स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary
आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा
न च वाच्यं तैजसाः परमाणवः कथं तमस्त्वेन परिणमन्त इति । पुद्गलानां तत्तत्साम-
ग्रीसहकृतानां विसदृशकार्योत्पादकत्वस्यापि दर्शनात् । दृष्टो ह्यार्द्रन्धनसंयोगवशाद् भास्वर-
रूपस्यापि वन्हेग्भास्वररूपधूमरूपकार्योत्पादः । इति सिद्धो नित्यानित्यः प्रदीपः । यद्यपि
निर्वाणादर्वाग्देदीप्यमानो दीपस्तथापि नवनवपर्यायोत्पादविनाशभाक्त्वात् प्रदीपत्वान्वयाच्च
नित्यानित्य एव ।।
एवं व्योमाप्युत्पादव्ययध्रौव्यात्मकत्वाद् नित्यानित्यमेव । तथाहि । अवगाहकानां
जीवपुद्गलानामवगाहदानोपग्रहे^१ एव तल्लक्षणम् । “अवकाशदमाकाशम्^२” इति वचनात् ।
यदा चावगाहका जीवपुद्गलाः प्रयोगतो^३ विस्रसातो^४ वा एकस्मान्नभःप्रदेशात् प्रदेशान्तर-
मुपसर्पन्ति तदा तस्य व्योम्नस्तैरवगाहकैः सममेकस्मिन् प्रदेशे विभागः उत्तरस्मिंश्च प्रदेशे
अन्य. यो. व्य. श्लोक ५ ] स्याद्वादमञ्जरी १९
तथा च यद् “अप्रच्युतानुत्पन्नस्थिरैकरूपं नित्यम्” इति नित्यलक्षणमाचक्षते ।
तदपास्तम् । एवंविधस्य कस्यचिद्वस्तुनोऽभावात् । “तद्भावाव्ययं नित्यम्” १ इति तु सत्यं
नित्यलक्षणम् । उत्पादविनाशयोः सद्भावेऽपि तद्भावात् अन्वयिरूपात् यन्न व्येति तन्नित्यमिति
तदर्थस्य घटमानत्वात् । यदि हि अप्रच्युतादिलक्षणं नित्यमिष्यते तदोत्पादव्यययोर्निराधा-
रत्वप्रसङ्गः । न च तयोर्योगे नित्यत्वहानिः ।
“द्रव्यं पर्यायवियुतं पर्याया द्रव्यवर्जिताः ।
क्व कदा केन किंरूपा दृष्टा मानेन केन वा' ? ॥”२
उस समय आकाशका जीव-पुद्गलोंके साथ एक प्रदेशमें विभाग और दूसरे प्रदेशमें संयोग होता है ।
ये संयोग और विभाग एक दूसरेके विरुद्ध हैं । इसलिए संयोग-विभागमें भेद होनेसे, संयोग-विभागको धारण
करनेवाले आकाशमें भी भेद होना चाहिए । कहा भी है "विरुद्ध धर्मोंका रहना और भिन्न-भिन्न कारणोंका
होना यही भेद और भेदका कारण है ।" (यहाँपर लक्षण और कारणके भेदसे भेद दो प्रकारका बताया
गया है । जैसे घट जल लाने और पट ठण्डसे बचानेके काममें आता है—यही घट और पटमें लक्षण-भेद है ।
तथा घट मृत्तिकाके पिण्ड और पट तन्तुसे उत्पन्न होता है—यही घट और पटका कारण-भेद है । ) इसलिए
यहाँ पुद्गलके एक प्रदेशमें संयोगके विनाशसे आकाशमें व्यय होता है, और दूसरे प्रदेशमें संयोगके होनेसे
आकाशमें उत्पाद होता है । तथा उत्पाद और व्यय दोनों अवस्थाओंमें आकाश ही एक अधिकरण है,
इसलिए आकाश ध्रौव्य है । ( भाव यह है कि जैनदर्शनके अनुसार दीपककी तरह आकाश भी नित्यानित्य
है । जैनसिद्धान्तमें आकाश एक अनन्त प्रदेशवाला अखण्ड द्रव्य माना गया है । आकाश द्रव्यका काम जीव
और पुद्गलको अवकाश देना है । जिस समय जीव और पुद्गल द्रव्य आकाशके एक प्रदेशको छोड़कर
दूसरे प्रदेशके साथ संयोग करते हैं, उस समय आकाशका जीव-पुद्गलके साथ विभाग और संयोग होता है ।
अर्थात् जीव-पुद्गलके आकाश-प्रदेशोंको छोड़नेके समय आकाशमें विभाग और जीव-पुद्गलके आकाश-प्रदेशोंके
साथ संयोग करनेके समय आकाशमें संयोग होता है । दूसरे शब्दोंमें कहना चाहिए कि एक ही आकाशमें
संयोग-विभाग नामके दो विरुद्ध धर्म पाये जाते हैं । क्योंकि संयोग-विभाग नामके धर्मोंमें भेद होनेसे संयोग-
विभाग धर्मोंको धारण करनेवाले आकाश धर्मीमें भी भेद पाया जाता है । अतएव जीव-पुद्गलके आकाश-
प्रदेशोंको छोड़कर अन्यत्र गमन करनेमें जीव-पुद्गलका आकाशके प्रदेशोंके साथ संयोगका विनाश होता है,
अर्थात् आकाशमें विनाश ( व्यय ) होता है । तथा जीव-पुद्गलका आकाशके दूसरे प्रदेशोंके साथ संयोग
होनेके समय आकाशमें उत्पाद होता है । तथा उक्त उत्पाद ओर व्यय दोनों दशाओंमें आकाश मौजूद रहता
है, इसलिए आकाशमें ध्रौव्य भी है । अतएव आकाशमें उत्पाद-व्यय होनेसे अनित्यत्व और ध्रौव्य होनेसे
नित्यत्वकी सिद्धि होती है । )
इस पूर्वोक्त कथनसे "जो नाश और उत्पन्न न होता हो, और एकरूपसे स्थिर रहे, उसे नित्य कहते
हैं"—इस नित्यत्वके लक्षणका भी खण्डन हो जाता है । क्योंकि ऐसा कोई भी पदार्थ नहीं, जो उत्पत्ति और
नाशसे रहित हो, और सदा एकसा रहे । "पदार्थके स्वरूपका नाश नहीं होना नित्यत्व है"—जैनदर्शन द्वारा
मान्य नित्यत्वका यही लक्षण ठीक है । क्योंकि उत्पाद और विनाशके रहते हुए भी जो अपने स्वरूपको
नहीं छोड़ता वही नित्य है । यदि अप्रच्युत आदि पूर्वोक्त नित्यका लक्षण माना जाये, तो उत्पाद और व्ययका
कोई भी आधार न रहेगा । जैनसिद्धान्तके अनुसार नित्य पदार्थमें जो उत्पाद और व्यय माना गया है, उससे
पदार्थकी नित्यतामें कोई हानि नहीं आती । कहा भी है—
“पर्यायरहित द्रव्य और द्रव्यरहित पर्याय किसने, किस समय, कहाँपर, किस रूपमें, और कौनसे
प्रमाणसे देखे हैं" ? अर्थात् द्रव्य बिना पर्याय और पर्याय बिना द्रव्य कहीं भी सम्भव नहीं ।
१. तत्त्वार्थसूत्रम् अ. ५ सू. ३० ।
२. एतदर्थिका गाथा सन्मतितर्के प्रथमकाण्डे दृश्यते—
'दव्वं पज्जवविज्जुअं दव्वविउत्ता य पज्जवा नत्थि ॥१२॥
२० श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक ५
इति वचनात् ॥
लौकिकानामपि घटाकाशं पटाकाशमिति व्यवहारप्रसिद्धेराकाशस्य नित्यानित्यत्वम् ।
घटाकाशमपि हि यदा घटापगमे, पटेनाक्रान्तं, तदा पटाकाशमिति व्यवहारः । न चायमौप-
चारिकत्वादप्रमाणमेव । उपचारस्यापि किञ्चित्साधर्म्यद्वारेण मुख्यार्थस्पर्शित्वात् । नभसो हि
यत्किल सर्वव्यापकत्वं मुख्यं परिमाणं तत् तदाधेयघटपटादिसम्बन्धिनियतपरिमाणवशात्
कल्पितभेदं सत् प्रतिनियतदेशव्यापितया व्यवह्रियमाणं घटाकाशपटाकाशादि तत्तद्व्यपदेश-
निबन्धनं भवति । तत्तत्घटादिसम्बन्धे च व्यापकत्वेनावस्थितस्य व्योम्नोऽवस्थान्तरापत्तिः ।
ततश्चावस्थाभेदेऽवस्थावतोऽपि भेदः । तासां ततोऽविष्वग्भावात् । इति सिद्धं नित्या-
नित्यत्वं व्योम्नः ॥
( भाव यह है कि जैनोंको वैशेषिकोंका नित्यत्व लक्षण मान्य नहीं है । वैशेषिकोंके अनुसार, जिसमें
उत्पत्ति और नाश न हो और जो सदा एकसा रहे, वही नित्य है । जैन इस मान्यताको स्वीकार नहीं
करते । उनके अनुसार, उत्पाद और व्ययके होते हुए भी पदार्थके स्वरूपका नाश नहीं होना ही नित्यत्व
है । जैनसिद्धान्तके अनुसार वैशेषिकोंका नित्यत्व लक्षण स्वीकार करनेसे उत्पाद और व्ययको कोई स्थान
नहीं मिलता । क्योंकि कूटस्थ नित्यत्वमें उत्पत्ति और नाशका होना सम्भव नहीं । तथा उत्पाद और
व्ययके अभावसे कोई भी पदार्थ 'सत्' नहीं कहा जा सकता । इसलिए जैन लोग कहते हैं कि नित्यत्वको
सर्वथा नित्य न मानकर उत्पाद-व्यय सहित नित्य अर्थात् आपेक्षिक-नित्य मानना चाहिए । क्योंकि कहीं
भी द्रव्य और पर्याय अलग-अलग नहीं पाये जाते । द्रव्यको छोड़कर पर्यायका और पर्यायको छोड़कर
द्रव्यका अस्तित्व सम्भव नहीं । अतएव द्रव्यकी अपेक्षासे पदार्थ नित्य है और पर्यायकी अपेक्षासे अनित्य;
इस तरह नित्य-अनित्य दोनों साथ रहते हैं । इसीलिए आकाश भी नित्यानित्य है । )
प्रकारान्तरसे भी आकाश नित्यानित्य है, क्योंकि सर्वसाधारणमें भी 'यह घटका आकाश है', 'यह
पटका आकाश है' यह व्यवहार होता है। जिस समय घटका आकाश घटके दूर हो जानेपर पटसे संयुक्त
होता है, उस समय वही घटका आकाश पटका आकाश कहा जाता है। यह 'घटका आकाश', 'पटका
आकाश' का व्यवहार उपचारसे होता है, इसलिए अप्रमाण नहीं कहा जा सकता । क्योंकि उपचार भी
किसी न किसी साधर्म्यसे ही मुख्य अर्थको द्योतित करनेवाला होता है। आकाशका सर्वव्यापकत्व मुख्य
परिमाण आकाशमें रहनेवाले घट-पटादि सम्बन्धी नियत परिमाणसे भिन्न होकर, प्रतिनियत प्रदेशोंमें व्यापक
होनेसे ही घटाकाश, पटाकाश आदि व्यवहारका कारण होता है। अर्थात् मुख्यरूपसे सर्वव्यापकत्व परिमाण-
वाला आकाश अपने आधेय घट पटादिके सम्बन्धसे प्रतिनियत देशव्यापित्व परिमाणरूप कहा जाता है।
इसीसे यह घटाकाश है, यह पटाकाश है, यह व्यवहार होता है। तथा व्यापक आकाशके अमुक घट पट
आदिके सम्बन्धसे एक अवस्थासे अवस्थान्तरकी उत्पत्ति होती है। अवस्थाभेद होनेपर अवस्थाके धारक
आकाशमें भेद होता है। क्योंकि ये अवस्थायें आकाशसे अभिन्न हैं। (भाव यह है कि जिस समय घट एक
स्थानसे ( आकाशसे ) अलग होता है, और उसकी जगह पट रखा जाता है, तो यह घटका आकाश है,
यह पटका आकाश है, इस प्रकारका व्यवहार होता है। अर्थात् आकाशमें एक ही जगह घटाकाशका नाश
होता है, और पटाकाशकी उत्पत्ति होती है। इसलिए आकाशमें नित्यानित्य दोनों धर्म विद्यमान हैं। यह
घटाकाश और पटाकाशका व्यवहार औपचारिक है अर्थात् वास्तवमें आकाशमें उत्पाद-विनाश नहीं होता,
केवल आकाशके आधेय घट पटादिके परिवर्तनसे ही आकाशमें परिवर्तन होनेका व्यवहार होता है, यह
शंका ठीक नहीं। क्योंकि मुख्य अर्थके सम्बन्धके बिना उपचार नहीं हो सकता । प्रस्तुत प्रसंगमें
आकाशका सर्वव्यापकत्व मुख्य परिमाण है। यही मुख्य परिमाण आकाशके आधेय घट पटादिके सम्बन्धसे
प्रतिनियत देशपरिमाणरूप कहा जाता है। इसीसे घटाकाश, पटाकाश आदि व्यवहार होता है। अतएव
" - wait, no, look at it:
It's two dots: "समःसेदुषां".
Wait, look at "श्रुतामंगिनः":
Is it "श्रुतामंगिनः"?
Let's zoom into "श्रुतामंगिनः":
"सप्त श्रुतामंगिनः" -> wait, is that a 'म' with anusvara or 'ङ्' or 'ञ्'?
Look at the letter: 'म' with an anusvara: 'मं'!
"श्रुतामंगिनः ।।" (or श्रुतामङ्गिनः? No, it looks like म with anusvara: 'मं').
Let's look at the image: "श्रु ता मं गि नः ।।" - yes, clearly श्रुतामंगिनः!
Now let's verify line 2 to line 17:
स्वायंभुवा$^१$ अपि हि नित्यानित्यमेव वस्तु प्रपन्नाः । तथा चाहुस्ते—“त्रिविधः खल्वयं
Wait, is it "स्वायंभुवा" or "स्वायंभुवाः"?
In line 2: "स्वायंभुवा$^१$ अपि" -> स्वायंभुवा with footnote 1: "स्वायंभुवा¹ अपि".
Wait, is there an anusvara on ya: "स्वायंभुवा" or "स्वयंभुवा"?
२२ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक ५
तथा च प्रशस्तकारः- “सा तु द्विविधा नित्या चानित्या च । परमाणुलक्षणा नित्या; कार्य-
लक्षणा१ त्वनित्या” इति ॥
न चात्र परमाणुकार्यद्रव्यलक्षणविषयद्वयभेदाद् नैकाधिकरणं नित्यानित्यत्व.मिति
वाच्यम्; पृथिवीत्वस्योभयत्राप्यव्यभिचारात् । एवमबादिश्वपीति । आकाशेऽपि संयोगविभागा-
ङ्गीकारात् तैरनित्यत्वं युक्त्या प्रतिपन्नमेव । तथा च स एवाह— “शब्दकारणत्ववचनात्
संयोगविभागौ”३ इति नित्यानित्यपक्षयोः संवलितत्वम् । एतच्च लेशतो भावितमेवेति ॥
प्रलापप्रायत्वं च परवचनानामित्थं समर्थनीयम् । वस्तुनस्तावदर्थक्रियाकारित्वं लक्ष-
णम् । तच्चैकान्तनित्यानित्यपक्षयोर्न घटते । अप्रच्युतानुत्पन्नस्थिरैकरूपो हि नित्यः । स च
क्रमेणार्थक्रियां कुर्वीत, अक्रमेण वा ? अन्योन्यव्यवच्छेदरूपाणां प्रकारान्तरासम्भवात् । तत्र
न तावत् क्रमेण, स हि कालान्तरभाविनीः क्रियाः प्रथमक्रियाकाल एव प्रसद्य कुर्यात् ; समर्थस्य
कालक्षेपाद्योगात् । कालक्षेपिनो वा असामर्थ्यप्राप्तेः । समर्थोऽपि तत्तत्सहकारिसमवधाने तं
तमर्थं करोतीति चेत्, न तर्हि सामर्थ्यम्; अपरसहकारिसापेक्षवृत्तित्वात् । “सापेक्षमसामर्थ्यम्४”
इति न्यायात् ॥
का उत्तर है कि इस क्रमके उल्लंघन करनेका केवल यही अभिप्राय है कि कोई भी पदार्थ सर्वथा नित्य अथवा
अनित्य नहीं कहा जा सकता—जो अनित्य है, वह भी कथंचित् नित्य है, और जो नित्य है, वह भी कथंचित्
अनित्य है । वैशेषिकोंने भी एक ही पृथिवीमें नित्य और अनित्य दोनों धर्म माने हैं। प्रशस्तकारने कहा है
“पृथिवी नित्य-अनित्य दो प्रकारकी है । परमाणुरूप पृथिवी नित्य और कार्यरूप पृथिवी अनित्य है ।”
यहाँपर शंका हो सकती है, कि प्रशस्तकारके उक्त कथनमें पृथिवीका नित्यानित्यत्व सिद्ध नहीं
होता । क्योंकि नित्यानित्य दोनों धर्मोंका अधिकरण एक पृथिवी नहीं है, किन्तु परमाणु और कार्य दो अलग-
अलग पदार्थ हैं । परन्तु यह शंका ठीक नहीं है । क्योंकि पृथिवीत्व नित्य पृथिवी अर्थात् परमाणु पृथिवी
अर्थात् कार्यरूप पृथिवी दोनोंमें रहता है, इसलिए पृथिवीत्वका नित्यत्व और अनित्यत्व दोनोंके साथ एकाधि-
करण है । जल आदिमें भी वैशेषिकोंने नित्यानित्यरूप दोनों धर्म स्वीकार किये हैं । तथा संयोग-विभागके
अंगीकार करनेसे आकाशमें भी उन्होंने युक्तिपूर्वक अनित्यत्व माना है । प्रशस्तभाष्यमें कहा भी है “आकाश
शब्दका कारण है, इससे आकाशमें संयोग और विभाग होते हैं ।” इस प्रकार भाष्यकारने आकाशको नित्य-
अनित्य स्वीकार किया है ।
अब यहाँपर वादियोंके वचनोंको प्रलापप्राय बताकर सामान्यरूपसे वस्तुके नित्यत्वानित्यत्वका
समर्थन करते हैं । अर्थक्रियाकारित्व ही वस्तुका लक्षण है । वस्तुको एकान्त-नित्य अथवा एकान्त-अनित्य
स्वीकार करनेसे यह लक्षण घटित नहीं होता । क्योंकि वैशेषिकोंके अनुसार जिसका कभी नाश न हो, जो
उत्पन्न न हो, और जो सदा एकरूप रहे, वही नित्य है। अब यदि नित्य वस्तु वास्तवमें कोई वस्तु है, तो उसमें
अर्थक्रियाकारित्व होना चाहिए । यहाँ प्रश्न होता है कि यह अर्थक्रिया नित्य पदार्थमें क्रमसे होती है, अथवा
अक्रमसे ? अन्योन्यव्यवच्छेदकोंमें किसी अन्य प्रकारकी सम्भावना नहीं है । नित्य पदार्थमें क्रमसे अर्थक्रिया नहीं
बन सकती । क्योंकि नित्य पदार्थ समर्थ है, इसलिए कालान्तरमें होनेवाली क्रियाओंको वह प्रथम क्षणमें
होनेवाली क्रियाओंके समयमें ही एक साथ कर सकता है; क्योंकि जो समर्थ है, वह कार्य करनेमें विलम्ब
करता है, तो वह सामर्थ्यवान नहीं कहा जा सकता । यदि कोई शंका करे कि पदार्थके समर्थ होनेपर भी
अमुक सहकारी कारणोंके मिलनेपर ही पदार्थ अमुक कार्य करता है, तो इससे नित्य पदार्थकी असमर्थता ही
सिद्ध होती है; क्योंकि वह नित्य पदार्थ दूसरोंके सहयोगकी अपेक्षा रखता है । न्यायका वचन भी है—“जो
दूसरोंकी अपेक्षा रखता है, वह असमर्थ है ।”
१. द्वयणुकादिलक्षणा । २. वैशेषिकदर्शने प्रशस्तपादभाष्ये पृथिवीनिरूपणप्रकरणे । ३. प्रशस्तपादभाष्ये
आकाशानिरूपणे । ४. हेमहंसगणिसमुच्चितहेमचन्द्रव्याकरणस्थन्यायः २८ ।
अन्य. यो. व्य. श्लोक ५ ] स्याद्वादमञ्जरी २३
न तेन सहकारिणोऽपेक्ष्यन्ते अपि तु कार्यमेव, सहकारिष्वसत्स्वभवत् तानपेक्षत इति
चेत्, तत् किं स भावोऽसमर्थः, समर्थो वा ? समर्थश्चेत्, किं सहकारिमुखप्रेक्षणदीनानि
तान्यपेक्षते न पुनर्झटिति घटयति । ननु समर्थमपि बीजम् १इलाजलानिलादिसहकारिसहित-
मेवाङ्कुरं करोति, नान्यथा । तत् किं तस्य सहकारिभिः किञ्चिदुपक्रियेत, न वा ? यदि नोप-
क्रियेत, तदा सहकारिसन्निधानात् प्रागिव किं न तदाप्यर्थक्रियायामुदास्ते । उपक्रियेत चेत् सः,
तर्हि तैरुपकारोऽभिन्नो, भिन्नो वा क्रियत इति वाच्यम् । अभेदे स एव क्रियते । इति लाभ-
मिच्छतो२ मूलक्षतिरायाता कृतकत्वेन तस्यानित्यत्वापत्तेः ॥
भेदे तु कथं तस्योपकारः, किं न सह्यविन्ध्याद्रेरपि । तत्सम्बन्धात् तस्यायमिति चेत्,
उपकार्योपकारयोः कः सम्बन्धः ? न तावत् संयोगः, द्रव्ययोरेव तस्य भावात् । अत्र तु उपकार्यं
द्रव्यम्, उपकारश्च क्रियेति न संयोगः । नापि समवायः, तस्यैकत्वात् व्यापकत्वाच्च प्रत्यासत्ति-
विप्रकर्षाभावेन सर्वत्रतुल्यत्वान्न नियतैः सम्बन्धिभिः सम्बन्धो युक्तः । नियतसम्बन्धि-सम्बन्धे
चाङ्गीक्रियमाणे तत्कृत उपकारोऽस्य समवायस्याभ्युपगन्तव्यः । तथा च सति उपकारस्य
अब यदि कहा जाय कि नित्य पदार्थ स्वयं सहकारी कारणोंकी अपेक्षा नहीं करते, परन्तु सहकारी
कारणोंके अभावमें नहीं होनेवाला कार्य ही सहकारी कारणोंकी अपेक्षा रखता है, तो प्रश्न होता है कि
वह नित्य पदार्थ समर्थ है या असमर्थ ? यदि वह समर्थ है तो वह सहकारी कारणोंके मुँहकी तरफ क्यों
देखता है ? क्यों झटपट कार्य नहीं कर डालता ? यदि कहो कि जिस प्रकार बीजके समर्थ होते हुए भी बीज
पृथिवी, जल, वायु आदिके सहयोगसे ही अंकुरको उत्पन्न करता है, अन्यथा नहीं; इसी प्रकार नित्य पदार्थ
समर्थ होते हुए भी सहकारियोंके बिना कार्य नहीं करता । तो प्रश्न होता है, कि सहकारी कारण नित्य
पदार्थका कुछ उपकार करते हैं या नहीं ? यदि सहकारी कारण नित्य पदार्थका कुछ उपकार नहीं करते हैं
तो वह नित्य पदार्थ जैसे सहकारी कारणोंके सम्बन्धके पहले अर्थक्रिया करनेमें उदास था, वैसे ही सह-
कारियोंके संयोग होनेपर भी क्यों उदास नहीं रहता ? यदि कहो कि सहकारी नित्य पदार्थका उपकार करते
हैं, तो प्रश्न होता है कि यह उपकार पदार्थसे अभिन्न है या भिन्न ? यदि सहकारी पदार्थसे अभिन्न ही
उपकार करते हैं तो सिद्ध हुआ कि नित्य पदार्थ ही अर्थक्रियाको करता है । इस प्रकार लाभकी इच्छा रखने-
वाले वादीके मूलका भी नाश हो जाता है । क्योंकि यदि नित्य पदार्थ सहकारियोंकी अपेक्षा रखेगा तो वह
कृतक हो जायेगा और कृतक होनेसे वह नित्य नहीं रह सकता ।
यदि सहकारियोंका उपकार पदार्थसे भिन्न है, तो भेदत्व सामान्यसे सह्य-विन्ध्यके साथ भी उस भिन्न-
उपकारका सम्बन्ध क्यों नहीं मानते ? ( अर्थात् यदि सहकारियोंके उपकारसे नित्य पदार्थ सर्वथा भिन्न है
तो यह नहीं मालूम हो सकता कि वह उपकार नित्य पदार्थका ही है । ऐसी हालतमें सह्य और विन्ध्यका
भी उपकार माना जा सकता है, क्योंकि सहकारियों तथा सह्य और विन्ध्यमें भी भेद है । ) यदि कहो, कि
नित्य पदार्थके साथ उपकारके सम्बन्धसे यह उपकार इस नित्य पदार्थका है—ऐसी प्रतीति होती है, तो
प्रश्न होता है कि उपकार्य और उपकार दोनोंमें कौनसा सम्बन्ध है ? उपकार और उपकार्यमें संयोग सम्बन्ध
बन नहीं सकता, क्योंकि दो द्रव्योंमें ही संयोग-सम्बन्ध होता है । यहाँपर उपकार्य द्रव्य है, और उपकार
क्रिया है, इसलिए संयोग-सम्बन्ध सम्भव नहीं । उपकार्य और उपकारमें समवाय-सम्बन्ध भी नहीं बन सकता ।
क्योंकि समवाय एक है और व्यापक है । इसलिए समवाय न किसी पदार्थसे दूर है और न समीप, वह सब
पदार्थोंमें समान है । अतएव नियत सम्बन्धियोंके साथ समवायका सम्बन्ध मानना ठीक नहीं । यदि नियत-
सम्बन्धियोंके साथ समवायका सम्बन्ध स्वीकार किया जाय तो सहकारियोंसे किये हुए उपकारको भी समवाय-
का उपकार मानना चाहिए । तथा इस तरह उपकारके विषयमें जो भेद अभेद कल्पनाएँ की गयी थीं, वे
१. पृथिवी । २. यदा कश्चिद्वार्धुषिकः स्वद्रव्यं कुसीदेच्छयाधमर्णाय प्रयच्छति । तेनाधमर्णेन न मूलद्रव्यं
न वा कुसीदं प्रत्यावर्त्यते तदायं न्यायः समापतति । वृद्धिमिच्छतो मूलद्रव्यक्षतिरुत्पन्नेत्यर्थः ।
२४ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक ५
भेदाभेदकल्पना तदवस्थैव । उपकारस्य समवायस्य समवायादभेदे समवाय एव कृतः स्यात् ।
भेदे पुनरपि समवायस्य न नियतसम्बन्धिसम्बन्धत्वम् । तन्नैकान्तनित्यो भावः क्रमेणार्थ-
क्रियां कुरुते ॥
नाप्यक्रमेण । नह्येको भावः सकलकालकलाकलापभाविनीर्युगपत् सर्वाः क्रियाः करो-
तीति प्रातीतिकम् । कुरुतां वा, तथापि द्वितीयक्षणे किं कुर्यात् । करणे वा, क्रमपक्षभावी दोषः ।
अकरणे त्वर्थ क्रियाकारित्वाभावाद् अवस्तुत्वप्रसङ्गः । इत्येकान्तनित्यात् क्रमाक्रमाभ्यां व्याप्तार्थ-
क्रिया व्यापकानुपलब्धिबलाद् व्यापकनिवृत्तौ निवर्तमाना स्वव्याप्यमर्थक्रियाकारित्वं निवर्त-
यति । अर्थक्रियाकारित्वं च निवर्तमानं स्वव्याप्यं सत्त्वं निवर्तयति । इति नैकान्तनित्यपक्षो
युक्तिक्षमः ॥
एकान्तनित्यपक्षोऽपि न कक्षीकरणार्हः । अनित्यो हि प्रतिक्षणविनाशी स च न
क्रमेणार्थक्रियासमर्थः देशकृतस्य कालकृतस्य च क्रमस्यैवाभावात् । क्रमो हि पौर्वापर्यम्, तच्च
क्षणिकस्यासम्भवि । अवस्थितस्यैव हि नानादेशकालव्याप्तिः देशक्रमः कालक्रमश्चाभिधीयते ।
न चैकान्तविनाशिनि सास्ति ।
वैसी की वैसी ही रहीं । तथा उपकार और समवायका अभेद माननेपर समवाय और उपकार एक हो ठहरेंगे,
और फिर तो सहकारियोंने उपकार नहीं किया, किन्तु समवायने ही किया—ऐसा कहना चाहिए । यदि
समवाय और उपकार भिन्न हैं, तो नियत सम्बन्धियोंके साथ समवायका सम्बन्ध नहीं हो सकता । (अभिप्राय
यह है कि उपकार और समवायके भेद माननेमें दोनोंका संयोग सम्बन्ध नहीं हो सकता, क्योंकि संयोग
सम्बन्ध द्रव्योंमें ही होता है । यदि दोनोंमें समवाय सम्बन्ध माना जाय तो समवाय व्यापक है, इसलिए
नियत सम्बन्धियोंके साथ समवाय सम्बन्ध भी नहीं बन सकता ।) अतएव एकान्त नित्यमें क्रमसे अर्थक्रिया
नहीं हो सकती ।
नित्य पदार्थ अक्रमसे भी अर्थक्रिया नहीं करता है । क्योंकि एक पदार्थ समस्त कालमें होनेवाली
अर्थक्रियाको एक ही समयमें कर डाले, यह अनुभवमें नहीं आता । अथवा यदि नित्य पदार्थ अक्रमसे अर्थ-
क्रिया करे भी, तो वह दूसरे क्षणमें क्या करेगा ? यदि कहो कि दूसरे क्षणमें भी वह अर्थक्रिया करता है तो
जो दोष क्रमसे अर्थक्रिया करनेमें आते हैं, वे सब दोष यहाँ भी आयेंगे । यदि कहा जाय कि नित्य पदार्थ
दूसरे क्षणमें कुछ भी नहीं करता, तो दूसरे क्षणमें अर्थक्रियाकारित्वका अभाव होनेसे नित्य पदार्थ अवस्तु
ठहरेगा । इस प्रकार व्यापककी अनुपलब्धिके कारण व्यापककी निवृत्ति हो जानेसे विरत हो जानेवाली क्रम
और अक्रमसे व्याप्त ऐसी अर्थक्रिया अपने व्याप्य अर्थक्रियाकारित्वकी भी निवृत्ति कर देती है । तथा निवृत्त
होनेवाला अर्थक्रियाकारित्व अपने व्याप्य पदार्थकी भी निवृत्ति कर देता है । अतः एकान्त-नित्य पदार्थमें
क्रम और अक्रमसे अर्थक्रिया नहीं बनती । तथा वस्तुमें अर्थक्रियाकारित्वके नष्ट हो जानेपर वस्तुका अस्तित्व
अन्य. यो. व्य. श्लोक ५ ] स्याद्वादमञ्जरी २५
यदाहुः—
“यो यत्रैव स तत्रैव यो यदैव तदैव सः।
न देशकालयोर्व्याप्तिर्भावानामिह विद्यते”॥
न च सन्तानापेक्षया पूर्वोत्तरक्षणानां क्रमः सम्भवति; सन्तानस्यावस्तुत्वात् । वस्तुत्वेऽपि
तस्य यदि क्षणिकत्वं, न तर्हि क्षणेभ्यः कश्चिद्विशेषः। अथाक्षणिकत्वं, तर्हि समाप्तः
क्षणभङ्गवादः॥
नाप्यक्रमेणार्थक्रिया क्षणिके सम्भवति। स ह्येको बीजपूरादिक्षणो¹ युगपदनेकान्
रसादिक्षणान् जनयन् एकेन स्वभावेन जनयेत्, नानास्वभावैर्वा ? यद्येकेन तदा तेषां रसादि-
क्षणानामेकत्वं स्यात्, एकस्वभावजन्यत्वात् । अथ नानास्वभावैर्जनयति किञ्चिद्रूपादिकमुपा-
दानभावेन, किञ्चिद्रसादिकां सहकारित्वेन, इति चेत्, तर्हि ते स्वभावास्तस्यात्मभूता, अनात्म-
भूता वा ? अनात्मभूताश्चेत् स्वभावत्वहानिः। यद्यात्मभूताः तर्हि तस्यानेकत्वम्; अनेकस्व-
भावत्वात् । स्वभावानां वा एकत्वं प्रसज्येत; तद्व्यतिरिक्तत्वात् तेषां तस्य चैकत्वात् ॥
पदार्थ क्षण-क्षणमें नष्ट होनेवाला है, इसलिए वह क्रमसे अर्थक्रिया नहीं कर सकता। कारण कि अनित्य
पदार्थमें देश और कालकृत क्रम सम्भव नहीं। पूर्वक्रम और अपरक्रम क्षणिक पदार्थमें असम्भव है। क्योंकि
नित्य पदार्थमें ही अनेक देशोंमें रहनेवाला देशक्रम और अनेक कालमें रहनेवाला कालक्रम सम्भव हो सकता
है। सर्वथा अनित्य पदार्थामें देश और कालक्रम नहीं हो सकता। कहा भी है:—
'जो पदार्थ जिस स्थान (देश) और जिस क्षण (काल) में है, वह उसी स्थान और उसी
क्षणमें है, क्षणिक भावोंके साथ देश और कालकी व्याप्ति नहीं बन सकती।'
यदि कहा जाय कि सन्तानकी अपेक्षासे पूर्व और उत्तर क्षणमें क्रम सम्भव हो सकता है तो यह भी
ठीक नहीं। क्योंकि सन्तान कोई वस्तु ही नहीं। यदि सन्तानको वस्तु स्वीकार किया जाय, तो सन्तान
क्षणिक है, अथवा अक्षणिक ? सन्तानको क्षणिक माननेपर सन्तानमें क्षणिक पदार्थोंसे कोई विशेषता न होगी।
अर्थात् जिस प्रकार पदार्थोंके क्षणिक होनेपर उनमें क्रम नहीं होता, वैसे ही सन्तानमें भी क्रम न होगा।
यदि सन्तान अक्षणिक है, तो क्षणभंगवाद ही नहीं बन सकता।
क्षणिक पदार्थमें अक्रमसे भी अर्थक्रिया सम्भव नहीं। क्योंकि एक बीजपूर (बिजौरा) आदि क्षण
(बौद्ध लोग वस्तुओंको क्षण कहते हैं, क्योंकि उनके मतमें सब पदार्थ क्षणिक हैं) एक साथ अनेक रस
आदि क्षण (वस्तु) को एक स्वभावसे उत्पन्न करता है, अथवा नाना स्वभावसे ? यदि एक स्वभावसे
उत्पन्न करता है, तो एक स्वभावसे उत्पन्न होनेके कारण रस आदि पदार्थोंमें एकता हो जानी चाहिए।
यदि बीजपूर क्षण रस आदि क्षणको नाना स्वभावोंसे उत्पन्न करता है—अर्थात् किसी रूप आदिको उपा-
दानभावसे, और किसी रस आदिको सहकारीभावसे उत्पन्न करता है—तो प्रश्न होता है कि वे उपादान
और सहकारीभाव बीजपूरके आत्मभूत (निजस्वभाव) हैं, या अनात्मभूत (परस्वभाव) ? यदि उपादानादि
भाव बीजपूरके अनात्मभूत हैं तो उपादानादि भाव बीजपूरके स्वभाव ही नहीं कहे जा सकते। यदि उपा-
दानादि भाव बीजपूरके आत्मभूत हैं तो अनेक स्वाभावरूप होनेसे बीजपूर पदार्थमें अनेकता हो जायेगी,
अर्थात् जितने स्वभाव होंगे, उतने ही उन स्वभावोंके धारक बीजपूर पदार्थ भी होंगे। अथवा उपादानादि
बीजपूर पदार्थसे अभिन्न हैं, और बीजपूर एक है, इसलिए स्वभावोंका एकत्व हो जायेगा।
१. 'बीजपूरादिरूपादि' पाठान्तरम् । एते बौद्धाः क्षणशब्देन पदार्थान् गृह्णन्ति । यतः सर्वे पदार्थाः
क्षणिकाः ।
४
२६ श्रीमद्रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक ५
अथ य एव एकत्रोपादानभावः स एवान्यत्र सहकारिभाव इति न स्वभावभेद इष्यते ।
तर्हि नित्यस्यैकरूपस्यापि क्रमेण नानाकार्यकारिणः स्वभावभेदः कार्यसाङ्कर्यं च कथमिष्यते
क्षणिकवादिना । अथ नित्यमेकरूपत्वादक्रमं; अक्रमाच्च क्रमिणां नानाकार्याणां कथमुत्पत्तिः
इति चेत्, अहो स्वपक्षपाती देवानांप्रियः यः खलु स्वयमेकस्माद् निरंशाद् रूपाटिक्षणात्
कारणाद् युगपदनेककार्याण्यङ्गीकुर्वाणोऽपि परपक्षे नित्येऽपि वस्तुनि क्रमेण नानाकार्यकरणेऽपि
विरोधमुद्भावयति । तस्माद् क्षणिकस्यापि भावस्याक्रमेणार्थक्रिया दुर्घटा । इत्यनित्यैकान्तादपि
क्रमाक्रमयोर्व्यापकयोर्निवृत्त्यैव व्याप्यार्थक्रियापि व्यावर्तते । तद्व्यावृत्तौ च सत्त्वमपि व्यापका-
नुपलब्धिबलेनैव निवर्तते । इत्येकान्तानित्यवादो
अन्य. यो. व्य. श्लोक ५ ] स्याद्वादमञ्जरी २७
“भागे सिंहो नरो भागे योऽर्थो भागद्वयात्मकः ।
तमभागं विभागेन नरसिंहं प्रचक्षते” ॥ इति ॥
वैशेषिकैरपि चित्ररूपस्यैकस्यावयविनोऽभ्युपगमात् एकस्यैव पटादेश्चलाचलरक्तरक्ता-
वृतानावृत्तत्वादिविरुद्धधर्माणामुपलब्धेः । सौगतैरप्येकत्र चित्रपटीज्ञाने नीलानीलयोर्विरोधा-
नङ्गीकारात् ॥
अत्र च यद्यप्यधिकृतवादिनः प्रदीपदिकं कालान्तरावस्थायित्वात् क्षणिकं न मन्यन्ते
तन्मते पूर्वापरान्तावच्छिन्नायाः सत्ताया एवानित्यता लक्षणात्, तथापि बुद्धिसुखादिकं तेऽपि
क्षणिकतयैव प्रतिपन्नाः इति तदधिकारेऽपि क्षणिकवादचर्चा नानुपपन्ना । यद्यपि च कालान्त-
रावस्थायि वस्तु तदापि नित्यानित्यमेव । क्षणोऽपि न खलु सोऽस्ति यत्र वस्तु उत्पादव्ययध्रौ-
व्यात्मकं नास्ति
२८ श्रीमद्रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक ६
अथ तदभिमतमीश्वरस्य जगत्कर्तृत्वमभ्युपगमं मिथ्याभिनिवेशरूपं निरूपयन्नाह—
कर्तास्ति कश्चिज्जगतः स चैकः स सर्वगः स स्ववशः स नित्यः ।
इमाः कुहेवाकविडम्बनाः स्युस्तेषां न येषामनुशासकस्त्वम् ॥६॥
जगतः—प्रत्यक्षादिप्रमाणोपलक्ष्यमाणचराचररूपस्य विश्वत्रयस्य, कश्चिद्—अनिर्वच-
नीयस्वरूपः पुरुषविशेषः, कर्ता—स्रष्टा, अस्ति—विद्यते । ते हि इत्थं प्रमाणयन्ति । उर्वीपर्वत-
तर्वाऽऽदिकं सर्वं, बुद्धिमत्कर्तृकं, कार्यत्वात् ; यद् यत् कार्यं तत् तत्सर्वं बुद्धिमत्कर्तृकं, यथा घटः,
तथा चेदं, तस्मात् तथा । व्यतिरेके व्योमादि । यश्च बुद्धिमांस्तत्कर्ता स भगवानीश्वर एवेति ॥
उत्तर प्रदेशोंके साथ संयोग होनेस उत्पाद, तथा पूर्वोत्तर दोनों पर्यायोंमें आकाश द्रव्यके मौजूद रहनेसे ध्रौव्य
अवस्थाएँ पायी जाती हैं । इसलिए द्रव्यकी अपेक्षा आकाश नित्य है, और पर्यायकी अपेक्षा अनित्य । दूसरे
शब्दोंमें, जैनसिद्धान्तके अनुसार, द्रव्य और पर्याय कथंचित्-भिन्न हैं और कथंचित्-अभिन्न । जिस प्रकार
बिना द्रव्यके पर्याय नहीं रह सकती, उसी तरह बिना पर्यायके द्रव्य नहीं रह सकते । परन्तु वैशेषिक लोग
कुछ पदार्थोंको सर्वथा नित्य मानते हैं और कुछको सर्वथा अनित्य । इसीलिए वैशेषिकों द्वारा मान्य 'अप्रच्युत,
अनुत्पन्न और स्थिररूप' नित्यका लक्षण न स्वीकार करके जैन लोग 'पदार्थके भावका नष्ट नहीं होना' ही
नित्यत्वका लक्षण मानते हैं ।
इस श्लोककी व्याख्यामें टीकाकार मल्लिषेणने निम्न विषयोंपर भी विचार किया है ।
(१) अन्धकार तेजकी ही एक पर्यायविशेष है, सर्वथा अभावरूप नहीं है । जैनदर्शनके अनुसार
प्रकाशकी तरह तम भी चक्षुका विषय है । इसलिए जैनशास्त्रोंमें अन्धकारको पौद्गलिक—स्पर्श, रस, गन्ध
और वर्णयुक्त—स्वीकार किया गया है । जैन लोगोंका कहना है कि यदि वैशेषिक लोग दीपककी प्रभाको
पौद्गलिक मानते हैं, तो उ-हें अन्धकारको पुद्गलकी पर्याय माननेमें क्या आपत्ति है ?
(२) पदार्थको एकान्त-नित्य अथवा एकान्त-अनित्य स्वीकार करनेसे उसमें अर्थक्रियाकारित्व अर्थात्
वस्तुत्व ही सिद्ध नहीं होता । इस विषयको नाना ऊहापोहात्मक विकल्पोंके साय टीकाकारने विस्तारपूर्वक
प्रतिपादित किया है ।
( ३ ) नित्यानित्यके सिद्धान्तको दूसरे वादी भी रूपान्तरसे स्वीकार करते हैं । उदाहरणके लिए,
वैशेषिक लोग पृथिवीको नित्य और अनित्य दोनों मानते हैं; तथा एक ही अवयवीके चित्ररूपकी कल्पना
करते हैं । बौद्ध लोग भी एक ही चित्रपटमें नील-अनील धर्मोंको मानते हैं । इसी तरह पातंजलमतके अनु-
यायी धर्म, लक्षण और अवस्थाको धर्मीसे भिन्न और अभिन्न मानते हैं ।
अब, वैशेषिकों द्वारा मान्य ईश्वरके जगत्कर्तृत्वमें दूषण देते हुए कहते हैं—
श्लोकार्थ—हे नाथ, जो अप्रामाणिक लोग 'जगत्का कोई कर्त्ता है (१) वह एक है, (२) सर्व-
व्यापी है, (३) स्वतन्त्र है और (४) नित्य है' आदि दुराग्रहसे परिपूर्ण सिद्धान्तोंको स्वीकार करते हैं, उनका
तू अनुशास्ता नहीं हो सकता ।
व्याख्यार्थ—पूर्वपक्ष—'जगतः कश्चित् कर्ता अस्ति'—प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंसे जाने हुए स्थावर और
जंगमरूप तीनों विश्वका अनिर्वचनीय स्वरूप कोई पुरुषविशेष सृष्टिकर्ता है । इसमें निम्नलिखित प्रमाण दिया
गया है—'पृथिवी, पर्वत, वृक्ष अ.दि पदार्थ किसी बुद्धिमान कर्ताके बनाये हुए हैं, क्योकि ये कार्य हैं; जो
जो कार्य होते हैं वे सब किसी बुद्धिमान् कर्ताके बनाये हुए होते हैं, जैसे घट पृथिवी, पर्वत आदि भी कार्य
हैं, इसलिए ये भी बुद्धिमान् कर्ताके बनाये हुए होने चाहिए' । व्यतिरेक रूपमें—'आकाश आदि कार्य नहीं
हैं, इसलिए किसी बुद्धिमान् कर्ताका बनाया हुआ भी नहीं है ।' जो कोई इन पदार्थोंका बुद्धिमान् कर्ता है
वह भगवान् ईश्वर ही है ।
अन्य. यो. व्य. श्लोक ६ ] स्याद्वादमञ्जरी २९
न चायमसिद्धो¹ हेतुः । यतो भूभूधरादेः स्वस्वकारणकलापजन्यतया अवयवितया वा
कार्यत्वं सर्ववादिनां प्रतीतमेव । नाप्यनैकान्तिको² विरुद्धो³ वा । विपक्षादत्यन्तव्यावृत्तत्वात् ।
नापि कालात्ययापदिष्टः⁴ । प्रत्यक्षानुमानागमाबाधितधर्मधर्म्यनन्तरप्रतिपादितत्वात् । नापि
प्रकरणसमः⁵ तत्प्रतिपन्थिधर्मोपपादनसमर्थप्रत्यनुमानाभावात् ॥
न च वाच्यम् ईश्वरः पृथ्वीपृथ्वीधरादेर्विधाता न भवति; अशरीरत्वात्, निवृत्तात्मवत्,
इति प्रत्यनुमानं तद्बाधकमिति । यतोऽत्रेश्वररूपो धर्मी प्रतीतोऽप्रतीतो वा प्ररूपितः ? न
तावदप्रतीतः, हेतोराश्रयासिद्धिप्रसङ्गात् । प्रतीतश्चेत्, येन प्रमाणेन स प्रतीतस्तेनैव किं स्वय-
मुत्पादितस्वतनुर्न प्रतीयते । इत्यतः कथमशरीरत्वम् । तस्मान्निरवद्य एवायं हेतुरिति ॥
उक्त हेतु असिद्ध नहीं है। क्योंकि अपने-अपने कारणोंसे उत्पन्न होनेके और अवयवी होनेके कारण
पृथिवी, पर्वत आदिका कार्यत्व सभी वादियोंने स्वीकार किया है। यह हेतु अनैकान्तिक ( व्यभिचारी )
अथवा विरुद्ध भी नहीं है, क्योंकि इसकी विपक्षसे अत्यन्त व्यावृत्ति है। ( जिस हेतुकी विपक्षमें भी अविरुद्ध
वृत्ति हो, अर्थात् जो हेतु विपक्षमें भी चला जाय उसे अनैकान्तिक हेत्वाभास कहते हैं। जैसे घड़ा ठण्डा है,
क्योंकि मूर्तिक है। यहाँ मूर्तिकत्वकी व्याप्ति ठण्डा और गरम दोनोंके साथ है, अर्थात् मूर्तिकत्व हेतु विपक्ष
( गरम ) में भी चला जाता है, इसलिए दूषित है। यहाँ कार्यत्व हेतुकी विपक्ष अर्थात् आकाश आदिसे
व्यावृत्ति है, इसलिए यह हेतु अनैकान्तिक नहीं है। इसीलिए कार्यत्व हेतु विरुद्ध भी नहीं है। जिस
हेतुका अविनाभावसम्बन्ध साध्यसे विरुद्धके साथ निश्चित हो उसे विरुद्ध हेत्वाभास कहते हैं। जैसे शब्द
परिवर्तनशील है, क्योंकि उत्पत्तिवाला है। यहाँ उत्पत्तिकी व्याप्ति परिवर्तनशीलताके साथ है, जो साध्यसे
विरुद्ध है। प्रस्तुत कार्यत्व हेतु अपने साध्य बुद्धिमत्कर्तृत्वके साथ अविनाभावसम्बन्धसे रहता है, इस-
लिए विरुद्ध नहीं है।) कार्यत्व हेतु कालात्ययापदिष्ट भी नहीं है, क्योंकि यह प्रत्यक्ष अनुमान और
आगमसे अबाधित, धर्म और धर्मीके सिद्ध हो जानेपर प्रतिपादन किया गया है—अर्थात् पहले प्रमाणसिद्ध
धर्म-धर्मीका कथन करके बादमें हेतुका कथन किया गया है। यह हेतु प्रकरणसम भी नहीं है, क्योंकि यहाँ
कोई बाधक प्रत्यनुमान नहीं है। (जहाँ साध्यके अभावका साधक कोई दूसरा अनुमान मौजूद हो उसे प्रकरणसम
कहते हैं। यहाँ कार्यत्व हेतुके प्रतिकूल बुद्धिमदकर्तृकत्व धर्मको सिद्ध करनेवाला कोई प्रत्यनुमान नहीं है।)
प्रतिवादी—'ईश्वर पृथिवी, पर्वत आदिका कर्ता नहीं है, क्योंकि वह अशरीरी है, मुक्तात्माकी
तरह'—यह प्रत्यनुमान उक्त कार्यत्व हेतुका बाधक है, इसलिए कार्यत्वहेतु प्रकरणसम हेत्वाभाससे दूषित
है। वैशेषिक—यह शंका ठीक नहीं। क्योंकि 'ईश्वर पृथिवी, पर्वत आदिका कर्ता नहीं है'—इस वाक्यमें
ईश्वररूप धर्मी प्रतीत है, अथवा अप्रतीत ? यदि धर्मी अप्रतीत हो, तो हेतु आश्रयासिद्ध होगा; अर्थात् जब
धर्मी ही अप्रतीत है तब अशरीरत्व हेतु कहाँ रहेगा ? यदि कहो कि उक्त अनुमानमें ईश्वर प्रतीत है तो जिस
प्रमाणसे ईश्वर प्रतीत है; उसी प्रमाणसे यह क्यों नहीं मानते कि ईश्वर स्वयं उत्पन्न किये हुए शरीरको ही
धारण करता है। अर्थात् ईश्वरको प्रतीत ( जाना हुआ ) माननेसे क्या ऐसा प्रतीत नहीं होता कि ईश्वरने
अपना शरीर स्वयं बनाया है, और वह जगत्को बनानेमें समर्थ है। इसलिए ईश्वरको शरीररहित नहीं
कह सकते । अतएव ईश्वरके कर्तृत्वमें हमारा दिया हुआ कार्यत्व हेतु असिद्ध, विरुद्ध आदि दोषोंसे रहित
होनेके कारण निर्दोष है।
१. अयं साध्यसमशब्देनाभिधीयते । 'साध्याविशिष्टः साध्यत्वात्साध्यसमः' । गौतमसूत्रे । १-२-८ ।
२. 'अनैकान्तिकः सव्यभिचारः' । गौतमसूत्रे १-२-५ । ३. 'सिद्धान्तमभ्युपेत्य तद्विरोधी विरुद्धः' ।
गौतमसूत्रे १-२-६ । ४. 'कालात्ययापदिष्टः कालातीतः' । गौतमसूत्रे १-२-९ । ५. 'यस्मात्प्रकरणचिन्ता स
निर्णयार्थमपदिष्टः प्रकरणसमः' । गौतमसूत्रे १-२-७ ।
३० श्रीमद्रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक ६
स चैक इति । चः पुनरर्थे । स पुनः-पुरुषविशेषः; एकः-अद्वितीयः । बहूनां हि विश्व-
विधातृत्वस्वीकारे परस्परविमतिसम्भावनाया अनिवार्यत्वाद् एकैकस्य वस्तुनोऽन्यान्यरूपतया
निर्माणे सर्वमसमञ्जसमापद्येत इति ॥
तथा स सर्वग इति । सर्वत्र गच्छतीति सर्वगः-सर्वव्यापी । तस्य हि प्रतिनियतदेश-
वर्तित्वेऽनियतदेशवृत्तीनां विश्वत्रयान्तर्वर्तिपदार्थसार्थानां यथावन्निर्माणानुपपत्तिः । कुम्भकारा-
दिषु तथा दर्शनाद् । अथवा सर्वं गच्छति जानातीति सर्वगः-सर्वज्ञः “सर्वे गत्यर्था
ज्ञानार्थाः१” इति वचनात् । सर्वज्ञत्वाभावे हि यथोचितोपादानकारणायनभिज्ञत्वाद् अनुरूप-
कार्योत्पत्तिर्न स्यात् ॥
तथा स स्ववशः-स्वतन्त्रः, सकलप्राणिनां स्वेच्छया सुखदुःखयोरनुभावनसमर्थत्वात् ।
तथा चोक्तम्—
“ईश्वरप्रेरितो गच्छेत् स्वर्गं वा श्वभ्रमेव वा ।
अन्यो जन्तुरनीशोऽयमात्मनः सुखदुःखयोः ॥”
पारतन्त्र्ये तु तस्य परमुखप्रेक्षितया मुख्यकर्तृत्वव्याघाताद् अनीश्वरत्वापत्तिः ॥
तथा स नित्य इति । अप्रच्युतानुत्पन्नस्थिरैकरूपः । तस्य ह्यनित्यत्वे परोत्पाद्यतया
कृतकत्वप्राप्तिः । अपेक्षितपरव्यापारो हि भावः स्वभावनिष्पत्तौ कृतक इत्युच्यते । यश्चापरस्त-
त्कर्ता कल्प्यते, स नित्योऽनित्यो वा स्यात् ? नित्यश्चेत् अधिकृतेश्वरेण किमपराद्धम् । अनित्य-
श्चेत्, तस्याप्युत्पादकान्तरेण भाव्यम् । तस्यापि नित्यानित्यत्वकल्पनायाम् अनवस्थादौ-
स्थ्यमिति ॥
(१) वह पुरुषविशेष एक अर्थात् अद्वितीय ( 'एक' ) है । क्योंकि यदि बहुतसे ईश्वरोंको संसारका
कर्ता स्वीकार किया जाय, तो एक दूसरेकी इच्छामें विरोध उत्पन्न होनेके कारण एक वस्तुके अन्य रूपमें
निर्माण होनेसे संसारमें असमञ्जस उत्पन्न हो जायेगा ।
(२) ईश्वर सर्वव्यापी ('सर्वग') है। यदि ईश्वरको नियत प्रदेशमें ही व्याप्त माना जाय, तो अनियत
स्थानोंके तीनों लोकोंके समस्त पदार्थोंकी यथारीति उत्पत्ति सम्भव न होगी। जैसे कुम्भकार एक प्रदेशमें रहकर
नियत प्रदेशके घटादिक पदार्थोंको ही बना सकता है, वैसे ही ईश्वर भी नियत प्रदेशमें रहकर अनियत प्रदेशके
पदार्थोंकी रचना नहीं कर सकता । अथवा, ईश्वर सब पदार्थोंको जाननेवाला ( 'सर्वज्ञ' ) है । क्योंकि कहा
है "गत्यर्थक धातु ज्ञानार्थक होती हैं" । यदि ईश्वरको सर्वज्ञ न मानें, तो यथायोग्य उपादान कारणोंके न
जाननेके कारण वह ईश्वर अनुरूप कार्योंकी उत्पत्ति न कर सकेगा ।
(३) ईश्वर स्वतन्त्र ('स्ववश') है, क्योंकि वह अपनी इच्छासे ही सम्पूर्ण प्राणियोंको सुख-दुखका
अनुभव करानेमें समर्थ है । कहा भी है—
“ईश्वर द्वारा प्रेरित किया हुआ जीव स्वर्ग और नरकमें जाता है। ईश्वरकी सहायताके बिना कोई
अपने सुख-दुःख उत्पन्न करनेमें स्वतन्त्र नहीं है।”
ईश्वरको परतन्त्र स्वीकार करनेमें उसके परमुखापेक्षी होनेसे, मुख्य कर्तृत्वको बाधा पहुँचेगी जिससे
कि उसका ईश्वरत्व ही नष्ट हो जायेगा ।
(४) ईश्वर अविनाशी, अनुत्पन्न और स्थिररूप 'नित्य' है। ईश्वरको अनित्य माननेमें एक ईश्वर
दूसरे ईश्वरसे उत्पन्न होगा, इसलिए वह कृतक—अपने स्वरूपकी सिद्धिमें दूसरेकी अपेक्षा रखनेवाला—हो
जायगा। तथा ईश्वरका जो कोई दूसरा कर्ता मानोगे, वह नित्य है या अनित्य ? यदि नित्य है तो एक ही
ईश्वरको नित्य क्यों नहीं मान लेते । यदि ईश्वरका कर्ता अनित्य है, तो उस अनित्य कर्ताका कोई दूसरा
उत्पादक होना चाहिए । फिर वह कर्ता नित्य होगा या अनित्य ? इस प्रकार अनवस्था दोष उत्पन्न होगा ।
१. 'गत्यर्था ज्ञानार्थाः' हेमहंसगणिसमुच्चितहेमचन्द्रव्याकरणस्थन्यायः ४४ इति ।
अन्य. यो. व्य. श्लोक ६ ] स्याद्वादमञ्जरी ३१
तदेवमेकत्वादिविशेषणविशिष्टो भगवानीश्वरस्त्रिजगत्कर्तेति पराभ्युपगममुपदर्श्य उत्तरा-
र्धेन तस्य दुष्टत्वमाचष्टे । इमाः—एताः, अनन्तर्रोक्ताः, कुहेवाकविडम्बनाः—कुत्सिता हेवाकाः-
आग्रहविशेषाः कुहेवाकाः कदाग्रहा इत्यर्थः । त एव विडम्बनाः विचारचातुरीवाह्यत्वेन तिर-
स्काररूपत्वाद् विगोपकप्रकाराः । स्युः--भवेयुः । तेषां प्रामाणिकापसदानाम् । येषां हे स्वामिन्
त्वं नानुशासकः—न शिक्षादाता ॥
तदभिनिवेशानां विडम्बणारूपत्वज्ञापनार्थमेव पराभिप्रेतपुरुषविशेषणेषु प्रत्येकं तच्छब्द-
प्रयोगमसूयागर्भमाविर्भावयाञ्चकार स्तुतिकारः । तथा चैवमेव निन्दनीयं प्रति वक्तारो
वदन्ति । स मूर्खः स पापीयान् स दरिद्र इत्यादि । त्वमित्येकवचनसंयुक्तयुष्मच्छब्दप्रयोगेण
परमेशितुः परसकारुणिकतयानपेक्षितस्वपरपक्षविभागमद्वितीयं हितोपदेशकत्वं ध्वन्यते ।।
अतोऽत्रायमाशयः । यद्यपि भगवानविशेषेण सकलजगज्जन्तुजातहितावहां सर्वेभ्य एव
देशनावाचमाचष्टे, तथापि सैव केषाञ्चिद् निचितनिकाचित¹पापकर्मकलुषितात्मनां रुचिरूपतया
न परिणमते । अपुनर्बन्धक²ादिव्यतिरिक्तत्वेनायोग्यत्वात् । तथा च ³ कादम्ब्यां बाणोऽपि
वभाण—“अपगतमले हि मनसि स्फटिकमणाविव रजनिकरगभस्तयो विशन्ति सुखमुपदेश-
गुणाः । गुरुवचनममलमपि सलिलमिव महदुपजनयति श्रवणस्थितं शूलमभव्यस्य” इति ।
अतो वस्तुवृत्त्या न तेषां भगवाननुशासक इति ॥
उत्तरपक्ष—'इमाः कुहेवाकविडम्बनाः'—इस प्रकारकी कुत्सित आग्रहरूप विडम्बनाएँ विचाररहित
होनेके कारण तिरस्कारके योग्य हैं। अप्रामाणिक लोगोंकी ये विडम्बनाएँ अपने दोषोंको छिपानेके लिए ही
हैं। ऐसे लोगोंके उपदेष्टा, हे स्वामिन्, आप नहीं हो सकते ।
न्याय-वैशेषिकोंकी मान्यताको विडम्बना सिद्ध करनेके लिए ही श्लोकमें न्याय-वैशेषिकों द्वारा अभीष्ट
ईश्वरके प्रत्येक विशेषणोंके साथ 'तत्' शब्दका प्रयोग किया गया है। जिस प्रकार वक्ता लोग किसी निन्दनीय
पुरुषको कहते हैं कि वह मूर्ख है, वह पापी है, वह दरिद्र है, आदि; उसी प्रकार यहाँ भी ईश्वरके लिए
कहा गया है, कि वह जगत्का कर्ता है, वह एक है, वह नित्य है, आदि । श्लोकमें युष्मत् (त्वं) शब्दके
प्रयोगसे परम दयालु होनेके कारण पक्षपातकी भावना रहित जिनेन्द्र भगवान्का अद्वितीय हितोपदेशकत्व
ध्वनित होता है ।
भाव यह है कि यद्यपि भगवान् सामान्यरूपसे सम्पूर्ण प्राणियोंको हितोपदेश करते हैं, परन्तु वह
उपदेश पूर्व जन्ममें उपार्जन किये हुए निकाचित ( जिस कर्मकी उदीरणा, संक्रमण, उत्कर्षण और अपकर्षणरूप
अवस्थाएँ न हो सकें उसे निकाचित कर्म कहते हैं ) पापकर्मोंसे मलिन आत्मावाले प्राणियोंको सुखकर नहीं
लगता । कारण कि इस प्रकारके पापी जीव अपुनर्बन्धक ( जो जीव तीव्र भावोंसे पाप नहीं करता है तथा
जिसकी मुक्ति पुद्गलपरावर्तनमें हो जाती है। उसे अपुनर्बन्धक कहते हैं । ) ( देखिए परिशिष्ट [ क ],
आदि जीवोंसे भिन्न हैं, इसलिये उपदेशके पात्र नहीं हैं। बाणने भी कादम्बरीमें कहा है—“जिस
प्रकार निर्मल स्फटिक मणिमें चन्द्रमाकी किरणोंका प्रवेश होता है, उसी तरह निर्मल चित्तमें उपदेश प्रवेश
१. उदये संकममुदये चउसुवि दातुं कमेण णो सक्कं । उवसंतं च णिवत्ति णिकाचिदं होदि जं कम्मं ।
छाया—उदये संक्रमोदययोः चतुर्ष्वपि दातुं क्रमेण नो शक्यम् । उपशान्तं च निधत्तिः निकाचितं यत् कर्म ॥
( गोम्मटसार कर्मकाण्ड गा० ४४० )
२. 'पावं ण तिव्वभावा कुणइ ण बहुमन्नई भवं घोरम् ।
उच्चिअट्ठिइं च सेवइ सव्वत्थ वि अपुणबन्धोत्ति' ॥
छाया—पापं न तीव्रभावात् करोति न बहुमन्यते भवं घोरम् ।
उचितार्थं च सेवते सर्वत्रापि अपुनर्बन्धक इति ॥ इति धर्मसंग्रहे तृतीयाधिकरणे ।
३. बाणभट्टकृतकादम्बरी पूर्वार्ध, पृ० १०३, पं० १० ।
३२ श्रीमद्रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक ६
न चैतावता जगद्गुरोरसामर्थ्यसम्भावना । न हि कालदष्टमनुजीवयन् समुज्जीवितेत-
रदष्टको विषभिषगुपालम्भनीयः, अतिप्रसङ्गात् । स हि तेषामेव दोषः । न खलु निखिलभुवना-
भोगमवभासयन्तोऽपि भावनीया भानवः १ कौशिक २ लोकस्यालोकहेतुतामभजमाना उपालम्भ-
सम्भावनास्पदम् । तथा च श्रीसिद्धसेनः—
“सद्धर्मबीजवपनानघकौशलस्य यल्लोकबान्धव ! तवापि खिलान्यभूवन् ३ ।
तन्नाद्भुतं खगकुलेष्विह तामसेषु सूर्यांशवो मधुकरीचरणावदाताः ॥४”
अथ कथमिव तत्कुहेवाकानां विडम्बनारूपत्वम् इति । ब्रूमः । यत्तावदुक्तं परैः
'क्षित्यादयो बुद्धिमत्कर्तृकाः, कार्यत्वाद् घटवदिति' । तदयुक्तम् । व्याप्तेरग्रहणात् । “साधनं
हि सर्वत्र व्याप्तौ प्रमाणेन सिद्धायां साध्यं गमयेत्” इति सर्ववादिसम्वादः । स चायं जगन्ति
सृजन् सशरीरोऽशरीरो वा स्यात् ? सशरीरोऽपि किमस्मदादिवद् दृश्यशरीरविशिष्टः, उत
पिशाचादिवददृश्यशरीरविशिष्टः ? प्रथमपक्षे प्रत्यक्षबाधः; तमन्तरेणापि च जायमाने तृणतरु-
पुरन्दरधनुरादौ कार्यत्वस्य दर्शनात् प्रमेयत्वादिवत् साधारणानैकान्तिको हेतुः ॥
करता है । तथा जैसे कानोंमें भरा हुआ निर्मल जल भी महान् पीड़ाको उत्पन्न करनेवाला होता है, वैसे ही
गुरुओंके वचन भी अभव्य जीवको क्लेश उत्पन्न करनेवाले होते हैं ।” इसलिये वास्तवमें भगवान् दुराग्रही
पुरुषोंके उपदे
अन्य. यो. व्य. श्लोक ६ ] स्याद्वादमञ्जरी ३३
द्वितीयविकल्पे पुनरदृश्यशरीरत्वे तस्य माहात्म्यविशेषः कारणम्, आहोस्विदस्मदाद्य-
दृष्टवैगुण्यम् ? प्रथमप्रकारः कोशपानप्रत्यायनीयः,^१ तत्सिद्धौ प्रमाणाभावात् । इतरेतराश्रयदोषो-
पत्तेश्च । सिद्धे हि माहात्म्यविशेषे तस्यादृश्यशरीरत्वं प्रत्येत्तव्यम् । तत्सिद्धौ च माहात्म्यविशेष-
सिद्धिरिति । द्वैतीयिकस्तु प्रकारो न संचरत्येव विचारगोचरे; संशयानिवृत्तेः । किं तस्या-
सत्त्वाद् अदृश्यशरीरत्वं वान्धेयादिवत् किं वास्मदाद्यदृष्टवैगुण्यात् पिशाचादिवदिति
निश्चयाभावात् ।
अशरीरश्चेत् तदा दृष्टान्तदार्ष्टान्तिकयोर्वैषम्यम् । घटादयो हि कार्यरूपाः सशरीरकर्तृका
दृष्टाः । अशरीरस्य च सतस्तस्य कार्यप्रवृत्तौ कुतः सामर्थ्यम् ? आकाशादिवत् । तस्मात्
सशरीराशरीरलक्षणे पक्षद्वयेऽपि कार्यत्वहेतोर्व्याप्त्यसिद्धिः ।
किञ्च, त्वन्मतेन कालात्ययापदिष्टोऽप्ययं हेतुः । धर्म्येकदेशस्य तरुविद्युदभ्रादेरिदानी-
मप्युत्पद्यमानस्य विधातुरनुपलभ्यमानत्वेन प्रत्यक्षबाधितधर्म्यनन्तरं हेतुभणनात् । तदेवं न
कश्चिद् जगतः कर्ता । एकत्वादीनि तु जगत्कर्तृत्वव्यवस्थापनायानीयमानानि तद्विशेषणानि
षण्ढं प्रति कामिन्या रूपसंपन्निरूपणप्रायाण्येव । तथापि तेषां विचारासहत्वख्यापनार्थं
किञ्चिदुच्यते ।
अनैकांतिक हेत्वाभास है। इसी प्रकार यहाँ भी कार्यत्वहेतु पृथ्वो आदि पक्षमें घट आदि सपक्षमें तथा
ईश्वरके शरीर-द्वारा नहीं बनाये हुए घास, वृक्ष आदि विपक्षमें भी कार्यत्वहेतु चला गया, इसलिये यह
हेतु साधारण अनैकांतिक हेत्वाभास होनेसे दोषपूर्ण है । )
यदि कहो कि ईश्वर पिशाच आदिके समान अदृश्य शरीरसे जगत्की सृष्टि करता है तो इस शरीरके
अदृश्य होनेमें ईश्वरका माहात्म्यविशेष कारण है, अथवा हम लोगोंका दुर्भाग्य ? प्रथम पक्ष विश्वासके
योग्य नहीं है। क्योंकि ईश्वरके अदृश्य शरीर सिद्ध करनेमें कोई प्रमाण नहीं है। तथा ईश्वरके माहात्म्य-
विशेष सिद्ध होनेपर उसके अदृश्य शरीर सिद्ध हो, और अदृश्य शरीर सिद्ध होनेपर माहात्म्यविशेष सिद्ध हो,
इस प्रकार इतरेतराश्रय दोष भी आता है। यदि कहो कि हम लोगोंके दुर्भाग्यसे ईश्वरका शरीर दृष्टिगोचर
नहीं होता तो यह भी ठीक नहीं जँचता । क्योंकि वंध्यापुत्रकी तरह ईश्वरका अभाव होनेसे उसका शरीर
दिखाई नहीं देता, अथवा जिस प्रकार हमारे दुर्भाग्यवश पिशाच आदिका शरीर दिखाई नहीं देता, वैसे ही
ईश्वरका शरीर भी अदृश्य है ? इस तरह कुछ भी निश्चय नहीं होता ।
तथा ईश्वरको अशरीरस्रष्टा माननेमें दृष्टांत और दार्ष्टान्तिक विषम हो जाते हैं । क्योंकि घटादिक
कार्य शरीर सहित कर्ताके बनाये हुए ही देखे जाते हैं। फिर आकाशकी तरह अशरीर ईश्वर किस प्रकार
कार्य करनेमें समर्थ हो सकता है ? ( तात्पर्य यह कि 'जगत् अशरीर ईश्वरका बनाया हुआ है, कार्य होनेसे
घटकी तरह' इस अनुमानमें घट दृष्टान्त और जगत् दार्ष्टान्तिकमें समता नहीं है, क्योंकि घट सशरीरीका
बनाया हुआ माना जाता है। तथा जिस तरह अशरीरी आकाश कोई कार्य आदि नहीं कर सकता, उसी तरह
अशरीरी ईश्वर भी कार्य करनेमें असमर्थ है । ) इस कारण सशरीर और अशरीर दोनों पक्षोंमें कार्यत्व हेतु-
की सकर्तृकत्व साध्यके साथ व्याप्ति सिद्ध नहीं होती ।
तथा, तुम्हारे मतसे कार्यत्व हेतु कालात्ययापदिष्ट भी है । क्योंकि जगत्रूप धर्मी ( साध्य ) के एक
देश, इस कालमें उत्पन्न वृक्ष, विद्युत्, मेघ आदि किसी कर्ताके बनाये हुए नहीं देखे जाते हैं, इसलिए यहाँ
प्रत्यक्षसे बाधित धर्मीके अनन्तर हेतुका कथन किया गया है, अतएव यह हेतु दोषपूर्ण है । अतएव कोई
जगत्का कर्ता नहीं है। तथा ईश्वरके जगत्कर्तृत्व साधनमें जो एकत्व आदि विशेषण दिये गये हैं वे सब
नपुंसकके प्रति स्त्रियोंके रूप-लावण्य आदिका कथन करनेके समान हैं। फिर भी इन विशेषणोंपर कुछ विचार
किया जाता है ।
१. शपथेन विभावनीयः ।
५
३४ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक ६
तत्रैकत्वचर्चास्तावत् । बहूनामेककार्यकरणे वैमत्यसम्भावना इति नायमेकान्तः । अनेक-
कीटिकाशतनिष्पाद्यत्वेऽपि शक्रमूर्द्ध्नः, अनेकशिल्पिकल्पितत्वेऽपि प्रासादादीनां, नैकसरघानि-
र्वर्तितत्वेऽपि मधुच्छत्रादीनां चैकरूपताया अविगानेनोपलम्भात् । अथैतेष्वप्येक एवेश्वरः कर्तेति
ब्रूषे । एवं चेद् भवतो भवानीपतिं प्रति निष्प्रतिमा वासना, तर्हि कुविन्दकुम्भकारादिति-
रस्कारेण पटघटादीनामपि कर्ता स एव किं न कल्प्यते । अथ तेषां प्रत्यक्षसिद्धं कर्तृत्वं कथम-
पह्नोतुं शक्यम् । तर्हि कीटिकादिभिः किं तव विराद्धं यत् तेषामसह्यतादृशप्रयाससाध्यं कर्तृ-
त्वमेकहेल्यैवापलप्यते । तस्माद् वैमत्यभयाद् महेशितुरेकत्वकल्पना भोजनादिव्ययभयात्
कृपणस्यात्यन्तवल्लभपुत्रकलत्रादिपरित्यजनेन शून्यारण्यानीसेवनमिवाभासते ।
तथा सर्वगतत्वमपि तस्य नोपपन्नम् । तद्धि शरीरात्मना, ज्ञानात्मना वा स्यात् ? प्रथम-
पक्षे तदीयेनैव देहेन जगतत्रयस्य व्याप्तत्वाद् इतरनिर्मेयपदार्थानामाश्रयानवकाशः । द्वितीयपक्षे
तु सिद्धसाध्यता । अस्माभिरपि निरतिशयज्ञानात्मना परमपुरुषस्य जगत्त्रयक्रोडीकरणाभ्यु-
पगमात् । यदि परमेवं भवत्प्रमाणीकृतेन वेदेन विरोधः । तत्र हि शरीरात्मना सर्वगतत्व-
मुक्तम्—“विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतो मुखो विश्वतः पाणिरुत विश्वतः पात्” इत्यादिश्रुतेः ॥
यच्चोक्तं तस्य प्रतिनियतदेशवर्तित्वे त्रिभुवनगतपदार्थानामनियतदेशवृत्तीनां यथावन्नि-
र्माणानुपपत्तिरिति । तत्रेदं पृच्छयते । स जगत्त्रयं निर्मिमाणस्तक्षादिवत् साक्षाद् देहव्यापारेण
(१) एकत्व—‘बहुत-से ईश्वरोंद्वारा जगतरूप एक कार्यके किये जानेपर ईश्वरोंमें मतिका भे दउत्पन्न
होगा’ यह कथन एकान्त-सत्य नहीं है । क्योंकि सैकड़ों कीड़ियां एक ही वमीको बनाती हैं, बहुत से शिल्पी
एक ही महलको बनाते हैं, बहुत सी मधुमक्खी एक ही शहदके छत्तेका निर्माण करती हैं, फिर भी वस्तुओंकी
एकरूपतामें कोई विरोध नहीं आता । यदि वादी कहे कि बमी, प्रासाद आदिका कर्ता भी ईश्वर ही है, तो
इससे ईश्वरके प्रति आप लोगोंकी निरुपम श्रद्धा ही प्रगट होती है, और इस तरह तो जुलाहे और कुंभकार
आदिको पट और घट आदिका कर्ता न मानकर ईश्वरको ही इनका भी कर्ता मानना चाहिये । यदि आप
कहें कि पट घट आदिके कर्ता जुलाहा और कुंभकारके प्रत्यक्ष-सिद्ध कर्तृत्वका अपलाप कैसे किया जा सकता
है ? तो फिर कीटिका आदिको बमी आदिका कर्ता माननेमें क्या दोष है ? कीटिका आदिने आप लोगोंका
क्या अपराध किया है जो आप उनके असाधारण परिश्रमसे साध्य कर्तृत्वको एक चुटकीमें ही उड़ा देना
चाहते हैं ? इसलिए परस्पर मतिभेद होनेके भयसे जो एक ईश्वरकी कल्पना है, वह भोजन आदिके व्ययके
डरसे कृपण पुरुषके अपने अत्यन्त प्रिय पुत्र और स्त्री आदिको छोड़कर शून्य जंगलमें वास करनेके समान
है । ( जैसे कोई कृपण पुरुष खर्चके भयसे अपने स्त्री-पुत्रादिको छोड़कर वनमें चला जाय, उसी तरह मतिभेदके
भयसे आप लोग भी एक ईश्वरकी कल्पना करते हैं ।)
(२) सर्वगतत्व—तथा ईश्वर सर्वगत भी सिद्ध नहीं होता, क्योंकि ईश्वरका सर्वगतत्व शरीर
की अपेक्षासे है, अथवा ज्ञानकी ? प्रथम पक्षमें ईश्वरका अपना शरीर ही तीनों लोकोंमें व्याप्त हो जायेगा,
फिर दूसरे बनाने योग्य ( निर्मेय ) पदार्थोंके लिए कोई स्थान ही न रहेगा । यदि आपलोग ज्ञानकी अपेक्षा
ईश्वरको सर्वव्यापी मानें, तो इसमें हमारे साध्यको सिद्धि है, क्योंकि हम लोग ( जैन ) भी परमात्माको
निरतिशय ज्ञानकी अपेक्षा तीनों लोकोंमें व्यापी मानते हैं । परन्तु ईश्वरको ज्ञानकी अपेक्षा सर्वगत माननेसे
आपके वेदसे विरोध आता है । वेदमैं ईश्वरको शरीरकी अपेक्षासे सर्वव्यापी कहा है । श्रुति भी है—“ईश्वर
सर्वत्र नेत्रोंका, मुखका, हाथोंका और पैरोंका धारक है ।”
तथा ईश्वरको शरीरकी अपेक्षा सर्वव्यापक माननेमें वादीने हेतु दिया है कि यदि ईश्वरको नियत
स्थानवर्ती माना जाय, तो तीनों लोकोंमें अनियत स्थानोंके पदार्थोंकी यथावत् उत्पत्ति नहीं हो सकेगी; तो
१. शुक्लयजुर्वेदमाध्यन्दिनसंहितायां सप्तदशोऽध्याये १९ मन्त्रे ।
· अन्य. यो. व्य. श्लोक ६ ] स्याद्वादमञ्जरी ३५
निर्मिमीते, यदि वा सङ्कल्पमात्रेण ? आद्ये पक्षे एकस्यैव भूभूधरादेर्विधानेऽक्षोदीयसः कालक्षे-
पस्य सम्भवाद् बहीयसाप्यनेहसा न परिसमाप्तिः । द्वितीयपक्षे तु सङ्कल्पमात्रेणैव कार्यकल्प-
नायां नियतदेशस्थायित्वेऽपि न किञ्चिद् दूषणमुत्पश्यामः । नियतदेशस्थायिनां सामान्यदेवा-
नामपि सङ्कल्पमात्रेणैव तत्तत्कार्यसम्पादनप्रतिपत्तेः ॥
किञ्च, तस्य सर्वगतत्वेऽङ्गीक्रियमाणेऽशुचिषु निरन्तरसन्ततमसेषु नरकादिस्थानेष्वपि
तस्य वृत्तिः प्रसज्यते । तथा चानिष्टापत्तिः । अथ युष्मत्पक्षेऽपि यदा ज्ञानात्मना सर्वं जगत्त्रयं
व्याप्नोतीत्युच्यते तदाशुचिरसास्वादादीनामप्युपलम्भसम्भवात् नरकादिदुःखस्वरूपसंवेदनात्म-
कतया दुःखानुभवप्रसङ्गाच्च अनिष्टापत्तिस्तुल्यैवेति चे
३६ श्रीमद्रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक ६
बहिर्निर्गत्य प्रमेयं परिच्छिनत्तीति । तत्रेदमुत्तरम् । किरणानां गुणत्वमसिद्धम्; तेषां तैजस-
पुद्गलमयत्वेन द्रव्यत्वात् । यश्च तेषां प्रकाशात्मा गुणः स तेभ्यो न जातु पृथग् भवतीति ।
तथा च धर्मसङ्ग्रहिण्यां श्रीहरिभद्राचार्यपादाः—
“किरणा गुणा न दव्वं तेसिं पयासो गुणो न वा दव्वं ।
जं णाणं आयगुणो कहमद्दव्वो स अन्नत्थ ॥ १ ॥
गन्तूण न परिच्छिन्दइ णाणं णेयं तयम्मि देसम्मि ।
आयत्थं चिय नवरं अचिंतसत्तीउ विण्णेयं ॥२॥
लोहोवलस्स सत्ती आयत्था चेव भिन्नदेसंपि ।
लोहं आगरिसंती दीसइ इह कज्जपच्चक्खा ॥३॥
एवमिह नाणसत्ती आयत्था चेव हंदि लोगंतं ।
जइ परिछिंदइ सम्मं को णु विरोहो भवे एत्थं”१ ॥४॥
इत्यादि ॥
चलती है, उसी तरह यहां भी हमने जिनेन्द्रके ज्ञानकी शक्तिको देखकर जिनेन्द्रको ज्ञानकी अपेक्षा सर्वव्यापक
कहा है । तथा ज्ञान प्राप्यकारी नहीं है, क्योंकि वह आत्माका धर्म है, इसलिये ज्ञान आत्मासे बाहर निकल
कर नहीं जा सकता । यदि ज्ञान आत्माके बाहर निकल कर जाने लगे तो आत्माके अचेतनत्वकी आपत्ति खड़ी
हो जानेसे उसके अजीवत्वका प्रसंग उपस्थित हो जायेगा । लेकिन यह संभव नहीं, क्योंकि धर्मीको छोड़कर
केवल धर्म कहीं भी नहीं रहता । तथा वैशेषिक लोगोंने जो सूर्यका दृष्टांत दिया है कि जैसे सूर्यकी किरणें
गुणरूप होकर भी सूर्यसे बाहर जाकर संसारको प्रकाशित करती हैं, उसी तरह ज्ञान आत्माका गुण होकर भी
आत्मासे बाहर जाकर प्रमेय पदार्थको जानता है, यह भी ठीक नहीं । क्योंकि किरणोंका गुणत्व ही असिद्ध
है, कारण कि किरणें तैजस पुद्गलरूप हैं, इसलिये वे द्रव्य हैं । तथा किरणोंका प्रकाशात्मक गुण कभी
किरणोंसे अलग नहीं होता । हरिभद्राचार्यने धर्मसंग्रहिणीमें भी कहा है—
“किरणें द्रव्य हैं, गुण नहीं हैं । किरणोंका प्रकाश गुण है । यह प्रकाशरूप गुण द्रव्यको छोड़कर
अन्यत्र नहीं रहता । इसी तरह ज्ञान आत्माका गुण है, वह आत्माको छोड़कर अन्यत्र नहीं जाता ॥१॥
जिस देशमें ज्ञेय पदार्थ स्थित है उस प्रदेशमें ज्ञान जाकर ज्ञेयको नहीं जानता, किन्तु आत्मामें रहते
हुए ही दूर देशमें स्थित ज्ञेयको जानता है; आत्माके ज्ञानमें अचिंत्य शक्ति है ॥२॥
जिस प्रकार चुम्बक पत्थरकी शक्ति चुम्बकमें ही रहकर दूर रखे हुए लोहेको अपनी ओर
खींचती है; ॥३॥
इसी प्रकार ज्ञान शक्ति आत्मामें ही रहकर लोकके अंत तक रहनेवाले पदार्थोंको भलीभांति जानती
है, इसमें कोई विरोध नहीं है ॥४॥” इत्यादि ।
१. किरणा गुणा न द्रव्यं तेषां प्रकाशो गुणो न वा द्रव्यं ।
यज्ज्ञानमात्मगुणः कथमद्रव्यः सः अन्यत्र ॥
गत्वा न परिच्छिनत्ति ज्ञानं ज्ञेयं तस्मिन्देशे ।
आत्मस्थमेव नवरं अचिन्त्यशक्त्या तु विज्ञेयम् ॥
लोहोपलस्य शक्तिः आत्मस्थैव भिन्नदेशमपि ।
लोहमाकर्षती दृश्यते इह कार्यप्रत्यक्षा ॥
एवमिह ज्ञानशक्तिः आत्मस्थैव हन्त लोकान्तम् ।
यदि परिच्छिनत्ति सम्यक् को नु विरोधो भवेदत्र ॥
अन्य. यो. व्य. श्लोक ६ ] स्याद्वादमञ्जरी ३७
अथ सर्वगः सर्वज्ञ इति व्याख्यातम् । तत्रापि प्रतिविधीयते । ननु तस्य सार्वज्ञ्यं
केन प्रमाणेन गृहीतम् । प्रत्यक्षेण, परोक्षेण वा ? न तावत् प्रत्यक्षेण, तस्येन्द्रियार्थसन्निकर्षो-
त्पन्नतयातीन्द्रियग्रहणासामर्थ्यात् । नापि परोक्षेण । तद्धि अनुमानं, शाब्दं वा स्यात् ? न
तावदनुमानम्, तस्य लिङ्गलिङ्गिसम्बन्धस्मरणपूर्वकत्वात् । न च तस्य सर्वज्ञत्वेऽनुमेये
किञ्चिदव्यभिचारी लिङ्गं पश्यामः । तस्यात्यन्तविप्रकृष्टत्वेन तत्प्रतिबद्धलिङ्गसम्बन्धग्रहणा-
भावात् ॥
अथ तस्य सर्वज्ञत्वं विना जगद्वैचित्र्यमनुपपद्यमानं सर्वज्ञत्वमर्थादापादयतीति चेत्
न । अविनाभावाभावात् । न हि जगद्वैचित्री तत्सार्वज्ञ्यं विनान्यथा नोपपन्ना । द्विविधं हि
जगत् स्थावरजङ्गमभेदात् । तत्र जङ्गमानां वैचित्र्यं स्वोपात्तशुभाशुभकर्मपरिपाकवशेनैव ।
स्थावराणां तु सचेतनानामियमेव गतिः । अचेतनानां तु तदुपभोगयोग्यतासाधनत्वेनानादिकाल-
सिद्धमेव वैचित्र्यमिति ॥
नाप्यागमस्तत्साधकः । स हि तत्कृतोऽन्यकृतो वा स्यात् ? तत्कृत एव चेत् तस्य सर्व-
ज्ञतां साधयति तदा तस्य महत्त्वक्षतिः । स्वयमेव स्वगुणोत्कीर्त्तनस्य महतामनधिकृतत्वात् ।
अन्यच्च, तस्य शास्त्रकर्तृत्वमेव न युज्यते । शास्त्रं हि वर्णात्मकम् । ते च तालुवादिव्यापार-
( ३) सर्वज्ञत्व—वैशेषिकोंके ईश्वरका सर्वज्ञत्व प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष किसी भी प्रमाणसे सिद्ध
नहीं होता । प्रत्यक्ष प्रमाणसे ईश्वरका सर्वज्ञत्व इसलिये सिद्ध नहीं हो सकता कि प्रत्यक्ष इंद्रिय और मनके
संयोगसे उत्पन्न होता है, इसलिये वह अतीन्द्रिय ज्ञानको नहीं जान सकता । परोक्ष ज्ञानसे भी ईश्वरके
सर्वज्ञत्वकी सिद्धि नहीं होती । क्योंकि वह परोक्ष ज्ञान अनुमानसे सर्वज्ञत्वको जानता है, अथवा शब्दसे ? अनु-
मानसे ईश्वरके सर्वज्ञत्वका ज्ञान नहीं हो सकता, क्योंकि लिंगी और लिंग (साध्य और हेतु) दोनोंके संबंधके
स्मरणपूर्वक ही अनुमान होता है । (जैसे 'पर्वत अग्निवाला है, धूमवान् होनेसे—' यहाँ पहले धूमरूप
लिंगका ग्रहण होता है और फिर अग्निरूप लिंगीके साथ लिंगके संबंधका स्मरण होता है । इसी तरह
'ईश्वर सर्वज्ञ है, क्योंकि वह अपनी इच्छासे ही संपूर्ण प्राणियोंको सुख-दुःखका अनुभव करानेमें समर्थ है—'
इस अनुमानमें लिंगका ग्रहण और इस लिंगका सर्वज्ञत्वरूप लिंगीके साथ संबंधका स्मरण होना चाहिये ।
परन्तु ऐसा नहीं होता; इसलिये अनुमानसे ईश्वरके सर्वज्ञत्वका ज्ञान नहीं हो सकता ।) तथा ईश्वरके
सर्वज्ञत्वरूप अनुमेयमें हम कोई भी अव्यभिचारी लिंग नहीं देखते, क्योंकि वह ईश्वर अत्यन्त दूर है,
इसलिये ईश्वरसे संबद्ध लिंगका सर्वज्ञत्वरूप लिंगीके साथ संबंधका ग्रहण नहीं हो सकता ।
यदि वादी लोग कहें कि ईश्वरके सर्वज्ञत्वके बिना जगत्की विचित्रता नहीं बन सकती, इस कारण
अर्थापत्तिसे ईश्वरके सर्वज्ञत्वकी सिद्धि होती है, तो यह कथन भी ठीक नहीं । क्योंकि जगत्की विचित्रता
और सर्वज्ञताकी व्याप्तिका अभाव है । जगत्की विचित्रता ईश्वरकी सर्वज्ञताके बिना अन्य प्रकारसे घटित
नहीं होती, ऐसी बात नहीं है । जंगम (त्रस) और स्थावरके भेदसे संसार दो प्रकारका है । जंगम
जीवोंकी विचित्रता स्वयं उपार्जित शुभ और अशुभ कर्मोंके उदयसे ही होती है और स्थावर जीवोंकी यही
दशा होती है । अचेतन पदार्थोंका वैचित्र्य स्थावर और जंगमके उपभोगकी योग्यताके साधन रूपमें अनादि-
कालसे सिद्ध ही है ।
आगमसे भी ईश्वरकी सिद्धि नहीं होती । क्योंकि ईश्वरको सिद्ध करनेवाला आगम ईश्वरका बनाया
हुआ है, या किसी दूसरेका ? यदि वह आगम ईश्वरप्रणीत होकर ही ईश्वरकी सिद्धि करता है तो ईश्वरकी
महान् क्षति होगी । क्योंकि महात्मा लोग स्वयं ही अपने गुणोंकी प्रशंसा नहीं करते हैं । तथा ईश्वरका शास्त्र-
कर्तृत्व ही सिद्ध नहीं होता । क्योंकि शास्त्र वर्णात्मक होता है । ये वर्ण तालु आदिकी क्रियासे उत्पन्न होते