तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)
Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा
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भिन्नता आती है, करणरूपी शक्तियों के भेद से कर्ताओं में भेद आते
हैं। यह भी ज्ञातव्य है कि जो शक्ति कर्ता से अभिन्न है वैसी शक्ति को
ही करण रूप में ग्रहण किया जा सकता है—दूसरे को नहीं, अन्यथा
अनवस्था का प्रसंग आता है। वस्तुतः एक ही प्रमाता है जो चित्
स्वातन्त्र्य और आनन्द में विश्रान्त है। जब पृथिवी केवल स्वरूप में ही
विश्रान्त रह कर वेद्य बनती है उस समय उसका स्वरूप ही केवल प्रतीति-
गोचर होता है।
चैत्र के आँखों द्वारा देखी हुई चैत्र के द्वारा विदित वस्तु को मैं
जानता हूँ इस प्रकार अनुभव में सब प्रकार शक्ति के द्वारा सब
प्रकार शक्तिमान के द्वारा विशेषित अन्य स्वरूप अवश्य ही भासते
हैं—इस प्रकार शिव तक तत्त्वों के सम्बन्ध में ऐसा कहना उचित
होगा, क्योंकि शिव और शक्ति में निष्ठित शिवस्वभाव में विश्रान्त
विश्व को मैं जानता हूँ इस प्रकार विलक्षण अनुभव भी होता है। अब
प्रश्न उठता है—अगर भावों की वेद्यता निजी स्वरूप है तो वह सबके
लिए वेद्य क्यों न बन जाता है, और वेद्यता भी फिर वेद्य हो जाती है
इस प्रकार अनवस्था आ जाती है और ऐसे होने पर जगत का अन्धत्व
स्पष्ट ही प्रतीत होने लगेगा। केवल इतना ही नहीं वेद्यत्व अवेद्यत्व रूप
विरुद्ध धर्म का योगरूपी महान् दोष भी आ जायेगा। इस आपत्ति के
उत्तर में मैं कहता हूँ कि वेद्यता भावों का निजी स्वरूप नहीं अपितु स्वरूप
उससे भिन्न है ऐसा वर्णित किया गया है। तब वह क्या है ? प्रमातारूपी
शक्ति में और प्रमाता में जो विश्राम प्राप्त हो सकता है वही उसका
स्वरूप है, वह वास्तविकतया स्वप्रकाशरूप है जो प्रकाशित होता है,
इस लिए वह किसी के प्रति प्रकाशमान नहीं होता है--अतः अनवस्था-
रूप दोष और विरुद्ध धर्म योग की आपत्ति दूर हो गयी है। अनन्त
प्रकार के प्रमाताओं के द्वारा संवेद्यमान होते हुए भी वह ( वेद्यता ) एक
ही है, उसका रूप ( शक्ति-शक्तिमद् रूप ) उतना ( एक ) ही है, क्योंकि
उन सभी का आभास एक ही है, अतः भिन्न भिन्न प्रमाताओं के संवेदनों
में किसी प्रकार बाधा उत्पन्न नहीं होती है। उसका जो रूप है वह
कल्पित नहीं अपितु सत्य है, क्योंकि अर्थक्रियाकारिता का निर्वाह भी उसी
प्रकार है। दूसरे के द्वारा देखी गयी अपनी प्रियतमा पर भर्ता की ईर्ष्या
उत्पन्न होती है, फिर शिव स्वभाव विश्राम भूमिरूपी कुम्भ को देख कर
समावेश उत्पन्न होता है, सब प्रकार और अनन्तप्रमाताओं के विश्रामभूमि-