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सर्वकोश
स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary

आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished458 पृष्ठ

पृष्ठ 77, कुल 458 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 77

अन्य. यो. व्य. श्लोक ५ ] स्याद्वादमञ्जरी २५
यदाहुः—
“यो यत्रैव स तत्रैव यो यदैव तदैव सः।
न देशकालयोर्व्याप्तिर्भावानामिह विद्यते”॥
न च सन्तानापेक्षया पूर्वोत्तरक्षणानां क्रमः सम्भवति; सन्तानस्यावस्तुत्वात् । वस्तुत्वेऽपि
तस्य यदि क्षणिकत्वं, न तर्हि क्षणेभ्यः कश्चिद्विशेषः। अथाक्षणिकत्वं, तर्हि समाप्तः
क्षणभङ्गवादः॥
नाप्यक्रमेणार्थक्रिया क्षणिके सम्भवति। स ह्येको बीजपूरादिक्षणो¹ युगपदनेकान्
रसादिक्षणान् जनयन् एकेन स्वभावेन जनयेत्, नानास्वभावैर्वा ? यद्येकेन तदा तेषां रसादि-
क्षणानामेकत्वं स्यात्, एकस्वभावजन्यत्वात् । अथ नानास्वभावैर्जनयति किञ्चिद्रूपादिकमुपा-
दानभावेन, किञ्चिद्रसादिकां सहकारित्वेन, इति चेत्, तर्हि ते स्वभावास्तस्यात्मभूता, अनात्म-
भूता वा ? अनात्मभूताश्चेत् स्वभावत्वहानिः। यद्यात्मभूताः तर्हि तस्यानेकत्वम्; अनेकस्व-
भावत्वात् । स्वभावानां वा एकत्वं प्रसज्येत; तद्व्यतिरिक्तत्वात् तेषां तस्य चैकत्वात् ॥
पदार्थ क्षण-क्षणमें नष्ट होनेवाला है, इसलिए वह क्रमसे अर्थक्रिया नहीं कर सकता। कारण कि अनित्य
पदार्थमें देश और कालकृत क्रम सम्भव नहीं। पूर्वक्रम और अपरक्रम क्षणिक पदार्थमें असम्भव है। क्योंकि
नित्य पदार्थमें ही अनेक देशोंमें रहनेवाला देशक्रम और अनेक कालमें रहनेवाला कालक्रम सम्भव हो सकता
है। सर्वथा अनित्य पदार्थामें देश और कालक्रम नहीं हो सकता। कहा भी है:—
'जो पदार्थ जिस स्थान (देश) और जिस क्षण (काल) में है, वह उसी स्थान और उसी
क्षणमें है, क्षणिक भावोंके साथ देश और कालकी व्याप्ति नहीं बन सकती।'
यदि कहा जाय कि सन्तानकी अपेक्षासे पूर्व और उत्तर क्षणमें क्रम सम्भव हो सकता है तो यह भी
ठीक नहीं। क्योंकि सन्तान कोई वस्तु ही नहीं। यदि सन्तानको वस्तु स्वीकार किया जाय, तो सन्तान
क्षणिक है, अथवा अक्षणिक ? सन्तानको क्षणिक माननेपर सन्तानमें क्षणिक पदार्थोंसे कोई विशेषता न होगी।
अर्थात् जिस प्रकार पदार्थोंके क्षणिक होनेपर उनमें क्रम नहीं होता, वैसे ही सन्तानमें भी क्रम न होगा।
यदि सन्तान अक्षणिक है, तो क्षणभंगवाद ही नहीं बन सकता।
क्षणिक पदार्थमें अक्रमसे भी अर्थक्रिया सम्भव नहीं। क्योंकि एक बीजपूर (बिजौरा) आदि क्षण
(बौद्ध लोग वस्तुओंको क्षण कहते हैं, क्योंकि उनके मतमें सब पदार्थ क्षणिक हैं) एक साथ अनेक रस
आदि क्षण (वस्तु) को एक स्वभावसे उत्पन्न करता है, अथवा नाना स्वभावसे ? यदि एक स्वभावसे
उत्पन्न करता है, तो एक स्वभावसे उत्पन्न होनेके कारण रस आदि पदार्थोंमें एकता हो जानी चाहिए।
यदि बीजपूर क्षण रस आदि क्षणको नाना स्वभावोंसे उत्पन्न करता है—अर्थात् किसी रूप आदिको उपा-
दानभावसे, और किसी रस आदिको सहकारीभावसे उत्पन्न करता है—तो प्रश्न होता है कि वे उपादान
और सहकारीभाव बीजपूरके आत्मभूत (निजस्वभाव) हैं, या अनात्मभूत (परस्वभाव) ? यदि उपादानादि
भाव बीजपूरके अनात्मभूत हैं तो उपादानादि भाव बीजपूरके स्वभाव ही नहीं कहे जा सकते। यदि उपा-
दानादि भाव बीजपूरके आत्मभूत हैं तो अनेक स्वाभावरूप होनेसे बीजपूर पदार्थमें अनेकता हो जायेगी,
अर्थात् जितने स्वभाव होंगे, उतने ही उन स्वभावोंके धारक बीजपूर पदार्थ भी होंगे। अथवा उपादानादि
बीजपूर पदार्थसे अभिन्न हैं, और बीजपूर एक है, इसलिए स्वभावोंका एकत्व हो जायेगा।
१. 'बीजपूरादिरूपादि' पाठान्तरम् । एते बौद्धाः क्षणशब्देन पदार्थान् गृह्णन्ति । यतः सर्वे पदार्थाः
क्षणिकाः ।
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