सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary

आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished458 पृष्ठ

पृष्ठ 75, कुल 458 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 75

अन्य. यो. व्य. श्लोक ५ ] स्याद्वादमञ्जरी २३
न तेन सहकारिणोऽपेक्ष्यन्ते अपि तु कार्यमेव, सहकारिष्वसत्स्वभवत् तानपेक्षत इति
चेत्, तत् किं स भावोऽसमर्थः, समर्थो वा ? समर्थश्चेत्, किं सहकारिमुखप्रेक्षणदीनानि
तान्यपेक्षते न पुनर्झटिति घटयति । ननु समर्थमपि बीजम् १इलाजलानिलादिसहकारिसहित-
मेवाङ्कुरं करोति, नान्यथा । तत् किं तस्य सहकारिभिः किञ्चिदुपक्रियेत, न वा ? यदि नोप-
क्रियेत, तदा सहकारिसन्निधानात् प्रागिव किं न तदाप्यर्थक्रियायामुदास्ते । उपक्रियेत चेत् सः,
तर्हि तैरुपकारोऽभिन्नो, भिन्नो वा क्रियत इति वाच्यम् । अभेदे स एव क्रियते । इति लाभ-
मिच्छतो२ मूलक्षतिरायाता कृतकत्वेन तस्यानित्यत्वापत्तेः ॥
भेदे तु कथं तस्योपकारः, किं न सह्यविन्ध्याद्रेरपि । तत्सम्बन्धात् तस्यायमिति चेत्,
उपकार्योपकारयोः कः सम्बन्धः ? न तावत् संयोगः, द्रव्ययोरेव तस्य भावात् । अत्र तु उपकार्यं
द्रव्यम्, उपकारश्च क्रियेति न संयोगः । नापि समवायः, तस्यैकत्वात् व्यापकत्वाच्च प्रत्यासत्ति-
विप्रकर्षाभावेन सर्वत्रतुल्यत्वान्न नियतैः सम्बन्धिभिः सम्बन्धो युक्तः । नियतसम्बन्धि-सम्बन्धे
चाङ्गीक्रियमाणे तत्कृत उपकारोऽस्य समवायस्याभ्युपगन्तव्यः । तथा च सति उपकारस्य
अब यदि कहा जाय कि नित्य पदार्थ स्वयं सहकारी कारणोंकी अपेक्षा नहीं करते, परन्तु सहकारी
कारणोंके अभावमें नहीं होनेवाला कार्य ही सहकारी कारणोंकी अपेक्षा रखता है, तो प्रश्न होता है कि
वह नित्य पदार्थ समर्थ है या असमर्थ ? यदि वह समर्थ है तो वह सहकारी कारणोंके मुँहकी तरफ क्यों
देखता है ? क्यों झटपट कार्य नहीं कर डालता ? यदि कहो कि जिस प्रकार बीजके समर्थ होते हुए भी बीज
पृथिवी, जल, वायु आदिके सहयोगसे ही अंकुरको उत्पन्न करता है, अन्यथा नहीं; इसी प्रकार नित्य पदार्थ
समर्थ होते हुए भी सहकारियोंके बिना कार्य नहीं करता । तो प्रश्न होता है, कि सहकारी कारण नित्य
पदार्थका कुछ उपकार करते हैं या नहीं ? यदि सहकारी कारण नित्य पदार्थका कुछ उपकार नहीं करते हैं
तो वह नित्य पदार्थ जैसे सहकारी कारणोंके सम्बन्धके पहले अर्थक्रिया करनेमें उदास था, वैसे ही सह-
कारियोंके संयोग होनेपर भी क्यों उदास नहीं रहता ? यदि कहो कि सहकारी नित्य पदार्थका उपकार करते
हैं, तो प्रश्न होता है कि यह उपकार पदार्थसे अभिन्न है या भिन्न ? यदि सहकारी पदार्थसे अभिन्न ही
उपकार करते हैं तो सिद्ध हुआ कि नित्य पदार्थ ही अर्थक्रियाको करता है । इस प्रकार लाभकी इच्छा रखने-
वाले वादीके मूलका भी नाश हो जाता है । क्योंकि यदि नित्य पदार्थ सहकारियोंकी अपेक्षा रखेगा तो वह
कृतक हो जायेगा और कृतक होनेसे वह नित्य नहीं रह सकता ।
यदि सहकारियोंका उपकार पदार्थसे भिन्न है, तो भेदत्व सामान्यसे सह्य-विन्ध्यके साथ भी उस भिन्न-
उपकारका सम्बन्ध क्यों नहीं मानते ? ( अर्थात् यदि सहकारियोंके उपकारसे नित्य पदार्थ सर्वथा भिन्न है
तो यह नहीं मालूम हो सकता कि वह उपकार नित्य पदार्थका ही है । ऐसी हालतमें सह्य और विन्ध्यका
भी उपकार माना जा सकता है, क्योंकि सहकारियों तथा सह्य और विन्ध्यमें भी भेद है । ) यदि कहो, कि
नित्य पदार्थके साथ उपकारके सम्बन्धसे यह उपकार इस नित्य पदार्थका है—ऐसी प्रतीति होती है, तो
प्रश्न होता है कि उपकार्य और उपकार दोनोंमें कौनसा सम्बन्ध है ? उपकार और उपकार्यमें संयोग सम्बन्ध
बन नहीं सकता, क्योंकि दो द्रव्योंमें ही संयोग-सम्बन्ध होता है । यहाँपर उपकार्य द्रव्य है, और उपकार
क्रिया है, इसलिए संयोग-सम्बन्ध सम्भव नहीं । उपकार्य और उपकारमें समवाय-सम्बन्ध भी नहीं बन सकता ।
क्योंकि समवाय एक है और व्यापक है । इसलिए समवाय न किसी पदार्थसे दूर है और न समीप, वह सब
पदार्थोंमें समान है । अतएव नियत सम्बन्धियोंके साथ समवायका सम्बन्ध मानना ठीक नहीं । यदि नियत-
सम्बन्धियोंके साथ समवायका सम्बन्ध स्वीकार किया जाय तो सहकारियोंसे किये हुए उपकारको भी समवाय-
का उपकार मानना चाहिए । तथा इस तरह उपकारके विषयमें जो भेद अभेद कल्पनाएँ की गयी थीं, वे
१. पृथिवी । २. यदा कश्चिद्वार्धुषिकः स्वद्रव्यं कुसीदेच्छयाधमर्णाय प्रयच्छति । तेनाधमर्णेन न मूलद्रव्यं
न वा कुसीदं प्रत्यावर्त्यते तदायं न्यायः समापतति । वृद्धिमिच्छतो मूलद्रव्यक्षतिरुत्पन्नेत्यर्थः ।