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तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary

महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished294 पृष्ठ

पृष्ठ 181, कुल 294 में से

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पृष्ठ 181

१०० ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ९
में प्रकाशित होता है वह शिव है—जैसे श्रुति में कहा गया है—'यह जो
पृथिवी है वही ब्रह्म है।' जो धरातत्त्व में सिद्धि प्राप्तों को प्रेरित करते हैं
वे धरामन्त्रमहेश्वर हैं, जो प्रेरित होते हैं वे धरामन्त्रेश्वर हैं, उस धरातत्त्व
में अभिमानवश जो विग्रह धारण किये हैं उनका वाचक मन्त्र हैं। सांख्य
आदि पशु शास्त्रों में निरूपित विद्या से उत्तीर्ण और शिवशास्त्रोक्त विद्या
के द्वारा पार्थिव योग में जो अभ्यस्त हुए हैं अथच ध्रुवपद को प्राप्त नहीं
हुए हैं वे धराविज्ञानाकल कहलाते हैं। पशुशास्त्र में कथित विद्या की
प्रक्रिया से जो व्यक्ति पार्थिव योग में अभ्यस्त हुआ है वह कल्प के अन्त
में या मृत्यु के अनन्तर धराप्रलयाकेवल स्थिति को प्राप्त करता है।
सुषुप्त अवस्था में विचित्र स्वप्नों का उदय होगा, जिसमें धरासम्बन्धी
अभिमान वर्तमान है वह धरा-सकलरूपी आत्मा है। इसमें भी शक्ति के
उद्रेक और न्यग्भाव के कारण चतुर्दशता है, इस प्रकार प्रमातारूप धारण
करनेवाले धरातत्त्व के भेद हैं, इसका स्वरूप शुद्ध प्रमेय है। इस प्रकार
अन्यस्थल में भी जानना चाहिए।
अब एक प्रमाता के प्राण में उसकी स्थिति के अनुसार जो भेद उत्पन्न
होते हैं उसका निरूपण हो रहा है।
नील के ग्रहण करते समय प्राण सोलह त्रुटियों का स्वरूप धारण कर
वेद्य वस्तु तक उदित होता है। इन सोलहों में पहली त्रुटि केवल अविभाग
रूपी है, दूसरी त्रुटि ग्राहकरूपता को उल्लसित ( जगाता ) करता है,
सबसे अन्तिम त्रुटि ग्राह्य वस्तु से अभिन्न है और ग्राह्य वस्तु का स्वरूप
धारण करता है, अन्तिम त्रुटि के संलग्न ( उपान्त्य ) त्रुटि स्फुट
ग्राहक रूपी है। इन चारों से भिन्न मध्य में स्थित जो बारह त्रुटियाँ हैं
उनमें से पहले की छः त्रुटियाँ निर्विकल्प-स्वभाव हैं ओर वे विकल्पों के
आच्छादक हैं। इन षट्कों में सबसे पहली स्वरूपतः एक त्रुटि है।
विकल्पों को आवृत्त करनेवाली त्रुटियाँ पाँच हैं जैसे उन्मेष करने की
इच्छा, उन्मिषत्ता—ये दो स्फुट क्रियारूपी होने के कारण दो त्रुटिवाली
हैं, क्योंकि स्पन्दन ( क्रिया ) एकक्षण स्थायी नहीं होती है, उन्मिषितता,
अपने कार्यों का कर्तृत्व इस प्रकार आवृत्त किये जानेवाले विकल्पों की
संख्या पाँच होने के कारण और निजी स्वरूप इन सबको लेकर निर्वि-
कल्पक स्थिति छः क्षण स्थायी है। इसके उपरान्त विकल्प की ध्वंस-
मान्ता, विकल्प का नाश, उन्मेष की उन्मुखता और उन्मिषत्ता जो दो