स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary
आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक ५
भेदाभेदकल्पना तदवस्थैव । उपकारस्य समवायस्य समवायादभेदे समवाय एव कृतः स्यात् ।
भेदे पुनरपि समवायस्य न नियतसम्बन्धिसम्बन्धत्वम् । तन्नैकान्तनित्यो भावः क्रमेणार्थ-
क्रियां कुरुते ॥
नाप्यक्रमेण । नह्येको भावः सकलकालकलाकलापभाविनीर्युगपत् सर्वाः क्रियाः करो-
तीति प्रातीतिकम् । कुरुतां वा, तथापि द्वितीयक्षणे किं कुर्यात् । करणे वा, क्रमपक्षभावी दोषः ।
अकरणे त्वर्थ क्रियाकारित्वाभावाद् अवस्तुत्वप्रसङ्गः । इत्येकान्तनित्यात् क्रमाक्रमाभ्यां व्याप्तार्थ-
क्रिया व्यापकानुपलब्धिबलाद् व्यापकनिवृत्तौ निवर्तमाना स्वव्याप्यमर्थक्रियाकारित्वं निवर्त-
यति । अर्थक्रियाकारित्वं च निवर्तमानं स्वव्याप्यं सत्त्वं निवर्तयति । इति नैकान्तनित्यपक्षो
युक्तिक्षमः ॥
एकान्तनित्यपक्षोऽपि न कक्षीकरणार्हः । अनित्यो हि प्रतिक्षणविनाशी स च न
क्रमेणार्थक्रियासमर्थः देशकृतस्य कालकृतस्य च क्रमस्यैवाभावात् । क्रमो हि पौर्वापर्यम्, तच्च
क्षणिकस्यासम्भवि । अवस्थितस्यैव हि नानादेशकालव्याप्तिः देशक्रमः कालक्रमश्चाभिधीयते ।
न चैकान्तविनाशिनि सास्ति ।
वैसी की वैसी ही रहीं । तथा उपकार और समवायका अभेद माननेपर समवाय और उपकार एक हो ठहरेंगे,
और फिर तो सहकारियोंने उपकार नहीं किया, किन्तु समवायने ही किया—ऐसा कहना चाहिए । यदि
समवाय और उपकार भिन्न हैं, तो नियत सम्बन्धियोंके साथ समवायका सम्बन्ध नहीं हो सकता । (अभिप्राय
यह है कि उपकार और समवायके भेद माननेमें दोनोंका संयोग सम्बन्ध नहीं हो सकता, क्योंकि संयोग
सम्बन्ध द्रव्योंमें ही होता है । यदि दोनोंमें समवाय सम्बन्ध माना जाय तो समवाय व्यापक है, इसलिए
नियत सम्बन्धियोंके साथ समवाय सम्बन्ध भी नहीं बन सकता ।) अतएव एकान्त नित्यमें क्रमसे अर्थक्रिया
नहीं हो सकती ।
नित्य पदार्थ अक्रमसे भी अर्थक्रिया नहीं करता है । क्योंकि एक पदार्थ समस्त कालमें होनेवाली
अर्थक्रियाको एक ही समयमें कर डाले, यह अनुभवमें नहीं आता । अथवा यदि नित्य पदार्थ अक्रमसे अर्थ-
क्रिया करे भी, तो वह दूसरे क्षणमें क्या करेगा ? यदि कहो कि दूसरे क्षणमें भी वह अर्थक्रिया करता है तो
जो दोष क्रमसे अर्थक्रिया करनेमें आते हैं, वे सब दोष यहाँ भी आयेंगे । यदि कहा जाय कि नित्य पदार्थ
दूसरे क्षणमें कुछ भी नहीं करता, तो दूसरे क्षणमें अर्थक्रियाकारित्वका अभाव होनेसे नित्य पदार्थ अवस्तु
ठहरेगा । इस प्रकार व्यापककी अनुपलब्धिके कारण व्यापककी निवृत्ति हो जानेसे विरत हो जानेवाली क्रम
और अक्रमसे व्याप्त ऐसी अर्थक्रिया अपने व्याप्य अर्थक्रियाकारित्वकी भी निवृत्ति कर देती है । तथा निवृत्त
होनेवाला अर्थक्रियाकारित्व अपने व्याप्य पदार्थकी भी निवृत्ति कर देता है । अतः एकान्त-नित्य पदार्थमें
क्रम और अक्रमसे अर्थक्रिया नहीं बनती । तथा वस्तुमें अर्थक्रियाकारित्वके नष्ट हो जानेपर वस्तुका अस्तित्व