स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary
आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअन्य. यो. व्य. श्लोक ६ ] स्याद्वादमञ्जरी ३१
तदेवमेकत्वादिविशेषणविशिष्टो भगवानीश्वरस्त्रिजगत्कर्तेति पराभ्युपगममुपदर्श्य उत्तरा-
र्धेन तस्य दुष्टत्वमाचष्टे । इमाः—एताः, अनन्तर्रोक्ताः, कुहेवाकविडम्बनाः—कुत्सिता हेवाकाः-
आग्रहविशेषाः कुहेवाकाः कदाग्रहा इत्यर्थः । त एव विडम्बनाः विचारचातुरीवाह्यत्वेन तिर-
स्काररूपत्वाद् विगोपकप्रकाराः । स्युः--भवेयुः । तेषां प्रामाणिकापसदानाम् । येषां हे स्वामिन्
त्वं नानुशासकः—न शिक्षादाता ॥
तदभिनिवेशानां विडम्बणारूपत्वज्ञापनार्थमेव पराभिप्रेतपुरुषविशेषणेषु प्रत्येकं तच्छब्द-
प्रयोगमसूयागर्भमाविर्भावयाञ्चकार स्तुतिकारः । तथा चैवमेव निन्दनीयं प्रति वक्तारो
वदन्ति । स मूर्खः स पापीयान् स दरिद्र इत्यादि । त्वमित्येकवचनसंयुक्तयुष्मच्छब्दप्रयोगेण
परमेशितुः परसकारुणिकतयानपेक्षितस्वपरपक्षविभागमद्वितीयं हितोपदेशकत्वं ध्वन्यते ।।
अतोऽत्रायमाशयः । यद्यपि भगवानविशेषेण सकलजगज्जन्तुजातहितावहां सर्वेभ्य एव
देशनावाचमाचष्टे, तथापि सैव केषाञ्चिद् निचितनिकाचित¹पापकर्मकलुषितात्मनां रुचिरूपतया
न परिणमते । अपुनर्बन्धक²ादिव्यतिरिक्तत्वेनायोग्यत्वात् । तथा च ³ कादम्ब्यां बाणोऽपि
वभाण—“अपगतमले हि मनसि स्फटिकमणाविव रजनिकरगभस्तयो विशन्ति सुखमुपदेश-
गुणाः । गुरुवचनममलमपि सलिलमिव महदुपजनयति श्रवणस्थितं शूलमभव्यस्य” इति ।
अतो वस्तुवृत्त्या न तेषां भगवाननुशासक इति ॥
उत्तरपक्ष—'इमाः कुहेवाकविडम्बनाः'—इस प्रकारकी कुत्सित आग्रहरूप विडम्बनाएँ विचाररहित
होनेके कारण तिरस्कारके योग्य हैं। अप्रामाणिक लोगोंकी ये विडम्बनाएँ अपने दोषोंको छिपानेके लिए ही
हैं। ऐसे लोगोंके उपदेष्टा, हे स्वामिन्, आप नहीं हो सकते ।
न्याय-वैशेषिकोंकी मान्यताको विडम्बना सिद्ध करनेके लिए ही श्लोकमें न्याय-वैशेषिकों द्वारा अभीष्ट
ईश्वरके प्रत्येक विशेषणोंके साथ 'तत्' शब्दका प्रयोग किया गया है। जिस प्रकार वक्ता लोग किसी निन्दनीय
पुरुषको कहते हैं कि वह मूर्ख है, वह पापी है, वह दरिद्र है, आदि; उसी प्रकार यहाँ भी ईश्वरके लिए
कहा गया है, कि वह जगत्का कर्ता है, वह एक है, वह नित्य है, आदि । श्लोकमें युष्मत् (त्वं) शब्दके
प्रयोगसे परम दयालु होनेके कारण पक्षपातकी भावना रहित जिनेन्द्र भगवान्का अद्वितीय हितोपदेशकत्व
ध्वनित होता है ।
भाव यह है कि यद्यपि भगवान् सामान्यरूपसे सम्पूर्ण प्राणियोंको हितोपदेश करते हैं, परन्तु वह
उपदेश पूर्व जन्ममें उपार्जन किये हुए निकाचित ( जिस कर्मकी उदीरणा, संक्रमण, उत्कर्षण और अपकर्षणरूप
अवस्थाएँ न हो सकें उसे निकाचित कर्म कहते हैं ) पापकर्मोंसे मलिन आत्मावाले प्राणियोंको सुखकर नहीं
लगता । कारण कि इस प्रकारके पापी जीव अपुनर्बन्धक ( जो जीव तीव्र भावोंसे पाप नहीं करता है तथा
जिसकी मुक्ति पुद्गलपरावर्तनमें हो जाती है। उसे अपुनर्बन्धक कहते हैं । ) ( देखिए परिशिष्ट [ क ],
आदि जीवोंसे भिन्न हैं, इसलिये उपदेशके पात्र नहीं हैं। बाणने भी कादम्बरीमें कहा है—“जिस
प्रकार निर्मल स्फटिक मणिमें चन्द्रमाकी किरणोंका प्रवेश होता है, उसी तरह निर्मल चित्तमें उपदेश प्रवेश
१. उदये संकममुदये चउसुवि दातुं कमेण णो सक्कं । उवसंतं च णिवत्ति णिकाचिदं होदि जं कम्मं ।
छाया—उदये संक्रमोदययोः चतुर्ष्वपि दातुं क्रमेण नो शक्यम् । उपशान्तं च निधत्तिः निकाचितं यत् कर्म ॥
( गोम्मटसार कर्मकाण्ड गा० ४४० )
२. 'पावं ण तिव्वभावा कुणइ ण बहुमन्नई भवं घोरम् ।
उच्चिअट्ठिइं च सेवइ सव्वत्थ वि अपुणबन्धोत्ति' ॥
छाया—पापं न तीव्रभावात् करोति न बहुमन्यते भवं घोरम् ।
उचितार्थं च सेवते सर्वत्रापि अपुनर्बन्धक इति ॥ इति धर्मसंग्रहे तृतीयाधिकरणे ।
३. बाणभट्टकृतकादम्बरी पूर्वार्ध, पृ० १०३, पं० १० ।