स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary
आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८ श्रीमद्रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक ६
अथ तदभिमतमीश्वरस्य जगत्कर्तृत्वमभ्युपगमं मिथ्याभिनिवेशरूपं निरूपयन्नाह—
कर्तास्ति कश्चिज्जगतः स चैकः स सर्वगः स स्ववशः स नित्यः ।
इमाः कुहेवाकविडम्बनाः स्युस्तेषां न येषामनुशासकस्त्वम् ॥६॥
जगतः—प्रत्यक्षादिप्रमाणोपलक्ष्यमाणचराचररूपस्य विश्वत्रयस्य, कश्चिद्—अनिर्वच-
नीयस्वरूपः पुरुषविशेषः, कर्ता—स्रष्टा, अस्ति—विद्यते । ते हि इत्थं प्रमाणयन्ति । उर्वीपर्वत-
तर्वाऽऽदिकं सर्वं, बुद्धिमत्कर्तृकं, कार्यत्वात् ; यद् यत् कार्यं तत् तत्सर्वं बुद्धिमत्कर्तृकं, यथा घटः,
तथा चेदं, तस्मात् तथा । व्यतिरेके व्योमादि । यश्च बुद्धिमांस्तत्कर्ता स भगवानीश्वर एवेति ॥
उत्तर प्रदेशोंके साथ संयोग होनेस उत्पाद, तथा पूर्वोत्तर दोनों पर्यायोंमें आकाश द्रव्यके मौजूद रहनेसे ध्रौव्य
अवस्थाएँ पायी जाती हैं । इसलिए द्रव्यकी अपेक्षा आकाश नित्य है, और पर्यायकी अपेक्षा अनित्य । दूसरे
शब्दोंमें, जैनसिद्धान्तके अनुसार, द्रव्य और पर्याय कथंचित्-भिन्न हैं और कथंचित्-अभिन्न । जिस प्रकार
बिना द्रव्यके पर्याय नहीं रह सकती, उसी तरह बिना पर्यायके द्रव्य नहीं रह सकते । परन्तु वैशेषिक लोग
कुछ पदार्थोंको सर्वथा नित्य मानते हैं और कुछको सर्वथा अनित्य । इसीलिए वैशेषिकों द्वारा मान्य 'अप्रच्युत,
अनुत्पन्न और स्थिररूप' नित्यका लक्षण न स्वीकार करके जैन लोग 'पदार्थके भावका नष्ट नहीं होना' ही
नित्यत्वका लक्षण मानते हैं ।
इस श्लोककी व्याख्यामें टीकाकार मल्लिषेणने निम्न विषयोंपर भी विचार किया है ।
(१) अन्धकार तेजकी ही एक पर्यायविशेष है, सर्वथा अभावरूप नहीं है । जैनदर्शनके अनुसार
प्रकाशकी तरह तम भी चक्षुका विषय है । इसलिए जैनशास्त्रोंमें अन्धकारको पौद्गलिक—स्पर्श, रस, गन्ध
और वर्णयुक्त—स्वीकार किया गया है । जैन लोगोंका कहना है कि यदि वैशेषिक लोग दीपककी प्रभाको
पौद्गलिक मानते हैं, तो उ-हें अन्धकारको पुद्गलकी पर्याय माननेमें क्या आपत्ति है ?
(२) पदार्थको एकान्त-नित्य अथवा एकान्त-अनित्य स्वीकार करनेसे उसमें अर्थक्रियाकारित्व अर्थात्
वस्तुत्व ही सिद्ध नहीं होता । इस विषयको नाना ऊहापोहात्मक विकल्पोंके साय टीकाकारने विस्तारपूर्वक
प्रतिपादित किया है ।
( ३ ) नित्यानित्यके सिद्धान्तको दूसरे वादी भी रूपान्तरसे स्वीकार करते हैं । उदाहरणके लिए,
वैशेषिक लोग पृथिवीको नित्य और अनित्य दोनों मानते हैं; तथा एक ही अवयवीके चित्ररूपकी कल्पना
करते हैं । बौद्ध लोग भी एक ही चित्रपटमें नील-अनील धर्मोंको मानते हैं । इसी तरह पातंजलमतके अनु-
यायी धर्म, लक्षण और अवस्थाको धर्मीसे भिन्न और अभिन्न मानते हैं ।
अब, वैशेषिकों द्वारा मान्य ईश्वरके जगत्कर्तृत्वमें दूषण देते हुए कहते हैं—
श्लोकार्थ—हे नाथ, जो अप्रामाणिक लोग 'जगत्का कोई कर्त्ता है (१) वह एक है, (२) सर्व-
व्यापी है, (३) स्वतन्त्र है और (४) नित्य है' आदि दुराग्रहसे परिपूर्ण सिद्धान्तोंको स्वीकार करते हैं, उनका
तू अनुशास्ता नहीं हो सकता ।
व्याख्यार्थ—पूर्वपक्ष—'जगतः कश्चित् कर्ता अस्ति'—प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंसे जाने हुए स्थावर और
जंगमरूप तीनों विश्वका अनिर्वचनीय स्वरूप कोई पुरुषविशेष सृष्टिकर्ता है । इसमें निम्नलिखित प्रमाण दिया
गया है—'पृथिवी, पर्वत, वृक्ष अ.दि पदार्थ किसी बुद्धिमान कर्ताके बनाये हुए हैं, क्योकि ये कार्य हैं; जो
जो कार्य होते हैं वे सब किसी बुद्धिमान् कर्ताके बनाये हुए होते हैं, जैसे घट पृथिवी, पर्वत आदि भी कार्य
हैं, इसलिए ये भी बुद्धिमान् कर्ताके बनाये हुए होने चाहिए' । व्यतिरेक रूपमें—'आकाश आदि कार्य नहीं
हैं, इसलिए किसी बुद्धिमान् कर्ताका बनाया हुआ भी नहीं है ।' जो कोई इन पदार्थोंका बुद्धिमान् कर्ता है
वह भगवान् ईश्वर ही है ।