि उस वर्ग में वेद्योँ का तिरोभाव और संवित् (चैतन्य)
की अधिकता आती है। शुद्धविद्या से शक्तितत्त्व तक वर्ग में शान्ता नाम
की कला व्यापृत हैं, क्योंकि वहाँ कंचुक की लहरें उपशमित (शान्त)
होती है।
१. कलाध्वा कला, तत्त्व और भुवनरूप है। कला सूक्ष्मतम है जो तत्त्वों की
रचना में सहायक है। कला की तरह भुवनों के निर्माण में तत्त्व आवश्यक
है। उदाहरण के रूप में पृथ्वी तत्त्व के द्वारा कुछ भुवनों की रचना हुई है,
कुछ जल तत्त्व से, कुछ तेजस्तत्त्व से, इस प्रकार सभी तत्त्वों के साथ
भुवनों का सम्बन्ध है।
२. पृथ्वी शब्द से केवल धरित्री को ही समझना नहीं चाहिए। स्थूल ग्रह
नक्षत्र आदि भी पृथ्वी तत्त्व के अन्तर्गत है। इस प्रकार जो परिभाषिक
पृथ्वी है जिसके धृति और कठिनता आदि धर्म हैं निवृत्ति कला के द्वारा
उसकी रचना हुई है। छत्तीस तत्त्वों का पाँच कलाओं के द्वारा जो वर्गी-
करण हुआ है वह परमेश्वर का स्वातन्त्र्यकल्पित है।
३. भुवनों के परस्पर विभाजन के कारण और एक दूसरे से अलग होने के
कारण शक्तितत्त्व तक अण्डभाव माना जाता है। अण्ड आवरण रूपी है
इसलिए प्रत्येक अण्ड पृथक् है। शिवतत्त्व विश्वोत्तीर्ण स्वरूप है, यद्यपि
शिवतत्त्व के अन्तर्गत भुवन भी हैं तो भी वे शून्यरूप होने के कारण वे
एक दूसरे से पृथक् नहीं हैं।