स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary
आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअन्य. यो. व्य. श्लोक ५ ] स्याद्वादमञ्जरी १९
तथा च यद् “अप्रच्युतानुत्पन्नस्थिरैकरूपं नित्यम्” इति नित्यलक्षणमाचक्षते ।
तदपास्तम् । एवंविधस्य कस्यचिद्वस्तुनोऽभावात् । “तद्भावाव्ययं नित्यम्” १ इति तु सत्यं
नित्यलक्षणम् । उत्पादविनाशयोः सद्भावेऽपि तद्भावात् अन्वयिरूपात् यन्न व्येति तन्नित्यमिति
तदर्थस्य घटमानत्वात् । यदि हि अप्रच्युतादिलक्षणं नित्यमिष्यते तदोत्पादव्यययोर्निराधा-
रत्वप्रसङ्गः । न च तयोर्योगे नित्यत्वहानिः ।
“द्रव्यं पर्यायवियुतं पर्याया द्रव्यवर्जिताः ।
क्व कदा केन किंरूपा दृष्टा मानेन केन वा' ? ॥”२
उस समय आकाशका जीव-पुद्गलोंके साथ एक प्रदेशमें विभाग और दूसरे प्रदेशमें संयोग होता है ।
ये संयोग और विभाग एक दूसरेके विरुद्ध हैं । इसलिए संयोग-विभागमें भेद होनेसे, संयोग-विभागको धारण
करनेवाले आकाशमें भी भेद होना चाहिए । कहा भी है "विरुद्ध धर्मोंका रहना और भिन्न-भिन्न कारणोंका
होना यही भेद और भेदका कारण है ।" (यहाँपर लक्षण और कारणके भेदसे भेद दो प्रकारका बताया
गया है । जैसे घट जल लाने और पट ठण्डसे बचानेके काममें आता है—यही घट और पटमें लक्षण-भेद है ।
तथा घट मृत्तिकाके पिण्ड और पट तन्तुसे उत्पन्न होता है—यही घट और पटका कारण-भेद है । ) इसलिए
यहाँ पुद्गलके एक प्रदेशमें संयोगके विनाशसे आकाशमें व्यय होता है, और दूसरे प्रदेशमें संयोगके होनेसे
आकाशमें उत्पाद होता है । तथा उत्पाद और व्यय दोनों अवस्थाओंमें आकाश ही एक अधिकरण है,
इसलिए आकाश ध्रौव्य है । ( भाव यह है कि जैनदर्शनके अनुसार दीपककी तरह आकाश भी नित्यानित्य
है । जैनसिद्धान्तमें आकाश एक अनन्त प्रदेशवाला अखण्ड द्रव्य माना गया है । आकाश द्रव्यका काम जीव
और पुद्गलको अवकाश देना है । जिस समय जीव और पुद्गल द्रव्य आकाशके एक प्रदेशको छोड़कर
दूसरे प्रदेशके साथ संयोग करते हैं, उस समय आकाशका जीव-पुद्गलके साथ विभाग और संयोग होता है ।
अर्थात् जीव-पुद्गलके आकाश-प्रदेशोंको छोड़नेके समय आकाशमें विभाग और जीव-पुद्गलके आकाश-प्रदेशोंके
साथ संयोग करनेके समय आकाशमें संयोग होता है । दूसरे शब्दोंमें कहना चाहिए कि एक ही आकाशमें
संयोग-विभाग नामके दो विरुद्ध धर्म पाये जाते हैं । क्योंकि संयोग-विभाग नामके धर्मोंमें भेद होनेसे संयोग-
विभाग धर्मोंको धारण करनेवाले आकाश धर्मीमें भी भेद पाया जाता है । अतएव जीव-पुद्गलके आकाश-
प्रदेशोंको छोड़कर अन्यत्र गमन करनेमें जीव-पुद्गलका आकाशके प्रदेशोंके साथ संयोगका विनाश होता है,
अर्थात् आकाशमें विनाश ( व्यय ) होता है । तथा जीव-पुद्गलका आकाशके दूसरे प्रदेशोंके साथ संयोग
होनेके समय आकाशमें उत्पाद होता है । तथा उक्त उत्पाद ओर व्यय दोनों दशाओंमें आकाश मौजूद रहता
है, इसलिए आकाशमें ध्रौव्य भी है । अतएव आकाशमें उत्पाद-व्यय होनेसे अनित्यत्व और ध्रौव्य होनेसे
नित्यत्वकी सिद्धि होती है । )
इस पूर्वोक्त कथनसे "जो नाश और उत्पन्न न होता हो, और एकरूपसे स्थिर रहे, उसे नित्य कहते
हैं"—इस नित्यत्वके लक्षणका भी खण्डन हो जाता है । क्योंकि ऐसा कोई भी पदार्थ नहीं, जो उत्पत्ति और
नाशसे रहित हो, और सदा एकसा रहे । "पदार्थके स्वरूपका नाश नहीं होना नित्यत्व है"—जैनदर्शन द्वारा
मान्य नित्यत्वका यही लक्षण ठीक है । क्योंकि उत्पाद और विनाशके रहते हुए भी जो अपने स्वरूपको
नहीं छोड़ता वही नित्य है । यदि अप्रच्युत आदि पूर्वोक्त नित्यका लक्षण माना जाये, तो उत्पाद और व्ययका
कोई भी आधार न रहेगा । जैनसिद्धान्तके अनुसार नित्य पदार्थमें जो उत्पाद और व्यय माना गया है, उससे
पदार्थकी नित्यतामें कोई हानि नहीं आती । कहा भी है—
“पर्यायरहित द्रव्य और द्रव्यरहित पर्याय किसने, किस समय, कहाँपर, किस रूपमें, और कौनसे
प्रमाणसे देखे हैं" ? अर्थात् द्रव्य बिना पर्याय और पर्याय बिना द्रव्य कहीं भी सम्भव नहीं ।
१. तत्त्वार्थसूत्रम् अ. ५ सू. ३० ।
२. एतदर्थिका गाथा सन्मतितर्के प्रथमकाण्डे दृश्यते—
'दव्वं पज्जवविज्जुअं दव्वविउत्ता य पज्जवा नत्थि ॥१२॥